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अनिल का चबूतरा-21 श्रेष्ठ बालमन की कहानियां गुजरात
Anil ka Chabutra-Balman ki Kahaniya

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

अनिल का चबूतरा-अनिल की हवेली के पास में एक चबूतरा था। बहुत सुंदर! कलात्मक! वह गांव की शोभा था। बरसों पहले वह बंधवाया गया था। पर उसका बांध काम जितना मजबूत था, उतनी ही उसकी शिल्पकला अद्भुत थी। उसका छोटरा आरस का बना हुआ था। उसके स्तंभ पर बारीक शिल्प थी। उसके ऊपर” षट्कोण आकार का, चारों ओर से खुला छाते जैसा था। उसकी छत को आधार देने के लिए लकड्ड की छोटी पुतलियां थीं। छत की कमान में फूल-बेल और पक्षिओं की डिजाइन थी। लोग बार-बार यह चबूतरे को देखते जाते और उसकी प्रशंसा करते रहते। सरकार ने भी इस पुराने चबूतरे की अद्भुत शिल्पकला देखकर उसका संरक्षण करने के लिए जरूरी कदम उठाये थे।

इस गांव-चबूतरा का प्रबंध अनिल के पिताजी करते थे। गांव के वह सेठ एवं मुखिया भी थे। सारे गांव की देखभाल करते थे। उसमें भी चबूतरे की खास! चबूतरे की रोजाना सफाई होती थी। कोई इसे गंदा न करे, इसका ख्याल रखते थे। गांव में कोई खास मेहमान आने पर उनको खास तौर पर यह चबूतरा दिखाते थे। वह गांव की शान था। इस चबूतरे की डाक-टिकट निकालने के लिए पोस्ट विभाग में विनती की थी।

एक दिन की बात है। अनिल अगाशी में सोया था। अगाशी और चबूतरे के बीच ज्यादा अंतर नहीं था। सुबह होने में थी, आसपास थोड़ा उजास था। अनिल की आंखों में अब भी थोड़ी नींद थी। अनिल किसी सपने की दुनिया में तैर रहा था। उसको अपने नजदीक कोई गपशप करता सुनाई दिया। कौन होगा इतनी सुबह में? उसको प्रश्न हुआ। उसको ऐसा लगा कि उसकी अगाशी और चबूतरे के बीच में कोई बात चल रही है। एक ही पलकें मानो कि उसकी सांस रुक-सी गई है। उसे आश्चर्य हुआ! उसने गौर से सुनने का प्रयत्न किया। चबूतरा अगाशी को कह रहा थाः “बहन, अब मैं यहां खड़ा रहकर थक गया हूँ। कब तक मुझे यहां खामखां खड़े रहने का?”

“क्यों? “अगाशी ने प्रश्न किया।

“नहीं तो! अब यहां कोई भी आता नहीं है। चिडियां भी नहीं।” चबूतरे ने बताया।

“क्यों? रोज यहां कितने लोग आते हैं तुझे देखने के लिए! हमारी ओर तो कोई आंख उठाकर देखता तक नहीं है।”

“पर इससे क्या? मैं तो पंछी-कबूतर की बात करता हूँ। और खड़ा किया है पंछियों के लिए। पर पंछियों को पानी पीने के लिए कोई पात्र भी नहीं रखा है! पंछी आएंगे तो वे क्या खाएंगे? क्या पिएंगे?”

“सच बात कही आपने भाई। लोग आपको देखने के लिए आते हैं। आपकी तारीफ करते हैं। पर तुम्हारा जीवन पछियों के बिना कितना सूना-सूना लगता है, यह कोई नहीं देखता! मंदिर तो है लेकिन कोई देव नहीं है, ऐसा हुआ।”

“यह तो बात है। “चबूतरेने कहा।

“तुम्हारे यहां कोई दाना-पानी न डाले फिर तो पंछी भी कहां से आएंगें? आप तो खड़े हो भूखे प्यासे पंछियों के विश्राम के लिए। जैसे पंख बिना के पंछी, वैसे पंछी बिना के चबूतरा भाई आप! यही न?” अगाशी ने समभाव जताते हुए कहा।

“बहन, ऐसे ही खड़ा रह-रहकर मैं थक गया हूँ। भूखे-प्यासे पंछियों को दाना-पानी न मिले तो मेरे होने का क्या मतलब? “चबूतरा दुःख भरी आवाज में बोला।

अगाशी ने ढाढस बंधाते हुए कहाः “भगवान सब कुछ अच्छा करेंगे। अपना यह अनिल है न, वह समझदार है। वह तुम्हारा दुःख जानेगा तो तुरंत ही दूर कर देगा।”

“तुम कहती हो तो आशा रखता हूँ।”

चबूतरा बड़ी मुश्किल से शांत हुआ और अगाशी भी चबूतरा पंछियों के कलरव से चहकता हो जाए, ऐसी मूक प्रार्थना करने लगी।

अनिल को मानो जैसे चबूतरा मूक आंसू बहाता हो। ऐसा लगा। वह तुरंत ही अपने बिस्तर से खड़ा हुआ। उसने मा को उठाया और चबूतरे की बात कही। मां ने भी तुरंत कहाः “हम भी कैसे चबूतरे की शोभा देखते रहे। पर चबूतरा पंछियों के बिना कितना सूना है! यह कभी नहीं देखा। अब हम आज से रोजाना चबूतरे में दाना डालेंगे। और पानी का एक छोटा-सा पात्र रखेंगे। अब पंछियों को दिन-रात दाना और पानी मिलेगा, ठीक है न!”

फिर तो अनिल की मां सुबह उठकर तुलसी क्यारे के पास दीया जलाकर, चबूतरे में पंछियों के लिए दाने पानी का प्रबंध करने लगी। यह देखकर गांव के दूसरे लोग भी चबूतरे में दाना डालने लगें।

अब तो चबूतरा मानो पंछियों के पर फड़कने से चमकता हुआ कोई पेड़ न हो, ऐसा दिखता था! अनिल भी दिन में एक-दो बार चबूतरे पर न जाता तो चैन नहीं होता था। चबूतरा पर आते पंछियों को देखने में, उनकी गिनती करने में उसे बहुत आनंद होता था। फिर तो चबूतरे के साथ अगाशी भी कल्लोल करने लगी।

अनिल तो कई बार मां के हाथों में से दाना लेकर अपनी हथेली में रखता, पंछियों को चबूतरे की तरह आमंत्रण देता, दाना चुगने और चहकने के लिए! अब तो अनिल भी चबूतरा और अगाशी को पंछियों जितना ही प्यारा लगता है।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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