Hindi Story: बनवारी लाल जी को बड़े बाबू के ओहदे से सेवानिवृत्त होने में अभी कुछ साल बाकी है। लेकिन महंगाई के बोझ और परिवार की बढ़ती जिम्मेदारियों को पूरा करने की चिंता ने समय से पहले ही उनके चेहरे पर बुढ़ापे की गहरी छाप छोड़ दी है। बनवारी लाल जी अभी अपनी मेज पर पड़ी हुई सरकारी फाइलों को संभाल ही रहे थे कि इतने में चपरासी ने आकर कहा कि आपको बड़े साहब ने जल्दी से बुलाया है। संदेशा मिलते ही बनवारी लाल जी अपना काम बीच में ही छोड़ कर बड़े साहब के कमरे की ओर जाने लगे। जैसे ही वे अपनी कुर्सी से उठे तो उनके हाथ से पेन नीचे गिर गया।
हड़बड़ाहट में वे पेन उठाने के लिये झुके तो बरसों पुराना ढीला-ढाला सा चश्मा नीचे फर्श पर जा गिरा। चपरासी ने आगे बढ़ कर बनवारी लाल जी से कहा कि मैं आपका चश्मा उठा देता हूं। इन्होंने उसे एक तरफ करते हुए कहा कि तुम्हें क्या लगता है कि मैं बूढ़ा हो गया हूं और मैं अपना काम भी ठीक से नहीं कर सकता। इतना कहने के साथ बनवारी लाल जी अपना चश्मा उठाने के लिये फर्श पर इधर-उधर हाथ मारने लगे। चश्मा ढूंढने के लिये वो जैसे ही नीचे की ओर झुके तो मेज से टकरा कर इनके मुंह से नकली दांतों का सेट निकल कर फर्श पर लुढ़क गया। अब चपरासी से नहीं रहा गया, उसने खिल्ली उड़ाते हुए कहा-‘साहब जी, अब तो आपका सारा फर्नीचर धीरे-धीरे खुल कर गिरने लगा है। अब इससे पहले कि आपके बाकी के अंजर-पिंजर खुल जाए, यदि आपकी इजाजत हो तो आपका सारा सामान इकट्ठा कर दूं।’ बनवारी लाल ने चपरासी को डांट कर वहां से जाने के लिये कह दिया।
इससे पहले कि बनवारी लाल जी अपना सारा सामान ढूंढ़ने के बारे में कुछ और सोचते बड़े साहब का एक और संदेशा आ गया, लेकिन बनवारी लाल जी इस हालात में नहीं थे कि बिना चश्मे और दांतों के साहब के सामने जा सकते। जब कुछ देर तक यह उनके कमरे में नहीं पहुंचे तो वो खुद ही इनकी सीट पर आ धमके। नज़र कमज़ोर होने के कारण इन्होंने बड़े साहब को आते देख समझा कि फिर से चपरासी उनके पास आया है। बनवारी लाल ने साहब को चपरासी जान कर उससे कहा कि जरा इधर मेरे मेज के पास देख एक कराची हलवे का टुकड़ा गिर गया है। बड़े साहब ने बिना यह बताये कि वो कौन है, बनवारी लाल को एक 50 रुपये का नोट देते हुए कहा-‘यह लो पैसे और बाजार से और कराची हलवा ले लेना।’ बनवारी लाल ने 50 रुपये का नोट वापिस करते हुए कहा कि मैं तेरे 50 रुपयों का क्या करूं? मैं कराची हलवा तो इसलिये ढूंढ रहा हूं क्योंकि उसके साथ मेरे नकली दांतों का 5000 रुपये का सेट भी लगा हुआ है। बेवकूफ इंसान इतना तो तू भी जानता है कि मैं बिना दांत लगाए बड़े साहब के कमरे में नहीं जा सकता।
इस सारे नज़ारे को बाकी लोगों के साथ दफ्तर का चपरासी भी देख रहा था। उसका तो यही सोच-सोच कर बुरा हाल हो रहा था कि जैसे ही बनवारी लाल को यह मालूम पड़ेगा कि उनके सामने मैं नहीं बल्कि बड़े साहब खड़े हैं तो उनका क्या हाल होगा? इससे पहले कि दफ्तर का कोई कर्मचारी कुछ भी बोलता, बड़े साहब ने उंगली के इशारे से सभी को चुप रहने के लिये कहा। अब हर कोई यही सोच रहा था कि आज बनवारी लाल जी को साहब से बड़ी ही खरी-खरी खुराक मिलने वाली है। जब कुछ देर तक बनवारी लाल को चपरासी की कोई हलचल सुनाई नहीं दी तो उन्होंने उसे आवाज देते हुए कहा कि कहां चैन की नींद सोने के लिये चला गया है। जल्दी से मेरा सामान ढूंढने में मेरी मदद कर, वरना बड़े साहब नाराज हो जायेंगे।
इसी दौरान बड़े साहब ने बनवारी लाल जी का चश्मा, दांतों का सेट और पेन उनको पकड़ाया। अपनी आंखों पर चश्मा लगाते ही बनवारी लाल ने जब बड़े साहब को अपने सामने देखा तो उनके पैरों तले तो जमीन ही निकल गई। अपनी गलती का एहसास होते ही बनवारी लाल ने बड़े साहब से हाथ जोड़ कर उनके पैरों पर गिर कर माफी मांगनी शुरू कर दी। बड़े साहब उम्र में जरूर बनवारी लाल से छोटे हैं, लेकिन वो भी अब तक जमाने के कई उतार-चढ़ाव देख चुके हैं। बड़े साहब ने बनवारी लाल जी से कहा कि आप मेरे पिता समान है। ऐसे में यदि मैं आपके बुढ़ापे या कमजोरी को देख कर आपसे दूर रहता हूं तो यह किसी से उसके वस्त्रों के आधार पर घृणा करने जैसा होगा। बड़े साहब ने बनवारी लाल के साथ दफ्तर के बाकी सभी लोगों से भी कहा कि हमें सिर्फ अपनों के लिये नहीं बल्कि उन लोगों के लिये भी जीना चाहिये और कुछ करना चाहिये जिनका कोई नहीं होता। यही जज्बा हमें जिंदगी से असल प्यार का मतलब समझाता है। किसी के लिये दो मीठे और प्यार से भरे शब्द बोल कर यदि उसमें उत्साह का संचार हो सकता हो तो यह बड़े से बड़े धन के दान से भी बढ़ कर है।
यह सब सुनते-सुनते बनवारी लाल जी ने अपनी आंखों से आंसू पोंछते हुए कहा कि मैंने आपको चपरासी समझ कर न जाने क्या-क्या बुरा-भला कह दिया, क्या आपको सच में मेरी किसी भी बात का बुरा नहीं लगा? इस बात का जवाब देते हुए बड़े साहब ने कहा कि एक बार किसी ने गुलाब के फूल से पूछा था कि जब कोई तुम्हें टहनी से तोड़ कर अलग करता है तो तुम्हें दर्द नहीं होता। इस पर गुलाब के फूल ने कहा था कि दर्द तो होता है, परंतु फूल को तोड़ने वाले की खुशी इतनी अधिक होती है कि उसे देख कर मैं अपना दर्द भूल जाता हूं। बड़े साहब के यह भावनात्मक विचार सुन कर जौली अंकल भी यह जान गये हैं कि जिस तरह प्रभु से मांगने के लिए हम हर समय हाथ उठाते हैं उसी तरह जरूरतमंदों की मदद के लिए भी हाथ बढ़ाते रहना चाहिये। आज हर कोई यह तो सोचता है कि हमें ये लेना है वह लेना है, लेकिन ऐसा सोचने की बजाय हमें दूसरों को क्या देना है इस बात पर विचार करने वाले ही सच्चे मददगार होते हैं। जो व्यक्ति हर पल अपने माता-पिता का आशीर्वाद और प्यार पाने में कामयाब हो जाते हैं उन लोगों का घर ही तीर्थ बन जाता है।
ये कहानी ‘कहानियां जो राह दिखाएं’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं–
