दोपहर का समय था। मनु खिड़की के सामने खड़ी आकाश में तैरते बादलों को देख रही थी। मन स्थिर न था। कभी वह निखिल के विषय में सोचती और कभी आनंद के विषय में। उसे यों लगता-मानो वह किसी नदी में खड़ी हो और आनंद तथा निखिल के रूप में ये दोनों किनारे उसे अपनी ओर आने का निमंत्रण दे रहे हों।
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सच तो यह है कि एकाएक निखिल के आ जाने से वह एक तूफान में फंस गई थी। उसे भय था कि कहीं यह तूफान उसे खींचकर निखिल की ओर न ले जाए और वह आनंद को उसी प्रकार न भूल जाए, जिस प्रकार निखिल को भूल गई थी। तभी पीछे से किसी के कदमों की आवाज सुनाई पड़ी और मनु की विचारधारा टूट गई। मुड़कर देखा-समीप ही आनंद बैठा था। आनंद को देखकर वह हौले से मुस्कुराई और बोली- ‘तुम कब आए?’
‘ठीक दस मिनट पहले।’
‘आश्चर्य है कि…।’
‘आश्चर्य कैसा? तुम्हारा ध्यान तो आकाश में तैरते बादलों की ओर था। मनुष्य वही तो देख पाता है, जिस ओर उसका ध्यान होता है। यही कारण है कि तुम्हें मेरे आने का पता न चला।
‘सॉरी!’ मनु कुर्सी खीचकर आनंद के समीप बैठ गई बौर बोली- ‘लेकिन इस मौसम में, आकाश में बादलों का घूमना मुझे अच्छा लग रहा था। जानते हो-चिलचिलाती धूप में जब सूरज आग उगल रहा हो और अचानक कोई बदली आ जाए तो-मन को कितनी शांति मिलती है?’
‘सिर्फ शांति ही नहीं-शीतलता भी। खैर-तबीयत कैसी है?’
‘ठीक तो हूं।’
‘क्या वास्तव में ठीक हो?’ मनु को ध्यान से देखते हुए आनंद ने पूछा।
‘क्यों-तुम्हें क्या लगता है?’
‘लगता है-जैसे तुम्हारे सर में रात भर दर्द रहा है।’
‘नहीं तो?’
‘तो फिर-आंखों में नींद का नशा-बोझिल पलकें?’
‘ठीक से सो नहीं पाई।’
‘सर दर्द के कारण?’
‘नहीं-कोई और वजह थी।’
‘वह क्या?’
‘पापा के कारण। सोचती थी-मेरे विवाह के पश्चात् उनका क्या होगा?’
‘समाधान मैंने सोच लिया है।’ आनंद उठा और बिस्तर पर बैठते हुए बोला- ‘हम दोनों यहीं रहेंगे।’
मनु आनंद के पास ही बैठ गई और बोली- ‘सच कह रहे हो न तुम?’
‘बिलकुल सच।’ मनु को अपनी गोद में खींचकर आनंद ने कहा- ‘मैंने इस संबंध में भइया से भी कह दिया है। खैर-चलो अब सो जाओ।’
‘सो जाऊं? इस समय?’
‘क्यों-समय क्या बुरा है?’
‘न बाबा! मुझे नींद न आएगी।’
‘क्या।’ मनु के कपोलो को अपनी हथेलियों में भरकर उसकी आंखों में झांकते हुए आनंद ने पूछा- ‘मेरी बांहों में भी नहीं?’
‘यह बाद की बात है।’
‘बाद की क्यों?’
‘अभी हमारा विवाह नहीं हुआ।’
‘तो फिर ऐसा करते हैं-पहले विवाह कर लेते हैं।’ इतना कहकर आनंद नीचे झुका। किन्तु इससे पूर्व कि वह मनु के होंठों का चुंबन ले पाता-एकाएक फोन की घंटी बजी।
मनु ने शीघ्रता से उठकर रिसीवर उठाया। बोली- ‘हैलो!’
‘मनु! मैं निक्की बोल रहा हूं।’
आवाज सुनकर मनु के होंठों पर मद्धिम-सी मुस्कुराहट उभरी। किन्तु दूसरे ही क्षण आनंद की उपस्थिति के कारण उसकी यह मुस्कुराहट लुप्त हो गई और वह कांपती आवाज में बोली- ‘आप! आप कहां से बोल रहे हैं?’
‘देवी जी! फिलहाल तो हम अपने ऑफिस से ही बोल रहे हैं। किन्तु ठीक छह बजे हम रोशनी बाग में होंगे। आपको याद है न-हम वहां आपकी प्रतीक्षा करेंगे।’
‘ठीक है-कह दूंगी।’ मनु ने कहा और रिसीवर रखकर आनंद से बोली- ‘मैं तुम्हारे लिए ठंडा लेकर आती हूं।’
‘किसका फोन था?’ आनंद ने पूछा।
‘था कोई।’ मनु शरारत से बोली।
‘कोई कौन?’
‘कोई चाहने वाला।’
‘अच्छा!’ आनंद ने उठकर मनु के कंधे थाम लिए। बोला- ‘तो अब तुम्हारे चाहने वाले भी पैदा हो गए?’
‘इसमें बुरा भी क्या है? मैं सुंदर हूं-युवा हूं इसलिए मुझे चाहने वाले भी पैदा हो सकते हैं।’
‘जरा सामने तो लाओ उसे।’
‘क्या करोगे?’
‘गर्दन न तोड़ दूंगा।’
‘क्यों-क्या बिगाड़ा उसने तुम्हारा?’
‘उसने मेरी मनु को चाहा है। और मेरे अतिरिक्त कोई दूसरा तुम्हें चाहे इसे मैं कभी पसंद नहीं कर सकता।’
‘अच्छा बाबा! अब यह सब छोड़ो और मुझे जाने दो। मैं तुम्हारे लिए ठंडा लेकर आती हूं।’
‘किंतु मुझे ठंडे की नहीं-गर्म की जरूरत है।’
‘चाय-अथवा कॉफी?’
‘ऊंह यह सब नहीं।’
‘और?’ मनु ने पूछा।
आनंद ने उसे तत्काल बांहों में भरा और उसके होंठों पर चुंबन अंकित कर दिया।
‘जंगली।’ कहते हुए मनु ने स्वयं को छुड़ाया और तेजी से बाहर चली गई। आनंद हंस पड़ा।
सांझ होने में अभी देर थी। पश्चिम की दिशा में उठने वाली एक बदली के कारण मौसम सुहाना हो गया था। रोशनी बाग में चहल-पहल थी। अनेक जोड़े फूलों की क्यारियों के आस-पास घूम रहे थे। किन्तु निखिल की इन जोड़ों में कोई दिलचस्पी न थी। उसकी उंगलियों में सिगरेट सुलग रही थी और वह एक क्यारी के समीप खड़ा बेचैनी से मुख्य द्वार की ओर देख रहा था।
एकाएक उसके होंठों पर मुस्कुराहट उभर आई।
मनु टैक्सी से उतरकर उसी की ओर बढ़ रही थी। आसमानी साड़ी में वह किसी अप्सरा की भांति लगती थी। ज्यों ही वह निकट आई-निखिल ने सिगरेट बूट से मसल दी और उससे कहा- ‘मुझे विश्वास था-तुम जरूर आओगी।’
‘न आती तो नाराज होते।’
‘नहीं! मैं सिर्फ यह सोचता कि तुम्हें आनंद के कारण समय न मिला होगा। वैसे-क्या करते हैं तुम्हारे आनंद साहब?’
‘दर्शन शास्त्र के प्रोफेसर हैं।’
‘खूब-फिर तो वेतन भी अच्छा होगा?’
‘क्या पता।’
‘पता होना चाहिए था।’ कहकर निखिल घास के मैदान की ओर बढ़ने लगा। मनु साथ थी। वह उससे बोला- ‘बात यह है कि पैसा मानवीय जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकता है। पैसा न होने पर मनुष्य को पशुओं से भी बुरा जीवन जीना पड़ता है।’
मनु ने कुछ न कहा।
उसे यों मौन देखकर निखिल ने फिर कहा- ‘तुम शायद बुरा मान गईं।
‘क्यों?’
‘मैंने तुम्हारे आनंद के विषय में जो पूछ लिया।’
‘मुझे आनंद के विषय में विशेष जानकारी नहीं।’
‘फिर यह विवाह?’
‘पापा की इच्छा से हो रहा है।’
‘तुम्हारी सहमति?’
‘भारतीय परिवारों में लड़कियों की सहमति-असहमति को अधिक महत्व नहीं दिया जाता। विवाह के संबंध में मेरी सहमति पूछी जाती तो मेरी जुबान पर तुम्हारे अतिरिक्त किसी दूसरे का नाम न आता।’
निखिल मुस्कुरा दिया।
कुछ क्षणोपरांत वह बोला- ‘जाने दो। जो कुछ हो चुका है-उसे स्वप्न की भांति भूल जाओ। और वैसे भी-मनुष्य जो कुछ सोचता है-वह हमेशा पूरा नहीं होता। आओ-उधर बैठते हैं।’
मनु ने कुछ न कहा। दोनों आगे बढ़े और फूलों की क्यारियों के बीच हरी-हरी घास पर बैठ गए।
निखिल एक सिगरेट सुलगाकर उसके कश खींचने लगा। मौन को तोड़ते हुए मनु उससे बोली- ‘एक बात पूछूं?’
‘वह क्या?’
‘तुम्हारे जीवन में एकाएक यह परिवर्तन कैसे आया?’
‘गरीबी के पश्चात् अमीरी?’
‘हां।’
‘विधाता की कृपा से।’ निखिल बोला- ‘गुजरात में मेरे एक चाचाजी थे। बहुत प्यार करते थे मुझे। अपनों के नाम पर दूसरा कोई था नहीं-अतः उन्होंने मृत्यु से पूर्व अपनी कुल संपत्ति जो करोड़ों में थी-मेरे नाम लिख दी और मैं करोड़पति बन गया।’
‘सुना है-आजकल तुम कोई फिल्म बना रहे हो?’
‘यह किसने कहा तुमसे?’
‘पापा ने।’
‘हां! मैंने शिल्पा फिल्म कंपनी के नाम से फिल्म निर्माण का कार्य शुरू कर दिया है। स्टूडियो का ठेका भी तुम्हारे पापा को ही दिया है। स्टूडियो बनते ही काम शुरू हो जाएगा। आना किसी दिन?’
‘कहां?’
‘स्टूडियो में।’
‘किसी दिन पापा के साथ आऊंगी।’
‘ऊंहुं-आनंद के साथ।’
‘आनंद के साथ क्यों?’
‘इसलिए-क्योंकि ठीक तीन दिन पश्चात् तुम्हारा विवाह है।’
‘ओह!’ मनु के होंठों से निकला और चेहरा घुमाकर एक फूल पर मंडराते भंवरे को देखने लगी।
‘मैं तो शायद न आ सकूं।’ निखिल फिर बोला।
‘कहां?’
‘तुम्हारे विवाह में।’
‘मैं जानती हूं-तुम्हारे लिए उस दृश्य को देखना बहुत कठिन होगा। किन्तु प्यार के लिए प्यार की पीड़ा को सहन करना भी आवश्यक होता है।’
‘मैं उस पीड़ा को सहन न कर पाऊंगा। इसीलिए मैंने उस दिन हांगकांग जाने का प्रोग्राम बना लिया है। वहां मुझे अपनी कंपनी से संबंधित एक काम तो है ही-साथ ही मैं उस पीड़ा को भी भूल जाऊंगा। अतः सोचता हूं तुम्हारे विवाह का उपहार तुम्हें आज ही दे दूं।’
मनु ने उत्सुकता से निखिल की ओर देखा।
निखिल ने अपनी जेब से शीशे की एक खूबसूरत डिबिया निकाली। डिबिया में हीरे की अंगूठी जगमगा रही थी। डिबिया मनु की ओर बढ़ाकर वह बोला- ‘किसी वक्त एक ख्वाब सजाया था। सोचा था-सुहागरात वाले दिन तुम्हें अपने हाथों से एक अंगूठी पहनाऊंगा। किन्तु वक्त की ऐसी आंधी चली कि सब कुछ बिखर गया। न ख्वाब रहा-न अंगूठी रही। आज भी ये अंगूठी तो है-किन्तु ख्वाब नहीं। ख्वाब टूट चुका है। इसे-इसे सुहागरात वाले दिन पहनना और हो सके तो-मुझे एक पल के लिए याद कर लेना।’
मनु यह सब सुनकर मछली की भांति तड़प उठी और निखिल का हाथ थामकर रुंधे स्वर में बोली- ‘निक्की! क्या तुम मुझे कभी माफ नहीं करोगे?’
‘मैंने तुम्हारे अपराध को कभी अपराध नहीं माना मनु! उसे सिर्फ हादसे का नाम दिया है। अतः यह मत कहो कि…।’
‘तो फिर क्यों कहते हो तुम यह सब? क्यों बार-बार उस तस्वीर को मेरे सामने रखते हो-जो मेरी आत्मा को तड़पाती है? क्यों नहीं समझते तुम मेरी विवशता को? क्यों नहीं सोचते कि मनु आज भी मेरी है?’
‘मेरी?’
‘हां निक्की! मैं आज भी तुम्हारी हूं। शरीर से न सही, किन्तु मन और आत्मा से मैं युगों-युगों तक तुम्हारी हूं। और यदि तुम्हें इस पर भी विश्वास नहीं होता तो चलो-कहीं दूर ले चलो मुझे। किसी ऐसी दुनिया में-जहां हम दोनों के सिवाय कोई और न हो। ठीक तीन दिन पश्चात् मेरा विवाह है। ठीक तीन दिन पश्चात् मैं विवाह का सुर्ख जोड़ा पहनकर आनंद की डोली में बैठ जाऊंगी। किन्तु यदि तुमने मुझसे उस वक्त भी साथ चलने के लिए कहा तो मैं चलूंगी निक्की! मैं सब कुछ छोड़कर तुम्हारे साथ चलूंगी।’ यह सब कहते-कहते मनु ने निखिल के कंधे पर सर रख दिया और सिसक उठी।
उसे यों सिसकते देखकर निखिल के होंठों पर फैलने वाली मुस्कुराहट और भी गहरी हो गई।
पर भर के मौन के पश्चात् गंभीर स्वर में वह बोला- ‘नहीं मनु! मेरा प्यार खुदगर्ज नहीं। मैं अपनी खुशी के लिए आनंद की खुशियों में आग न लगाऊंगा। मैंने प्यार में हंसना सीखा है तो रोना भी सीखा है। मेरे अंदर इतना साहस है कि आंसुओं को पी सकूं। तुम शौक से विवाह का जोड़ा पहनो। तुम पूरे उत्साह एवं उल्लास से आनंद की डोली में बैठो। मैं तुमसे कभी नहीं कहूंगा कि इन रस्मों को तोड़कर मेरे साथ चलो। कभी नहीं कहूंगा कि मेरा प्यार मुझे लौटा दो। मनु! तुम्हें तुम्हारी खुशियां मुबारक हों और मुझे मेरे गम।’

‘निक्की-निक्की!’
‘आंसू पोंछ लो मनु! मत रोओ। मुझे भय है कि कहीं तुम्हारे यह आंसू मुझसे मेरा जीवन न छीन लें।’
मनु ने सिसकियां पीकर आंसू पोंछ लिए।
मनु ने डिबिया ले ली। बोली- ‘मेरे लिए तो तुम्हारा प्यार ही काफी था निक्की! तुम्हें इतना कीमती उपहार खरीदने की क्या जरूरत थी।’
‘पसंद नहीं है शायद?’
‘यह तो डायमंड रिंग है। यदि तुमने मुझे उपहार में एक फूल भी दिया होता तो भी मुझे पसंद होता।’
‘आओ अब चलें।’
मनु उठ गई। डिबिया उसने पर्स में डाल ली थी।
एकाएक निखिल को कुछ याद आया और वह बोला- ‘एक प्रार्थना है मनु!’
‘बोलो।’
‘वचन दो कि अस्वीकार न करोगी।’
‘वचन देती हूं।’
‘मनु! मैं चाहता हूं कि हम दोनों भविष्य में भी मिलते रहें।’
‘ऐसा ही होगा निक्की!’
‘आनंद ने रोका तो?’
‘मैं तुम्हारे लिए समाज की मर्यादाएं भी तोड़ दूंगी।’
‘थैंक्यू मनु! यह कहकर तुमने मेरे दिल से बहुत बड़ा बोझ उतार दिया। आओ।’ कहकर निखिल ने उसका हाथ थाम लिया।
दोनों रोशनी बाग से बाहर आ गए।
पश्चिम की दिशा से उठने वाली काली घटा अब तेजी से आकाश पर फैलती जा रही थी।

