वह मंदिर की सीढ़ियों पर बैठा गंगा नदी की कलकल करती धारा को देखकर आनंद से सराबोर हो जाता। उसका अशांत मन प्राकृति के इस मनोरम दृश्य को देखकर उल्लास और उमग से भर जाता कोलाहल से दूर इस शात वातावरण मे वह ऐसे खो जाता की समय के बीतने का अहसास भी नही हो पाता। चारो ओर शक्ति ही शक्ति थी। ऐसी शक्ति को छोड कर भला कौन अशात दूनिया मे जाना चाहेगा! यही कारण था कि वह घटो गंगा की लहरो मे खो जाया करता। एक दिन अचानक किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा। उसका ध्यान भग हुआ। उसने पलट कर देखा। उसके पीछे एक अित खूबसूरत युवती गेरूआ वस्ा पहने खड़ी थी। मानो स्वर्ग से उतरी कोई अप्सरा हो। साक्षात सौदर्य की
देवी। वह अपलक नेाो से उसकी खूबसूरती को निहार ने लगा। गुलाब की पंखुडिया के समान होठ, मोती जैसे दात, नशीली आखे, माथे पर चदन का टीका और हवा मे लहराते बिखरे बाल, जो उसकी खूबसूरती मे चार-चाद लगा रहे थे। ‘क्या मै आपके करीब बैठ सकती हू। वह मुस्कुराते हुए बोली।
‘हा,हा, क्यो नही ? वह बोला। वह उसके करीब बैठ गई और बोली, यहा पर बहुत शांति है। गगा की अिवरल धारा को देखकर तन-मन प्रफुल्लित हो जाता है। फिर मिदर की घटिया मानो अशात मन को भी उमग से भर देती है। आप सही कह रही है । इसिलए तो मै अपने अशात मन को शात करने के लिए यहा घटो बैठा करता हू । यहा बेचैन दिल को सुकून मिलता है। वह बोला। तो आप इस शहर मे ही रहते है । वह बोली। नही ! उमानाथ धाम का नाम बहुत सुना था। कहते है, यहा आकर भगवान शिव के दर्शन करने मात्र से ही मन की इच्छा पूरी हो जाती है। वह बोला। मै भी यही जानती हू। इसलिए यहां आई हू। वह बोली। तो आप भी अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए यहा आई है । वह बोला।
‘हा, शायद यहा मेरी इच्छा पूरी हो जाए! वह बोली। आप कहा से आई है और आप का नाम क्या है उसने पूछा। वह मुस्कुराते हुए बोली’ मै लदन से आई हू और मेरा नाम हेली है। आपकी कौन-सी इच्छा लदन मे पूरी नही हुई, जो अपनी इच्छा पूरी करने के लिए भारत चली आईं। वह मुस्कुराते हुए बोला। आप अपना नाम नही बतायेगे। वह मुस्कान बिखेरते हुए बोली। वह मुस्कुरा कर बोला, अमन।
बडा प्यारा नाम है। वह मुस्कुराते हुए बोली। ‘आपने बताया नही कि आप यहा क्यो आई है ? वह पुन: प्रश्न किया। ‘मेरा परिवार पहले भारत मे ही रहता था। फिर मेरे दादाजी यहा की सारी सपत्ति बेचकर
लदन चले गए। वहा मेरे पिताजी का बहुत बडा कारोबार है। मेरा लालन-पालन वही लदन मे हुआ। मेरे परिवार के लोग लदन मे रहने के बावजूद अपनी सस्कृित और देश को भुला नही पाए। मेरी परवरिश भी भारतीय परिवेश मे हुई। मुझे भारतीय संस्कृति से बहुत लगाव है। यही कारण रहा िक मै अपने परिवार को छोड कर लदन से मुबई आ गई। लेकिन वहा की संस्कृति मुझे रास नही आई।
लदन की तरह ही मुबई की संस्कृति है। वहा दौलत-शौहरत है, लेकिन मन की शांति नही है। सब मतलब के यार है । वहा कोई सच्चे दिल से किसी को प्यार नही करता। उन आँखों मे सच्चे प्यार की झलक नही मिलती, बिल्क उन आँखों मे वासना की भूख झलकती थी। मै राम के जीवन दर्शन को पढ कर यहा राम की खोज मे आई थी। मै राम की सीता बनना चाहती थी। लेकिन माहौल मे मुझे कोई राम नजर नही आ रहा था। चारो ओर रावण ही रावण थे, जो सीता की पिवाता को भग करना चाहते थे। इतने दिन मुबई मे रही, लेकिनकिसी से अपने प्यार का इजहार नही किया। न अपने शरीर को किसी को स्पर्श करने दिया। मै आज भी सीता और गगा की तरह पवित्र हू । मै अपने राम की खोज मे भटक रही हू । मै उस सच्चे इसान की तलाश कर रही हू , जो राम की तरह निश्छल चरित्र
वाला हो और मुझे सीता की तरह सच्चे दिल से प्यार करे। वह मेरी खूबसूरती और तन से नही,बिल्क सच्चे हृदय से मुझे अपना बना ले। और मै मुबई छोड कर तीर्थों का भ्रमण करने लगी, ताकि मेरे जीवन मे भी कोई राम मिल जाए। वह प्रेम भरी निगहाो से उसकी ओर दे१ते हुए बोली। उसकी बाते सुनकर उसके हृदय मे हेली के प्रित प्रेमऔर अनुराग उमड आया। उसके त्याग के सामने वह नतमस्तक हो गया और सोचने लगा की कितने उच्च विचार है इस युवती के। दौलत और शौहरत को छोड कर सच्चे मानव की तलाश मे भटक रही है। अपने राम की खोज कर रही है। जबकी आधुकनीता की इस अधी दौड मे जहा दौलत और शौहरत पाने के लिए आज की युवितया क्या कुछ
करने को तैयार हो जाती है ? ऐसे मे हेली का यह त्याग उसके विशाल हृदय का प्रतीक है। निस्वार्थ प्रेम तो कही दीखता ही नही ! यहा तो दौलत की पूजा होती है, राम की नही । हेली तो नैतिकता की अनुपम उदाहरण है। वह मन ही मन हेली के विचारो से प्रभावित हो उसकी खूबसूरती पर फिदा हो गया। उसे विचारो में खोया देख हेली बोली, तुम कहा खो गये ? रात होने वाली है। क्या रात यही बितानी है? उसका ध्यान भग हुआ। सच मुच रात घिर आई थी। उसकी खोज की कहानी सुनकर वह
विचारो मे ऐसे खो गया की उसे समय का ध्यान ही नही रहा। वह चारो ओर दे१ने लगा। चारो ओर सन्नाटा छाया हुआ था। अधेरी रात मे भी हेली की खूबसूरती मानो प्रकाश फैला रही थी। उसे ध्यान आया िक आज कल यहा का माहौल १राब है। ऐसे मे िकसीखूबसूरत युवती को रात के अधेरे मे यहा अिधक देर तक रुकना िकसी मुसीबत को बुलावा देना है। वह हेली की ओर दे१ते हुए बोला, बातो मे समय का पता ही नही चला। रात मे यहा रूकना ठीक नही है। अब पहले वाला समय नही रहा। गुडे-बदमाशो का भी यहा आना-जाना लगा रहता है। आप कहा ठहरी है ? मै आपको वहा तक छोड दूगा। हेली की आखों मे चमक थी। अपने-पराए का भेद नही था। उसकी आखों मे अपने पन
का भाव साफ झलक रहा था। इतने कम समय मे हेली उससे घुल -िमल गई थी। वह मुस्कुराते
हुए बोली, मै होटल विरंची विहार मे रुकी हू और आप कहा रुके है ? ‘मै पास के ही एक होटल हर्ष मे ठहरा हू। चिलए, आपको होटल तक छोड देता हू । वह न चाहते हुए भी हेली से झूठ बोल दिया। उसका घर तो इसी शहर मे है। वह अपने अभाव और कष्टो को भुलाने केलिए यहा घटो बैठा करता है।
‘मै स्वय चली जाड्डगी। मै एक गाडी को भाडे पर ले रखी हू । गाडी मिदर प्रागण के बाहर खड़ी है। चिलए साथ मे । रास्ते मे आपको उतार दूगी। वह उसके हाथ पकडे गाडी की ओर बढने लगी। उसके कोमल हाथ के स्पर्श से उसका शरीर रोमािचत हो रहा था। उसकी खूबसूरती की महक उसे मदहोश कर रही थी। उसे लग रहा था िक यिद कुछ देर और उसके साथ गाडी मे बैठा रहा, तो वह अपना सयम खो देगा। वह बीच रास्ते मे ही गाडी रूकवा दी और बोला, यही पास मे ही होटल है। मै अब चला जाड्डगा। हेली बोली, हम कल सुबह मिदर मे मिलेंगे। गगा स्नान कर भगवान की पूजा करेगे। आप भी साथ रहे गेन! मै आपका यही इतजार करूगी। यही से हम दोनो साथ मिदर चलेगे। पहली मुलाकात मे ही वह हेली को अपना दिल दे बैठा था। उसकी खूबसूरती पर फिदा हो गया था। उसकी खूबसूरती उसके दिल को बेचैन कर रही थी। उसका मन मचल रहा था, लेिकन चाह कर भी अपने प्यार का इजहार नही कर पा रहा था। उसकी आडे जो उसकी पत्नी और बच्चे आ रहे थे। िफर हेली को तो राम जैसा आदर्श पित चािहए। वह उससे कैसे प्रेम कर सकती है ! फिर किस सोच मे पड गए! कल यहीि मलोगे न! हेली मुस्कुराते हुए बोली। उसकी मुस्कुराहट उसे और अिधक बेचैन कर रही थी। वह इस मौके को कैसे गवा सकता था। बोला, हा-हा ! इसी स्थान पर आपका इतजार करूगा। मेरी भी इच्छा अधूरी है। हम दोनो साथ िमलकर अपनी-अपनी इच्छाओ की पूर्ति के लिए प्रार्थना करेगे। और वह आगे बढ गया। फिर पीछे मुड कर देखा। हेली गाडी की खिड़की से उसे जाते हुए देख
रही थी। वह घर आ गया। हेली के यालो मे डूबा वह अपने अभाव और कष्टो को भूल गया। अपनी पत्नी और बच्चो को भी भूल गया। उसकी आखो के आगे तो बस हेली की मन मोहक खूबसूरती ही घूम रही थी। उसकी आखो से नीद कोसो दूर चली गई थी। वह बेचैन होकर इधर-उधर करवटे बदलते रहा। कब सुबह हो िक वह हेली की खूबसूरती का दीदार करे। पत्नी और बच्चो के प्रित भी उसका व्यवहार बदल चुका था। वह सुबह उठ कर सडक के फुटपाथ पर आकर खड़ा हो गया। हेली भी उसे अिधक इतजार नही करवाई और कुछ समय मे गाडी उसके करीब आकर रूक गई। हेली ने गाडी
का दरवाजा खोला और वह फौरन उसके करीब जाकर बैठ गया। हेली के करीब बैठना उसे सुखद अनुभूति का अहसास करा रहा था। उसे परम आनद की अनुभूति हो रही थी। वह हेली के यालो मे इस कदर डूब गया िक मिदर कब आ गया, उसे पता भी नही चला। ‘चलो उतरो! उमानाथ मिदर आ गया।
हेली उसके हाथ पर अपना हाथ रखते हुए बोली। ‘ मिदर आ गया! वह उसके ख्यालो मे डूबे हुए बोला।
‘ हा, आ गया। हेली बोली। दोनो गाडी से उतर मिदर प्रागण मे प्रवेश कर गए। उत्तरायण गगा की शात धारा उन दोनो को अपनी ओर आकिर्षत कर रही थी। गगा का निर्मल जल शीशे की तरह चमक रहा
था। ‘हेली! तुम यहा स्नान कर पाओगी। इस खुले वातावरण मे कैसे अपने कपडे बदलोगी! इतना प्राचीन तीर्थ स्थल, लेकिन सुविधा नगण्य। औरतो के कपडे बदलने तक की व्यवस्था नही । यहा स्नान करना तुहारे िलए उिचत नही । वह अपनी निगहै नीची कर बोला। ‘महानगर के लोग स्विमिंग पूल मे कैसे नहाते है , समदर मे कैसे स्नान करते है । फिर गगा की निर्मल धारा मे स्नान कने मे सकोच कैसा! खुले वातावरण मे स्नान करने का आनद ही कुछ और है। फिर तुम भी होन !अपनो के साथ स्नान करने मे सकोच कैसा। मै कपडे पीपल के पेड की ओट मे बदल लूगी। हेली उसके गाल पर अपने कोमल हाथ से स्पर्श करते हुए बोली। और दोनो ने गगा स्नान कर भगवान शकर का जलाबषिषेक किया। इस प्रकार वे दोनो रोज मिदर की सीडीओ पर बैठे घटो बाते किया करते। काफी दिन हो गए। वे दोनो एक-दूसरे से काफी घुल-िमल गए। एक दिन बातो ही बातो मे अमन ने पूछा, ‘हेली! तुम यहा काफी दिनो से हो। यहा से कब जा रही हो, अपने राम की तलाश मे।
उसकी बाते सुनकर हेली खिलखिलाकर हसने लगी। खिलखिलातीती हेली पीली साडी मे और अिधक खूबसूरत लग रही थी। वह उसकी खूबसूरती को एकटक निहरने लगा। उसकी हसी बद होने का नाम ही नही ले रही थी। फिर उसने वही प्रशन दोहराया, तुम तो हसती ही जा रही हो। मेरे प्रशन का उत्तर नही दे रही हो। हेली अपनी हसी पर काबू करते हुए बोली, ‘अब मै कही नही जाड्डगी। यही रहूगी। ‘क्यो ? उसने प्रशन किया। ‘मेरी तलाश पूरी होगई। हेली उसकी आखो में आँख डालकर बोली।
‘क्या तुहारी तलाश पूरी हो गई ? भगवान शकर ने तुहारी पुकार सुनली। कौन है वह खुशनसीब, जो तुहारा राम बनेगा। वह उदास स्वर मे बोला। ‘मुझे राम जैसा चरिा वाला सच्चा इसानि मल गया। मै सीता बनकर उसकी जिंदिगी खुशियों से भरदूगी और वह मेरी जिंदिगी को राम बनकर। हेली उत्साहित स्वर मे बोली। ‘जरा मै भी तो जानू ! वह कौ है, जो तुहारा राम बनेगा। वह बोला। वह मुस्कुराते हुए उसकी बाहो से लिपट गई और बोली अमन! वह राम तुम हो और मै तुहारी सीता। तुहारी आखो मे मेरे प्रित सच्चा प्रेम झलकता है। तुहारी आ१ो मे ́प्रेम और अनुराग है। तुहारी आखो मे जो प्रेम
और समर्पण है। वह िकसी और की आखो मे नही ́देखी। तुम मे ही मुझे राम का स्वरूप नजर आता
है। वह तुम ही आदर्श पुरुष हो, िजस की तलाश मे मै भटक रही थी। आज मेरे सच्चे मानव की तलाश पूरी हो गई। मुझे अपने मन मिदर मे बसा लो। मुझे अपनी सीता बनालो। उसके शरीर का स्पर्श उसे रोमा िचत कर रहा था। वह अपनी मर्यादा की सीमा को लाघने ही वाला था िक उसकी अतरात्मा ने उसे धिक्कारा, ‘तुम यह क्या करने जा रहे हो ? वह हेली जो अपने परिवार और दौलत-शौहरत को छोड कर शांति की खोज मे भारत आई। यहा आकर भी माया नगरी की चकाचौध िजदगी को त्याग कर राम जैसे आदर्श पुरूष की खोज मे भटक ने लगी। वह सीता बनना चाहती है। गगा की तरह निर्मल और पवित्र हेली को अपवित्र मत करो। हेली सीता जरूर बन सकती है, लेिकन तुम राम नही बन सकते। राम तो पराई स्त्री को आँख उठा कर भी नही दे१ते थे। तुम तो बीवी -बच्चे वाले हो। राम तो आदर्श पुरुष थे। तुहारा तो कोई आदर्श ही नही है। तुहारा तो एक ही मकसद है। वह है हेली की खूबसूरती का भोग करना। राम के नाम को कलिकत मत करो। तुम हेली के जज्बातो के साथ खेल रहे हो। उसे अपने राम की खोज करने दो। और उसने एक झटके मे हेली को अपनी बाहो से अलग करि दया। ‘यह तुमने क्या िकया, अमन ? क्या मै तुहारी सीता बनने लायक नही हू ? क्या मै सीता नही बन सकती ? आखिर तुमने मुझे अपने आप से अलग क्यो कर दिया ? यह
कहते-कहते हेली की आखो मे आसू आ गये। मै तुहारे जज्बातो के साथ नही खेल सकता। मै तुहे धोका नही दे सकता। राम के नाम को बदनाम नही कर सकता। मै कभी राम जैसा आदर्श पुरुष नही बन सकता। तुम जिस सच्चे मानव की तलाश कर रही हो, वह मै नही हू। मै तुहारा राम नही बन सकता। तुम यहा से वापस चली जाओ। अपने राम को कही और खोजो। शायद तुहारा राम मिल
जाए! अमन अपनी आखो मे आसू भरकर बोला। ‘पर! तुम मुझे अपनी सीता क्यो नही बना सकते ? मै तो तुहे अपना राम मान चुकी हू। मुझे अपनाने से पीछे क्यो भाग रहे हो ? राम ने तो सीता के साथ ऐसा नही िकया। अब तुम ही मेरे राम हो और मै तुहारी सीता। अब मै अपने राम को छोड कर कही नही जाड्डगी। हेली उसके करीब आते हुए बोली। ‘तुम जिस राम की खोज मे भटक रही हो। वो राम आज के आधुनिक युग मेमिलने वाला नही है। तुम जरूर सीता बन जाओगी, लेकिन तुहारी जिंदिगी मे कोई राम नही आएगा। न कोई सच्चा मानव तुहे इस युग मे ́िमलेगा जो तुहे हृदय से प्यार करेगा। यहा तो पग-पग पर रावण जरूर िमल जाएंगे। तुहारी पिव ाता को भग करने के िलए। आि१र कब तक अपनी पिव ाता को इन रावणो से बचा पाओगी। तुम वापस लदन चली जाओ। वही अपनी गृहस्थी बसा लो। यहा तुहे राम नही ́मिलने वाला। मै भी राम नही रावण हू , जो तुहारी खूबसूरती
और तुहारे खूबसूरत तन को भोग ना चाहता था। मै भी तुहे कहा सच्चे हृदय से प्रेम करता हू! मै तो सिर्फ तुहारी खूबसूरती का आनद उठाना चाहता था । मेरी पत्नी तो बात-बात पर मेरी गरीबी का मजाक उडाती है। मुझे राम की तरह प्रेम नही करती। मै उसकी नजरो मे एक तुच्छ इसान हू।
मै तुम्हे देखे में नहीं रख सकता। मै बीवी-बच्चो वाला हू। मै इसी शहर मे रहता हू और अपने दर्द को भुलाने के लिए यहा घटो बैठा करता था। तुम मुझे भूल जाओ। अपने राम की तलाश मे कही और चली जाओ। शायद इस कलयुग मे भी तुहारा राम तुहे िमल जाए! वह अपने हृदय पर पत्थर र१ कर यह सब कह तो दिया लेकिन उसकी आखो मे आसू की बूदे साफ झलक रही थी। यह सुनते ही हेली चौकी और फिर बोली, ‘लेकिन तुहारी आखो मे मेरे लिए सच्चा प्यार झलकत है। इतना सब कुछ होने के बाद भी
तुमने मेरी पिवाता को भग करने का कभी प्रया नही किया। तुम रावण नही हो सकते। तुम गरीब जरूर हो, लेकिन शैतान नही। तुम से मिलते ही मुझे शांति का अहसास हो गया था। तुम वास्तव मे सच्चे हृदय वाले राम हो। मै तुहे अपना राम मान चुकी हू । मै तन की भुकी नही, मन की भुकी हू और आज मेरी वह भुकी मिट गई। मै तुहारा बसा-बसाया घर उजाड नही सकती। तुमने ठीक कहा िक यहा त पग-पग पर रावण है, जो मेरी पवित्रता को जरूर भग कर देगे। जब मेरा राम मुझे मिल ही गया है, तो अपने राम के याद के सहरे जिंदिगी बिता ही दूगी। मै तुहे अपने मन-मिदर मे बसा कर
अकेली वनवास तो जा ही सकती हू । मेरी तलाश पूरी हो गई। मै राम का नाम बदनाम नही होने दूगी। उनके जीवन के आदर्श को मिट्टी में मिलने नही दूगी। इतना कह कर हेली अपनी आखो मे आसू लिए मिदर प्रागण से बाहर निकल गई। वह हेली को जाते हुए एकटक देख रहा था। उसकी आखो से आसुओ की धारा बह चली और वह सोचने लगा, इस कलयुग मे भी सीता है, लेकिन राम जैसा आदर्श पुरुष क्यो नही ?आखिर सीता के जीवन मे वनवास क्यो लिखा है। और हेली रूपी सीता अपने राम की नजरो से सदा के लिए दूर चली जा रही थी।
