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bhootnath by devkinandan khatri

दोपहर की कड़ी धूप में भी भूतनाथ को चैन नहीं। देखिए किस तेजी के साथ सन्नाटे मैदान में सर पर पकड़ा रखे हुए चला जा रहा है ! जमानिया को छ:-सात कोस पीछे छोड़ आया है और दक्खिन झुकता हुआ पश्चिम की तरफ चला जा रहा है। सामने कोस-डेढ़ कोस की दूरी पर एक जंगल है जिसकी तरफ वह कभी-कभी सर उठाकर देख लेता है और पुन: सर झुका तेजी के साथ रवाना होता है।

जंगल के पास पहुँचकर उसने अपनी चाल धीमी कर दी और चौकन्ना हो कर इधर-उधर देखता हुआ जंगल के भीतर जाने लगा। एक कोस से ज्यादा न गया होगा कि बहुत घने ओर भयानक जंगल में जा घूमता-फिरता ऐसे ठिकाने पर पहुँचा जहाँ पानी का एक सुन्दर चश्मा बह रहा था और किनारे पर बड़े-बड़े साखू और शीशम के पेड़ बहुतायत के साथ मौजूद थे जिनके नीचे पत्थर के बड़े-बड़े चट्टान थे जो इस समय पेड़ों की सूखी पत्तियों से प्राय: ढके-से दिखाई दे रहे थे।

चारों तरफ अच्छी निगाह दौड़ाने के बाद भूतनाथ एक पत्थर की चट्टान पर बैठ गया और सर झुकाकर कुछ सोचने तथा किसी के आने का इंतजार करने लगा। थोड़ी-थोड़ी देर में जब कभी पत्तों के खड़खड़ाने की आवाज उसके कान में पड़ती तो वह सिर उठाकर उस तरफ देख लेता और जब किसी पर निगाह न पड़ती तो फिर सिर झुकाकर सोचने लग जाता।

इसी तरह सर उठाकर देखते और सोचते हुए उसे डेढ़ घंटे से ज्यादा बीत गया और तब घबड़ा कर इधर-उधर घूमने के लिए उठा और यह कहता हुआ सामने की तरफ बढ़ा, ‘ओफ! उसके आने में बड़ी देर हो गई। कदाचित् कोई विघ्न तो नहीं पड़ा’ ! इसी समय सामने से उसका एक शागिर्द आता हुआ दिखाई पड़ा जिसका चेहरा खून से रंगा हुआ था और कपड़े भी खून से तरबतर थे।

पास पहुँचने पर भूतनाथ ने ताज्जुब के साथ उसकी तरफ देखा और कहा, “पारस, यह क्या मामला है, तुम इस तरह पर जख्मी क्यों हो रहे हो?”

पारस : आपकी आज्ञानुसार हम तीनों आदमी जैपाल सिंह की गठरी बारी-बारी से पीठ पर लादे हुए इस तरफ आ रहे थे। जब यहाँ से सिर्फ एक कोस की दूरी पर रह गए तब एक सवार ने वहाँ पहुँचकर हम लोगों का मुकाबला किया जो बहुत ही बहादुर और नौजवान जान पड़ता था तथा उसका घोड़ा भी बहुत ही अनमोल, खूबसूरत और ताकतवर था।

उसने हम लोगों से डपट कर पूछा, “तुम लोग कौन हो?” परन्तु हम लोगों ने उसे किसी तरह का साफ और सच्चा जवाब न दिया, इस पर उसने रंज होकर हम लोगों पर चाबुक का वार किया।

मैंने जैपाल की गठरी जमीन पर रख दी और तीनों आदमी एक साथ उस पर टूट पड़े मगर उसका कुछ भी न बिगाड़ सके। उसने भी तलवार म्यान से निकाल ली और हम तीनों के हमले का अच्छी तरह जवाब दिया।

हम तीनों उसके हाथ से जख्मी हुए मगर उसके करारेपन में कुछ भी फर्क न पड़ा, हम लोगों के सामने खड़ा रहा और अंत में बोला कि ‘तुम लोग कौन हो इसे हम खूब जानते हैं।’

इतना कहकर वह घोड़े से नीचे उतरा और जैपाल की गठरी खोल कर उसने उसे अच्छी तरह देखा, तब अपनी जेब में से लखलखे की डिबिया निकालकर जैपाल को सुंघाया और जब वह होश में आया तो उसे कहा कि ‘उठो और जल्दी से भाग जाओ।

क्या तुम्हें मालूम नहीं है कि गदाधरसिंह ने तुम्हें कैद कर लिया और ये तीनों गदाधरसिंह के आदमी हैं जो तुम्हें कहीं लिए जा रहे हैं? मैंने तुम्हें इस आफत से रिहाई दिलाई है, अब तुम जाकर दारोगा से कह दो कि गदाधरसिंह पर कदापि भरोसा न करे। उठो और जल्दी के साथ यहाँ से भागो’!

उस सवार की बातें सुनकर जैपाल चैतन्य हो गया और बड़े गौर से हम लोगों को देखकर सवार से बोला, “मैं खूब अच्छी तरह से पहिचान गया, बेशक् ये लोग गदाधरसिंह के शागिर्द हैं, आपने मुझ पर बड़ी ही कृपा की कि इस आफत से मेरी जान बचाई।

क्या आप अपना परिचय मुझको दे सकते हैं?” इसके जवाब में सवार ने कहा कि ‘हम अपना परिचय तुम्हें नहीं दे सकते हाँ, इस घोड़े पर अपने साथ सवार करा तुम्हें कुछ दूर तक पहुँचा तो सकते हैं जिससे ये लोग तुम्हारा पीछा करके तुम्हें पुन: गिरफ्तार न कर सकें।”

हम लोगों में इतनी हिम्मत न थी कि उठकर उस सवार का मुकाबला करते या उससे कुछ कहते। देखते-ही-देखते उस सवार ने जैपाल को अपने घोड़े पर बैठा लिया और एक तरफ का रास्ता लिया। घंटे भर बाद हम लोगों में उठने की ताकत हुई, मैं यहाँ आपके पास पहुँचा और मेरे साथी भी पीछे-पीछे आ रहे हैं।

पारस की बातें सुनकर भूतनाथ ने उदासी के साथ कहा, “यह बहुत ही बुरा हुआ! हम जैपाल के दिल में यह बात जमा दिया चाहते थे कि तुम्हें तुम्हारे एक दुश्मन मेघराज नामी ने गिरफ्तार कर लिया था और हमने उसके हाथ से तुम्हारी जान बचाई है, मगर अफसोस, तुम लोगों के लिए कुछ न हुआ।”

पारस : आखिर हम लोग करते ही क्या?

भूतनाथ : तुम लोग तीन ऐयार होकर एक आदमी का मुकाबला न कर सके तो अब क्या कहा जाय!

पारस : दुश्मन ही ऐसा जबर्दस्त था, अगर आपका उसका मुकाबला हो जाता तो आपको भी मालूम हो जाता कि उसका मुकाबला…

भूतनाथ : (चिढ़कर) अजी रहने भी दो। अगर मेरा उसका मुकाबला हो जाता तो उसे मजा भी चखा देता और तुम लोगों को भी दिखा देता कि ऐयारी और बहादुरी किसे कहते हैं।

पारस : शायद ऐसा ही हो। मगर आपकी बराबरी हम लोग क्यों कर कर सकते हैं। (घबराहट के साथ सामने की तरफ देखता हुआ) ईश्वर कुशल करे, लीजिए वह यहाँ भी आ पहुँचा! अब आप भी इसका मुकाबला करके अपने दिल का हौसला मिटा लीजिए।

भूतनाथ ने चौकन्ने होकर उस तरफ देखा जिधर पारस ने इशारा किया था। एक खुशरू नौजवान और बहादुर शहसवार पर उसकी निगाह पड़ी जिसका घोड़ा भी बहुत खूबसूरत और ताकतवर मालूम होता था और अठखेलियाँ करता हुआ भूतनाथ की तरफ बढ़ा आता था।

उस सवार की पोशाक अमीराना थी और कई तरह के हर्बों से वह अपने को सजाए हुए था। रंग गोरा, चेहरा साफ और सुडौल तथा बड़ी-बड़ी आँखों में हिम्मत और मर्दानगी की झलक पाई जाती थी।

पर उसकी सिकुड़ी हुई चौड़ी पेशानी की मददगार चढ़ी भृकुटी की तरफ ध्यान देने से मालूम होता था कि इस समय वह बड़े ही क्रोध में है। यद्यपि ढाल-तलवार, खंजर, नेजा, कमान और तीर इत्यादि उसके पास सभी कुछ थे परन्तु हाथ में वह एक मजबूत कोड़ा ही लिए था जिसकी सुनहरी डंडी पर नेहायत ही नफीस जड़ाऊ काम किया हुआ था और उसमें जड़े हुए कीमती हीरे दूर से ही अपनी चमक-दमक दिखा रहे थे।

देखते-ही-देखते वह सवार भूतनाथ के पास आकर खड़ा हो गया और मीठी परन्तु गंभीर आवाज में बोला, “तुम्हारे पास सिर्फ एक ही शागिर्द को देखता हूँ। बाकी के दो कहाँ गये जो मेरे हाथ में जख्मी हुए थे?”

भूतनाथ : (बड़े क्रोध के साथ सवार की तरफ देखता हुआ) यद्यपि तुम्हारे चेहरे पर नकाब नहीं है तथापि मैं तुम्हें पहिचान न सका। तुम कौन हो और मेरे साथ ऐसी बेअदबी करने का कारण क्या है?

सवार : यद्यपि तुम मुझे पहिचानते नहीं मगर मेरा और तुम्हारा कई दफे सामना हो चुका है! मेरी और तुम्हारी दुश्मनी पुरानी है, यद्यपि तुम मुझे नहीं पहिचानते! मैं तुम्हारा पुराना खैरख्वाह मगर अब बदख्वाह हूँ, यद्यपि तुम मुझे नहीं पहिचानते! मैंने तुम्हारा बहुत कुछ भला किया है और अब बुरा करने के लिए तैयार हूँ यद्यपि तुम मुझे नहीं पहिचानते!

तुम्हारी हर एक कार्रवाई को जानता हूँ, तुम्हारी नीयत को पहिचानता हूँ, तुम्हारी चालबाजियों का हाल रोज ही सुना और समझा करता हूँ, यद्यपि तुम मुझे नहीं पहिचानते! भैया राजा के साथ जिस तरह पर दारोगा से मिल कर तुमने दुश्मनी की और पुन: भैया राजा के कब्जे में फँसकर तथा उनकी कुदरत को जान कर उनके ताबेदार बने और सदैव ताबेदार बने रहने की कसम खाई, वह भी मुझसे दिप हुआ नहीं है, और अब जो तुम एक अदनी बात पर भैया राजा से चिढ़ गये और दारोगा को अंधा बनाकर उसे धोखा देते हुए अपना काम सिद्ध किया चाहते हो उसे भी मैं देख-सुन रहा हूँ, यद्यपि तुम मुझे नहीं पहिचानते! मैंने ही तुम्हारे कब्जे से जैपाल को छुड़ाकर दारोगा के पास भेज दिया है और अब पुन: तुम्हारा सामना करने के लिए तैयार हूँ, यद्यपि…

भूतनाथ : (झुंझलाकर) मगर इन बातों से तुम्हें मतलब ही क्या? तुम कौन हो सो बताओ।

सवार : मैं वही हूँ जिसे तुम जानते हो मगर पहिचानते नहीं, मैं वही हूँ जिसने तुम्हारी वह बस दौलत छीन ली जो किसी महात्मा ने तुम्हें दी थी, मैं वही हूँ जिसने भोलासिंह बन कर तुम्हारी कैद से प्रभाकर सिंह को छुड़ाया, और मैं वही हूँ जिसके अधीन तुम्हारे वे सब शागिर्द काम कर रहे हैं जिनके साथ तुमने उस खोह में बड़ी ही बेइज्जती का बर्ताव किया था। मगर अफसोस, मैं तुम्हें अभी अपना नाम नहीं बता सकता।

भूतनाथ : (म्यान से तलवार खैंच कर) खैर तो मालूम हो गया कि मेरे सबसे बड़े दुश्मन तुम हो और तुमसे मुझे जरूर बदला लेना चाहिए।

इतना कह कर भूतनाथ ने उस सवार पर तलवार से हमला किया जिसे उसने बड़ी खूबी के साथ अपने चाबुक की डंडी पर रोका और तब उसी से भूतनाथ की गर्दन पर एक ऐसा हाथ मारा कि भूतनाथ का सिर घूम गया और वह बेचैन होकर जमीन पर बैठ गया।

सवार ने ललकारा और कहा, “बस सिर्फ एक ही चाबुक में तुम्हारा यह हाल है! मैं तुमसे लड़ने और तुम्हारा हौसला देखने के लिए आया हूँ। तुम्हारी बहादुरी की बड़ी तारीफ सुनता था, मगर अब जो देखता हूँ तो मालूम होता है कि तुम्हारे लिए मुझे तलवार या खंजर निकालने की जरूरत न पड़ेगी और सिर्फ इस चाबुक ही से अच्छी तरह तुम्हारा मुकाबला कर सकूँगा!”

भूतनाथ फिर सम्हल कर उठ खड़ा हुआ और बोला, “खैर यह इत्तिफाक की बात थी कि तुम्हारी एक जरा-सी लकड़ी से मैं चोट खा गया, आओ मैं अब अच्छी तरह तुमसे मुकाबला करने के लिए तैयार हूँ।”

सवार : मगर गदाधरसिंह, तुम इस बात का भी खयाल कर लेना कि इस समय मेरे पास यह तलवार भी मौजूद है जो तुमने धोखा देकर प्रभाकर सिंह की कमर से निकाल ली थी और जिसे तुम्हारे एक शागिर्द ने तुम्हें उल्लू बनाकर तुम्हारे कब्जे से ले लिया था। (तलवार निकालकर और दिखाकर) देखो यह वही तलवार है और इसके जोड़ की यह अँगूठी। मगर संभव है कि तुम्हारे लिए इसे काम में लाने की जरूरत न पड़े। लो उस तरफ देखो, तुम्हारे वे दोनों शागिर्द भी वहाँ आ पहुँचे जो मेरे हाथ से जख्मी हुए थे।

सवार की बातें सुन कर और उस अजीब तलवार की सूरत देखकर भूतनाथ का कलेजा काँप उठा और वह घबड़ाकर उस सवार का मुँह देखने लगा। सवार ने पुन: भूतनाथ से कहा, “तुम्हारा वह शागिर्द भी मेरे साथ है जिसने यह तलवार ले ली थी और जो चन्द्रशेखर के नाम से तुम्हारी खबर लिया करता है।”

भूतनाथ : मेरे साथ तुम्हारे दुश्मनी करने का सबब क्या है?

सवार : यही कि मैं भैया राजा और प्रभाकर सिंह का दोस्त हूँ।

भूतनाथ : क्या तुम्हें यह नहीं मालूम है कि भैया राजा और प्रभाकर सिंह से अच्छा बर्ताव रखने के लिए मैं कसम खा चुका हूँ और भैया राजा से प्रतिज्ञा कर चुका हूँ कि अब कदापि आप लोगों के साथ बुरा बर्ताव न करूँगा।

सवार : हाँ मालूम है, मगर अब जो तुम्हारी नीयत पुन: खराब हो गई है क्या किया जाय?

भूतनाथ : मेरी नीयत कुछ खराब नहीं है। आपको कोई भी बात ऐसी मालूम नहीं होगी जो कि इन दिनों में उन लोगों को नुकसान पहुँचाने के खयाल से की हो।

सवार : उस दिन मेघराज का परिचय न पाने के कारण जो तुम भैया राजा से रूठकर और तन करके चले ये क्या वह मामूली बात थी! उसके बाद तुम जाकर दारोगा के दोस्त बन बैठे और हरनामसिंह को कैद से छुड़ाने के बाद जैपाल को जिसे तुमने खुद गिरफ्तार किया था दोस्त बना दारोगा के पास ले चले थे, वह क्या ध्यान देने योग्य नहीं है?

भूतनाथ : मगर तुम नहीं समझ सकते कि ये सब काम में किस नीयत से कर रहा हूँ।

सवार : मैं खूब जानता हूँ। तुम्हारी नीयत का हाल किसी से छिपा हुआ नहीं है। लालच, बदनीयती और बेईमानी तो मानो तुम्हारे ही लिए बनाई गई है। अब हम लोग तुम्हारे धोखे में कभी नहीं आ सकते।

भूतनाथ : खैर जब तुम्हारी ऐसी ही समझ है तो तुम्हारे साथ बहस करने की कोई जरूरत नहीं।

भूतनाथ ने इतना कहने को तो कह दिया मगर वास्तव में वह बहुत ही डरा हुआ था और आश्चर्य के साथ सोच रहा था कि यह सवार कौन है और मेरे भेद की बातें इसे कैसे मालूम हुई तथा अब देखना चाहिए कि यह मेरे साथ कैसा बर्ताव करता है।

इतने में भूतनाथ की निगाह मैदान की तरफ जा पड़ी और उसने दो नकाबपोश सवारों को अपनी तरफ आते देखा। उसे विश्वास हो गया कि वे दोनों नकाबपोश सवार भी जरूर इस सवार के साथी और मददगार ही होंगे। भूतनाथ को उत्कंठा के साथ मैदान की तरफ देखते पा उस सवार ने भी घूमकर देखा और कहा, “लो गदाधरसिंह, मेरे दोनों साथी भी यहाँ आ पहुँचे, अब तो तुम्हारी हिम्मत बिलकुल ही टूट गई होगी!”

भूतनाथ : अगर ईमानदारी और धर्म का मार्ग छोड़ा न जाय तो मेरी हिम्मत कभी टूट नहीं सकती।

सवार : इसका क्या मतलब? ईमानदारी और धर्म की क्या बात है?

भूतनाथ : इसका मतलब यह है कि अगर मुकाबिले की लड़ाई की जाय, एक पर दो टूट न पड़ें। पैदल के मुकाबले में सवार न लड़ें और मामूली हर्वे के मुकाबले में तिलिस्मी हर्बा न बर्ताव जाय-तो मेरी हिम्मत कभी नहीं टूट सकती, यों तो आप तीनों सवारों के मुकाबले में मैं अभी से हार मानता हूँ, हर्बा छोड़े देता हूँ और आपका हुक्म मानने के लिए तैयार हूँ, परन्तु यदि आपको बहादुरी का घमंड है और मेरी बहादुरी भी देखना चाहते हैं तो उन दोनों सवारों को दूर खड़ा कीजिए, तिलिस्मी तलवार कमर में रखिए और घोड़े से नीचे उतर कर मुकाबिले में आइए।

सवार : बेशक् मैं ऐसा ही करूँगा।

इतने ही में वे दोनों सवार भी वहाँ आ पहुँचे। पहिले सवार ने उनसे अपनी खास भाषा में जिसे भूतनाथ समझ न सका कुछ कहा जिसे सुनते ही वह दोनों कुछ दूर हट कर खड़े हो गये और तब पहिला सवार तिलिस्मी तलवार कमर में रख कर घोड़े से नीचे उतर पड़ा और खंजर हाथ में लेकर भूतनाथ के सामने आया।

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भूतनाथ : हाँ, अब आप मेरे हौंसले को देख सकते हैं।

सवार : खैर वार करो, मैं जवाब देने के लिए तैयार हूँ।

भूतनाथ और सवार में लड़ाई होने लगी। यद्यपि वह सवार बहादुर और लड़ाका था परन्तु भूतनाथ ने भी उसका खूब ही मुकाबिला किया। पूरे घंटे-भर तक लड़ाई हुई मगर कोई किसी को परास्त न कर सका, दोनों बहादुर कुछ-कुछ जख्मी जरूर हुए मगर हताश न हुए।

लड़ते और पैंतरा बदलते हुए भूतनाथ ने कई चक्कर काटे और मौका देखता हुआ सवार के घोड़े के पास जा पहुँचा जो बिना बँधे हुए चुपचाप खड़ा अपने टापों से जमीन खोद रहा था। फुर्ती के साथ छलाँग मार कर भूतनाथ उस घोड़े पर सवार हो गया और एक तरफ से भाग निकला।

यह सवार जो भूतनाथ से लड़ रहा था पैदल होने के कारण भूतनाथ का पीछा न कर सका मगर उसके दोनों दोस्त नकाबपोश सवारों ने फौरन बड़ी तेजी के साथ भूतनाथ का पीछा किया।

वह घोड़ा बहुत ही उम्दा था जिस पर सवार होकर भूतनाथ भाग निकला था परन्तु इन दोनों नकाबपोशों के घोड़े भी उससे कम न थे इसलिए बराबर भूतनाथ का पीछा किये चले गये, यद्यपि उसे पास नहीं पहुँच सके परन्तु उसके और अपने बीच में फासला भी न बढ़ने दिया।

जब नकाबपोशों ने देखा कि भूतनाथ हम लोगों को अपने पास पहुँचने नहीं देता और सोचा कि अगर इसी तरह हम लोग पीछा किये चले जाएँगे तो तीनों घोड़े बेकार हो जाएँगे, और अपने साथी से भी (जो भूतनाथ से लड़ा था) बहुत दूर निकल जाएँगे, लौट कर पुन: उसके पास पहुँचना कठिन हो जायेगा, तब उन दोनों में से एक ने घाड़े की लगाम तो काठी के साथ अड़ा दी और तीर-कमान निकाल कर वार करने के लिए तैयार हो गया।

यह देख कर दूसरे नकाबपोश ने आवाज दी और कहा, “देखना मेघराज, गदाधरसिंह पर तीर मत चलाना।” इसके जवाब में मेघराज ने कहा, “नहीं, गदाधरसिंह को नहीं मारूँगा बल्कि घोड़े को कुछ जख्मी करूँगा, यद्यपि वह अपना ही घोड़ा है मगर लाचारी है!” इतना कह कर मेघराज ने तीर चलाया जो कि भूतनाथ के घोड़े के पिछले पैर में लगा और जख्मी हो जाने के कारण उसकी चाल भी धीमी पड़ गई।

कुछ ही मौका मिलना इन दोनों पीछा करने वालों के लिए काफी था। बात-की-बात में ये दोनों भूतनाथ के पास जा पहुंचे और उसको ललकारा। जब भूतनाथ ने देखा कि अब भागना व्यर्थ है और घोड़ा भी जिस पर वह सवार था बेकार हो गया और तब वह खड़ा हो गया और न-मालूम क्या-क्या सोचता हुआ उन दोनों सवारों की तरफ देखने लगा।

मेघराज : क्यों जी गदाधरसिंह, तुम तो अपने को बहादुर कहते थे और एक-पर-एक लड़ने के लिए ललकारते थे, इस तरह धोखा देकर भागने की क्या जरूरत थी?

भूतनाथ : जब मैंने देखा कि तुम तीनों आदमी नाहक मेरे पीछे पड़े हुए हो और इंसाफ पर कुछ भी ध्यान नहीं देते तब मुझे यही रास्ता अच्छा मालूम हुआ।

मेघराज : ईश्वर को धन्यवाद दो कि हम तीनों आदमी तुम्हारे दोस्त हैं, अगर इस समय हमारे बदले कोई तुम्हारा दुश्मन होता तो जान से तुम्हें मारे बिना न रहता।

भूतनाथ : (हँसकर) क्या अच्छे दोस्तों से सामना पड़ा है! यद्यपि मेरा दिल भी यही गवाही देता है कि आप लोग मेरे दुश्मनी नहीं हैं परन्तु उस दोस्ती की बलिहारी है कि नाहक मेरे बने-बनाये काम को आप लोगों ने बिगाड़ दिया और बहादुर भैया राजा के पुन: कुछ दिनों तक संकट में पड़े रहने का सामान कर दिया।

मेघराज : सो क्यों कर? कौन-सा तुम्हारा काम हम लोगों ने बिगाड़ दिया?

भूतनाथ : यही कि जैपालको मेरे कब्जे से बाहर कर दिया जिसकी बदौलत मैं आज ही किसी समय भैया राजा की स्त्री को दारोगा के पंजे से रिहाई दिलाने वाला था।

मेघराज : मगर हम लोगों को कैसे विश्वास हो सकता है कि जो कुछ तुम कह रहे हो वह सच है और तुम हम लोगों को धोखे में नहीं डाला चाहते।

भूतनाथ : अब आप लोगों को विश्वास हो, या न हो हमारा काम तो बिगड़ ही गया।

मेघराज : ऐसा तुम नहीं कह सकते, क्योंकि यद्यपि हमारे दोस्त ने जैपाल को तुम्हारे कब्जे से बाहर निकाल दिया मगर अपने कब्जे से बाहर नहीं निकाला।

भूतनाथ : (आश्चर्य और कुछ भरोसे के साथ) क्या वास्तव में जैपाल अभी आप लोगों के कब्जे में है?

मेघराज : बेशक्!

भूतनाथ : तब आप लोग अपना ठीक-ठीक परिचय मुझे क्यों नहीं देते कि मैं भी अपना खुलासा हाल आप लोगों से बयान करूँ? जैपाल का आपके कब्जे में बने रहना मेरे लिए खुशी की बात होगी यदि आप लोग वास्तव में मेरे विपक्षी न होंगे।

इतना सुनकर मेघराज के साथी ने भूतनाथ से कहा, “और कोई चाहे अपना परिचय तुम्हें दे या न दे परन्तु मैं अपना परिचय तुम्हें जरूर दूंगा। यद्यपि तुम बड़े बेमौके मुझसे रूठकर भाग गये और मेरे बने-बनाये काम में बाधा डाल कर तुमने मेरा मन मैला कर दिया तथापि मैं इसी समय अपना परिचय देता हूँ!”

इतना कह कर उस सवार ने जो वास्तव में भैया राजा थे, अपने चेहरे पर से तिलिस्मी झिल्ली उतार दी और भूतनाथ से कहा- “देखो और पहिचानो कि मैं कौन हूँ!”

भैया राजा का पहिचान कर भूतनाथ हँसा और झुककर सलाम करने के बाद बोला, “बस सिर्फ एक मौके पर रूठकर मेरे चले जाने से आपका दिल इतना बदल गया! अच्छा अब इसके पहिले कि मैं आपसे कोई मौके की बात कहूँ आप अपना निशान भी दीजिए, सिर्फ इस झिल्ली के उतर जाने से मेरा संतोष नहीं होता।”

भैया राजा : क्या अब मैं शंखध्वनि करूँ?

भूतनाथ : नहीं, कोई जरूरत नहीं, मुझे विश्वास हो गया। अब यह बताइए कि ये आपके साथी साहब कौन हैं?

भैया राजा : इन्हीं का परिचय न पाने से तुम रूठ गये थे, और इस समय भी तम इनका परिचय नहीं पा सकते।

भैया राजा की यह आखिरी बात सुनकर भूतनाथ बड़ा ही क्रोधित हुआ परन्तु अपने दिल के इस भाव को भी उसने खूब दबाया और कहा, “खैर इनका परिचय पाने की मुझे जरूरत भी नहीं, अब मैं इनके बारे में कभी कुछ न पूछूँगा, हाँ उन साहब के बारे में आप कुछ कहिएगा जिनसे लड़ता हुआ मैं भाग आया हूँ?”

भैया राजा : नहीं, उनके बारे में भी मैं कुछ नहीं कह सकता जब तक कि वे खुद अपना परिचय देने के लिए तैयार न हो जाएँ।

भूतनाथ : खैर उन्हें भी जाने दीजिए और यह बताइए कि मेरे साथ अब आप कैसा सलूक किया चाहते हैं?

भैया राजा : इसका जवाब देना तब तक मुश्किल है जब तक तुम्हारी नीयत का ठीक-ठीक हाल न मालूम हो जाय। सच तो यह है कि मैं अभी तक तुम पर भरोसा करता हूँ और तुम्हारी कसमों पर विश्वास रखता हूँ मगर तुम्हारी करतूतों को देखकर मुझे लोगों के सामने शर्मिन्दा होना पड़ता है। लोग यही कहते हैं कि ‘तुम्हारा गदाधरसिंह पर भरोसा करना परले सिरे की बेवकूफी है, तुम उसके हाथ से जरूर सताए जाओगे और धोखा उठाओगे।”

भूतनाथ : बेशक् लोग आपसे ऐसा कहते हों और मैं अपने ऊपर ध्यान देता हूँ तो यही निश्चय होता है कि जो कुछ मैं कर रहा हूँ वह मेरी नादानी और बेवकूफी है। बैठे-बैठाए नाहक जी तोड़ कर मेहनत करना और उसके बदले में बदनामी उठाना बस इसके सिवाय और कुछ भी नहीं होता।

मेरे सिर पर जो पाप का टोकरा लदा हुआ है उसका बोझ दिनों-दिन बढ़ता ही जाता है। दोस्तों के दिल में मैल बैठती जाती है और दुश्मनों की गिनती तरक्की कर रही है।

जिसके साथ नेकी करो वही बदी करने के लिए तैयार हो जाता है, जिसकी खिदमत करो वही नालायक बनाता है और जिसका साथ करो वही घृणा करता है। ऐसी अवस्था में मैं यह नहीं समझता कि मेरे लिए अब क्या कर्तव्य है।

यदि मैं सब झंझटों को छोड़कर अपने घर बैठता हूँ तो लोग आराम से बैठने भी नहीं देते। इसके अतिरिक्त पेशा ऐयारी का भी ऐसा खराब है कि बिना मालिक का या अपना काम किए चुपचाप बैठ ही नहीं सकता और जब काम करने के लिए निकलूँगा तो किसी से दोस्ती और किसी से दुश्मनी जरूर ही पैदा होगी।

अस्तु क्यों कर कह सकता हूँ कि मेरी जिंदगी किसी तरह आराम से बीत सकती है। आप ही देखिए कि आपके लिए मैं कितनी मेहनत कर रहा हूँ और मेहनत का अच्छा फल भी पा चुका हूँ मगर इस समय आप ही को मेरी बातों पर विश्वास नहीं होता और मेरी सच्चाई का आप सबूत खोजते हैं जिसका मुझे बड़ा ही दु:ख है।

मैं खूब समझता हूँ कि जिस तरह आप मेरी बातों पर विश्वास नहीं करते उसी तरह मेरी कसमों पर भी विश्वास न करेंगे परन्तु कोई चिंता नहीं, मैं बहुत अच्छा सबूत देकर आपको अपनी बातों पर विश्वास दिलाऊँगा और फिर इसके बाद ही से दुनिया कि सब मामलों से हाथ धो बैठूँगा। आज से आप गदाधरसिंह को किसी काम में हाथ डालते न देखेंगे। अच्छा आप लोग घोड़ों के नीचे उतरें और मैं जो कुछ अपनी सफाई का सबूत दिखाता हूँ उसे देखें।

भैया राजा : (मुस्कुराते हुए) इस समय तो तुम बड़े ज्ञानी मालूम पड़ते हो! ईश्वर करे तुम्हारा यह ज्ञान बराबर बना रहे और तुम्हारे सिर पाप का बोझ बढ़ने न पावे। अगर इस समय तुमने कोई वाजिब सबूत देकर अपने को सच्चा साबित कर दिया तो बेशक् मैं तुमको अपना दोस्त मानूँगा और तुम्हारी तरफ से जो कुछ मैल मेरे दिल में बैठ गई उसे साफ कर दूंगा।

इतना कहकर भैया राजा घोड़े से नीचे उतर पड़े। भूतनाथ और मेघराज भी घोड़े से नीचे उतरे और तीनों आदमी घोड़ों का उचित प्रबंध करने के बाद एक साएदार पेड़ के नीचे बैठ कर पुन: बातचीत करने लगे।

भूतनाथ : बेशक् मैं अपनी सच्चाई के लिए जो कुछ सबूत दूँगा उसे आप किसी तरह भी रद्द न कर सकेंगे। आप लोगों के खयाल से मैं दारोगा का दोस्त बना हूँ, यह सही है मगर मेरे दिए सबूत को देखकर आपका यह खयाल भी बदल जाएगा और आपको विश्वास भी हो जाएगा कि जो कुछ मैं कर रहा हूँ वह केवल आपकी स्त्री को उस दुष्ट के पंजे से छुड़ाने के लिए, बस अब मेरे लिए इस दुनिया में इतना ही काम बाकी है। फिर मैं किसी का मुँह न देखूँगा और न मेरा ही मुँह कोई देख सकेगा।

सबूत ढूँढ़ने के लिए भी मुझे कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं है, सब इसी जगह मेरे बटुए के अन्दर मौजूद है।

इतना कहकर भूतनाथ अपने ऐयारी के बटुए को खोल कर उसकी हर एक चीज देखने, जाँचने और इधर-उधर करने लगा, साथ-ही-साथ बात भी करता जाता था।

भूतनाथ : सबसे पहिले मुझे इस बात का बंदोबस्त करना है कि आपका शक दूर करने के बाद फिर मुझे कोई काम न करना पड़े। (अपने बटुए में से कोई दवा निकाल कर और अपने मुँह में रखकर) मेरे और दारोगा के बीच जो एकरारनामा हुआ है वह इसी बटुए में मौजूद है।

जैपाल ने आपकी स्त्री का पता जिस चिट्ठी में लिखकर मेरे पास भेजा था वह भी इस बटुए के अन्दर है और उस अजायबघर में जिसमें आपकी स्त्री कैद कर मुझे किस तरह पहुँचकर उसे छुड़ाना चाहिए यह भी एक कागज पर लिखा हुआ इसी बटुए में रखा है जिसे आप स्वयं निकाल कर देख सकते हैं।

इतना कहते हुए भूतनाथ ने दवा की एक शीशी जिसमें किसी तरह का अर्क भरा हुआ था जो उसी बटुए में थी, खोल कर उसकी दवा उसी बटुए के अन्दर लुढ़का दी और इसके बाद एक चिट्ठी निकालकर भैया राजा के हाथ में देते हुए कहा “लीजिए, इस चिट्ठी को पढ़िए, आप तो दारोगा के अक्षर अच्छी तरह पहिचानते हैं, देखिए उसी के हाथ का लिखा हुआ है या नहीं?”

भैया राजा : (चिट्ठी देखकर) बेशक् यह उसी कम्बख्त के हाथ का लिखा हुआ

इतना कह कर भैया राजा ने वह चिट्ठी पढ़ी, यह लिखा हुआ था-

“मेरे प्यारे गदाधरसिंह,

देखो, मैं तुम्हारी बात नहीं टालता, मगर तुम्हें भी हमारी इज्जत का खयाल रखना चाहिए! परसों शाम को तुम मुझसे मिलो, मैं भैया राजा की स्त्री को तुम्हारे हवाले कर दूंगा, मगर खूब होशियार! शिकार खराब न जाय।

वही-दा”

भैया राजा : यह चिट्ठी तुम्हें कब मिली थी?

भूतनाथ : परसों।

भैया राजा : तो आज तुम उसे लेने के लिए दारोगा के पास जाओगे?

भूतनाथ : हाँ, मैं जरूर जाने वाला था।

भैया राजा : तो अब क्या हुआ?

भूतनाथ : अब तो जो होना था हो गया। आपने देखा नहीं कि मैंने इस बटुए में से एक दवा निकाल कर खा ली है। वह जहर कातिल है जो कि मेरा प्राण लिये बिना कभी न रहेगा।

एक दवा और इसी बटुए में थी जिससे उस जहर का असर दूर हो सकता था, मैंने वह दवा इसी बटुए में उँडेल कर बर्बाद कर दी, इस खयाल से कि कहीं आप लोग जहर उतारने के लिए मुझे जबर्दस्ती कर दी, इस खयाल से कि कहीं आप लोग जहर उतारने के लिए मुझे जर्बदस्ती वह दवा पिला न दें क्योंकि मैं अब इस दुनिया में रहना नहीं चाहता।

(बटुए में से खाली शीशी निकाल और भैया राजा को दिखाकर) देखिए यह शीशी खाली हो गई। इस पर लिखा हुआ है, “यह दवा सब तरह के जहरों को दूर करती है।” अब यह दवा भी इस दुनिया से उठ गई, सिर्फ इसकी गमक थोड़ी देर के लिए रहेगी। इसी बटुए में और भी कई चिट्ठियाँ हैं।

भैया राजा : (बात काट कर) भला यह दवा तुमने बटुए के अन्दर क्यों उँडेल दी?

भूतनाथ : अगर मैं बाहर फेंकता तो शायद आप लोग मेरा हाथ पकड़ लेते और शीशी में कुछ दवा बची रहती तो ताज्जुब नहीं कि आप लोग मुझे बचा लेते। जो हो अब मैं जीते रहना नहीं चाहता…

भैया राजा : गदाधरसिंह, यह तुमने बहुत बुरा किया कि…

भूतनाथ : खैर बुरा तो जो कुछ होना था हो गया। (भयानक चेहरा बना कर) ओफ! अब मुझे तकलीफ हो रही है। मेरी थोड़ी बातें और सुन लीजिए, शायद थोड़ी देर बाद मैं कुछ भी न बोल सकूँ । मेरे इस बटुए में बहुत-सी चिट्ठियाँ हैं जो दारोगा और जैपाल के हाथ की लिखी हुई हैं।

कोई खुली हैं, कोई डिबिया में है, कोई कपड़े में बँधी हुई है, जिनके देखने से आपको मालूम हो जाएगा कि मैंने दारोगा के साथ मकर आपका नुकसान किया था या…ओफ! अब मेरा हाथ नहीं चलता, आप लोग स्वयं इस बटुए में…आह !

इतना कहकर भूतनाथ चुप हो गया और सर पर हाथ रख कर आँखें बंद कर ली परन्तु यह अवस्था भी उसकी ज्यादा देर तक न रही और कुछ ही देर में वह जमीन पर लेट कर लंबी साँसे लेने लगा।

मेघराज (जो वास्तव में दयाराम थे) और भैया राजा को उसकी इस अवस्था पर बहुत दु:ख हुआ और दोनों आदमी इस खयाल से उनके बटुए की तलाशी लेने लगे कि शायद कोई चीज ऐसी निकल आए जिससे गदाधरसिंह की हालत कुछ सुधर जाय। थोड़ी देर बाद उन्होंने गौर किया तो मालूम हुआ कि गदाधरसिंह बिलकुल ही बेहोश है, ताज्जुब नहीं कि थोड़ी ही देर में उसका दम निकल जाय।

यह सब कुछ तो हुआ मगर मेघराज और भैया राजा की अवस्था भी अच्छी न रही। भूतनाथ ने जो दवा बटुए के अन्दर उँडेल दी थी उसकी तेज महक ने इन दोनों का दिमाग फिरा दिया और भूतनाथ के बटुए की तलाश लेते-लेते ये दोनों भी बेहोश होकर जमीन पर लेट गये। उस समय भूतनाथ मुसकुराता हुआ उठ बैठा और खड़े होकर मूँछों पर ताव देता हुआ बोला, “वह मारा! कैसा छकाया है बच्चा जी को, अपने को बड़ा होशियार मानते थे।”

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