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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

आज के मोबाइल, ई-मेल आदि न जाने क्या-क्या के जमाने में, पोर्च में आउटडेटेड-सा पड़ा वह पत्र मुझ में उत्सुकता का वह ज्वार भर गया कि मैं कार गेट पर ही छोड़ उस पत्र पर वैसे ही झपट पड़ी कि जैसे बर्थडे पार्टी में बच्चे चॉकलेट पर झपटते हैं। हैंडराइटिंग तो बड़ी जानी-पहचानी सी है फिर भी याद क्यों नहीं आ रहा कुछ? कौन है आखिर ये पत्र लिखने वाला? पत्र दूर, विदेशी धरती से आया था। पल भर में मेरा दिमागी घोड़ा सरपट दौड़ने लगा अपनों-परिचितों की ओर।

“मॉम, कार अंदर पार्क कर के भी तो लेटर पढ़ा जा सकता था।”

अरे! ये तो बड़कू बाबा थे जो न जाने कब मेरे पीछे आ लगे थे।

“देख तो बेटा ये किसका पत्र है?” जल्दी-जल्दी चश्मा निकालने की कोशिश किये जाती थी मैं। आजकल ऐसा ही होता है कि चश्मा ढूंढती हूँ तो पेन हाथ में आ जाता है, जब पेन ढूंढती हूं तो चश्मा हाथ में आ लगता है। और जब दोनों ही ढूंढो तो भानुमति के पिटारे से मेरे पर्स में बस ढूंढा ही करो। मेरी हालत से जर्रा-जर्रा वाकिफ बेटे राम ने बड़े इत्मीनान से मुझे ढूंढती-खंगालती छोड़ कार की चाबी ले ली है। उसे आज अपने दोस्तों के साथ कोई पार्टी अटेंड करनी है सो कार के खासे फेशियल के मूड में दिख रहा था वह। गनीमत है कि चश्मा मिला, और पेन भी। पेन की नोक से पत्र खोले दे रही हूं मैं। ओह!

“प्रिय बिटो!”

बस इस एक संबोधन से ही सब समझ में आ गया। मम्मी-पापा अब हैं नहीं, ममेरे पक्ष के लोग फोन करते हैं पत्र नहीं लिखते, चचेरे पक्ष के भी यही हाल हैं। और कोई बड़ा है नहीं अब, जो उम्र की हाफ सेंचुरी पर आलगी मुझे बिट्टो कह सके। ये तो वही थे अंकल-आंटी, आज से सात-आठ साल पहले अमोल की असामयिक मृत्यु से आहत, अपनों के दगा दे जाने के दौर में भी जिन्होंने मेरा साथ न छोड़ा था। बिन खेवइया की नैया की तरह हो चुकी मुझ अकेली को, स्वयं की खेवनहार के रूप में सक्षम बनने के पलों के साक्षी थे ये लोग जिन्होंने जीवन के उस कठिन मोर्चे पर मेरी व मेरे बच्चों की भरपूर हौंसला आफजाई करने का अपना मानवीय फर्ज पूरे मनोयोग से निभाया था।

अमोल की मौत एक हादसा थी। इस हादसे से मैं और मेरे दोनों बच्चे उबर पाते कि इसके पहले ही उसके लालची घरवालों, ऐसे ही दोस्तों व पार्टनरों तथा पाई-पाई लूट लेने को मरे जा रहे तमाम नाते-रिश्तेदारों, देनदारों की भीड़ ने हमें घेर लिया था। मकान, कार, दुकान-जमीन सब कुछ कर्ज में दबा था और कर्ज के इस दलदल से निबटने को मेरे पास थी बस थोड़ी सी जमा पूंजी और मेरी ये नौकरी जो कि कभी मेरे लिये समय काटने का एक शगल सा ही हुआ करती थी। मगर अब यही नौकरी मेरे अर्थ-तंत्र की मजबूत नींव बन गई। अमोल की फिजूल खर्ची, दिखावे भरी जिंदगी जीने की आदत ने हमें कर्ज से पाट दिया था। किंतु अब, अपने हर गैर जरूरी खर्च में बेतहाशा कमी लाकर, आय के अपने उपलब्ध थोड़े से ही सही किंतु निश्चित साधनों की सार-संभाल करते हुए मुझे हर कदम फूंक-फूक कर उठाना था। बच्चे भी अमोल के रहते शाह खर्ची की आदत के शिकार थे किंतु अमोल के जाते ही वे भी मेरी ही तरह पाई-पाई के हिसाब-किताब मिलाने वाले महाजन हो लिये। दिल में कहीं हक सी उठती जब सोचती कि बच्चों को दुनियादार बनाने के लिये अमोल का इस तरह जाना जरूरी था क्या? या शायद वे सही समय पर गए, क्योंकि यही समय था बच्चों की सही शिक्षा-दीक्षा का। अगर वे अमोल की तरह लापरवाह, गैर जिम्मेदार बन जाते तो फिर नि:संदेह ठोकरें खा-खाकर ही सुधरते या, शायद अमोल की तरह नहीं ही सुधरते! खैर।

मेरा विशाल बंगला शहर से इतना बाहर था कि अब गाड़ी, शोफर के बिना मेरा ऑफिस बच्चों का स्कूल तक मेरे लिये समस्या बन गये। सुरक्षा व बंगले के रख-रखाव आदि को देखते हुए मजबूरी में किसी सरकारी ऑफिस के लिये उसे कि राए पर उठा अपने बच्चों के साथ जब मैं बीच शहर में, अपने ऑफिस के बेहद नजदीक छोटे से उस साधारण से मकान में शिफ्ट हुई तो खुद मुझे यकीन नहीं था कि मेरी मुश्किलों के किले फतह होने के दिन आ गए हैं!

जरूर वे पुरानी बेफिक्री भरे बेवकूफियत के दिन अपने जाने का प्रतिपल अहसास कराते थे जब बच्चों के आइसक्रीम-चिप्स के बिल ही हजारों में होते थे। जब सुई भी खरीदनी हो तो पेट्रोल कार रवाना की जाती थी। जरूर वे बेवकूफी भरे, बेफिक्री के दिन अब न लौटने थे, उनके लौटने का मगर इंतजार भी किसे था?

बच्चों ने बड़ी मार्मिकता से एडजस्ट कर लिया था। बड़ी शीघ्रता से उन्होंने स्वयं को वातावरण के अनुकूल ढाल लिया था। उनकी यह मासूम मगर विराट क्षमता, मेरी अदना-सी नौकरी, और अंकल-आंटी का अचानक उपलब्ध हो गया अपनाप नहीं मेरे आत्मबल को बनाए रखने में काम या बहुआ था।

कौन थे ये अंकल-आंटी? ये तो वे देवदूत से थे जिन्होंने उस कठिन दौर में मुझे अपना मकान किराए पर दे, जीने का हौंसला ही दे दिया था। उनका एक ही बेटा था जो शिकागो में सैटल्ड था। वे दोनों बुजुर्ग अपने घर-घाट के मोह में फंसे थे। उनका यह मोह मेरे बड़ा काम आया। दिनभर की मेरी नौकरी, बच्चों के स्कूल, हारी-बीमारी, अमोल के कानूनी पचड़े सुलझाते-सुलझाते मैं हताश हो जब-जब रोई मुझे आंटी ने संभाला। जब बाहर की कोई मुश्किल मुझसे कतई न संभाली गई तो अंकल उसे भरसक सुलझा लाए। कब वे हमारे, कब हम उनके हो गए, कब वे मुझे बिट्टो, कब बच्चे उन्हें दादा जी-दादी जी कहने लगे पता ही न चला। कब मेरे पोर्शन की चाबियां उन्हीं के पास रहने लगी और कब उनके रूटीन मेडिकल चौकअप मैं करवाने लगी-सचमुच पता ही न चला!

यूं ही समय की चोट खाए तलवों के घाव धीरे-धीरे भरते गए। जिंदगी अपनी अविराम गति से खिसकती गई। अपनों ने, कईयों ने मुश्किलों के उस दौर में अपना मुंह तक न दिखाया मगर पराए होकर भी अंकल-आंटी ने इंसानियत से मेरा विश्वास डिगने न दिया था। मेरे सभी अपनों ने मुझ पर केवल कर्तव्य लादे, वे स्वयं अधिकार ओढ़ते गए। पारिवारिक स्नेह, अपनत्व की उष्मा वहां कहां थी? वहां तो थी केवल लूट, ज्यादा से ज्यादा पाने की चाह, इसी चाह में हर रिश्ता अपना संभावनाएं तलाशता भूखे हिंसक जानवर का रूप लिये जाता था। ऐसे डरावने जंगल से, आदमखोरों के चंगुल से अकेली अपने बच्चों को बड़े साहस व सलीके से सुरक्षित निकाल लाई थी मैं, यकीन नहीं आता था।

शुरू-शुरू में तो अनजान-अपरिचित अंकल-आंटी भी मुझे दबे-छिपे भेड़िये ही लगते थे। इसी से काफी समय तक दोनों ही पक्ष एक-दूसरे से कटे-कटे से रहे थे। शायद उन के भी कुछ ऐसे ही अनुभव रहे होंगे। न वे यकीन करते थे हमारा न हम यकीन करते थे उनका। न वे हमसे खुलते थे, न हम उनसे खुलते थे। लेकिन सारे दुनियावी रिश्तों की भीड़ में भी एक रिश्ता है जो पीड़ित-दुखी मन को थपकता, तसल्ली देता है। यही मानवता का रिश्ता आग उगलते रेगिस्तान में नखलिस्तान की ही तरह सही, मगर जीने की प्रेरणा तो दे ही देता है। धीरे-धीरे, यही प्रेरणा मुझे अंकल-आंटी से, तो अंकल-आंटी को हम लोगों से मिली। और, भयानक जानवरों के मेले में भी हमने इंसानियत काटेंटता नहीं तो दिया था!

उन्हें जैसे विधाता ने मेरी मुश्किलों का साथी बनाकर ही भेजा था। मेरी तकलीफों को जब मैंने खुश होकर झेलना सीख लिया, जब मुझे उन तकलीफों-पेरशानियों से ठीक तरह से निबटना आ गया, परेशानियों से जब मेरा डरना बंद हो गया, तभी पता चला कि अंकल-आंटी के बेटे-बहू ने उन्हें वह मकान बेचकर शिकागो चलने के लिये राजी कर ही लिया था। एक बारगी तो बहुत कुछ सूना-सूना सा आया मेरे हिस्से में, लेकिन फिर एक बार हम लोगों को होनी के आगे सिर झुकाना पड़ा।

मेरा बंगला यद्यपि अपनी ही जगह पर था लेकिन तेज गति से अपने कदम बढ़ाते हुए शहर तक पहुंच गया था। अब आसपास अनेक कॉलोनियां बस चुकी थीं सोकन्वींसकी, किसी तरह की कोई असुविधा बन रही थी। मैं किसी अन्य जगह पर किराए लेने की जहमत से बचने के लिये फिर से अपने विशाल बंगले में आ गई, किंतु अब इसके एक छोटे से हिस्से में ही मैंने अपना बसेरा डालबा की हिस्से को किराए पर ही रखा क्योंकि बच्चों की पढ़ाई के अनेक खर्च थे जो इस किराए के भरोसे चलते थे।

अब छोटे-छोटे, नन्हें-नन्हें पौधे वृक्ष बनकर सघन साए में तब्दील होने की तैयारी में थे। अंकल-आंटी के अभाव के बावजूद मैं अब बेसहारा थी। नन्हीं कोपलें अब अपनी धरती मां को छांव देने में सक्षम थीं।

एक जमीन से उखाड़ कर वृक्ष दूसरी माटी में खोंस दिये गए थे। हां, बिल्कुल यही हुआ था।”

आंटी ने पत्र में विस्तार से सब लिखा था कि कैसे एक शुद्ध भारतीय वातावरण में पली-बढ़ी बहू निखालिस विदेशिनी ही हो चुकी थी।

बेटा-बहू दोनों अपने नर्सिंग होम में व्यस्त रहते, अपनी देर रात की पार्टियों में सुध-बुध खोए रहते। बच्चों की जिम्मेदरी दादा-दादी की थी। कौन ऐसा मनहूस होगा जो इस जिम्मेदारी से बचना चाहेगा लेकिन आंटी-अंकल की असहाय होती जा रही हड्डियों में उतनी ताकत न रही थी। फिर भी हर संभव सब संभालते वे ठेठ नौकरों-चाकरों की ही श्रेणी में रख दिये गए थे। बुरी तो उन पर तब गुजरने लगी जब बच्चे बॉर्डिंग भेज दिये गए। उनकी सारी दिनचर्या, सारी जिंदगी को उनके संस्कारों के विरुद्ध दिशा में ठेल दिया गया था। देर रात तक चली पार्टियों के जूठे शराब के ग्लास तक वे अतिथि सत्कार का अपना कर्तव्य समझकर धोती ही थीं। मगर नहीं सहा जाता था उन साग-पात खाने वालों से कि उसी एक फ्रिज में बहू बीफ, मीट, फिश, चिकन और न जाने क्या-क्या तो लूंस दिया करती। उनका तो मानो कोई नियम-धर्म ही न रहा हो।

बहुत हाय-तौबा के बाद अंततः बेटे-बहू की ओर से उन्हें वापस इंडिया जाने की अनुमति’ मिल ही गई। लेकिन अब कि जब वे अपना मकान भी खो चुके हैं तो यहां अपनी मात्र पेंशन के भरोसे कहां और कैसे रहेंगे? बेटे-बहू आश्वस्त थे कि अब इंडिया में उनका क्या ठौर-ठिकाना? कौन डॉक्टर को फोन करेगा? कौन उनकी देख-रेख करेगा? कौन भाग-दौड़ करेगा? कौन मार्निंग वॉक पर साथ देगा जैसे ख्यालों से घबराए रहने वाले वे लोग स्वयं ही अपना इंडिया वापस लौटने का इरादा रद्द कर उनकी नौकरी बजाते रहेंगे।

आंटी-अंकल ने पत्र में मुझसे खुलकर पूछा था कि क्या मैं उन्हें अपने बंगले में किराए पर रख सकती हूं? वे अपना अंतिम सफर अपने ही देश में बिताना, यहीं पूरा करना चाहते थे।

पोर्च के कोने में हौले-हौले मुझे झूला सा झुला रहा रॉकर जिस पर बैठी मैं पत्र पढ़ रही थी किसी के थामने से थम गया था। मैंने पलटकर देखा, छह फुट की उंचाई को पहुंच रहा बड़कू था यह। जिसके हाव-भाव से लग रहा था कि शायद पीछे खड़ा वह पत्र पढ़ चुका था।

अनेक बातें ऐसी होती थीं कि बच्चों की इच्छा जानना मैं जरूरी समझती थी। मेरे कद से ऊँचे हो चुके बेटे की ओर मैंने आशा भरा प्रश्न उछाला “रख लें बेटा अपन इन्हें अपने साथ वाले पोर्शन में किराए से?” मगर उसके चेहरे और जुबान पर यह क्या था? क्यों था?

“नहीं मम्मी, कभी नहीं।”

अपने दोनों बच्चों के पालन-पोषण में उठानी पड़ी बेहिसाब मुश्किलें मेरे मनो-मस्तिष्क में चलचित्र की तरह घूम गईं। मेरे बेटे को क्या वे जरा भी याद न रही थीं? ये तो खुद साक्षी रहा है मेरे उस कठिनाई भरे दौर का! अंकल-आंटी बच्चों के बुखार उतरने की प्रतीक्षा में बैठे हैं उनके सिरहाने। ठंडे पानी की पट्टियां रख-रखकर बुखार उतार रहे हैं। मेरे ऑफिस से आने तलक वे उनका होमवर्क करा देते, टेस्ट की तैयारी करा, खिला-पिलाकर खेलने भी भेज दिया करते। बच्चे कभी ‘टिफिन अच्छा नहीं’ कहकर टिफिन नहीं ले जाते तो आंटी अपने हाथ से कुछ ‘अच्छा’ बनातीं, बेचारे अंकल अपने खटारा स्कूटर से धीरे-धीरे जाकर रिसेस के पहले बच्चों को टिफिन दे आते। सात-आठ घंटों की अपनी प्रतिस्पर्धा भरी नौकरी क्या मैं उतनी बेफिक्री से कर पाती जितनी अंकल-आंटी के साए में मैंने कर ली थी? क्या कुछ भी याद नहीं मेरे इस बच्चू को आज?

“क्यों रखें हम उन्हें किराए से?”

मेरा कलेजा मुंह को आने लगा था। बच्चू पूछ रहा था मुझसे, सीधे मेरी आंखों में आंखें डालकर।

“क्या आपके मम्मी-पापा होते तब भी क्या आप किराए की सोचतीं? क्यों रखें हम उन्हें किराएदार की तरह? वे दादा-दादी या नाना-नानी की ही तरह रहेंगे हमारे साथ। लाइये उनका कॉन्टेक्ट नंबर दीजिये मैं फोन करता हूं उन्हें। बोलूंगा कि मैं कितना नाराज हूं उनसे बड़े आए किराएदार बनने।”

दिप्दि करती आशा की एक भरपूर किरण उजियारा बनकर मेरे मन-प्रांत पर फैल गई थी। मैं भी कैसी बुद्ध ठहरी! मेरे संघर्ष और दर्द की तपती आंच को मेरे अलावा सबसे नजदीक से झेलने वाले मेरे बच्चे ही थे जिनके जज्बातों को समझने में मैं कैसे गलती कर रही थी? अपने बच्चों से क्यूं कर आश्वस्त न थी? अपने ही पाले-पोसे को पहचान न पाई। कंठ में रूलाई का कुछ गोला-सा अटकता था मगर खुशी से बल्लियों उछलता हृदय लिये मैं पत्र पर आंसुओं से लबालब बेसब्र नजरें वहां गड़ा दिये दे रही थी वहीं कि जहां अपना कोई फोन नंबर दिया था उन्होंने।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’