Support Story: शारदा आंटी का फोन आया था कह रही थी अगर फुरसत में है,तो घर आजा,आज जी बहुत घबरा रहा है” मैनें भी तुरंत ही कहा “बस आधे घंटे में पहुंचती हूँ।” फटाफट काम खत्म किया और आॅटो लिया उस आधे घंटे के सफर में मन बचपन के गलियारों में घूम आया जब शारदा आंटी, अजय अंकल और उनकी दोनो बेटियाँ शिखा और शुभ्रा हमारे पड़ोस के घर में रहते थे। ऐसा लगता था कि हम एक ही परिवार हैं। कभी भी कोई भी एक दूसरे के घर आता जाता था। माँ और आंटी बहनों की तरह रहते थे और मैं ,दीदी ,सोनू,शिखा और शुभ्रा भाई बहनों की तरह।जैसे हमारे सुख दुख साझा थे,खून का रिश्ता ना होते हुए भी। अंकल और आंंटी बिल्कुल “मेड फॉर ईच अदर” लगते थे। माँ—पापा के बीच तो फिर भी मीठी नोक झोंक चलती रहती थी,लेकिन हमने कभी आंंटी और अंकल को लड़ते क्या, ऊँची आवाज़ में बात करते भी नहीं सुना।
साथ—साथ बड़े हुए, हम सब बच्चों की शादी हो गई, और अंकल और पापा रिटायर हो गए। पापा तो उसी शहर में सेटल हो गए लेकिन अंकल मेरे शहर आ गए, क्योंकि उनके ज्यादातर रिश्तेदार यहींं रहते थे। मैं बहुत खुश हो गई, लगा जैसे मेरा मायका यहाँ आ गया हो। शिखा आस्ट्रेलिया में सेटल थी, लेकिन शुभ्रा की शादीशुदा जिंदगी कुछ ठीक नहीं चल रही थी। बहुत कोशिश की सबने कि सबकुछ ठीक हो जाए,लेकिन सारी कोशिशें नाकाम रही..आखिर शुभ्रा का तलाक हो गया। इस सदमें से उबरे भी नहीं थे कि एक और बड़ा वज्रपात हुआ..आंटी को कैंसर डॉइगनाइज्ड हुआ वो भी सेकेंड स्टेज।
अंकल नें अपना सबकुछ लगा दिया आंटी के इलाज में। गाँव की ज़मीन बेच दी ,सारी सेविंग्स लगा दी महंगे से महंगा इलाज करवाया, लेकिन कोई फायदा नहीं हो रहा था। आंटी दिन -ब -दिन कमज़ोर हो रही थीं। और अंकल टूट रहे थे। शिखा भी आकर देख जाती थी,और शुभ्रा नें घर और आफिस दोनों संभाला हुआ था। इस मुश्किल की घड़ी में रिश्तेदार भी मदद को नहीं आते थे। ऐसे में अंकल के स्वर्गीय मित्र राकेश अंकल की पत्नी आशा आंटी नें बहुत साथ दिया। वे अक्सर ही आकर शारदा आंटी के पास बैठ जाती। कभी खाना बना देती,तो कभी अंकल को हौसला रखने को कहती। फिर अचानक ही शारदा आंटी नें जिद्द पकड़ ली कि शुभ्रा की दूसरी शादी करवा दो,जबकि शुभ्रा इस बात के लिए तैयार नहीं थी। फिर भी माँ की बात का मान करते हुए मान गई, और संयोग से अच्छा रिश्ता भी मिल गया।शुभ्रा शादी करके यू.एस. चली गई।
अॉटो के ब्रेक के साथ मैं अतीत से वर्तमान में आई। शारदा आंटी को देखकर आँखे भर आईं।कहाँ आंटी का वो तेजमय चेहरा और माथे पर बड़ी सी लाल कुंमकुंम की बिंदी,और कहाँ ये जीर्ण शरीर। मुझे देखते ही चेहरे पर एक चमक सी आई। अंकल को दवा लेने के बहाने बाजार भेज दिया। मेरा हाथ पकड़ कर कहनें लगी “मेरे जाने के बाद शिखा और शुभ्रा मायके के सुख से वंचित हो जाएंगे, अब तू ही उनका मायका है,यूँ तो शिखा बड़ी है पर अब भी बहुत बचपना है उसमें,शुभ्रा समझदार है।लेकिन पता नहीं वो दोनों ही परिस्थितियों को किस तरह लेंगीं। तू समझाना उन्हें और सम्हालना भी।”जाने क्यों मुझे लग रहा था आंटी कह कुछ और रहीं थी और बोलना कुछ और चाह रही थी।मैनें भी उनसे वादा किया कि मैं शिखा और शुभ्रा का साथ कभी नहीं छोडूंगी।
उसके ठीक 10 दिन बाद आंटी हम सबको छोड़कर हमेशा के लिए चली गई। शिखा और शुभ्रा दोनो ही आए,और कुछ दिन रुककर लौट गए,अंकल को साथ चलने को कहा लेकिन वो अपना देश छोड़कर नहीं जाना चाहते थे। सब अपनी अपनी लाइफ में व्यस्त हो गए। फिर वो हुआ जो हम सबके लिए बिल्कुल अप्रत्याशित और चौंकने वाला था। अंकल नें आशा आंटी से शादी कर ली थी। हम सभी लगभग सदमें मे थे। शिखा और शुभ्रा आए,और बहुत बड़ा हंगामा हुआ। अंकल ने अपनी तरफ से समझाने की बहुत कोशिश की,लेकिन वे दोनों समझने को तैयार नहीं थे। मैनें भी कोशिश की,समझाने की,लेकिन वे दोनों सुनने को तैयार ही नहीं थी। उन दोनों ने अंकल से रिश्ते पूरी तरह से खत्म कर दिए।
सच कहूँ तो मैं खुद भी नहीं समझ पाई आखिर कौन सही था और कौन ग़लत। शिखा और शुभ्रा का अपनी माँ की जगह किसी और को ना देने का फैसला या अंकल का सारी उम्र अपनी पत्नी का पूरी शिद्दत से साथ निभाने के बाद ,उनके जाने के बाद उनकी जगह किसी और को देने का फैसला। क्या शारदा आंटी जानती थी कि अंकल उनके जाने के बाद आशा आंटी से शादी कर लेंगे,या फिर ये उनकी आखिरी इच्छा थी। इन सबसे ऊपर क्या दो ऐसे इंसान जो अंदर से टूटे हुए है,उनका एक दूसरे का सहारा बनना ग़लत है? आप ही बताइये।
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