love story
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Summary:सत्रह से सफ़ेद कोट तक: ऋषभ–अनाया की अधूरी से मुकम्मल मोहब्बत

सत्रह की उम्र में शुरू हुआ ऋषभ और अनाया का रिश्ता समय, दूरी और भावनात्मक उलझनों की कड़ी परीक्षा से गुज़रा। आख़िरकार दोनों ने समझ लिया कि सच्चा प्यार साथ रहने से ज़्यादा, एक-दूसरे को हर हाल में चुनने का नाम है।

Hindi Love Story: सत्रह साल की उम्र में प्यार अक्सर अचानक होता है बिना पूछे, बिना इजाज़त। ऋषभ और अनाया के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था। कोचिंग सेंटर की भीड़ में, बायोलॉजी की किताबों और नीट के सिलेबस के बीच, दोनों की नज़रें पहली बार टकराई थीं। ऋषभ शांत था, कम बोलने वाला। अनाया तेज़, सवाल पूछने वाली, आँखों में आत्मविश्वास लिए।

“तुम हमेशा इतनी नोट्स क्यों बनाती हो?” ऋषभ ने एक दिन हिम्मत करके पूछा था।
अनाया मुस्कराई, “क्योंकि डॉक्टर बनना है, सिर्फ़ सपना नहीं देखना।”

वहीं से बातों का सिलसिला शुरू हुआ। पहले पढ़ाई, फिर हँसी, फिर देर तक चलने वाली बातें। दोनों ने कभी खुले शब्दों में ‘प्यार’ नहीं कहा, लेकिन जब रिज़ल्ट आया और दोनों का सिलेक्शन हुआ, तो सबसे पहले एक-दूसरे को ही फोन किया।

“हो गया, अनाया… मैं मेडिकल कॉलेज जा रहा हूँ।”
“मुझे भी मिल गया, ऋषभ… हम डॉक्टर बनेंगे।”

लेकिन किस्मत ने साथ चलने की बजाय उन्हें अलग रास्तों पर भेज दिया। ऋषभ का एडमिशन दूसरे राज्य के सरकारी मेडिकल कॉलेज में हुआ और अनाया का अपने शहर के पास प्राइवेट कॉलेज में। स्टेशन पर विदाई के दिन अनाया की आँखें भीगी थीं।
“दूरी से कुछ नहीं बदलेगा, है ना?” उसने पूछा।
ऋषभ ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया, “अगर बदला, तो वो प्यार था ही नहीं।”

शुरुआती साल मुश्किल थे। मेडिकल की पढ़ाई, प्रेशर, नींद की कमी लेकिन दोनों एक-दूसरे के सहारे टिके रहे। जब ऋषभ फेल होने के डर से टूटता, अनाया उसे समझाती।

“तुम डॉक्टर बनोगे, ऋषभ… और बहुत अच्छे बनोगे।”

फिर एक रात सब बदल गया। ऋषभ के पिता को हार्ट अटैक आया। हॉस्टल के कमरे में फोन की घंटी गूँजी, और कुछ ही पलों में ऋषभ की दुनिया ढह गई। “पापा नहीं रहे…” उसकी आवाज़ काँप रही थी।

अनाया उसी रात ट्रेन पकड़कर पहुँची। अस्पताल के बाहर, ऋषभ फर्श पर बैठा था आँखें सूखी, चेहरा पत्थर-सा। अनाया उसके पास बैठ गई, बिना कुछ कहे उसका सिर अपने कंधे पर रख लिया।

“रो लो,” उसने फुसफुसाकर कहा, “मजबूत बनने की ज़रूरत नहीं है अभी।”

वह कई दिनों तक वहीं रही। घर संभाला, रिश्तेदारों के सवाल झेले, और हर रात ऋषभ के कमरे की लाइट बंद होने तक वहीं बैठी रही। ऋषभ ने पहली बार महसूस किया…यह लड़की सिर्फ़ उसकी प्रेमिका नहीं, उसका सहारा है।

समय बीता। कॉलेज फिर शुरू हुए। लेकिन अब चीज़ें वैसी नहीं रहीं। ऋषभ ज़्यादा चुप रहने लगा। अनाया समझती थी, लेकिन दूरी बढ़ रही थी। इसी बीच अनाया के कॉलेज में कबीर आया…कॉन्फिडेंट, हँसमुख, हर प्रैक्टिकल में साथ।

“तुम बहुत स्ट्रॉन्ग हो, अनाया,” कबीर ने एक दिन कहा, “सब कुछ अकेले संभाल लेती हो।”

ऋषभ से बातों में अब पहले-सी गर्माहट नहीं रही। कॉल्स छोटी होने लगीं।
“आज बहुत थक गया हूँ,” ऋषभ कहता।
“ठीक है,” अनाया जवाब देती, लेकिन फोन कटते ही दिल भारी हो जाता।

धीरे-धीरे अनाया खुद से झूठ बोलने लगी। कबीर के साथ हँसना आसान था। पास होना आसान था। लेकिन हर रात, जब ऋषभ का नाम फोन में चमकता, उसका दिल कांप जाता।

एक दिन अस्पताल में इमरजेंसी आई। एक एक्सीडेंट केस। अनाया घंटों ऑपरेशन थिएटर में रही। बाहर निकली तो हाथ काँप रहे थे, आँखें लाल। उसने ऋषभ को कॉल किया फोन स्विच ऑफ़ था।

कबीर ने उसका कंधा थामा, “सब ठीक है, मैं हूँ।”

उसी पल अनाया रो पड़ी। पर उस रोने में सुकून नहीं था…खालीपन था। कुछ हफ्तों बाद ऋषभ अचानक उसके कॉलेज पहुँचा। चेहरे पर थकान, आँखों में सवाल। “तुम बदल गई हो, अनाया,” उसने सीधा कहा। अनाया चुप रही। “मुझसे कुछ छुपा रही हो?” उसकी चुप्पी ही जवाब थी।

ऋषभ का सब्र टूट गया। “इतनी दूर इसलिए रहा कि तुम्हें खो दूँ?”
“नहीं!” अनाया चिल्लाई, “मैं बस… उलझ गई थी।”

वह रात भारी थी। आँसू, आरोप, खामोशी..सब कुछ था। अनाया ने कबीर से दूरी बना ली, लेकिन दिल का बोझ कम नहीं हुआ। कुछ दिन बाद कबीर ने खुद कहा, “तुम मुझसे नहीं, अपनी यादों से प्यार करती हो। और वो ऋषभ हैं।”

उस रात अनाया अकेली बैठी रही। उसे एहसास हुआ ऋषभ उसके सबसे बुरे समय में उसके साथ था। जब वह खुद को भूल रही थी, तब भी उसने उसका हाथ नहीं छोड़ा। वह सीधे ऋषभ के कॉलेज पहुँची। हॉस्टल के बाहर बारिश हो रही थी। ऋषभ सामने आया तो हैरान रह गया।

“मुझे माफ़ कर दो,” अनाया ने कहा, “मैं डगमगा गई थी… लेकिन प्यार कभी बदला नहीं।”

ऋषभ की आँखें भर आईं। “पता है सबसे ज़्यादा क्या दर्द देता है?” उसने कहा, “कि तुमने मुझसे कहा नहीं।”

अनाया ने उसका हाथ थाम लिया, “डर गई थी… तुम्हें खोने से।”

कुछ पल खामोशी रही। फिर ऋषभ ने उसे अपनी बाहों में खींच लिया।
“इस बार भागोगी नहीं,” उसने कहा।

अनाया रोते-रोते हँसी, “अब कहीं नहीं।”

सत्रह की उम्र में शुरू हुआ उनका प्यार अब आसान नहीं था, पर कहीं ज़्यादा सच्चा हो चुका था। सफ़ेद कोट के नीचे धड़कते दिलों ने समझ लिया था कि प्यार सिर्फ़ साथ रहने का नाम नहीं होता, बल्कि एक-दूसरे की गलतियों को स्वीकार करने और फिर भी हाथ थामे रखने की ताक़त का नाम है। ऋषभ ने अनाया की आँखों में अब पछतावे से ज़्यादा सच्चाई देखी और अनाया ने पहली बार महसूस किया कि लौटना हार नहीं, हिम्मत होती है।

समय ने उनके घावों पर मरहम रखा। दोनों अपनी पढ़ाई में और ज़्यादा डूब गए, जैसे हर चैप्टर के साथ रिश्ता भी नया इम्तिहान पास कर रहा हो। कभी-कभी खामोशी होती, कभी बहस, लेकिन अब वे भागते नहीं थे। वे रुकते थे, बात करते थे, और फिर आगे बढ़ते थे…साथ।

कुछ साल बाद, इंटर्नशिप के दौरान, उसी अस्पताल के कॉरिडोर में जहाँ कभी अनाया अकेली रोई थी, आज वह ऋषभ के साथ खड़ी थी। दोनों के गले में स्टेथोस्कोप था, आँखों में आत्मविश्वास। ऋषभ ने मुस्कराकर कहा,
“याद है, हमने कहा था…डॉक्टर बनेंगे?”
अनाया ने उसकी ओर देखा, आँखें नम हो गईं, “डॉक्टर तो बन गए… इंसान बनना भी सीख गए।”

अस्पताल की खिड़की से आती सुबह की रोशनी में दोनों साथ खड़े थे। बाहर ज़िंदगी अपनी रफ़्तार से चल रही थी, और भीतर दो दिल अब स्थिर थे। सत्रह की उम्र का वो अधूरा-सा प्यार अब मुकम्मल हो चुका था टूटकर, समझकर और फिर पूरे विश्वास के साथ एक-दूसरे को चुनकर।

राधिका शर्मा को प्रिंट मीडिया, प्रूफ रीडिंग और अनुवाद कार्यों में 15 वर्षों से अधिक का अनुभव है। हिंदी और अंग्रेज़ी भाषा पर अच्छी पकड़ रखती हैं। लेखन और पेंटिंग में गहरी रुचि है। लाइफस्टाइल, हेल्थ, कुकिंग, धर्म और महिला विषयों पर काम...