Stree ka Manodasha
Stree ka Manodasha

Hindi Long Story: पति के साथ शहर जाकर उसे अभी कुछ ज्यादा दिन न हुए थे कि अचानक से घर का माहौल बिगड़ता-सा लगने लगा। इसकी वजह शायद मितली का अकेलापन है, यह उसे समझ आ गया।

लाला बनिया अपनी दुकान बढ़ाने के बाद खुशी से अपनी कोठी की तरफ जा रहा था। वह आनंद के गीत गुनगुना रहा था, बोल थे- ‘ये रिश्ते नाते बड़े सयाने होते हैं। ऐसे कुछ मन ही मन बड़बड़ा रहा था जिसका मतलब शायद उसे भी मालूम ना हो। बस आनंद का अनुभव कर अपने आपको उत्तेजित कर रहा है। पिता को आनंद में देख मितली ने कहा, ‘बापू आज तो बहुत खुश नजर आ रहे हो, बात क्या है… उतने में अंदर से आवाज आई, ‘ऐ छोरी काहे को उन्हें परेशान कर रही है, चल अंदर और रसोई में हाथ बटा। लाला बोला, ‘क्यों काम करवाती हो इसे जीवन भर चूल्हा-चौका तो करना है।

पिता की बात सुनकर वो अपनी खोली में चली गई। रसोई घर से वह बोली, ‘कोई अच्छा-सा खानदान मिल गया है क्या जो आप बड़े खुश हो रहे हो। ‘हां, तो खुश क्यों ना हूं, अपनी बराबरी और हैसियत का घराना जो ढूंढ लिया है अपनी बेटी के लिए। लाला ने जवाब देते हुए कहा।
मितली कमरे में जा खटिया पर पड़ी-पड़ी आंसू बहाने लगी। उसे इस हालात में देख माता ने प्यार से पूछा, ‘अरे पगली रोती क्यों हो तुम बात क्या है?
मितली कहने लगी, ‘मां, मुझे जीवन भर आपकी तरह नहीं जीना, मुझे एक कामयाब इंसान बनना है। मां बोली, ‘हमने कब कहा कि तुम काबिल मत बनो, लेकिन हम जितना पढ़ा सके उतना बहुत है, आगे की पढ़ाई-लिखाई अपने होने वाले पति के घर जाकर करना, समझी तुम। मितली कहने लगी, ‘अच्छा मां, लेकिन वह भी समझ न पायें तो? बेटी के इस प्रश्न से माता कुछ सोच- विचार में पड़ गईं, कुछ क्षण के बाद बोली, ‘एक बात कहती हूं बेटी, स्वयं का निर्णय स्वयं को ही लेना चाहिए किंतु उस निर्णय से परिवार को कोई हानि नहीं होनी चाहिए, जो भी फैसला लो उससे पहले समाज और परिवार की मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। मितली माता की बात सुनकर आनंद से गले लग गई। लाला अपने मकान की छत पर टहल रहा था, उतने में योगिता वहां आ गई। योगिता अपने पति से बच्ची के मन की व्यथा बताते हुए कहने लगी, ‘आज पहली बार ऐसा हुआ है कि मैं किसी सवाल का जवाब न दे सकी और वह भी अपनी बेटी के प्रश्न का…क्या पढ़ाई-लिखाई जीवनयापन करने के लिए इतनी जरूरी हो गई है कि आजकल हर कोई पढ़ना चाहता है। न मैं कभी पाठशाला गई और शायद ना तुम फिर भी हमने अपने जीवन के हर क्षण आनंद से व्यतीत रहे हैं।
लाला कुछ क्षण शांत रहा और गहरी सोच में डूब गया और पत्नी के सवाल का जवाब देते हुए कहने लगा, ‘शिक्षा प्राप्त करना सभी का अधिकार है। हम पढ़ न पाए तो क्या हुआ हमारी बेटी तो पढ़ी-लिखी है। पढ़ाई से
हर व्यक्ति को अच्छाई और बुराई में सही राह चुनने में आसानी होती है।

योगिता कहने लगी, ‘क्या हमारी मितली को आगे पढ़ना है तो उसे पढ़ना चाहिए? लाला बोला, ‘हां अवश्य, मैंने उसे सही- गलत रास्ते में भेद करने की शिक्षा दी है। योगिता ने बेटी की खुशी जाहिर करते हुए कहा, ‘क्या उसकी इच्छा के अनुसार शादी कुछ सालों बाद नहीं हो सकती?
लाला अपनी असफलता दर्शाते हुए कहने लगा, ‘हां जरूर लेकिन मैं उसे उच्च शिक्षा दे नहीं सकता। मेरे ये हाथ अब थरथर कांपने लगे हैं, थक चुके हैं मेरे पैर, मैं अब कमजोर हो गया हूं। मेरी सेहत भी कुछ ठीक नहीं रहती। बस मैं उसे हमेशा सुखी देखना चाहता हूं। इसलिए उसका ब्याह मेरी आंखों के सामने हो जाए यही एक इच्छा शेष रह गई है। न जाने कल क्या हो जाए।

अपने पति के मुंह पर हाथ रखते हुए, ‘ऐसे कटु शब्द ना कहिए, जो होगा सो अच्छे के लिए ही होगा।

दोनों ने कल के सपने देखते हुए अपने खटिया पर लेटे-लेटे आंखें मूंद ली। दो दिन बाद मितली की शादी पिता के मनपसंद खानदान से करवा दी। उसका पति शहर में बड़े ओहदे पर अफसर था, इस कारण वह गांव से शहर जाकर बसना चाहता है। लेकिन मितली को यह नामंजूर था, इसी कारण उसने साफ-साफ इनकार कर दिया। शायद वह अपने घरवालों से अलग रहकर भी अलग न हो सकती थी।

‘बेटी तुम क्यों परेशान होती हो, हमारी चिंता मत कर और वैसे भी कहां सदा के लिए चली जाने वाली हो तुम। छुट्टियों में वापस आना ही है अपने घर। मितली को समझाते हुए सोधा (सासू मां) ने कहा। मितली आगे कुछ बोल न सकी। शायद कुछ कहने या समझाने के लिए यह उचित समय न था और वे दोनों शहर जाने के लिए
निकल पड़े। पति के साथ शहर जाकर उसे अभी कुछ ज्यादा दिन न हुए थे कि अचानक से घर का माहौल बिगड़ता- सा लगने लगा। इसकी वजह शायद मितली का अकेलापन है, यह उसे समझ आ गया।

‘क्या तुम आगे पढ़ना चाहती हो? मेरा ख्याल है कि तुम बहुत होशियार हो इसलिए तुम्हें अपना वक्त जाया नहीं करना चाहिए। ‘हां जरूर, मुझे तो आगे बढ़ने की बहुत चाह है, किंतु…! ‘अब क्या हुआ? तुम बहुत शंका-कुशंका उत्पन्न करती हो। मैं अब तुम्हारी कुछ नहीं सुनूंगा, कल से तुम पढ़ाई का शुभारंभ करोगी ठीक है। आ गई मेरी बात समझ में मेरी राणी सरकार।
देखते ही देखते कुछ साल बीत गए और वह एक अच्छी शिक्षा हासिल कर अच्छे पद पर कार्यरत हो गई।

खुशखबरी सुनते ही मितली के सास-ससुर आनंदित हो उठे। आनंद इतना की उन्होंने पूरे गांव में मिठाई बांटी। इस प्रकार की खुशी का अनुभव हर कोई करता किंतु यह कर सोधा मायूस सी होकर बैठी बाशो ने देखा।

मायूस बैठी हुई सोधा को देख बाशो ने पूछा, ‘काहे को मुंह लटकाकर बैठी है। आज तो खुश होना चाहिए और तुम नाराज हो रही है। बात क्या है?

सोधा कहने लगी, ‘कुछ नहीं जी। अड़ोस-पड़ोस के लोग कह रहे थे कि ‘देख सोधा तेरी बहू अब बड़ी अफसर बन गई है, बुरा मत मान पर सच्चाई यह है कि जहां पढ़ी-लिखी बहु घर आ जाए तो बूढ़ों का घर पर
कोई अधिकार नहीं रहता। इन कारणों से ही आजकल बेटे अपने मां-बाप को घर से बेदखल कर देते हैं’ और शायद हम भी अकेले ना पड़ जाएं।

बाशो ने विश्वास से कहा, ‘बात तो कड़वी है पर सच्ची है लेकिन मुझे अपने बच्चों पर पूरा विश्वास है कि वे हमें कभी निराश नहीं करेंगे।
बाशो की बात सुनकर सोधा निराशा से दूर होकर अपने पति के गले लग आनंद का अनुभव करने लगी। अब उसके मन में कोई दुविधा न रही। अब वो शांत हो गई और न ही किसी की बातों में आकर चिंतित होती। दिवाली के मौके पर दोनों ही गांव छुट्टी मनाने आए। पूरा माहौल खुशनुमा हो गया। छुट्टियों के दिन खत्म हो चले थे। मितली अपने पति से कहने लगी, ‘मैंने फैसला किया है कि अगर मां- बाबूजी हमारे साथ शहर आएंगे तो ही मैं शहर आऊंगी वरना नहीं, यह मेरा अंतिम फैसला है।
पति उसे समझाते हुए कहने लगा, ‘वह शहर आ नहीं सकते।
‘लेकिन क्यों? बात बीच में ही काटते हुए मितली ने सवाल किया।
‘अगर उन्हें शहर लेकर जाओगी तो तुम तो खुश हो जाओगे लेकिन उनका क्या?
‘मतलब, मैं कुछ समझी नहीं।

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‘तुम उन्हें शहर लेकर जाओगी तो घर में अकेले हो जाएंगी, अनजान शहर में वह बिल्कुल अकेले पड़ जाएंगे और वैसे भी उनका दिल गांव में बस चुका है।
मितली ने अपनी दुविधा बाबूजी को कह सुनाई और यह भी कहा कि मेरा प्रथम दायित्व ये है कि मैं आप दोनों की सेवा करूं ना कि नौकरी।

बाशो कुछ देर शांत रहा और समस्या का हल निकालते हुए कहने लगा, ‘सुनो बेटी, मैंने फैसला कर लिया है कि हम दोनों तुम्हारे साथ आएंगे।

‘लेकिन बाबूजी मैं यह नहीं चाहती कि आप मेरे कारण दु:खी हों।
बाशो और सोधा को भी आज अपने बेटे और बहू पर नाज हो रहा है। आज उनके बेटे समाज के सारे बच्चों के समक्ष आदर्श जो बने हैं।
बाशो ने अपने बेटे और बहू से कहा, ‘अब हमें जल्द ही हमारे पोता-पोती चाहिए बेटी। इसी के साथ सारे हंसने लगे।

बाशो की बात सुनकर सोधा निराशा से दूर होकर अपने पति के गले लग आनंद का अनुभव करने लगी। अब उसके मन में कोई दुविधा न रही। अब वो शांत हो गई और न ही किसी की बातों में आकर चिंतित होती।