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Abhishap by rajvansh Best Hindi Novel | Grehlakshmi
Abhishap by rajvansh

समय मानो पंख लगाकर उड़ा और फिर आया मनु के विवाह का दिन। यूं गोपीनाथ जी की आर्थिक स्थिति ठीक न थी। पिछले एक वर्ष में उन्हें इतना घाटा हुआ था कि वह लाखों के कर्जदार हो गए थे। इसके बावजूद भी वे बेटी के विवाह में दिल खोलकर खर्च कर रहे थे।

कोठी को दुल्हन की तरह सजाया गया था।

कोठी के ठीक सामने एक पार्क में शामियाने लगे थे। मेहमानों के बैठने एवं बारात के खान-पान की व्यवस्था उसी पार्क में की गई थी। गोपीनाथ इस समय पार्क के मुख्य द्वार पर खड़े थे और मेहमानों का स्वागत कर रहे थे।

कोठी के अंदर मनु की सखी-सहेलियां उसे सजाने-संवारने में व्यस्त थीं। किन्तु मनु के चेहरे को देखकर यों लगता था-मानो आज का यह दिन उसके जीवन में कोई विशेष खुशी लेकर न आया था। उसके मन-मस्तिष्क में इस समय भी एक तूफान चक्कर काट रहा था और परस्पर विरोधी विचार, जो आनंद एवं निखिल से संबंधित थे, रह-रहकर एक-दूसरे से टकरा रहे थे।

निखिल के मिलने से पहले ऐसा न था।

उस समय उसके हृदय पर केवल आनंद का अधिकार था और आनंद को यह अधिकार उसने स्वयं दिया था। एक छोटी-सी मुलाकात ही उसे आनंद के करीब ले आई थी और फिर वही मुलाकात प्रेम में परिवर्तित हो गई थी। यह तो उसे बाद में पता चला था कि उसके पिता भी आनंद को जानते थे। फिर ऐसा भी हुआ जब एक दिन पिता ने बेटी की भावनाओं को समझा और आनंद से उसका रिश्ता पक्का कर दिया।

आनंद के मिलते ही वह निखिल को भूल गई।

शायद उसने निखिल को चाहा भी न था। चाहा होता तो भूलना इतना सरल न था।

वही निखिल आज फिर उसके सामने था। एक साधारण युवक के नहीं-एक दौलतमंद युवक के रूप में। निखिल से मिलकर वह आंदोलित हुई थी। उसके मन-मस्तिष्क में एक भयानक हलचल हुई थी और यह ही वह क्षण थे-जब उसने पहली बार अपने आपसे यह प्रश्न किए थे-

‘क्या वह निखिल को चाहती है? क्या उसने निखिल से वास्तव में प्यार किया था?’

‘कहीं ऐसा तो नहीं कि उसका निखिल के प्रति यह आकर्षण केवल उसकी दौलत के कारण हो?’

‘तो क्या-वह निखिल की दौलत को प्यार करती है?’

यह प्रश्न उसके मस्तिष्क में इस वक्त भी तूफान की भांति शोर कर रहे थे और वह समझ न पा रही थी कि आखिर सच क्या था। वह जान न पाई थी कि उसने निखिल को पहले भी चाहा था-अथवा सिर्फ आज चाहा था।

सहसा मनु की विचार श्रृंखला टूट गई।

संध्या उसे झंझोड़ती हुए पूछ रही थी- ‘कहां खो गई तू?’

मनु ने आंखें खोल दीं। चौंककर देखा कमरे में संध्या के अतिरिक्त अन्य कोई न था। संध्या ने उससे फिर पूछा- ‘क्या सोच रही थी?’

‘कुछ भी नहीं।’

‘तो फिर यह मौन-विचार मग्नता?’

‘नींद आ गई थी। एक गिलास पानी तो दे।’

‘प्यास लगी है?’

‘हां।’

‘दिल की प्यास है-पानी से कैसे बुझेगी? इसके लिए तुझे आने वाली रात की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।’ संध्या ने शरारत से कहा और हंस पड़ी।

मनु बोली- ‘बहुत निर्लज्ज हो गई है।’

‘इसमें निर्लज्जता कैसी? सुहागरात वाले दिन यही तो होता है। होंठ अंगारों की भांति दहकते हैं। हृदय मानो लावा उगलता है। पूरे जिस्म में इतनी प्यास भड़कती है कि पूछो मत।’

‘मेरे साथ यह सब न होगा।’

‘क्यों, तेरी प्यास क्या पहले ही बुझ चुकी है।’

मनु ने कुछ क्षणों तक तो संध्या के शब्दों का अर्थ ही न जाना। फिर ज्यों ही बात समझ में आई-उसने झट से संध्या की चोटी पकड़ ली और उसे अपनी ओर खींचती हुई गुस्से बोली- ‘बहुत बोलने लगी है।’

‘माफ कर बाबा! अब न बोलूंगी।’

‘प्रॉमिस?’

‘वचन देती हूं।’

मनु ने उसकी वेणी छोड़ दी। तभी सड़क पर बैंड की आवाज सुनाई दी। संध्या ने कहा- ‘ले आ गए तेरे वो।’

‘मेरे वो-वो कौन?’

‘प्रोफेसर साहब।’

‘तो-मैं क्या करूं?’ मनु ने असावधानी से पूछा।

‘वरमाला उठा और गेट पर चल।’

‘तू क्यों नहीं चली जाती।’

‘न बाबा न!’ संध्या बोली- ‘तेरा यह दुबला-पतला दर्शन शास्त्र का प्रोफेसर मुझे बिलकुल पसंद नहीं। यह दार्शनिक लोग प्रेम एवं रोमांस के मामले में बिलकुल अनाड़ी होते हैं। मैं प्रेम-प्यार की बात करूंगी और यह साहब अपना दर्शन बघारेंगे। कभी तो जीवन-मृत्यु के भेद पर लेक्चर देंगे और कभी प्रकृति के रहस्य समझायेंगे। मैं तो चार दिन भी न निभा पाऊंगी।’

‘इसमें दिक्कत कैसी?’ आदमकद शीशे में अपनी छवि देखते हुए मनु ने कहा- ‘जब तक निभ सके-निभाना।’

‘और-उसके पश्चात्?’

‘तलाक ले लेना।’

‘भई हम भी तो सुनें-तलाक किससे लिया जा रहा है।’ एकाएक रेणु एवं सीमा ने कमरे में आकर कहा तो मनु जल्दी से दर्पण के सामने से हट गई। उसके कहे हुए शब्द रेणु एवं सीमा ने सुन लिए थे।

संध्या ने उत्तर देते हुए कहा- ‘अपनी रानी जी आनंद से तलाक ले रही हैं। कहती हैं-यह प्रोफेसर तो सुहागरात वाले दिन भी अपना दर्शन ही बघारेगा। अतः मैं तो न निभा पाऊंगी।’

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‘क्यों रानी जी!’ रेणु ने सामने आकर मनु के गाल पर चिकोटी भरी और बोली- ‘किसी और से नैना लड़ गए क्या? अभी तो शादी भी नहीं हुई और अभी से तलाक।’

संध्या एवं सीमा इस पर खिलखिलाकर हंस पड़ी।

मनु केवल मुस्कुराकर रह गई।

‘मिस्टर पाशा!’

‘सब ओ-के- है सर!’

‘वह राइटर कहां है?’

‘हॉल में। मैं उससे आज के सीन में थोड़ा परिवर्तन करा रहा हूं।’

‘स्क्रिप्ट जैसी भी है, उसे वैसी ही रहने दो। एक बात का ध्यान रखो-यह राइटर शूटिंग के दौरान वहीं रहना चाहिए। हम नहीं चाहते कि बाहर के किसी भी आदमी को हमारी प्लान का पता चले।’

‘मैं समझ गया सर!’ लंबे-तगड़े और स्याह चेहरे वाले पाशा ने कहा- ‘आज के पश्चात् ऐसी भूल न होगी।’

‘गुड! अब तुम शूटिंग करो और शिल्पा को हमारे पास भेज दो।’

‘सर! क्या आप शूटिंग न देखेंगे?’

‘शायद आज नहीं।’ निखिल ने कहा और सोफे की पुश्त से सटकर वह सिगरेट के लंबे-लंबे कश खींचने लगा।

पाशा चला गया।

उसी समय शिल्पा ने कमरे में प्रवेश किया। वह इस वक्त ऊंची स्कर्ट एवं ब्लाउज में थी। ब्लाउज के अंदर कैद उसके सुदृढ़ अंग मौन निमंत्रण-सा देते प्रतीत होते थे।

शिल्पा ने अंदर आते ही निखिल के मूड को समझा और उसके समीप बैठकर बोली- ‘सर! क्या यह सच है कि आज आपकी तबीयत कुछ ठीक नहीं?’

‘तबीयत तो ठीक है शिल्पा! किन्तु मन में थोड़ी उथल-पुथल है। और जानती हो-ऐसा क्यों है?’

‘क्यों?’ शिल्पा ने पूछा और अपने पांव मेज पर फैला दिए। उसके ऐसा करते ही स्कर्ट थोड़ी ऊपर उठ गई और शिल्पा की सुडौल जंघाएं स्पष्ट नजर आने लगीं। किन्तु निखिल ने इस ओर कोई ध्यान न दिया और बोला- ‘आज हमारी प्रेमिका की शादी है।’

‘आप मनु की बात कर रहे हैं न सर?’

‘हां।’

‘तो इसमें सोचना कैसा? आप तो जानते हैं कि…।’

‘नहीं शिल्पा!’ निखिल ने निःश्वास ली और बोला- ‘आज हमें ऐसा लग रहा है-जैसे हम उसे आज भी चाहते हैं। जैसे हमारा हृदय आज भी उसी के लिए सुरक्षित है। और यह सब हमें आज ही लगा है शिल्पा! आज ही।’

‘छोड़िए सर! और काम की बातें कीजिए। आज भली प्रकार जानते हैं कि इस संसार में प्यार-वफा और वादों का कोई महत्व नहीं। हम लोग केवल अपने स्वार्थ के कारण मिलते हैं और स्वार्थ पूरा होते ही उससे यों दूर चले जाते हैं-मानो कभी कोई रिश्ता ही न रहा हो।’

‘तुम सोचती हो-हमने उसे कभी नहीं चाहा?’

‘मैं सोचती हूं-आपने उसे चाहा है। न चाहा होता तो आप उससे एक वर्ष के बाद फिर न मिलते। आपके हृदय में तड़प थी उसके लिए। आप उससे इसलिए भी मिले-क्योंकि आप उसके सामने अतीत की तस्वीर को रखना चाहते थे। आप चाहते थे-वह आपको देखकर पश्चाताप करे और जी भरकर रोये। यही हुआ-वह रोती तो आपको शांति मिली। उसने पश्चाताप किया तो आपको खुशी हुई। अन्यथा-यदि आपका मनु से कोई रिश्ता न होता-यदि आपके हृदय में उसके लिए बिलकुल भी चाहत न होती तो आप उससे क्यों मिलते सर?’

निखिल ने कुछ न कहा और बेचैनी से होंठ काटने लगा। शिल्पा ने झूठ न कहा था। उसके हृदय में आज भी वही चाहत थी उसके लिए। यदि ऐसा न होता तो उसके हृदय में आज इतनी पीड़ा क्यों उठती? क्यों उसे ऐसा लगता कि मनु किसी और की होने के साथ-साथ उसकी तमाम खुशियां भी बटोर कर ले जा रही है।

तभी शिल्पा उससे बोली- ‘सर! मैं आपके लिए गिलास तैयार करती हूं।’

‘ठहरो शिल्पा!’ निखिल ने कहा और फिर फोन को अपनी ओर सरकाकर वह गोपीनाथ का नंबर डायल करने लगा।

संबंध मिलते ही वह बोला- ‘मनु से बात कराइये।’

कुछ क्षणोपरांत मनु की आवाज सुनाई पड़ी- ‘हैलो! आप कौन हैं?’

‘निक्की! कैसी हो?’

‘बारात आ चुकी है।’

‘बहुत खुश हो-हो न?’

‘निक्की! सपने जब टूटते हैं तो खुशी नहीं होती। बहुत दुःख होता है। किन्तु यह दुःख ऐसा होता है-जो कभी जुबान पर नहीं आता। जिसके लिए आंखों में आंसू भी नहीं बहते। सिर्फ महसूस किया जाता है।’

‘मनु! याद है तुमने मुझसे कुछ कहा था? तुमने मुझसे कहा था कि मैं तुम्हारे लिए संसार भर की रस्में तोड़कर चली आऊंगी।’

‘हां! मैंने कहा था निक्की! किन्तु तुमने मुझे बुलाया ही कहां? तुमने कहा तो होता मुझसे-मैं तो तीन दिन पहले ही चली आती।’

‘आज भी आ सकती हो?’

‘कहकर तो देखो।’

‘नहीं मनु! इस समय कुछ न कहूंगा। मैं नहीं चाहता कि आज की यह खुशी किसी मातम में तब्दील हो जाए। किन्तु मैं तुमसे कहूंगा अवश्य! मैं-मैं इस बाजी को हार नहीं सकता मनु! मैं तुमसे अलग रहकर चैन से न जी पाऊंगा।’

‘मैं आऊंगी निक्की! मैं जरूर आऊंगी। और कुछ…?’

‘एक बात और। मेरा उपहार तो तुम्हें याद रहेगा?’

‘सिर्फ उपहार ही नहीं-उपहार देने वाला भी।’

‘थैंक्यू मनु! अब तुम अपने प्रोफेसर का स्वागत करो। मैं रिसीवर रखता हूं।’ कहते हुए निखिल ने गहरी सांस ली और रिसीवर रख दिया।

चेहरा घुमाकर देखा-शिल्पा उसके सामने शराब का गिलास लिए खड़ी थी। निखिल ने सिगरेट ऐश ट्रे में डालकर गिलास थाम लिया और शिल्पा से कहा- ‘शिल्पा! मनुष्य का स्वभाव भी बड़ा विचित्र होता है। सच तो यह है कि हम अपने जीवन में हर पल एक नाटक खेलते हैं। हम हर पल धोखा देते हैं दुनिया को और यों जीते हैं कि लोग हमारे विषय में कुछ भी नहीं जान पाते। किन्तु हम अपने आपको कभी नहीं छल पाते-अपने आपको कभी धोखा नहीं दे पाते।’

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शिल्पा निखिल के इन शब्दों का अर्थ न समझ सकी और बोली- ‘गिलास खाली कीजिए सर!’

निखिल ने गिलास होंठों से लगा लिया।

उसी समय इंटरकॉम बजा।

निखिल ने गिलास रखकर रिसीवर उठाया तो दूसरी ओर से पाशा की आवाज सुनाई पड़ी- ‘एक प्रॉब्लम है सर!’

‘वह क्या?’

‘कामिनी अपने आपको काफी नर्वस महसूस कर रही है। बार-बार रिटेक हो रहा है। अभी तक एक भी शॉट ओ-के- नहीं हुआ।’

‘मिस्टर पाशा! कलाकारों को नर्वस अथवा एक्टिव रखना डायरेक्टर के हाथ में होता है। आप कामिनी को समझाने की कोशिश करें। बार-बार रिटेक होना अच्छी बात नहीं।’

‘सर! मैं सोच रहा था कि शूटिंग कल तक के लिए स्थगित कर दी जाए।’

‘मिस्टर पाशा! आप समझ नहीं रहे हैं। यह फिल्म हमें चार दिन के अंदर-अंदर तैयार करनी है। डिस्ट्रिीब्यूटर का पैसा आ चुका है। कामिनी यदि काम करने को तैयार नहीं हो तो आप दूसरी एक्ट्रेस का प्रबंध कीजिए।’

‘ठीक है सर!’

निखिल ने रिसीवर रख दिया।

रिसीवर रखकर उसने अपना गिलास खाली किया और फिर शिल्पा को खींचकर अपनी गोद में डाल लिया।

शिल्पा ने कोई विरोध न किया।

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