चक्रधर की कीर्ति उनसे पहले ही बनारस पहुंच चुकी थी। उनके मित्र और अन्य लोग उनसे मिलने के लिए उत्सुक हो रहे थे। जब वह पांचवें दिन घर पहुंचे, तो लोग मिलने और बधाई देने आ पहुंचे। नगर का सभ्य-समाज मुक्तकंठ से उनकी तारीफ कर रहा था। यद्यपि चक्रधर गम्भीर आदमी थे; पर अपनी कीर्ति की प्रशंसा से उन्हें सच्चा आनन्द मिल रहा था। और लोग तो तारीफ कर रहे थे, मुंशी वज्रधर लड़के की नादानी पर बिगड़ रहे थे। निर्मला तो इतना बिगड़ी कि चक्रधर से बात न करना चाहती थी।
मनोरमा नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें मनोरमा भाग-1
शाम को चक्रधर मनोरमा के घर गये। वह बगीचे में दौड़-दौड़कर हजारे से पौधों को सींच रही थी। पानी से कपड़े लथपथ हो गये थे। उन्हें देखते ही हजारा फेंककर दौड़ी और पास आकर बोली-आप कब आये, बाबू जी! मैं पत्रों में रोज वहां का समाचार देखती थी और सोचती थी कि आप यहाँ आयेंगे, तो आपकी पूजा करूंगी। आप न होते, तो वहां जरूर दंगा हो जाता। आप को बिगड़े हुए मुसलमानों के सामने अकेले जाते हुए जरा भी शंका न हुई?
चक्रधर ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा-जरा भी नहीं! मुझे तो यही धुन थी कि इस वक्त कुरबानी न होने दूंगा, इसके सिवा दिल में और कोई खयाल न था। मैं तो यही कहूंगा कि मुसलमानों को लोग नाहक बदनाम करते हैं। फिसाद से वे भी उतना ही डरते हैं, जितना हिन्दू? शान्ति की इच्छा भी उनमें हिन्दुओं से कम नहीं है?
मनोरमा-मैंने तो जब पढ़ा कि आप उन बौखलाये हुए आदमियों के सामने निःशंक भाव से खड़े थे, तो मेरे रोंगटे खड़े हो गये। मैं उस समय वहां होती, तो आपको पकड़कर खींच लाती। अच्छा, तो बतलाइए कि आपसे वधूजी ने क्या बातें कीं? (मुस्कराकर) मैं तो जानती हूं आपने कोई बातचीत न की होगी, चुपचाप लजाये बैठे रहे होंगे?
चक्रधर शरम से सिर झुकाकर बोले -हां, मनोरमा हुआ तो ऐसा ही! मेरी समझ में ही न आता था कि बातें क्या करूं? उसने दो-एक बार कुछ बोलने का साहस भी किया…
मनोरमा-आपको देखकर खुश तो बहुत हुई होंगी?
चक्रधर- (शरमाकर) किसी के मन का हाल मैं क्या जानूं।
मनोरमा ने अत्यन्त सरल भाव से कहा-सब मालूम हो जाता है। आप मुझसे बता नहीं रहे हैं। कम-से-कम इच्छा तो मालूम हो ही गई होगी। मैं तो समझती हूं जो विवाह लड़की की इच्छा के विरुद्ध किया जाता है, वह विवाह ही नहीं है। आपका क्या विचार है?
चक्रधर बड़े असमंजस में पड़े। मनोरमा से ऐसी बातें करते उन्हें संकोच होता था। डरते थे कि कहीं ठाकुर साहब को खबर मिल जाय-सरला मनोरमा ही कह दे-तो वह समझेंगे, मैं इसके सामाजिक विचारों में क्रान्ति पैदा करना चाहता हूं। अब तक उन्हें ज्ञान न था कि ठाकुर साहब किन विचारों के आदमी हैं। हां, उनके गंगा-स्नान से यह आभास होता था कि वह सनातन- धर्म के भक्त हैं। सिर झुकाकर बोले-मनोरमा, हमारे यहां विवाह का आधार प्रेम और इच्छा पर नहीं, धर्म और कर्तव्य पर रखा गया है। इच्छा चंचल है, क्षण-क्षण में बदलती रहती है। कर्तव्य स्थायी है, उसमें कभी परिवर्तन नहीं होता।
सहसा घर के अन्दर से किसी के कर्कश शब्द कान में आये, फिर लौंगी का रोना सुनायी दिया। चक्रधर ने पूछा-यह तो लौंगी रो रही है?
मनोरमा-जी हां! आपसे तो भाई साहब की भेंट नहीं हुई? गुरुसेवक सिंह नाम है। कई महीनों से देहात में जमींदारी का काम करते हैं। हैं तो मेरे सगे भाई और पढ़े-लिखे भी खूब हैं लेकिन भलमनसी छू भी नहीं गई। जब आते हैं, लौंगी अम्मां से झूठ-मूठ तकरार करते हैं। न जाने उससे इन्हें क्या अदावत है।
इतने मैं गुरुसेवकसिंह लाल-लाल आंखें किये निकल आये और मनोरमा से बोले -बाबूजी कहां गये हैं? तुझे मालूम है कब तक आयेंगे। मैं आज ही फैसला कर लेना चाहता हूं। चक्रधर को बैठे देखकर वह कुछ झिझके और अन्दर लौटना ही चाहते थे। कि लौंगी रोती हुई आकर चक्रधर के पास खड़ी हो गयी और बोली-बाबूजी, इन्हें समझाइए कि मैं अब बुढ़ापे में कहां जाऊं? इतनी उम्र तो इनमें कटी, अब किसके द्वार पर जाऊं? मैंने इन्हें अपना दूध पिलाकर पाला है; मालकिन के दूध न होता था, और अब मुझे घर से निकालने पर तुले हुए हैं।
गुरु सेवकसिंह की इच्छा तो न थी कि चक्रधर से इस कलह के सम्बन्ध में कुछ कहें; लेकिन जब लौंगी ने उन्हें पंच बनाने में संकोच न किया तो वह खुल पड़े। बोले -महाशय, इससे यह पूछिए कि अब यह बुढ़िया हुई, इसके मरने के दिन आये, क्यों नहीं किसी तीर्थस्थान में जाकर अपने कलुषित जीवन के बचे हुए दिन काटती? मरते दम तक घर की स्वामिनी बनी रहना चाहती है। दादाजी भी सठिया गये हैं; उन्हें मानापमान की जरा भी फिक्र नहीं। इसने उन पर न जाने क्या मोहिनी डाल दी है कि इनके पीछे मुझसे लड़ने पर तैयार रहते हैं। आज मैं निश्चय करके आया हूं कि इसे घर के बाहर निकाल कर ही छोडूंगा। या तो यह किसी दूसरे मकान में रहे, या किसी तीर्थ-स्थान को प्रस्थान करे।
लौंगी-तो बच्चा सुनो, जब तक मालिक जीता है, लौंगी इसी घर में रहेगी और इसी तरह रहेगी। जब वह न रहेगा, तो जो कुछ सिर पर पड़ेगी, झेल लूंगी। मैं लौंडी नहीं हूं कि घर से बाहर जाकर रहूं। तुम्हें यह कहते लज्जा नहीं आती? चार भांवरे फिर जाने से ही ब्याह नहीं हो जाता। मैंने अपने मालिक की जितनी सेवा की है और करने को तैयार हूं उतनी कौन ब्याहता करेगी? लाये तो हो बहू कभी उठकर एक लुटिया पानी भी देती है? नाम से कोई ब्याहता नहीं होती, सेवा और प्रेम से होती है।
यह कहती हुई लौंगी घर में चली गयी। मनोरमा चुपचाप सिर झुकाये दोनों की बातें सुन रही थी। उसे लौंगी से सच्चा प्रेम था। मातृ-स्नेह का जो कुछ सुख उसे मिला था, लौंगी से ही मिला था। उसकी माता तो उसे गोद में छोड़कर परलोक सिधारी थीं। उस एहसान को वह कभी न भूल सकती थी। अब भी लौंगी उस पर प्राण देती थी। इसलिए गुरु सेवकसिंह की यह निर्दयता उसे बहुत बुरी मालूम होती थी।
एकाएक फिटन की आवाज आई और ठाकुर साहब उतरकर अन्दर गये। गुरु सेवकसिंह भी उनके पीछे-पीछे चले। वह डर रहे थे कि लौंगी अवसर पाकर कहीं उनके कान न भर दे।
जब वह चले गये, तो चक्रधर ने कहा-यह तो बताओ कि तुमने इन चार-पांच दिनों में क्या काम किया?
मनोरमा-मैंने तो किताब तक नहीं खोली। आप नहीं रहते तो मेरा किसी काम में जी नहीं लगता। आप अब कभी बाहर न जाइएगा।
चक्रधर ने मनोरमा की ओर देखा, तो उसकी आंखें सजल हो गई थीं। सोचने लगे-बालिका का हृदय कितना सरल, कितना उदार, कितना कोमल और कितना भावमय है।
6
मुंशी वज्रधर विशालसिंह के पास से लौटे तो उनकी तारीफों के पुल बांध दिये। यह! तारीफ सुनकर चक्रधर को विशालसिंह से श्रद्धा-सी हो गई। उनसे मिलने गये और समिति के संरक्षकों में उनका नाम दर्ज कर लिया। तब से कुंवर साहब समिति की सभाओं में नित्य सम्मिलित होते थे। अतएव अबकी जब उनके यहां कृष्णाष्टमी का उत्सव हुआ तब चक्रधर अपने सहवर्गियों के साथ उसमें शरीक हुए।
कुंवर साहब कृष्ण के परम भक्त थे। उनका जन्मोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाते थे; उनकी स्त्रियों में भी इस विषय में मतभेद था। रोहिणी कृष्ण की उपासक थी, तो वसुमती रामनवमी का उत्सव मनाती थी, रही रामप्रिया, वह कोई व्रत न रखती थी।
सन्ध्या हो गयी थी। बाहर कंवल, झाड़ आदि लगाये जा रहे थे। चक्रधर अपने मित्रों के साथ बनाव-सजाव में मसरूफ थे। संगीत समाज के लोग आ पहुंचे थे। गाना शुरू होने वाला ही था कि वसुमती और रोहिणी में तकरार हो गई। वसुमती को यह तैयारियां एक आंख न भाती थीं। उसके रामनवमी के उत्सव में सन्नाटा-सा रहता था। विशालसिंह उस उत्सव से उदासीन रहते थे। वसुमती इसे उनका पक्षपात समझती थी। वह दिल में जलभुन रही थी। रोहिणी सोलह-श्रृंगार किये पकवान बना रही थी। उसका वह अनुराग देख-देखकर वसुमती के कलेजे पर सांप-सा लोट रहा था। वह इस रंग में भंग मिलाना चाहती थी। सोचते -सोचते उसे एक बहाना मिल गया। महरी को भेजा, जाकर रोहिणी से कह आ-घर के बरतन जल्दी खाली कर दे। दो थालियां, दो बटलोइयां, कटोरे, कटोरियां मांग लो। उनका उत्सव रात भर होगा, तो कोई कब तक बैठा भूखों मरे। महरी गयी, तो रोहिणी ने तन्नाकर कहा-आज इतनी भूख लग गयी। रोज तो आधी रात तक बैठी रहती थीं, आज 8 बजे ही भूख सताने लगी। अगर ऐसी ही जल्दी है, तो कुम्हार के यहां से हांडियां मंगवा लें। पत्तल मैं दे दूंगी।
वसुमती ने यह सुना, तो आग हो गई। हांडिया चढ़ाये मेरे दुश्मन-जिनकी छाती फटती हो, मैं क्यों हांडी चढ़ाऊं? उत्सव मनाने की बड़ी साध है, तो नये बासन क्यों नहीं मंगवा लेतीं? अपने कृष्ण से कह दें, गाड़ी-भर बरतन भेज दें। क्या जबरदस्ती दूसरों को भूखों मारेंगी?
रोहिणी रसोई से बाहर निकलकर बोली-बहन, जरा मुंह संभालकर बातें करो। देवताओं का अपमान करना अच्छा नहीं।
वसुमती-अपमान तो तुम करती हो, जो व्रत के दिन यों बन-ठन कर इठलाती फिरती हो। देवता रंग-रूप नहीं देखते, भक्ति देखते हैं।
रोहिणी-क्या आज लड़ने ही पर उतारू होकर आई हो क्या? भगवान सब दुःख दें, पर बुरी संगत न दें। लो, यह गहने कपड़े, आंखों में गड़ रहे हैं न! न पहनूंगी। जाकर बाहर कह दे, पकवान-प्रसाद किसी हलवाई से बनवा लें। मुझे क्या, मेरे मन का हाल भगवान आप जानते हैं, पड़ेगी उन पर जिनके कारण यह सब हो रहा है।
यह कहकर रोहिणी अपने कमरे में चली गयी। सारे गहने-कपड़े उतार फेंके और मुंह ढाप कर चारपाई पर पड़ी रही। ठाकुर साहब ने यह समाचार सुना तो माथा कूटकर बोले -इन चाण्डालिनों से आज शुभोत्सव के दिन भी शान्त नहीं बैठा जाता। इस जिन्दगी से तो मौत ही अच्छी। घर में आकर रोहिणी से बोले-तुम मुंह ढापकर सो रही हो, या उठकर पकवान बनाती हो?
रोहिणी ने पड़े-पड़े उत्तर दिया-फट पड़े वह सोना, जिससे टूटे कान! ऐसे उत्सव से बाज आयी; जिसे देखकर घरवालों की छाती फटे।
विशालसिंह-तुमसे तो बार-बार कहा कि उनके मुंह न लगा करो। एक चुप सौ वक्ताओं को हरा देता है। फिर तुमसे बड़ी भी तो ठहरी, यों भी तुमको उनका लिहाज करना ही चाहिए।
रोहिणी क्यों दबने लगी। यह उपदेश सुना तो झुंझलाकर बोली-रहने भी दो, जले पर नमक छिड़कते हो। जब बड़ा देख-देखकर जले, बात-बात पर कोसे, तो कोई कहां तक उसका लिहाज करे। तुम्हीं ने उन्हें सिर चढ़ा लिया है। कोई बात होती है, मुझी को उपदेश करने को दौड़ते हो, सीधा पा लिया है न! उनसे बोलते हुए तो तुम्हारा भी कलेजा कांपता है। तुम न शह देते, तो मजाल थी कि यों मुझे आंखें दिखाती।
विशालसिंह-तो क्या मैं उन्हें सिखा देता हूं कि तुम्हें गालियां दें?
कुंवर साहब ज्यों-ज्यों रोहिणी का क्रोध शान्त करने की चेष्टा करते थे, वह और भी बफरती जाती थी, यहां तक कि अन्त में वह भी नर्म पड़ गये।
वसुमती सायबान में बैठी हुई दोनों प्राणियों की बातें तन्मय होकर सुन रही थी, मानो कोई सेनापति अपने प्रतिपक्षी की गति का अध्ययन कर रहा हो, कि कब यह चूके और कब मैं दबा बैठूं। अन्त में प्रतिद्वन्द्वी की एक भद्दी चाल ने उसे अपेक्षित अवसर दे ही दिया। विशालसिंह को मुंह लटकाये रोहिणी की कोठरी से निकलते देखकर बोली-क्या मेरी सूरत न देखने की कसम खा ली है, या तुम्हारे हिसाब से मैं घर में हूं ही नहीं। बहुत दिन तो हो गये रूठे, क्या जन्म भर रूठे ही रहोगे? क्या बात है? इतने उदास क्यों हो?
विशालसिंह ने ठिठककर कहा-तुम्हारी ही लगायी हुई आग को तो शान्त कर रहा था, पर उलटे हाथ जल गये। क्या यह रोज-रोज तूफान खड़ा किया करती हो? में तो ऐसा तंग हो गया हूं कि जी चाहता है कि कहीं – भाग जाऊं।
वसुमती-कहां भागकर जाओगे? कहकर वसुमती ने आकर उनका हाथ पकड़ लिया, घसीटती हुई अपने कमरे में ले गयी और चारपाई पर बैठाती हुई बोली-औरतों को सिर चढ़ाने का यही फल है। जब देखो तब अपने भाग्य को रोया करती है, और तुम दौड़ते हो मनाने। बस, उसका मिजाज और आसमान पर चढ़ जाता है। दो दिन, चार दिन, दस दिन, रूठी पड़ी रहने दो, फिर देखो भीगी बिल्ली हो जाती है या नहीं।
विशालसिह-यहां वह खटवांस लेकर पड़ी, अब पकवान कौन बनाये?
वसुमती-तो क्या जहां मुर्गा न होगा, वहां सवेरा ही न होगा? ऐसा कौन-सा बड़ा काम है। मैं बनाये देती हूं।
विशालसिंह ने पुलकित होकर कहा-बस, कुलवन्ती स्त्रियों का यही धर्म है। विजय के गर्व से फूली हुई वसुमती आधी रात तक बैठी भांति-भांति के पकवान बनाती रही। रामप्रिया ने उसे बहुत व्यस्त देखा, तो वह भी आ गयी और दोनों मिलकर काम करने लगीं।
विशालसिह बाहर गये और कुछ देर गाना सुनते रहे; पर वहां जी न लगा। फिर भीतर चले आये और रसोई-घर के द्वार पर मोड़ा डालकर बैठ गये। भय था कि कहीं रोहिणी कुछ कह न बैठे और दोनों फिर लड़ मरे।
वसुमती ने कहा-अभी महारानी नहीं उठीं क्या? इससे छिपकर बातें सुनने की बुरी लत है। मुहब्बत तो इसे छू नहीं गयी। अभी तुम तीन दिन बाहर कराहते रहे, पर कसम ले लो, जो उसका मन जरा भी मैला हुआ हो। ऐसी औरतों पर कभी विश्वास न करे।
विशालसिंह-सब देखता हूं और समझता ,हूं निरा गधा नहीं हूं।
वसुमती-यही तो रोना है कि तुम देखकर भी नहीं देखते, समझ कर भी नहीं समझते। आदमी में सब ऐब हों, किन्तु मेहर-बस न हो।
विशालसिंह-मैं मेहर-बस हूं? मैं उसे ऐसी-ऐसी बातें कहता हूं कि वह भी याद करती होगी।
रामप्रिया-कड़ी बात भी हंसकर कही जाय, तो मीठी हो जाती है।
