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Abhishap by rajvansh Best Hindi Novel | Grehlakshmi
Abhishap by rajvansh

गाड़ी उसके सामने तीर जैसी तेजी से गुजर गई और आनंद को यों लगा-मानो एक साथ कई तीर उसके हृदय को चीरकर निकल गए हों। गुजरने वाली एक खुली गाड़ी थी-जिसमें निखिल एवं मनु बैठे थे।

गाड़ी नजरों से ओझल हो गई थी, किन्तु आनंद अभी भी उस ओर देख रहा था। एक विवशता थी जो उसे अभी तक वहां रोके खड़ी थी और एक पीड़ा थी, जो उसकी रगों में तूफान की भांति चक्कर काट रही थी। आनंद देर तक वहीं खड़ा उस पीड़ा को पीता रहा और फिर होटल में लौट आया।

मन में एक ही सोच थी। कैसे जी पाएगा वह? किस प्रकार समझा सकेगा वह अपने आपको? किस प्रकार देख सकेगा वह मनु को निखिल की बांहों में? सच-कितनी पीड़ा होती है जब अपना प्यार लुटता है। कितना दर्द होता है जब आंखों के सामने ही दिल की दुनिया लुटती है। आनंद को लग रहा था कि एक दिन उसका यह दर्द हद से गुजर जाएगा और उस समय दो ही बातें होंगी। या तो वह पागल हो जाएगा या फिर आत्महत्या कर लेगा। पूरी दुनिया में कोई ऐसा भी तो नहीं था-जो उसे सांत्वना देता। जो पल-दो पल के लिए ही सही-किन्तु उसके घावों पर मरहम तो लगाता और वह जिसके कंधे से लगकर कुछ देर रो पाता।

तभी द्वार पर दस्तक हुई।

आनंद ने चौंककर कहा- ‘द्वार खुला है।’

अगले ही क्षण भारती अंदर आ गई। वह आज भी उसी परिधान में थी। अंदर आते ही उसने हाथ जोड़ लिए। बोली- ‘नमस्ते सर!’

‘आओ भारती! बैठो।’

भारती बैठ गई। एक पल बाद बोली- ‘मेरा आना आपको बुरा तो नहीं लगा सर!’

‘क्यों?’

‘मेरा मतलब है सर! न कोई रिश्ता और न ही कोई पहचान।’

‘पहचान तो है-क्योंकि तुम मेरी स्टूडेंट रही हो। रहा रिश्ता तो न जाने क्यों मुझे इस शब्द से ही घृणा हो गई है।’

‘यह क्यों सर?’

‘बहुत शीघ्र टूट जाते हैं रिश्ते। कभी-कभी तो रिश्तों का महल पूरी तरह से बन भी नहीं पाता और उससे पहले ही गिर जाता है। बहुत पीड़ा होती है ऐसी स्थिति में। सोचता हूं रिश्ते न ही बनें तो अच्छा है।’

‘आपके सोचने से क्या होता है सर! रिश्ते तो होते ही बनने के लिए हैं।’

‘बनने के लिए होते हैं तो फिर टूटते क्यों हैं?’ आनंद ने पूछा। स्वर में आक्रोश के साथ पीड़ा भी थी। वह बोला- ‘क्यों होता है ऐसा?’

‘इसमें रिश्तों का कोई दोष नहीं होता सर!’ भारती बोली- ‘दोष तो उन लोगों का होता है जो रिश्तों को बदनाम करते हैं। जो इतने खुदगर्ज होते हैं कि अपनी गरज के लिए रिश्तों का खून कर देते हैं।’

आनंद ने इस विषय को आगे न बढ़ाया।

कुछ पलों के मौन के बाद उसने बातों का विषय बदला- ‘आज मनु मिली थी।’

‘अकेली?’

‘निखिल भी साथ था-दोनों खुली गाड़ी में बैठे थे।’

‘देखकर पीड़ा हुई होगी?’

‘स्वाभाविक है।’

‘पर आप तो उसे भूल जाने की बात कह रहे थे।’

‘कहना और किसी को भूल जाना, इन दोनों शब्दों में अंतर होता है भारती! मैं प्रयास करके मनु को तो भूल सकता हूं-यद्यपि यह भी संभव नहीं। किन्तु वह निखिल के साथ रहे, इसे मैं कैसे भूल सकता हूं?’

‘प्रेम इसी को कहते हैं सर! मनुष्य यदि वास्तव में किसी से प्रेम करता है तो वह भले ही मुंह से अपने प्रेम को स्वीकार न करे, किन्तु उसका अपना किसी दूसरे की बांहों में हो, इसे वह कभी सहन नहीं कर पाता। और यह ही प्रेम की कसौटी होती है।’

‘ठीक कहती हो भारती!’ आनंद ने निःश्वास लेकर कहा और सिगरेट सुलगाने लगा।

एकाएक भारती ने उससे कहा- ‘सर! आप कहीं जाएंगे तो नहीं?’

‘कब?’

‘इसी शाम।’

‘जाना ही कहां है।’

‘घूमने चलेंगे?’

‘न-नहीं भारती!’

‘सर! घूमने से मन बहलता है।’

‘पीड़ा भी तो होती है।’

‘वह कैसे?’

‘घूमते-घूमते एकाएक कोई अपना मिल जाए और उसके इर्द-गिर्द किसी दूसरे की बांहें हों तो…?’

‘ऐसा हमेशा नहीं होता सर! कभी-कभी हो सकता है।’

‘पीड़ा तो एक पल की भी दुखदायी होती है।’

‘बुद्धिमान लोग उसे पी जाते हैं। चलिए न सर!’

भारती उठकर बोली।

‘मन नहीं है भारती!’

‘मन को बहलाने का प्रयास कीजिए सर! जीने के लिए यह अनिवार्य होता है।’

आनंद का वास्तव में मन न था, किन्तु वह भारती के इस आग्रह को ठुकरा न सका और फिर दोनों होटल से निकलकर यूं ही एक ओर को चल पड़े। अभी शाम न हुई थी किन्तु मौसम सुहाना था और सड़कों पर चहल-पहल थी। चलते-चलते लंबे मौन को तोड़ते हुए भारती बोली- ‘सर! आपने कोई भटका हुआ मुसाफिर देखा है?’

‘देखा भी हो तो याद नहीं।’

‘कहते हैं सर! कि मुसाफिर यदि अपनी राह भूल जाए अथवा अंधकार के कारण उसे राह नजर न आए-तो वह उस राह को छोड़ देता है।’

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‘फिर कहां जाता है?’

‘किसी दूसरी राह पर-जो उसे मंजिल तक पहुंचा सके।’

‘मंजिल मिल ही जाए, यह आवश्यक तो नहीं।’

‘मन में आशाओं का दीप जला हो और साहस हो तो मंजिल अवश्य मिल जाती है।’

‘आशाओं का दीप भी बुझ जाए तो?’

‘बुद्धिमान राही उसे फिर से जलाते हैं और फिर किसी दूसरी राह पर चल पड़ते हैं।’

‘मेरे विषय में कह रही हो?’ आनंद ने पूछा।

‘यस सर!’ भारती बोली- ‘क्योंकि आप भी उसी मुसाफिर की भांति हैं, जिसने राह तो अच्छी चुनी थी और मंजिल भी अधिक दूर न थी, किन्तु एकाएक तूफान आया और राह अंधेरों में खो गई। मंजिल का पता न रहा। ऐसे में आपकी बुद्धिमानी इसी में है कि आप किसी दूसरी राह की ओर मुड़ जाएं। मुझे विश्वास है आपको मंजिल अवश्य मिलेगी।’

‘ऐसी राह कहां होगी?’

‘इसी संसार में-आपके आस-पास ही। आवश्यकता है केवल उसे पुकारने की! उससे यह कहने की कि मुझे मेरी मंजिल दे दो।’

आनंद ने इस बार चौंककर भारती की ओर देखा। मन में शंका उठी-कहीं ऐसा तो नहीं कि भारती के हृदय में उसके लिए प्रेम का अंकुर फूट पड़ा हो? किन्तु यह कैसे हो सकता था? भारती तो स्वयं विवाहिता थी। नहीं-यह उसका भ्रम है। यह संभव नहीं। किन्तु भारती का उसके प्रति अपनों जैसा व्यवहार-उससे मिलना-उसे सांत्वना देना। यदि भारती के हृदय में उसके लिए प्रेम न होता तो वह उससे मिलने ही क्यों आती?

इस प्रश्न ने आनंद को बहुत कुछ सोचने पर विवश कर दिया। तभी भारती उससे बोली- ‘और वैसे भी सर! हृदय में कसकते घाव के लिए तो मरहम बहुत आवश्यक होता है।’

‘नहीं भारती!’ आनंद बोला- ‘मैं इसे आवश्यक नहीं मानता। जीवन का जो आनंद पीड़ाओं को सहने में है, वह पीड़ाओं को कम करने में नहीं है। मैं अपनी पीड़ाओं से समझौता कर रहा हूं। बढ़ने दो इन पीड़ाओं को-जलने दो हृदय को इस ज्वालामुखी में। देखना यह है कि आखिर विजय किसकी होती है, इन पीड़ाओं की अथवा…।’

आनंद की बात अधूरी रह गई।

एकाएक उसने देखा-मनु एवं निखिल एक-दूसरे का हाथ थामे एक रेस्तरां से निकल रहे थे। मनु खिलखिलाकर हंस रही थी और निखिल उसके कान में कुछ कह रहा था।

आनंद के बढ़ते कदम रुक गए। यह सब देखकर उसके अस्तित्व में बारूद-सी सुलग उठी। हृदय में पीड़ाओं का गुब्बार बना और एक धमाके के साथ फट गया।

भारती से उसकी यह दशा छुपी न रही। गाड़ी के निकट खड़े निखिल एवं मनु को उसने भी देखा था। वे दोनों भी उन दोनों की ओर ही देख रहे थे। भारती ने उस ओर से चेहरा घुमाया और आनंद से बोली-

‘आइए, लौट चलें सर!’

‘भारती!’ मानो रो पड़ा आनंद।

‘मैं आपकी पीड़ा समझती हूं।’

‘भारती! भारती इन लोगों से कह दो कि ये यहां से चले जाएं।’

‘धैर्य एवं साहस से काम लीजिए सर!’

‘भारती! मैं पागल हो जाऊंगा।’ पीड़ा को दबाने के प्रयास में अपने होंठों को काटते हुए आनंद ने कहा और शीघ्रता से साइड पोल का सहारा ले लिया। यदि वह ऐसा न करता तो निश्चित ही चकराकर गिर पड़ता।

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भारती ने उसका हाथ थाम लिया। यह देखते हुए भी कि निखिल उसी की ओर देख रहा था और यह जानते हुए भी कि निखिल उसे आनंद के साथ देखकर क्रोध से पागल हो रहा होगा। वह आनंद से बोली- ‘नहीं सर! जो लोग पीड़ाओं से समझौता करते हैं, वे ऐसी कायरता कभी नहीं दिखाते। अपने आपको संभालिए और चलिए।’

आनंद लौट पड़ा।

भारती उसका हाथ थामे रही।

अभिशाप-भाग-22 दिनांक 12 Mar. 2022 समय 04:00 बजे साम प्रकाशित होगा

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