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bhootnath by devkinandan khatri

बेशक् भूतनाथ ने मेघराज और भैया राजा को बुरा धोखा दिया। उसे इस बात की प्रबल इच्छा थी कि किसी तरह मेघराज और उसके साथी का परिचय मिले परन्तु यह बात इस समय भी असंभव जान पड़ती थी।

भूतनाथ ने पहिले चाहा कि भैया राजा के चेहरे पर से झिल्ली ले ले परन्तु फिर यह सोचकर छोड़ दिया कि ऐसी झिल्ली तो मेरे पास मौजूद ही है, फिर भैया राजा से बुराई लेने की जरूरत ही क्या है।

अस्तु वह भैया राजा को छोड़ कर मेघराज की तरफ झपका और चाहा कि किसी तरह उन्हें पहिचाने परन्तु इस बात का विश्वास हो जाने पर कि उनके चेहरे पर तिलिस्मी झिल्ली नहीं है वह रूका और इधर-उधर देखकर धीरे से बोला, “यहाँ तो नजदीक में कोई कुआँ भी नहीं है कि मैं जल भर कर लाऊँ और इसका चेहरा धोकर पहिचानने का उद्योग करूँ।

खैर जाने दो। इन दोनों को यहीं पड़ा रहने दो और पहिले उस दुष्ट पर कब्जा करो जो मुझे नीचा दिखा चुका है और जिसे अपने साथियों के साथ छोड़ कर मैं यहाँ भाग आया हूँ। ये दोनों अभी कई घंटे तक होश में न आवेंगे और न यहाँ कोई मुसाफिर ही पहुँचकर दोनों की मदद कर सकेगा।’

भूतनाथ ने अपने बटुए में से आग पैदा करने वाला सामान निकाला और सूखे पत्ते बटोर कर आग सुलगाने के बाद उस पर अपने ऐयारी के बटुए को सेंक कर सुखाया तथा उस बेहोशी वाली दवा के असर को दूर किया और उस बटुए का सामान भी जो बहुत छितर-बितर हो गया था अपने कायदे के साथ ठीक करके पुन: सोचने लगा कि क्या करना चाहिए।

एक दफे उसका ध्यान पुन: अपने शागिर्दों और उस दुश्मन की तरफ गया जिससे लड़ता हुआ हारकर वह इस तरफ भाग आया था और वह उस पर कब्जा करने का ढंग सोचने लगा मगर फिर विचार किया कि कदाचित् इस समय वह मेरे ढंग पर न चढ़ा या पुन: मुझ ही को नीचा देखना पड़ा तो इधर की मेहनत बिलकुल बर्बाद हो जाएगी और मेघराज पर भी पुन: कब्जा करना कठिन ही नहीं बल्कि असंभव हो जाएगा मुझे इस बात का पता लगाना बहुत ही जरूरी है कि यह मेघराज वास्तव में कौन है और भैया राजा से इसका क्या संबंध है।

साथ ही इसके भैया राजा को भी मैं किसी तरह का नुकसान नहीं पहुँचाना चाहता, मेघराज को पहिचान लेने के बाद मैं भैया राजा से माफी माँग लूँगा और यदि वे माफी न देंगे तो मैं उनकी खिमदत करके उन्हें खुश कर लूँगा।

मगर क्या मेरे शागिर्द उस जगह फँसे ही रह जाएँगे और वह दुश्मन इस समय मेरे कब्जे में न आवेगा? मेरे पास और भी कई तरह की दवाइयाँ हैं जिनसे मैं इन दोनों को कई दिनों तक बेहोश रख सकता हूँ।

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तो इनकी बेहोशी बढ़ाकर और इन्हें इसी जगह छोड़ कर उस दुश्मन की तरफ मेरा इस समय जान उचित होगा? नहीं, अब दिन बहुत कम रह गया है, थोड़ी ही देर में अंधकार अपना दखल जमा लेगा, इतने थोड़े समय में ही वह काम नहीं हो सकता, इन दोनों को भी इस जगह पड़े रहने देना ठीक न होगा अस्तु भैया राजा को तो उनकी बेहोशी कम करके इसी जगह छोड़ दिया जाय जिसमें घंटे-भर के अन्दर ही वे होश में आकर जहाँ जो चाहे चले जाए और इस मेघराज को घोड़े पर लाद कर अपने अड्डे पर ले चलें, फिर जो कुछ होगा देखा जाएगा।

इसी तरह की बातें कुछ देर तक भूतनाथ सोचता रहा, अंत में वह मेघराज के पास गया और गैर से उनकी सूरत देखकर आप-ही-आप बोला, “मगर पानी का यहाँ बिलकुल ही अभाव हैं खैर अपने डेरे पर ही चल कर इनका चेहरा साफ करें। अब इन्हें घोड़े पर लादना चाहिए!” इतना सोचकर भूतनाथ एक घोड़ा खोल आया और उस पर मेघराज को लादने की फिक्र करने लगा, मगर अफसोस, भूतनाथ का इरादे पूरा नहीं हुआ। जैसे ही भूतनाथ ने मेघराज के बदन पर हाथ रखा वैसे ही इसके बदन में एक बिजली-सी दौड़ गई। उसका तमाम शरीर काँप गया और वह बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा।

भूतनाथ की यह बेहोश बहुत देर तक कायम नहीं रही। आधी घड़ी के अन्दर ही वह होश में आ गया और उठकर बड़े गौर और आश्चर्य से मेघराज को देखने लगा।

उसने देखा कि मेघराज के सिर से पैर तक अजीब किस्म का कपड़ा पहिरा हुआ है जो कि बहुत ही बारीक तार का बुना हुआ है और वह सुनहरा तार इतना पतला और मुलायम है कि सूत की तरह से उसका कपड़ा बुना गय है।

उस कपड़े के ऊपर से सूत का एक बारीक कपड़ा मेघराज पहिरे हुए है जिसके अन्दर से उस तार के कपड़े की चमक छनकर बाहर निकलती और बहुत ही भली मालूम होती है। आश्चर्य के साथ भूतनाथ ने कुछ देर तक उस कपड़े को देखा और पुन: उसे छुआ। छूने के साथ ही वह फिर बेहोश हो गया और आधी घड़ी तक बेहोश रहा।

जब भूतनाथ होश में आकर उठा तो धीरे से बोला, “अफसोस, मैं इसे किसी तरह भी अपने कब्जे में नहीं कर सकता। मेरी तमाम मेहनत ही व्यर्थ हो गई। अब मुझे भैया राजा और इन्द्रदेव के सामने भी शर्मिन्दगी उठानी पड़ेगी।

तो क्या मैं भैया राजा और इस मेघराज दोनों ही को इस दुनिया से उठा दूं? इन्द्रदेव को क्या मालूम हो सकता है कि मैंने इन दोनों को मार डाला!!” ।

इतने ही में भूतनाथ ने सामने से अपने उस दुश्मन को आते हुए देखा जिससे लड़ कर और भाग कर वह यहाँ तक चला आया था।

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