manorma munshi premchand
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उन्होंने सब चीजों में से जरा-जरा सा निकालकर अपनी पत्तल में रख लिया और बाकी चीजें शंखधर के आगे रख दीं।

शंखधर-आपने तो केवल उलाहना छुड़ाया है। लाइए मैं परस दूं।

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चक्रधर-अगर तुम इस तरह जिद करोगे, तो मैं तुम्हारी दवा न करूंगा।

शंखधर-मुझे क्या, न दवा दीजिएगा। तो यही पड़ा-पड़ा मर जाऊंगा। कौन कोई रोने वाला बैठा हुआ है?

यह कहते -कहते शंखधर की आंखें सजल हो गईं। चक्रधर ने विकल होकर कहा-अच्छा लाओ, तुम्हीं अपने हाथ से दे दो। अपशब्द क्यों मुंह से निकालते हो?

शंखधर ने सभी चीजों में से आधी से अधिक उनके सामने रख दी; और आप एक पंखा लेकर उन्हें झलने लगा। चक्रधर ने वात्सल्यपूर्ण कठोरता से कहा-मालूम होता है, आज तुम मुझे बीमार करोगे। भला, इतनी चीजें मैं खा सकूंगा?

शंखधर-इसीलिए तो मैंने थोड़ी-थोड़ी दी हैं।

चक्रधर-यह थोड़ी-थोड़ी हैं। तो क्या तुम सब-की-सब मेरे ही पेट में ठूंस देना चाहते हो? अब भी बैठोगे या नहीं? मुझे पंखे की जरूरत नहीं।

शंखधर-आप खाइये, मैं तो आपकी जूठन खाऊंगा।

उसकी आंखें फिर सजल हो गयीं। चक्रधर ने तिरस्कार के भाव से कहा-क्यों भाई, मेरी जूठन क्यों खाओगे? अब तो सब बातें तुम्हारे ही मन की हो रही हैं।

शंखधर-मेरी बहुत दिनों से यही आकांक्षा थी। जब से आपकी कीर्ति सुनी, तभी से यह अवसर खोज रहा था।

चक्रधर को फिर हार माननी पड़ी। वह एकान्तवासी, संयमी, व्रतधारी, योगी आज इस अपरिचित दीन बालक के दुराग्रहों को किसी भांति न टाल सकता था।

चक्रधर जब भोजन करके उठ गये, तो उसने उसी पत्तल में अपनी चीजें डाल लीं और भोजन करने बैठा। ओह! इस भोजन में कितना स्वाद था! क्या सुधा में इतना स्वाद हो सकता है!

चक्रधर हाथ मुंह धोकर गदगद कण्ठ से बोले -तुमने आज मेरे दो नियम भंग कर दिये। बिना जाने ये किसी को मेहमान बना लेने का यही फल होता है। मैं ऐसे जिद्दी लड़के को अपने साथ और न रखूंगा। तुम्हारा घर कहां है? यहां से कितनी दूर है?

शंखधर-मेरे तो कोई घर ही नहीं।

चक्रधर-माता-पिता तो होंगे? वह किस गाँव में रहते हैं?

शंखधर-यह मुझे कुछ नहीं मालूम। पिताजी तो मेरे बचपन ही में घर से चले गये थे और माताजी का पांच साल से मुझे कोई समाचार नहीं मिला।

चक्रधर को ऐसा मालूम हुआ, मानो पृथ्वी नीचे खिसकी जा रही है, मानो वह जल में बहे जा रहे हैं। पिता बचपन ही में घर से चले गये और माताजी का पांच साल से कुछ समाचार नहीं मिला? भगवान, क्या यह वही नन्हा-सा बालक है। जिसे अपने हृदय से निकालने की चेष्टा करते हुए आज 16 वर्षों से अधिक हो गये!

उन्होंने हृदय को संभालते हुए पूछा-तुम पांच साल तक कहा रहे बेटा, जो घर नहीं गये?

शंखधर-पिताजी को खोजने निकला था और जब तक वह न मिलेंगे, लौटकर घर न जाऊंगा।

चक्रधर को ऐसा मालूम हुआ, मानो पृथ्वी डगमगा रही है, मानों समस्त ब्रह्मांड एक प्रलयकारी भूचाल से आन्दोलित हो रहा है। वह सायबान के स्तम्भ के सहारे बैठ गये और ऐसे स्वर में बोले, जो आशा और भय के वेगों को दबाने के कारण क्षीण हो था, यह प्रश्न न गया था बल्कि-एक जानी हुई बात का समर्थन मात्र था। तुम्हारा नाम क्या है बेटा? वह धड़कते हुए हृदय से उत्तर की ओर कान लगाये थे, जैसे कोई अपराधी अपना कर्मदण्ड सुनने के लिए न्यायाधीश की ओर कान लगाये खड़ा हो।

शंखधर ने जवाब दिया-मेरा नाम तो शंखधर सिंह है।

चक्रधर-और तुम्हारे पिता का क्या नाम है?

शंखधर-उन्हें मुंशी चक्रधरसिंह कहते हैं।

चक्रधर-घर कहां है?

शंखधर-जगदीशपुर!

सर्वनाश! चक्रधर को ऐसा ज्ञात हुआ कि उनकी देह से प्राण निकल गये हैं, मानो उनके चारों ओर शून्य है। ‘ शंखधर!’ बस, यही एक शब्द उस प्रशस्त शून्य में किसी पक्षी की भांति चक्कर लगा रहा था। ‘ शंखधर! ‘ यही एक स्मृति थी, जो उस प्राण-शून्य दशा में चेतना को संस्कारों में बांधे हुए थी।

शंखधर को अपने पिता के साथ रहते एक महीना हो गया। न वह जाने का नाम लेता है, न चक्रधर ही जाने को कहते हैं। शंखधर इतना प्रसन्न चित्त रहता है मानो अब उसके लिए संसार में कोई दुःख, कोई बाधा नहीं इतने ही दिनों में उसका रंग-रूप कुछ और हो गया है। मुख पर यौवन का तेज झलकने लगा और जीर्ण शरीर भर आया है। मालूम होता है, कोई अखण्ड ब्रह्मचर्य व्रतधारी ऋषिकुमार है।

चक्रधर को अपने हाथों कोई काम नहीं करना पड़ता। शंखधर कभी उन्हें अपनी धोती भी नहीं छांटने देता। दोनों प्राणियों के जीवन का वह समय सबसे आनन्दमय होता है, जब एक प्रश्न करता है और दूसरा उत्तर देता है। बाबाजी अपने जीवन के सारे अनुभव, दर्शन, धर्म, इतिहास की सारी बातें घोलकर पिला देना चाहते हैं। दूसरों से उसकी सज्जनता और सहनशीलता का बखान सुनकर उन्हें कितना गर्व होता है! वह मारे आनन्द से गदगद हो जाते हैं, उनकी आंखें सजल हो जाती हैं। सब जगह यह बात खुल गयी है कि यह युवक उनका पुत्र है। दोनों सूरतें इतनी मिलती हैं कि। चक्रधर के इनकार करने पर भी किसी को विश्वास नहीं आता। जो बात सब जानते हैं, उसे वह स्वयं नहीं जानते और न जानना ही चाहते हैं।

शंखधर को कभी-कभी प्रबल इच्छा होती थी कि पिताजी के चरणों पर गिर पड़ूं और साफ-साफ कह दूं। उसी के मन में यह इच्छा नहीं थीं। चक्रधर भी कभी-कभी पुत्र-प्रेम से विकल हो जाते और चाहते कि उसे गले लगाकर कहूं-बेटा, तुम मेरी ही आंखों के तारे हो; तुम मेरे ही जिगर के टुकड़े हो। वह शंखधर के मुख से उसकी माता की विरह-व्यथा, दादी के शोक और दादा के क्रोध की कथाएं सुनते कभी न थकते थे। रानी जी उससे कितना प्रेम करती थीं; यह चर्चा सुनकर चक्रधर बहुत दुःखी हो जाते थे।

इस तरह एक महीना गुजर गया और अब शंखधर को यह फिक्र हुई कि इन्हें किस बहाने से घर से चलूं। अहा, कैसे आनन्द का समय होगा, जब मैं इनके साथ घर पहुंचूंगा।

लेकिन बहुत सोचने पर भी उसे कोई बहाना न मिला। तब उसने निश्चय किया कि माताजी को पत्र लिखकर यहीं क्यों न बुला लूं? माताजी पत्र पाते ही सिर के बल दौड़ी आयेंगी। वह पछताया कि मैंने व्यर्थ ही इतनी देर लगायी। उसी रात को उसने अपनी माता के नाम पत्र डाल दिया। वहां का पता-ठिकाना, रेल का स्टेशन सभी बातें स्पष्ट करके लिख दीं।

एक महीना पूरा गुजर गया और न अहल्या ही आयी, न कोई दूसरा ही। शंखधर दिन-भर उसकी बाट जोहता रहता। रेल का स्टेशन वहां से पांच मील पर था। रास्ता भी साफ था। फिर भी कोई नहीं आया। चक्रधर जब कहीं चले जाते, तो वह चुपके से स्टेशन की राह लेता और निराश लौट आता। आखिर एक महीने के बाद तीसरे दिन उसे एक पत्र मिला; जिसे पढ़कर उसके शोक की सीमा न रही। अहल्या ने लिखा था-मैं बड़ी अभागिनी हूं। तुम इतनी कठिन तपस्या करके जिस देवता के दर्शन कर पाये, उसके दर्शन करने की परम अभिलाषा होने पर भी मैं हिल नहीं सकती। एक महीने से बीमार हूं जीने की आशा नहीं। अगर तुम आ जाओ, तो तुम्हें देख लूं नहीं तो यह अभिलाषा भी साथ जायेगी! मैं कई महीने हुए, आगरे में पड़ी हूं। जी घबराया करता है। अगर किसी तरह स्वामीजी को ला सकी, तो अन्त समय उनके चरणों के दर्शन भी कर लूं। मैं जानती हूं वह न आयेंगे। व्यर्थ ही उनसे आग्रह न करना; मगर तुम आने में एक क्षण का भी विलम्ब न करना।

शंखधर डाकखाने के सामने खड़ा देर तक रोता रहा।

उसका मुख उतरा हुआ देखकर चक्रधर ने पूछा-क्यों बेटा, आज उदास क्यों मालूम होते हो?

शंखधर-माता जी का पत्र आया है, वह बहुत बीमार हैं। मैं पिताजी को खोजने निकला था। वह तो न मिले, माताजी भी चली जा रही हैं। आपके पास बड़ी-बड़ी आशाएं लेकर आया था; पर आपने भी अनाथ पर दया न की। आपको परमात्मा ने योगबल दिया है, आप चाहते, तो पिताजी की टोह लगा देते।

चक्रधर ने गम्भीर स्वर में कहा-बेटा, मैं योगी नहीं हूं पर तुम्हारे पिताजी की टोह लगा चुका हूं, उनसे मिल भी चुका हूं। वह गुप्त रीति से तुम्हें देख भी चुके हैं।

शंखधर-आपने पिताजी से भेंट की और मुझसे कुछ न कहा। इससे तो यह प्रकट होता है कि आपको मुझ पर दया नहीं आती।

चक्रधर ने कुछ जवाब न दिया। वह अत्यन्त कठिन परीक्षा में पड़े हुए थे। बहुत दिनों के बाद अनायास ही उन्हें पुत्र का मुख देखने का सौभाग्य प्राप्त हो गया था। वे सारी भावनाएं, जिन्हें वह दिल से निकाल चुके थे, जाग उठीं और इस समय वियोग के भय से आर्तनाद कर रहीं थीं। वह मोहबन्धन, उसे वे बड़ी मुश्किल से ढीला कर पाये थे, अब उन्हें शतगुण वेग से अपनी ओर खींच रहा था।

सहसा शंखधर ने अवरुद्ध कण्ठ से कहा-तो मैं निराश हो जाऊँ?

चक्रधर ने हृदय से निकलते उच्छवास को दबाते हुए कहा-नहीं बेटा, सम्भव है, कभी वह स्वयं पुत्र-प्रेम से विकल होकर तुम्हारे पास दौड़ जाय। अगर तुम अपने जीवन में ऊंचे आदर्श का पालन कर सके, तो तुम उन्हें अवश्य खींच लोगे।

शंखधर-आपके दर्शन मुझे फिर कब होंगे? आपका पता कैसे मिलेगा? मैंने आपको पिता-तुल्य ही समझा हूं और जीवन-पर्यन्त समझता रहूंगा। इन चरण-कमलों की भक्ति मेरे मन में सदैव बनी रहेगी। आपके दर्शनों के लिए मेरी आत्मा सदैव विकल रहेगी और माताजी के स्वस्थ होते ही मैं फिर आपकी सेवा में आ जाऊंगा।

चक्रधर ने आर्द्र कंठ से कहा-नहीं बेटा, तुम यह कष्ट न करना। मैं स्वयं कभी-कभी तुम्हारे पास आया करूंगा। मैंने भी तुमको पुत्र-तुल्य समझा है और सदैव समझता रहूंगा। मेरा आशीर्वाद सदैव तुम्हारे साथ रहेगा।

संध्या समय शंखधर अपने पिता से विदा होकर चला। चक्रधर को ऐसा मालूम हो रहा था मानो उनका हृदय वक्षस्थल को तोड़कर शंखधर के साथ चला जा रहा है। जब वह आंखों से ओझल हो गया, उन्होंने एक लम्बी सांस ली और बालकों की भांति बिलख-बिलखकर रोने लगे।

उन्हें ऐसी भावना हुई कि फिर उस प्रतिभा-सम्पन्न युवक के दर्शन न होंगे!

अभागिन अहल्या के लिए संसार सुना हो गया। पति को पहले ही खो चुकी थी। जीवन का एक मात्र आधार पुत्र रह गया था। उसे भी खो बैठी। अब वह किसका मुंह देखकर जियेगी? वह राज्य उसके लिए किसी ऋषि का अभिशाप हो गया।

अहल्या को अब वह राज-भवन फाड़े खाता था। वह अब उसे छोड़कर कहीं चली जाना चाहती थी। कोई सड़ा-गला झोपड़ा, किसी वृक्ष की छांह, पर्वत की गुफा, किसी नदी का तट उसके लिए इस भवन से सहस्रों गुना अच्छा था। वे दिन कितने अच्छे थे, जब वह अपने स्वामी के साथ पुत्र को हृदय से लगाये एक छोटे से मकान में रहती थी। रह-रहकर उसको अपनी भोग-लिप्सा पर क्रोध आता था, जिसने उसका सर्वनाश कर दिया था। क्या उस पाप का कोई प्रायश्चित्त नहीं है? क्या इस जीवन में स्वामी के दर्शन होंगे? अपने प्रिय पुत्र की मोहिनी मूर्ति फिर वह न देख सकेगी? कोई ऐसी युक्ति नहीं है?

राज-भवन अब भूतों का डेरा हो गया है। उसका अब कोई स्वामी नहीं रहा। राजा साहब अब महीनों नहीं आते। यह अधिकतर इलाके ही में घूमते रहे हैं। उनके अत्याचार की कथाएं सुनकर लोगों के रोएं खड़े हो जाते हैं। सारी रियासत में हाहाकार मचा हुआ है। कहीं किसी गांव में आग लगायी जाती है, किसी गांव में कुएं भ्रष्ट किये जाते हैं। राजा साहब को किसी पर दया नहीं आती। उनके सारे सद्भाव शंखधर के साथ चले गये। विधाता ने अकारण ही उन पर इतना कठोर आघात किया है। वह उस आघात का बदला दूसरों से ले रहे हैं।

अब राजा साहब के पास जाने का किसी को साहस नहीं होता। मनोरमा को देखकर तो वह जामे से बाहर हो जाते हैं। अहल्या भी उनसे कुछ कहते हुए थर-थर कांपती है। अपने प्यारों को खोजने के लिए वह तरह-तरह के मनसूबे बांधा करती है; लेकिन कहे किससे? उसे ऐसा विदित होता है कि ईश्वर ने उसकी भोग लिप्सा का यह दण्ड दिया है। यदि वह अपने पति के घर जाकर प्रायश्चित्त करे, तो कदाचित ईश्वर उसका अपराध क्षमा कर दें! लेकिन हाय रे मानव हृदय! इस घोर विपत्ति में भी मान का भूत सिर से नहीं उतरता। जाना तो चाहती है; लेकिन उसके साथ यह शर्त है कि कोई बुलाये अगर राजा साहब मुंशीजी से इस विषय में कुछ संकेत कर दें, तो उसके लिए अवश्य बुलावा आ जाय, पर राजा साहब से तो भेंट ही नहीं होती और भेंट भी होती है, तो कुछ कहने की हिम्मत नहीं पड़ती।

इसमें सन्देह नहीं कि अपने मन की बात मनोरमा से कह देती, तो बहुत आसानी ने काम निकल जाता; लेकिन अहल्या का मन मनोरमा से न पहले कभी मिला था, न अब मिलता था। उससे यह बात कैसे कहती?

एक दिन अहल्या का चित्त इतना उद्विग्न हुआ कि यह संकोच और झिझक छोड़कर मनोरमा के पास आ बैठी। मनोरमा के सामने प्रार्थी के रूप में आते हुए उसे जितनी मानसिक वेदना हुई, उसका अनुमान इसी से किया जा सकता है कि अपने कमरे से यहां तक आने में उसे कम-से-कम दो घण्टे लगे। कितनी ही बार द्वार तक आकर लौट गयी। जिसकी सदैव अवहेलना की, उसके सामने अब अपनी गरज लेकर जाने में उसे लज्जा आती थी; लेकिन जब भगवान ने ही उसका गर्व तोड़ दिया था, तो तब झूठी ऐंठ से क्या हो सकता था।

अहल्या ने कहा-मैं प्रायश्चित्त करना चाहती हूं। और आपसे उसके लिए सहायता मांगने आयी हूं। मुझे अनुभव हो रहा है कि यह सारी विडम्बना मेरे विलास-प्रेम का फल है और मैं इसका प्रायश्चित्त करना चाहती हूं। मेरा मन कहता है कि यहां से निकलकर मैं अपना मनोरथ पा जाऊंगी। यह सारा दण्ड मेरी विलासान्यता का है। आप जाकर अम्माजी से कह दीजिए। मुझे बुला लें। इस घर में आकर मैं अपना सुख खो बैठी और इसी घर से निकल कर ही उसे पाऊंगी।

उसने कहा-अच्छा; अहल्या, मैं आज ही जाती हूं।

इसके चौथे दिन मुंशी वज्रधर ने राजा साहब के पास रुखसती का संदेशा भेजा। राजा साहब इलाके पर थे। सन्देशा पाते ही जगदीशपुर आये। अहल्या का कलेजा धक-धक करने लगा कि राजा साहब कहीं आ न जाय। इधर-उधर छिपती फिरती थी कि उनका सामना न हो जाय। उसे मालूम होता था कि राजा साहब ने रुखसती मंजूर कर ली है; पर अब जाने के लिए वह बहुत उत्सुक न थी। यहां से जाना तो चाहती थी; पर जाते दुःख होता था। वह इसी घर को अपना घर समझने लगी थी। ससुराल उसके लिए बिरानी जगह थी। कहीं निर्मला ने कोई बात कह दी, तो वह क्या करेगी? जिस घर से मान करके निकली थी, वहीं अब विवश होकर जाना पड़ रहा था। इस बातों को सोचते-सोचते आखिर उसका दिल इतना घबराया कि वह राजा साहब के पास जाकर बोली-आप मुझे क्यों विदा करते हैं? मैं नहीं जाती।

राजा साहब ने हंसकर कहा-कोई लड़की ऐसी भी है, जो खुशी से ससुराल जाती हो? और कौन पिता ऐसा है, जो लड़की को खुशी से विदा करता हो? मैं कब चाहता हूं कि तुम जाओ; लेकिन मुंशी वज्रधर की आज्ञा है, और यह मुझे शिरोधार्य करनी पड़ेगी। वह लड़के के बाप हैं, मैं लड़की का बाप हूं मेरी और उनकी क्या बराबरी? और बेटी, मेरे दिल में भी अरमान हैं, उसको पूरा करने का और कौन अवसर आएगा? शंखधर होता, तो उसके विवाह में वह अरमान पूरा होता, अब यह तुम्हारे गौने में पूरा होगा।

अहल्या इसका क्या जवाब देती?

दूसरे दिन से राजा साहब ने विदाई की तैयारियां करनी शुरू कर दीं। सारे इलाके के सोनार पकड़ बुलाये गये और गहने बनने लगे। इलाके ही के दर्जी कपड़े सीने लगे। हलवाइयों के कढ़ाह चढ़ गये और पकवान बनने लगे। घर की सफाई और रंगाई होने लगी। राजाओं, रईसों और अफसरों को निमन्त्रण भेजे जाने लगे। सारे शहर की वेश्याओं को बयाने दे दिये गये। बिजली की रोशनी का इन्तजाम होने लगा। अहल्या यह सामान देख-देख कर दिल में झुंझलाती और शर्माती थी। सोचती-कहां-से-कहां मैंने यह विपत्ति मोल ले ली? अब इस बुढ़ापे में मेरा गौना? मैं मरने की राह देख रही हूं यहां गौने की तैयारी हो रही है।

राजा विशालसिंह ने जिस हौसले से अहल्या का गौना किया, वह राजाओं, रईसों में भी बहुत कम देखने में आता है। तहसीलदार साहब के घर में इतनी चीजों को रखने की जगह भी न थी। बर्तन, कपड़े, शीशे के सामान, लकड़ी की अलभ्य वस्तुएं, मेवे, मिठाइयां, गायें, भैंसे-इनका हफ्तों तक तांता लगा रहा। दो हाथी और पांच घोड़े भी मिले, जिनके बांधने के लिए घर में जगह न थी पांच लौंडिया अहल्या के साथ आयीं। यद्यपि तहसीलदार साहब ने नया मकान बनवाया था; पर वह क्या जानते थे कि एक दिन यहां रियासत जगदीशपुर की आधी सम्पत्ति आ पहुंचेगी? घर का कोना-कोना सामानों से भरा हुआ था। कई पड़ोसियों के मकान भी अंट उठे। उस पर लाखों रुपये नगद मिले वह अलग। तहसीलदार साहब लाने को तो सब कुछ लाये, पर उन्हें देख-देख रोते और कुढ़ते थे। कोई भोगने वाला नहीं!

दिन में बीसों ही बार चक्रधर पर बिगड़ते-नालायक आप तो आप गया अपने साथ लड़के को भी ले गया। न जाने कहां मारा-मारा फिरता होगा, देश का उपकार करने चला है! सच कहा है घर की रोये, बन की सोये। घर के आदमी मरें, परवाह नहीं; दूसरे के लिए जान देने को तैयार! अब बताओ, इन हाथी, घोड़े मोटरों और गाड़ियों को लेकर क्या करूं? अकेले किस-किस पर बैठूं? बहू है, उसे रोने से फुरसत नहीं। बच्चों की माँ है, उनसे अब मारे शोक के उठा नहीं जाता, कौन बैठे। यह सामान तो मेरे जी का जंजाल हो गया है।

अहल्या यहां आकर और भी पछताने लगी। वह रनिवास के विलासमय जीवन से विरक्त होकर यहां प्रायश्चित्त करने के इरादे से आयी थी; पर यह विपत्ति उसके साथ यहां भी आयी। सम्पत्ति से गला छुड़ाना चाहती थी, पर सम्पत्ति उससे और चिमट गयी थी। वह यहां कुछ देर शान्ति से बैठ सकती थी, कुछ देर हंस-बोलकर जी बहला लेती थी। किसी के ताने-मेहने न सुनने पड़ते थे। यहां निर्मला बाणों से छेदती और घाव पर नमक छिड़कती रहती थी। बहू के कारण वह पुत्र से वंचित हुई। बहू के ही कारण पोता भी हाथ से गया ऐसी बहू को वह पान-फूल से पूज न सकती थी। सम्पत्ति लेकर वह क्या करे? चाटे? भोजन वह अब भी अपने हाथों ही पकाती थी। अहल्या के साथ जो महाराजिनें आयीं थीं, उनका पकाया हुआ भोजन वह ग्रहण न कर सकती थी। अहल्या से भी वह छूत मानती थी। इन दिनों मंगला भी आयी हुई थी। उसका जी चाहता था कि यहाँ की सब चीजें समेट ले जाऊं। पर अहल्या अपनी चीजों को तीन-तेरह न होने देना चाहती थी। और इससे ननद-भावज में कभी-कभी खटपट हो जाती थी।

इस तरह कई महीनें गुजर गये; अहल्या का आशा-दीपक दिन-दिन मन्द होता गया। वह कितना ही चाहती थी कि मोह-बन्धन से अपने को छुड़ा ले; पर मन पर कोई वश न चलता था। उसके मन में बैठा हुआ कोई नित्य कहा करता था-जब तक मोह में पड़ी रहोगी, पति-पुत्र के दर्शन न होंगे। पर विश्वास कौन दिला सकता था कि मोह टूटते ही उसके मनोरथ पूरे हो जायेंगे। तब क्या वह भिखारिणी जीवन भोजन व्यतीत करेगी? सम्पत्ति के हाथ से निकल जाने पर फिर उसके लिए कौन आश्रय रह जायेगा?

अहल्या बार-बार व्रत करती कि अब अपने सारे काम अपने हाथ से करूंगी, अब सदा एक ही जून भोजन किया करूंगी, मोटा-से-मोटा अन्न खाकर जीवन व्यतीत करूंगी, लेकिन उसमें किसी व्रत पर स्थिर रहने की शक्ति न रह गयी थी। विलासिता ने उसकी क्रिया-शक्ति को निर्बल कर दिया था।

यहां रहकर वह अपने उद्धार के लिए कुछ कर सकेगी, यह बात शनैः-शनैः अनुभव से सिद्ध हो गयी।