मुद्दत के बाद जगदीशपुर के भाग जगे, कार्तिक लगते ही एक ओर राजभवन की मरम्मत होने लगी, दूसरी ओर गद्दी के उत्सव की तैयारियां शुरू हुई।
मनोरमा नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें मनोरमा भाग-1
राजा साहब ताकीद करते रहते थे कि प्रजा पर जरा भी सख्ती न होने पाये। दीवान साहब से उन्होंने जोर देकर कह दिया था कि बिना पूरी मजदूरी दिये किसी से काम न लीजिए; लेकिन, यह उनकी शक्ति से बाहर था कि आठों पहर बैठे रहें। उनके पास अगर कोई शिकायत पहुंचती, तो कदाचित् वह राज-कर्मचारियों को फाड़ खाते, लेकिन प्रजा सहनशील होती है, जब तक प्याला भर न जाय, वह जबान नहीं खोलती। फिर गद्दी के उत्सव में थोड़ा-बहुत कष्ट होना स्वाभाविक समझकर और भी कोई न बोलता था।
तीन महीने तक सारी रियासत के बढ़ई, मिस्त्री, दरजी, चमार, कहार सब दिल तोड़कर काम करते रहे। चक्रधर को रोज खबरें मिलती रहती थीं कि प्रजा पर बड़े-बड़े अत्याचार हो रहे हैं; लेकिन वह राजा साहब से शिकायत करके उन्हें असमंजस में न डालना चाहते थे। अकसर खुद जाकर मजूरों और कारीगरों को समझाते थे। इस तरह तीन महीने गुजर गये। राजभवन का कलेवर नया हो गया। सारे कस्बे में रोशनी के फाटक बन गये, तिलकोत्सव का विशाल पण्डाल तैयार हो गया।
लेकिन अब तक बहुत-कुछ काम बेगार से चल गया था। मजूरों को भोजन मात्र मिल जाता था। अब नकद रुपये की जरूरत सामने आ रही थी। राजाओं का आदर-सत्कार और अंगरेज हुक्काम की दावत-तवाजा तो बेगार में न हो सकती थी। खर्च का तखमीना पांच लाख से ऊपर था। खजाने में झंझी कौड़ी न थी। असामियों से छमाही लगान पहले ही वसूल किया जा चुका था। मुहूर्त आता जाता था और कुछ निश्चय न होता था। यहां तक कि केवल 15 दिन और रह गये।
सन्ध्या का समय था। राजा साहब उस्ताद मेडूखां के साथ बैठे सितार का अभ्यास कर रहे थे कि दीवान साहब और मुंशीजी आकर खड़े हो गये।
विशालसिंह ने पूछा-कोई जरूरी काम है?
ठाकुर-हुजूर, उत्सव को अब केवल एक सप्ताह रह गया है और अभी तक रुपये की कोई सबील नहीं हो सकी। अगर आज्ञा हो, तो किसी बैंक से 5 लाख कर्ज ले लिया जाय।
राजा-हरगिज नहीं।
दीवान-तो असामियों पर हल पीछे 10 रु. चन्दा लगा दिया जाय।
राजा-मैं अपने तिलकोत्सव के लिए असामियों पर जुल्म न करूंगा। इससे तो कहीं अच्छा है कि उत्सव ही न हो।
दीवान-महाराज, रियासतों में प्रथा है। सब असामी खुशी से देंगे, किसी को आपत्ति न होगी?
मुंशी-गाते-बजाते आएंगे और दे जायेंगे।
राजा-अगर आप लोगों का विचार है कि किसी को कष्ट न होगा और लोग खुशी से मदद देंगे तो आप अपनी जिम्मेदारी पर वह काम, कर सकते हैं। मेरे कानों तक शिकायत न आये।
दीवान-हुजूर, शिकायत तो थोड़ी-बहुत हर हालत में होती ही है। इससे बचना असम्भव है। राजा और प्रजा का सम्बन्ध ही ऐसा है। प्रजाहित के लिए भी कोई काम कीजिए, तो उसमें भी लोगों को शंका होती है। हल पीछे 10 रु. बैठा देने से कोई 5 लाख रुपये हाथ आ जायेंगे। रही रसद, वह तो बेगार में मिलती ही है। आपकी अनुमति की देर है।
मुंशी-जब सरकार ने कह दिया कि आप अपनी जिम्मेदारी पर वसूल कर सकते हैं, तो अनुमति का क्या प्रश्न? चलिए, अब हुजूर को तकलीफ न दीजिए।
राजा-बस, इतना खयाल रखिए कि किसी को कष्ट न होने पाये। आपको ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि असामी लोग सहर्ष आकर शरीक हों।
हुक्म मिलने की देर थी। कर्मचारियों के हाथ तो खुजला रहे थे। वसूली का हुक्म पाते ही बाग-बाग हो गये। फिर तो वह अंधेर मचा कि सारे इलाके में कुहराम पड़ गया। चारों तरफ लूट-खसोट हो रही थी। गालियां और ठोक-पीट तो साधारण बात थी, किसी के बैल खोल लिए जाते थे, किसी की गाय छीन ली जाती थी, कितनों ही के खेत कटवा लिये गये। बेदखली और इजाफे की धमकियां दी जाती थीं। जिसने खुशी से दिये, उसका तो 10 रु. ही में गला छूटा। जिसने हीले -हवाले किये, कानून बघारा, उसे 10 रु. के बदले 20 रु., 30 रु. 30 रु., 40 रु. देने पड़े। आखिर विवश होकर एक दिन चक्रधर ने राजा साहब से शिकायत कर ही दी।
राजा साहब ने त्योरी बदलकर कहा-मेरे पास तो आज तक कोई असामी शिकायत करने नहीं आया। आप उनकी तरफ से क्यों वकालत कर रहे हैं?
चक्रधर-उन्हें आपसे शिकायत करने को क्योंकर साहस हो सकता है।
राजा-यह मैं नहीं मानता। जिसको किसी बात की अखर होती है वह, चुप नहीं बैठा रहता।
चक्रधर-तो आपसे कोई आशा न रखूं?
राजा-मैं अपने कर्मचारियों से अलग कुछ नहीं हूं।
चक्रधर ने इसका और कुछ जवाब न दिया। मुंशीजी राजभवन में इन्हें देखकर बोले-तुम यहां क्या करने आये थे? अपने लिए कुछ नहीं कहा?
चक्रधर-अपने लिए क्या कहता? सुनता हूं रियासत में बड़ा अंधेर मचा हुआ है।
वज्रधर-यह सब तुम्हारे आदमियों की शरारत है। तुम्हारी समिति के आदमी जा-जाकर असामियों को भड़काते रहते हैं।
चक्रधर-हम लोग तो इतना ही चाहते हैं कि असामियों पर सख्ती न की जाय और आप लोगों ने इसका वादा भी किया था; फिर यह मार- धाड़ क्यों हो रही ?
वज्रधर-इसीलिए कि असामियों से कह दिया गया है कि राजा साहब किसी पर जब्र नहीं करना चाहते। जिसकी खुशी हो दे, जिसकी खुशी हो ना दे। तुम अपने आदमियों को बुला लो, फिर देखो कितनी आसानी से काम हो जाता है। तुम आज ही अपने आदमियों को बुला लो। रियासत के सिपाही उनसे बेतरह बिगड़े हुए हैं। ऐसा न हो कि मारपीट हो जाय।
चक्रधर यहां से अपने आदमियों को बुला लेने का वादा करके तो चले लेकिन दिल में आगा-पीछा हो रहा था। कुछ समझ में न आता था कि क्या करना चाहिए। इसी सोच में पड़े हुए मनोरम के यहां चले गये।
मनोरमा उन्हें उदास देखकर बोली-आप बहुत चिन्तित-से मालूम होते हैं? घर में तो सब कुशल हैं?
चक्रधर-क्या करूं मनोरमा, अपनी दशा देखकर कभी-कभी रोना आ जाता है। सारा देश गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है, फिर भी हम अपने भाइयों की गर्दन पर छुरी फेरने से बाज नहीं आते। राजा साहब की जात से लोगों को कैसी-कैसी आशाएं थीं, लेकिन अभी गद्दी पर बैठे छः महीने भी नहीं हुए और इन्होंने भी वही पुराना राग अख्तियार कर लिया। प्रजा से डण्डों के जोर से रुपये वसूल किये जा रहे हैं और कोई फरियाद नहीं सुनता। सबसे ज्यादा रोना तो इस बात का है कि दीवान साहब और मेरे पिताजी ही राजा साहब के मन्त्री और इस अत्याचार के मुख्य कारण हैं।
सरल हृदय प्राणी अन्याय की बात सुनकर उत्तेजित हो जाते हैं। मनोरमा ने उद्दण्ड होकर कहा-आप असामियों से क्यों नहीं कहते कि किसी को एक कौड़ी भी न दें कोई देगा ही नहीं तो ये लोग कैसे ले लेंगे?
चक्रधर को हंसी आ गयी बोले-तुम मेरी जगह होती, तो असामियों को मना कर देतीं?
मनोरमा-अवश्य। खुल्लम-खुल्ला कहती, खबरदार! राजा के आदमियों को कोई एक पैसा भी न दे। मैं राजा के आदमियों को इतना चिटवाती कि फिर इलाके में जाने का नाम ही न लेते।
चक्रधर ये बातें सुनकर पुलकित हो उठे। मुस्कुराकर बोले -अगर दीवान साहब खफा हो जाते?
मनोरमा-तो खफा हो जाते! किसी के खफा हो जाने के डर से सच्ची बात पर परदा थोड़े ही डाला जाता है।
इस विषय पर फिर कुछ बातचीत न हुई, लेकिन चक्रधर यहां से पढ़ाकर चले, तो उनके मन में प्रश्न हो रहा था-क्या अब यहां मेरा आना उचित है? आज उन्होंने विवेक के प्रकाश में अपने अन्तस्तल को देखा, तो उसमें कितने ही ऐसे भाव छिपे हुए थे, जिन्हें यहां न रहना चाहिए था।
गद्दी के कई दिन पहले ही से मेहमानों का आना शुरू हो गया और तीन दिन बाकी ही थे कि सारा कैम्प भर गया। दीवान साहब ने कैम्प में ही बाजार लगवा दिया था, वहीं रसद-पानी का भी इन्तजाम था। राजा साहब स्वयं मेहमानों की खातिरदारी करते रहते थे; किन्तु जमघट बहुत बड़ा था। आठों पहर हरबोंग-सा मचा रहता था।
मेहमानों के आदर-सत्कार की तो धूम थी और वे मजदूर, जो छाती फाड़-फाड़कर काम कर रहे थे, भूखों मरते थे। काम लेने को सब थे, पर भोजन को पूछने वाला कोई न था। चमार पहर रात रहे घास छीलने जाते, मेहतर पहर रात से सफाई करने लगते, कहार पहर रात से पानी खींचना शुरू करते, मगर कोई उनका पुरसाहाल न था। चपरासी बात-बात पर उन्हें गालियां सुनाते; क्योंकि उन्हें खुद बात-बात पर डांट पड़ती थी। चपरासी सहते थे; क्योंकि उन्हें दूसरे पर अपना गुस्सा उतारने का मौका मिल जाता था। बेगारों से न सहा जाता था, इसलिए कि उनकी आते जलती थीं। दिन-भर धूप में जलते, रात-भर क्षुधा की आग में। असन्तोष बढ़ता जाता था। न जाने कब सब-के-सब जान पर खेल जायें, हड़ताल कर दे।
सन्ध्या का समय था। तिलक का मुहूर्त निकट आ गया था। हवन की तैयारी हो रही थी। सिपाहियों की वर्दी पहनकर खड़े हो जाने की आज्ञा दे दी गयी थी कि सहसा मजदूरों के बाड़े से रोने-चिल्लाने की आवाजें आने लगीं। किसी कैम्प में घास न थी और ठाकुर हरसेवक हंटर लिए चमारों को पीट रहे थे। मुंशी वज्रधर की आंखें मारे क्रोध के लाल हो रही थीं।
चौधरी ने हाथ बांधकर कहा-हुजूर, घास तो रात ही को पहुंचा दी गयी थी। हां, इस बेला अभी नहीं पहुंची। आधे आदमी तो मांदे पड़े हुए हैं।
मुंशी-बदमाश! झूठ बोलता है, अभी पोलो खेल होगा, घोड़े बिना खाये कैसे दौड़ेंगे?
एक युवक ने कहा- हम लोग तो बिना खाये आठ दिन से घास दे रहे हैं, घोड़े क्या बिना खाये एक दिन भी न दौड़ेंगे?
चौधरी डण्डा लेकर युवक को मारने दौड़ा, पर उसके पहले ही ठाकुर साहब ने झटपट उसे चार-पांच हंटर सड़ाप-सड़ाप लगा दिये। नंगी देह, चमड़ी फट गयी, खून निकल गया।
चौधरी ने ठाकुर साहब और युवक के बीच में खड़े होकर कहा-हुजूर! क्या मार ही डालेंगे? लड़का है कुछ अनुचित मुंह से निकल जाय तो क्षमा करनी चाहिए। राजा को दयावान होना चाहिए।
ठाकुर साहब आपे से बाहर हो रहे थे। एक चमार का यह हौसला कि उनके सामने मुंह खोल सके। वहीं हंटर तान कर चौधरी को जमाया। बूढ़ा आदमी, उस पर कई दिन का भूखा, खड़ा भी मुश्किल से हो सकता था, हंटर पड़ते ही जमीन पर गिर पड़ा। बाड़े में हलचल पड़ गयी। हजारों आदमी जमा हो गये। कितने ही चमारों ने मारे डर के खुरपी और रस्सी उठा ली थी और घास छीलने जा रहे थे। चौधरी पर हंटर पड़ते देखा, तो रस्सी-खुरपी फेंक दी और आकर चौधरी को उठाने लगे।
ठाकुर साहब ने तड़पकर कहा-तुम सब अभी एक घंटे में घास लाओ, नहीं तो एक-एक की हड्डी तोड़ दी जायेगी।
एक चमार बोला-हम यहां काम करने आये हैं, जान देने नहीं आये हैं। एक तो भूखों मरें, दूसरे लात खायें। हमारा जन्म इसीलिए थोड़े ही हुआ है? जिससे चाहें काम कराइए, हम घर जाते हैं।
मुंशी-जिसने बाड़े के बाहर कदम रखा, उसकी शामत आई। तोप पर उड़ा दूंगा।
लेकिन चमारों के सिर पर भूत सवार था। बूढ़े चौधरी को उठाकर सब-के-सब एक गोल में बाड़े के द्वार की ओर चले। सिपाहियों की कवायद हो रही थी। ठाकुर साहब ने खबर भेजी और बात-की-बात में उन सबों ने आकर बाड़े का द्वार रोक लिया। सभी कैम्पों में खलबली पड़ गयी। तरह-तरह की अफवाहें उड़ने लगीं। राजा साहब अपने खेमे में तिलक के भड़कीले-सजीले वस्त्र धारण कर रहे थे। यह खबर सुनी, तो तिलमिला गये। क्रोध से बावले होकर वह अपनी बन्दूक लिए खेमे से निकल आये और कई आदमियों के साथ बाड़े के द्वार पर जा पहुंचे।
चौधरी इतनी देर में झाड़-पोंछकर उठ बैठा था। राजा साहब को देखते ही रोकर बोला-दुहाई है महाराज की। सरकार, बड़ा अन्धेर हो रहा है। गरीब लोग मारे जाते हैं।
राजा-तुम सब पहले बाड़े के द्वार से हट जाओ, फिर जो कुछ कहना है, मुझसे कहो। अगर किसी ने बाड़े के बाहर पांव रखा, तो जान से मारा जाएगा।
चौधरी-सरकार ने हमको काम करने के लिए बुलाया है कि जान लेने के लिए?
राजा-काम न करोगे, तो जान ली जाएगी।
चौधरी-काम तो आपका करें, खाने किसके घर जायें?
राजा-क्या बेहूदा बातें करता है, चुप रहो! तुम सब-के-सब मुझे बदनाम करना चाहते हो। तुम नीच हो और नीच लातों के बगैर सीधा नहीं होता।
चौधरी-क्या अब हमारी पीठ पर कोई नहीं कि मार खाते रहें और मुंह न खोलें? अब तो सेवा-समिति हमारी पीठ पर है। क्या वह कुछ भी न्याय न करेगी।
राजा-अच्छा! तो तुझे सेवा-समिति वालों का घमण्ड है?
चौधरी- है, वह हमारी रक्षा करती है, तो क्यों न उनका घमण्ड करें?
राजा साहब ओठ चबाने लगे -तो यह समिति वालों की कारस्तानी है। चक्रधर मेरे हाथ कपट-चाल चल रहे हैं, लाला चक्रधर! जिसका बाद मेरी खुशामद की रोटियां खाता है। देखता हूं वह मेरा क्या कर लेता है। इन मूर्खों के सिर से यह घमण्ड निकाल ही देना चाहिए। यह जहरीले कीड़े फैल गये, तो आफत मचा देंगे।
चौधरी तो ये बातें कर रहा था, उधर बाड़े में घोर कोलाहल मचा हुआ था। सरकारी आदमियों की सूरत देखकर जिनके प्राण-पखेरू उड़ जाते थे, वे इस समय निःशंक और निर्भय बन्दूकों के सामने मरने को तैयार खड़े थे। द्वार से निकलने का रास्ता न पाकर कुछ आदमियों ने बाड़े की लकड़ियां और रस्सियां काट डालीं और हजारों आदमी उधर से भड़भड़ाकर निकल पड़े, मानो कोई उमड़ी हुई नदी बांध तोड़कर निकल पड़े। उसी वक्त एक ओर से सशस्त्र पुलिस के जवान और दूसरी ओर से चक्रधर, समिति के कई युवकों के साथ आते हुए दिखाई दिये।
उन्हें देखते ही हड़तालियों में जान-सी पड़ गयी, जैसे अबोध बालक अपनी माता को देखकर शेर हो जाय। हजारों आदमियों ने घेर लिया- ‘ भैया आ गये! भैया आ गये! ’ की ध्वनि से आकाश गूंज उठा।
चक्रधर ने ऊंची आवाज से कहा-क्यों भाइयों, तुम मुझे अपना मित्र समझते हो या शत्रु?
चौधरी-भैया, यह भी खोई पूछने की बात है। तुम हमारे मालिक हो, सामी हो, सहाय हो।
चक्रधर इस भीड़ से निकलकर सीधे राजा साहब के पास आये और बोले-महाराज, मैं आप से कुछ विनय, करना चाहता हूं।
राजा साहब ने त्योरियां बदल कर कहा-मैं इस वक्त कुछ नहीं सुनना चाहता।
चक्रधर- आप कुछ न सुनेंगे, तो पछताएंगे।
राजा-मैं इन सबों को गोली मार दूंगा।
चक्रधर-दीन प्रजा के रक्त से राज-तिलक लगाना किसी राजा के लिए मंगलकारी नहीं हो सकता। प्रजा का आशीर्वाद ही राज्य की सबसे बड़ी शक्ति है, मैं आपका शुभचिन्तक हूं। इसीलिए आपकी सेवा में आया हूं। यह सारा तूफान अयोग्य कर्मचारियों का खड़ा किया हुआ है। ये सभी आदमी इस वक्त झल्लाये हुए हैं। गोली चलाकर आप उनके प्राण ले सकते हैं; लेकिन उनका रक्त केवल इसी बाड़े में न सूखेगा, यह सारा विस्तृत कैम्प उस रक्त से सिंच जायेगा; उसकी लहरों के झोंके से यह विशाल मण्डप उखड़ जायेगा और यह आकाश में फहराती हुई ध्वजा भूमि पर गिर पड़ेगी। सारी रियासत में हाहाकार मच जायेगा।
राजा साहब अपनी टेक पर अड़ना जानते थे; किन्तु इस समय उनका दिल कांप उठा। बोले -इन लोगों को अगर कोई शिकायत थी, तो इन्हें आकर मुझसे कहना चाहिए था। मुझसे न कहकर इन लोगों ने हेकड़ी करनी शुरू की, रात घोड़ों को घास नहीं दी और इस वक्त भागे जाते हैं। मैं यह घोर अपमान नहीं सह सकता।
चक्रधर-आपने इन लोगों को अपने पास आने का अवसर कब दिया? आपको मालूम है कि इन गरीबों को एक सप्ताह से कुछ भोजन नहीं मिला?
