भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
छत्रपाल मैं अडोल बैठा रहता हूं। व्यस्त-से वे भीतर आते हैं और सामान बरामदे में रखवाकर सप्ताह भर के आए पत्रों को जल्दी-जल्दी पढ़ते हैं। प्रत्येक पत्र उनकी मुखाकृति पर अलग-अलग भाव प्रतिबिंबित कर रहा है। रेखाएं बन-मिट रही हैं। उस पत्र में डूबते-उतरते चले गए हैं। अस्पष्ट-सा कुछ बुदबुदाकर उसे जेब में रख लेते हैं। आंटी और मैं उपेक्षित-से उनके पीछे ड्राइंगरूम में आ जाते हैं। वे दीवार पर टंगे कैलेंडर को सशंकित दृष्टि से देखते हैं, फिर बैठ जाते हैं, थके-से। आंटी ठीक उनके सामने वाली कुर्सी पर टिकी हैं। मैं दरवाजे के पास दीवार का सहारा लिए खड़ा हूं।
आरंभ के दिनों में जब भी अंकल वापस आते, तो आंटी अपनी उत्सुकता को दबा न पातीं। पूछतीं- हुआ कुछ फैसला? वे अपमानित-से नंगे फर्श पर रेंगती चींटी के पीछे अपनी पनीली आंखें लगाकर हौले से गर्दन नकारात्मक ढंग से हिला देते। किंतु अब वे कुछ पूछती नहीं। पांच वर्ष पर्याप्त नहीं होते। कई बार आधी उम्र चली जाती है मुकदमेबाजी में, वे जान गई हैं।
जैसे अंधेरे में संकरी गली के अंधे मोड़ पर कोई शोहदा किसी निरीह बाला को घेर ले और कुछ करे, इससे पहले ही गली के खंभों पर टंगे बल्ब जगमगा उठे और लड़की के अभिभावक भी सामने से आ जाएं- कुछ ऐसी ही दशा तब अंकल की हो गई थी। आपत्ति की घुमावदार गली से भागने की कोई गुंजाइश नहीं रही। गली के हर एक सिरे पर कानून के संरक्षक विकराल अजगर की तरह मुंह खोले खड़े थे। लोग कहते हैं, बहुत बड़ा केस था- लाखों का। कई फाइनेंस कंपनियां, मोटरगाड़ियों के दर्जनों परमिट, और न जाने क्या-क्या! इतना कुछ जाली हो सकता है, मेरा पंद्रह वर्षीय मस्तिष्क स्वीकारता नहीं; पर लोग कहते हैं, ऐसा हुआ है। कुछ-न-कुछ तो हुआ है, ऐसा मैं जानता हूं, पर इसकी भयंकरता नहीं जान पाया।
अंकल जब मुझे गांव से यहां ले आए, तो मेरा मन उमंगों से भरा था। शहर के ऐश्वर्य के मोहजाल ने मुझे जकड़ लिए था। कहां गांव का खपरैलवाला स्कूल और कहां शहर का कॉन्वेंट! वहां का मास्टर साक्षात् यमदूत था, तो यहां की सिस्टर्स दूध धोई संगमरमर की प्रतिमाएं। अंकल ने मुझे प्रवेश तो दिलवा दिया, लेकिन मुझे अन्य विद्यार्थियों के स्तर तक पहुंचने में जितना परिश्रम करना पड़ा, उतना शायद ही कभी जीवन भर करना पड़े। पर शीघ्र ही आस-पास की परिस्थितियों का जायजा लेकर मैंने अपने को समेट-सा लिए। जैसे बजती सितार के थरथराते तारों पर कोई अपना मांसल हाथ रख दे। घर भर एक अभेद्य चप्पी छाई रहती। तफान आने से पहले की खामोशी। पर तूफान तो एक भयंकर गति से आकर चला गया था। और पीछे छोड़ गया था आदर्शनीय मलबे का एक बड़ा ढेर। मान-प्रतिष्ठा का मलबा, आने वाली जिंदगी का मलबा और इस अशोभनीय मलबे के मालिक थे अंकल। मलबे में रहते-रहते हम कब प्रेत बन गए, हमें याद नहीं।
तिल-तिल कर मरते किसी सिर कुचले करैत की तरह मेरी उमंगें मेरे भीतर ही पूंछ पटक-पटककर दम तोड़ गईं। अंकल ने मुझे अपना प्रतिरूप बना दिया। अकसर वे रात को निश्चल-से बिस्तर पर लेटे छत को देखते रहते। उनकी आंखों में प्रयत्न करने पर भी मुझे कुछ दिखाई नहीं देता। करवट बदलते समय जब वे हल्की -सी कराह को दबाने का प्रयत्न करते, तो अपने बिस्तर पर लेटा मैं महसूस करता, मानो मेरे शरीर के अंग पथरा गए हैं। करवट लेने में अपने को असमर्थ पाता। हर करवट पर सैकड़ों प्रश्न तीक्ष्ण कांटों की तरह अंत:स्थल को बेध जाते और मैं यही सोचता-सोचता सो जाता कि क्या समय फिर करवट बदलेगा!
प्रातः टाइप राइटर की टिक-टिक मेरी नींद खोलती। अंकल टाइप कर रहे होते। मेरा मन उनकी सहायता करने को तरसता। चाहता कि वे कुछ देर सुस्ता लें और मैं उनकी अर्जियां टाइप कर दूं। जानता हूं वे आधी रात गए टाइप करते रहे होंगे। जब इस पर भी नींद न आई होगी, तो छत पर घूमते रहे होंगे अकेले। कहते हैं, आसपास से कटकर जब आदमी अंतर्मुखी हो जाता है तो उसमें और शून्य में भटकते प्रेम में कोई अंतर नहीं रहता। तो क्या अंकल भी? मैं इसके आगे कुछ सोचना नहीं चाहता। मैंने अपने एक मित्र के पिता के ऑफिस में प्रतिदिन एक घंटा लगाकर टाइप सीख ली है। झिझकते हुए एक दिन मैंने उनसे अर्जियां टाइप करने को कहा। मेरे हृदय पर एक जबरदस्त घुसा पडा। अंकल ने बताया कि टाइप राइटर बेच दिया गया है, मेरी चार महीनों की स्कूल फीस की अदायगी के लिए। कितने दिनों तक मेरे आस-पास एक अदृश्य टाइप राइटर की टिक-टिक् तैरती रही।
अंकल तौलिए उठाकर बाथरूम चले गए हैं और आंटी किचन में। दीवार से सटकर खड़े रहने से मेरी पीठ में ठंडक फैलती जा रही है। इस ठंडक का मैं गांव में रहकर आदी हो गया हूं, पर अंकल के चेहरे का ठंडापन मैं सह नहीं सकता। उनका चेहरा मझे बर्फ का एक गोला नजर आता है, जैसा हम गांव में बर्फ पड़ने पर बनाते थे। रुई-सी नर्म और धवल बर्फ का हम बच्चे मिल कर एक ढेर बना लेते और फिर अपने कौशलानुसार उस पर मुंह, नाक, आंखें खोदते। घंटों बाद जब उस हिम-मूर्ति के नैन-नक्श पिघल जाते, तो वह बर्फ का एक बेडौल ढेर नजर आने लगता।
स्कूल में गणित की टीचर अकसर कहती हैं- ‘फर्ज किया एक्स इक्वल टू’ फर्ज करो, बर्फ के उस बुत की पिघली आंखें, नाक, कान बराबर हैं, अंकल की खोई हुई मान-प्रतिष्ठा के और बर्फ के उस ठंडे ढेर में क्या अंतर है?
मैं बाहर बरामदे में आ गया हूं। बाथरूम से कपड़े पीटने की आवाज आ रही है। अंकल छोटे-मोटे कपड़े स्वयं ही धो लेते हैं। आंटी किचन में चाय बना रही हैं। आंच से उनका चेहरा अरुणिम हो उठा है। साड़ी का पल्लू खिसककर नीचे झूल रहा है। उनकी कमर का कुछ भाग साफ दिखाई दे रहा है। गोरा और मांसल। किंतु अंकल उनकी अकलुषित देहयष्टि को पांच सालों से निरंतर नजर अंदाज करते आ रहे हैं। शायद उन्हें इसके लिए फरसत ही नहीं मिलती। छी….मैं भी क्या सोचने लगा हूं!
अंकल के छोटे-छोटे काम करने को मैं लालायित रहता हूं, पर उनके लिए पेंसिल तराशते समय जिस दिन मेरी उंगली ब्लेड से कट गई थी, तब से उन्होंने मुझे कोई काम नहीं सौंपा। अधिक हुआ, तो धोबी से उनके कपड़े ला दिए, अब मैं धोबी की दुकान पर जाने से कतराता हूं। एक दिन स्कूल यूनिफॉर्म की नेकर इस्त्री करवाने गया, तो धोबी ने तुरंत इस्त्री करने से साफ इनकार कर दिया। कहा कि नेकर शाम तक ही मिलेगी। पहले यही आदमी मुझे आता देखकर अन्य कपड़े एक ओर फेंक देता और दुकान से बाहर आकर मुझसे कपड़े ले लेता था और उन पर झट से लोहा कर घर तक छोड़ भी जाता था। मैं अंकल का क्या लगता हूं! अंकल की कितनी कारें हैं! ऐसे सवाल पूछ-पूछ कर रास्ते में मेरा सिर खा जाता था, और मुस्तफा दर्जी भी ऐसे ही रंग बदल गया। ठीक ही तो है। बर्फ के पुतले के नैन-नक्श पिघल जाने पर बच्चे उसमें दिलचस्पी नहीं लेते।
कई बार अकेले बैठे मेरा सिर चकराने लगता। आंखों के आगे अंधेरा छा जाता और हाथ-पांव ढीले पड़ जाते, पर मैंने किसी को बताया नहीं। मैं अंकल की चिंताएं बढ़ाना नहीं चाहता।
कुछ दिन हुए मेरी कॉपी से दो-तीन कागज निकल गए। मैं अंकल की निजी अलमारी में स्टिचिंग मशीन ढूंढ़ने आया। मुझसे दुगनी अलमारी, बेशुमार फाइलें, डिब्बे, किताबें ढूंढते-ढूंढ़ते मेरी निगाह एक चमकदार जिल्द वाली नोटबुक पर पड़ी, जो कि फाइलों के अंबार से झांक रही थी। मैंने खींचकर उसे बाहर निकाला। वह अंकल की व्यक्तिगत डायरी थी। मैं पृष्ठ उलटने लगा। एक स्थान पर मेरी नजर जम गई। मैं पढ़ने लगा।
‘भीतर कुछ अकुला रहा है….बाहर निकलने को छटपटा रहा है और निकलने का कोई रास्ता नहीं…..मन की पैंतीस वर्षीय वृक्ष की डाल असमय ही तड़तड़ाकर टूटने को है और प्रबल झंझावात में सूखे पत्ते की तरह कांप रही हैं…..अस्थिरता…..अव्यवस्था…..किसी ने मानो गहरी झील में पत्थर फेंक कर उसके शांत जल को मथ डाला हो…..यथार्थ और कल्पना…..आसपास के वातावरण से कट जाना और मायाबी कल्पना के मकड़ जाले टूटने पर यथार्थ के प्रखर सूर्य की जलती धूप में जलना एक असह्य प्रताड़ना है…. जब पुरानी दुनिया छिन्न-भिन्न हो जाती है, तो अंतर्मन के कुछ अदृश्य हाथ सामने टोह लगाए कटु सत्य के ऑक्टोपस के लिजलिजे बाजुओं से बचने के लिए फिर उसी दुनिया के फिसलन भरे कगारों की ओर अपनी कंकाल उंगलिणं बढ़ाते हैं, तो पता चलता है कि हम कितनी बुरी तरह से उखड़ गए हैं!…..पिछली जिंदगी का आधार कितना गलत था!…..वह एक मटमैला सपना था…..अब है जलती रेत…..और मेरे पांव नंगे हैं…..’ मैंने घबराबर पृष्ठ उलट दिया।
‘कितनी भी गहरी सांस क्यों न लूं, भीतर फंसा कुछ बाहर नहीं निकलता…..भीतर-ही-भीतर खटकता रहता है…..मैं अधूरी कहानी हूं, जिसे लिखना छोड़कर लेखक कहीं चला गया है…..यह कहानी लेखक की बाट जोह रही है। वह लौटकर आएगा भी कि नहीं? अपनी पुरानी कलम से इस जर्जर पांडुलिपि को पूरा कर कोई नाम, कोई रूप देगा भी या यह ऐसे ही एक-एक पृष्ठ कर तेज हवा में खो जाएगी…..।’
मैंने पुनः पन्ना पलटा। उस पृष्ठ पर एक रेखाचित्र था, जिसे देखकर मैं सिहर उठा। वृक्ष की एक मोटी डाल है। उससे एक फंदा लटक रहा है और फंदे से एक लाश झूल रही है। गर्दन खींचकर लंबी हो गई है। कपड़े ढीले-ढाले, बाल बिखरे हुए। मैंने नीचे शीर्षक पढ़ा- आखिरी रास्ता…..मेरे हाथ-पांव पस्त होते गए। आंखों के आगे अंधेरा छा गया। मैंने रोकने के लाख यत्न किए, पर मेरे मुंह से बरबस एक चीख निकल पड़ी और मैं गिर पड़ा। शायद मैं बेहोश हो गया था।
होश आया, तो बिस्तर पर पड़ा था। आंटी तथा अंकल घबराए-से मुझ पर झुके मेरे चेहरे पर पानी के छींटे दे रहे थे। कुछ देर पश्चात् डॉक्टर भी आ गया था। मुझे इंजेक्शन लगाकर वह अंकल से बातें करता हुआ बाहर बरामदे में चला गया था, और फिर काफी देर तक खुसुर-पुसुर होती रही थी। मैं केवल इतना ही सुन पाया- डॉक्टर कह रहा था, ‘केस पुराना है!’
अंकल कितने ही दिनों तक मुझसे रुष्ट रहे। इसी बात को लेकर कि मैंने अपनी बीमारी के विषय में पहले क्यों नहीं बताया। अब उन्हें कौन समझाए कि मैं उनके दुःख बढ़ाना नहीं चाहता, और आंटी? वे तो पहले से भी अधिक मेरा ख्याल रखने लगीं। मैं जब भी स्कूल से लौटता, वे दरवाजे पर खड़ी मेरी प्रतीक्षा कर रही होती।
अंकल नहाकर बाथरूम से बाहर निकले हैं। कमर के गिर्द एक बड़ा तौलिए। लिपटा हुआ है। उनके धुंघराले बाल माथे पर झूल रहे हैं और चेहरा बडा मासम लग रहा है। मेरा जी कर रहा है मैं उनके माथे का प्यार भरा चुंबन ले लूं और उनके बालों में उंगलिए फेरूं। पर शायद ऐसा संभव नहीं। हाथ लगाना तो दर, हमने आपस में बातें भी बहुत कम की हैं। पांच वर्षों में उनके साथ हुई मेरी बातों को यदि समय में बांधा जाए, तो कठिनता से आठ-दस घंटे ही बनेंगे। पांच वर्षों में दस घंटे! और वह भी हां-ना में। शुरू-शुरू में जब उन्होंने मुझे ‘एडोप्ट’ किया, तो कोई-न-कोई बात पूछते रहते थे, पर बाद में वह भी बंद हो गई। मैं हिम्मत करके कभी कुछ पूछ भी लेता. तो वे इतना संक्षिप्त उत्तर देते कि मझमें बात आगे बढाने का हौसला नहीं रहता, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वे मुझे चाहते नहीं। नए-से-नए कपड़े, खेलों का सामान, कॉमिक्स और ढेर-सी दूसरी चाजें अला देते है। प्रायः घमाने ले जाते। कार की अगली सीट पर बैठे-बैठे मेरे मन में बीसियों प्रश्न उठते, पर जबान तक कोई न आता। वह प्रायः हर माह मुझे कार की अगली सीट पर बैठाकर कहीं-न-कहीं बाहर ले जाते- कभी गलमर्ग कभी पहलगाम। बैठे-बैठे मेरे मन में बीसियों प्रश्न उठते, पर जबान तक न आते।
एक बार वे मुझे ललितादित्य के मार्तंड दिखाने ले गए। यह स्थान श्रीनगर से लगभग 45 मील दूर है। क्लास में फादर जोंस ने सम्राट ललितादित्य के विषय में हमें पढ़ाया है। वह आठवीं शताब्दी का कार्कोटक वंश का एक शक्तिशाली सम्राट था। उसका साम्राज्य विशाल था। अपने राज्यकाल में उसने बड़े-बड़े भव्य मंदिर निर्मित करवाए। मार्तंड- आकाश से बातें करते ऊंचे-ऊंचे भारी-भरकम, अपने गौरव के प्रतीक! किंतु ये मार्तंड जिस वैभव से निर्मित हुए थे, ललितादित्य के जाते ही उतनी ही आकस्मिता से उनका पतन हो गया। समय की कठोर शिला पर नाम अंकित करने की उस सम्राट की इच्छा पूर्ण न हुई। अब रह गई थीं बड़ी-बड़ी दीवारें, बेडौल खंडहर, जिस पर लंबी-लंबी घास उग आई थी। शक्ति पर समय की विजय! अंकल ने मार्तंडों के विषय में और भी कई बातें बताई, उनकी कार जब मुकदमेबाजी को भेंट हो गई, तो हमारा लंबा सैर को जाना भी बंद हो गया। अंकल चार गवाहों को लेकर कार से देहली गए थे और जब लौटे थे तो कार नहीं थी। उस रोज आंटी बेहद खामोश रहीं। सुबह उठीं, तो उनकी आंखें सूजी हुई थीं और सुर्ख थीं।
कुछ दिन हुए सड़क के किनारे मैंने एक जादूगर को करतब दिखाते देखा। वह सामने रखे रंग-बिरंगे रूमाल. कागज और रिवन निकालता जा रहा था। भीड़ के बीचोंबीच खड़े मुझे अंकल की याद अचानक ही आ गई और उनके साथ ही मुकदमेबाजी और उनके साथ ही याद आए, वे पंखे, रेडियो सेट, कैमरे, कारें, बाग और मकान, जिन्हें उस जादूगर की तरह मुकदमेबाजी ने निगल लिए। था। गर्मियों में खाना खाते समय जब कोई मक्खी आकर थाली में बैठती. तो मैं झंझलाकर छत की ओर देखता. जहां पंखा उतर जाने के कारण एक खुलापन आ गया था। कौर चबाते-चबाते मैं ऐसा महसूस करता, मानो मैं पंखे के पर का कोई टुकड़ा रहा होऊ। बार-बार रुलाई आती अपनी असमर्थता पर। हमारे परिवार के मित्रों की भांति घर की चीजें भी एक-एक करके हमें छोड़ जा रही हैं।
अंकल नहा-धोकर तैयार हो गए हैं। आंटी उनके आगे चाय रखकर मझे बुलाने आती हैं। मैं उनके पीछे-पीछे चलता भीतर आ जाता हूं, खिंचा-खिंचा सा। अंकल कुर्सी पर बैठे चाय के कप में चम्मच फिरा रहे हैं। मैं पास की कुर्सी पर बैठ जाता हूं और आंटी सामने। तीनों मौन हैं। वे मुझे घूरकर देखते हैं और अपना कप मेरे आगे सरका देते हैं। चाय पीकर हम बाहर आ गए हैं।
“बिस्तर और अटैची खोल दं?” आंटी पछती हैं।
“नहीं, कल पठानकोट जाना है। वकील का खत आया है।” अंकल कहते हैं। दरवाजे के पास पहुंचकर वे पीछे मुड़कर मुझे देखते हैं- “सैर करने नहीं जाओगे?”
मैं ऊहापोह में पड़ गया हूं। आजकल उनसे कतराता हूं। उनके साथ चलूंगा, तो कोई बात नहीं करेंगे। ऐसे चलते रहेंगे, मानो मेरा अस्तित्व ही न हो। मुझे असमंजस में पड़ा देखकर आंटी अनचाही बौछार से बचा लेती हैं- मन नहीं, तो मत जाओ। अंकल बिना कुछ कहे चले जाते हैं। मैं एक लंबी सांस लेता हूं, मानो मैं बिल में घुसा चूहा होऊं, जो प्रतीक्षा कर रहा हो कि कब बिल्ली ओझल हो और वह बाहर आकर आराम से सांस ले।
शाम के सात बज चुके हैं। हवा बोझल और ठंडी है। चिनारों के वृक्ष अंधेरे की मटमैली-सी चादर ओढ़े प्रेतों की तरह दम साधे मौन खड़े हैं। बरामदे की बत्ती बुझी हुई है। आंटी खाना तैयार कर रही हैं। दिन भर वे अपने को किसी-न-किसी काम में उलझाए रखती हैं। जब कोई काम शेष नहीं रहता, तो माला लेकर बैठ जाती हैं। रसोई के एक कोने में मोटे पायों वाली बड़ी मेज पड़ी है, जिस पर नाना प्रकार के बर्तन, डिब्बे और एक स्टोव पड़ा है। आंटी की कलाइयां सूनी हैं और वे पतीली में पड़ा कुछ कलछी से हिला रही हैं। मैं चुपचाप उनके पीछे जाकर खड़ा हो जाता हूं। रसोई की दीवारें कुछ धुंधला गई हैं। शायद पांच वर्षों से सफेदी न होने के कारण। पच्चीस वाट का बल्ब अंधेरे को पूर्णतया भगाने में असमर्थ है। समूचे वातावरण में एक पीलापन तैर रहा है। जिस पर स्टोव की समरस आवाज! माहौल रहस्यपूर्ण है। मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है, जैसे मेरी चेतना कण-कण कर इस धुंधलके में विलीन होती जा रही है। मैं घबराकर आंटी की पीठ को पहली तीन उंगलिऐं से छू लेता हूं। वे चौंककर पीछे देखती हैं और मुझे पाकर आश्वस्त-सी पुनः कलछी चलाने लगती हैं। मैं कांप रहा हूं। आंखों के आगे धुंध कुछ बढ़ गई है और सिर…..मैं सहारे के लिए आंटी की ओर लपकता हूं। वे पुनः चौंककर मुझे घूरती हैं, पर मेरी मुंदती आंखें देखकर मुझे अपनी छाती से लगाकर भींच लेती हैं और बैठ जाती हैं…..
“बिरजू, हम तुम्हारा ठीक से इलाज भी न करवा सके!” उनका स्वर भीग आया है। वे पीने को मुझे पानी देती हैं। धुंध छंटने लगी है और मुझे उनकी देह की गरमाई महसूस हो रही है। मेरी आंखें अब भी बंद हैं और एक अन्य प्रकार की अचेतनता मुझ पर हावी होती जा रही हैं। वे मुझे सहारा देकर भीतर पलंग पर लिटा गई हैं। कंबल भी ओढ़ा गई हैं।
अंकल रात दस बजे लौटते हैं, थके-थके से। जानता हूं, वे दो-तीन मील का फासला तय कर आए हैं। मैं जाग रहा हूं। वे मेरे पास आकर रुक जाते हैं। उन्हें जानें कैसे पता चल गया है।
आज फिर…..उनकी आवाज खिड़की के शीशे की तरह ठंडी है। मेरा माथा छूकर कहते हैं- “टेम्प्रेचर तो नहीं है?”
कपड़े बदलकर वे फिर मेरे पास आकर बैठ जाते हैं। एकटक मेरी ओर देख रहे हैं। मैं उनकी दृष्टि की ताव नहीं ला सकता हूं। आंटी उनसे पूछती हैं- “खाना…..?” वे एक पल को कुछ सोचते हैं, फिर मेरी ओर देखकर उत्तर देते हैं- “कुछ भूख नहीं।” मुझे फिर रुलाई आ रही है। क्यों भूख नहीं? कहां से खाकर आ रहे हैं? या मेरे कारण आपका कुछ खाने को जी नहीं कर रहा? होता वही है, जो पहले होता आया है। मेरे ये सवाल मेरे अंतर में उमड़-उमड़कर गूंजते हैं, परंतु जबान पर नहीं आते। क्या आंटी खा सकेंगी?
“सुबह मेरे साथ चलना। डॉक्टर परकिंस को दिखाएंगे।” वे मुझसे कहते हैं।
“सुबह मुझे पांच बजे उठा देना।” आंटी से कहकर वे सोने को चले गए हैं।
प्रातः मेरी आंख खुलती है। अंकल अटैची में फाइल रख रहे हैं। आंटी नाश्ता लिए पास ही बैठी हैं। मुझे उठा देख वे मेरे पास आ जाती हैं।
“जल्दी से तैयार हो जाओ, वे जाने वाले हैं। तुम्हें डॉक्टर को दिखाकर तांगे पर बिठा देंगे।”
मैं बीस मिनट में तैयार हो जाता हूं। आज रविवार है, मेरी छुट्टी है। अंकल तांगे वाले को बुलाने गए हैं।
“डॉक्टर को सब कुछ बताना, झिझकना नहीं।” आंटी मुझे समझाती हैं। घंटियों की टुनटुनाहट सुनते ही वे अटैची उठाकर दरवाजे के पास रख जाती हैं। मैं भी दरवाजे के पास आ कर खड़ा हो गया हूं। अंकल आकर बिस्तर और अटैची तांगे पर लदवाते हैं।
“कितने दिन लगेंगे?” आंटी उनसे पूछती हैं।
“पठानकोट वाले केस का कल फैसला है। दो-तीन लग ही जाएंगे।” वे बोलते हैं। खर्च के लिए कुछ नोट आंटी को थमाकर मेरे पास पिछली सीट पर बैठ जाते हैं।
तांगा चल पड़ा है। मैं आंटी की ओर देखता हूं, वे दरवाजे के पास खड़ी झांककर हमें देख रही हैं। वे बार-बार उंगली से आंखें रगड़ रही हैं। जाने क्यों? शायद आंख में कुछ पड़ गया है।
तांगा गली को छोड़ खुली सड़क पर आ गया है। अभी तक दुकानें नहीं खुलीं। इक्का-दुक्का तांगा रेंगता आ रहा है। दिन पूरी तरह नहीं निकला है। आकाश बादलों भरा है। विशेष ठंड नहीं।
“ठंड तो नहीं लग रही?” अंकल मेरी कमर में हाथ डालकर पूछते हैं।
“नहीं…..” मैं हौले-से कहता हूं। उनका हाथ रखना मुझे भला लग रहा है।
तांगा चलते-चलते बस स्टैंड पर आ पहुंचता है। वेटिंग रूम में सामान रखकर अंकल और मैं सामने की एक इमारत में दाखिल होते हैं। बोर्ड लगा है- डॉक्टर परकिंस…..फिजीशियन। मरीजों की एक लंबी कतार ऑफिस के बाहर बेंचों पर बैठी है। इतने सारे बीमार लोग न जाने इतनी सुबह किस प्रकार आ जाते हैं! अंकल चपरासी के हाथ अपना विजिटिंग कार्ड अंदर भिजवाते हैं। दूसरे ही पल भीतर से बुलावा आ जाता है।
अंकल डॉक्टर से हाथ मिलाते हैं।
“कहिए मिस्टर राज, आज कैसे तकलीफ की? मुझे फोन कर दिया होता!” मुझे डॉक्टर के व्यवहार से बड़ा सुख-सा मिल रहा है। शहर के तमाम बड़े-बड़े अफसर और व्यापारी अंकल के परिचित हैं, थे, कुछ अब भी हैं। शायद डॉक्टर परकिंस उनमें से एक हैं। अरे! ये तो वही है। गंजे और लाल कानों वाले, जो अकसर हमारे घर आते थे।
“ये ठीक नहीं रहता।” अंकल मेरी ओर इशारा कर डॉक्टर से कहते हैं।
हाय…..बिरजू? उन्हें मेरा घरेलू नाम याद है। मैं हल्के से मुस्करा देता हूं। मेरी झिझक खत्म हो गई है। मैं उन्हें अपनी बीमारी के विषय में विस्तारपूर्वक बताता हूं। चेकअप के पश्चात् वे प्रिसक्रिप्शन लिख देते हैं। चलते समय अंकल उन्हें फीस देने लगते हैं, तो वे लेते नहीं। मेरा कंधा थपथपाकर स्नेह से कहते हैं- “देखो, जल्दी से अच्छे हो जाना…..हां!”
बस स्टैंड पर चहल-पहल कुछ बढ़ गई है। कुली बस की छतों पर सामान लाद रहे हैं। अंकल अपना सामान रखवाते हैं- बिस्तर और अटैची। हल्की बूंदा-बांदी होने लगी है। कंडक्टर सवारियों को बस में बैठने के लिए कह रहा है। अंकल एक तांगे वाले को इशारा करते हैं- “अब तुम जाओ। मैं तांगे वाले को कह दूंगा। तुम्हें घर तक छोड़ आए।” फिर पर्स से दस-दस के तीन नोट मुझे थमा देते हैं। शायद दवा खरीदने के लिए। “अपनी आंटी का खयाल रखना…..और अपना भी।”
“जी।”
“अच्छा…” वे बस की ओर मुड़ते हैं।
मैं तांगे पर बैठ गया हूं।
बस ढेर-सा धुआं छोड़कर सरकने लगती है।
अंकल हाथ मिलाते हैं, प्रत्युत्तर में मैं भी।
अंकल ललितादित्य के मार्तंडों की तरह अपने जर्जर कंधों पर उज्ज्वल अतीत का बोझ उठाए भविष्य का फैसला सुनने जा रहे हैं।
अंकल और ललितादित्य…..! उनका वर्तमान और मार्तंडों के भग्नावशेष…..!
आंटी और मैं मार्तंडों की नीरव खंडहरों में विचरते अभिशप्त प्रेत…..
टप-टप, टप-टप…..
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
