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Abhishap by rajvansh Best Hindi Novel | Grehlakshmi
Abhishap by rajvansh

सुबह का समय था।

आनंद नीचे झुका सूटकेस में अपने कपड़े भर रहा था और मनु दर्पण के सामने खड़ी अपने बाल संवार रही थी।

दोनों के बीच ऐसा मौन था जिसके टूटने की संभावना ही न थी। किन्तु फिर भी मौन टूट गया। मनु ने उसी मुद्रा में आनंद से पूछा- ‘जा रहे हो?’

‘हां।’ आनंद ने उत्तर दिया।

‘हमेशा के लिए?’

‘शायद।’

‘जाना आवश्यक तो नहीं।’

‘आवश्यक है।’

‘पापा से न मिलोगे।’

‘लाभ ही क्या है?’

‘लोग क्या कहेंगे?’

‘कुछ भी नहीं। वैसे भी आज के युग में संबंधों का बनना और फिर टूट जाना एक साधारण-सी घटना के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं।’

‘तुम चाहते हो यह संबंध टूट जाए?’

‘इंसान के चाहने मात्र से कुछ नहीं होता। मैंने तो न जाने क्या-क्या चाहा था। यह कि मैं तुम्हें जीवनभर यूं ही चाहूंगा। यह कि मेरी एक छोटी-सी दुनिया होगी। उस दुनिया में मैं रहूंगा, मनु रहेगी और हमारे बच्चे रहेंगे-लेकिन।’ आनंद ने निःश्वास ली और बोला- ‘लेकिन हुआ क्या? कहानी आरंभ होते ही समाप्त हो गई। दुनिया बसने से पहले ही उजड़ गई। राख हो गया सब कुछ जलकर। मेरी आशा, मेरा विश्वास और मेरे सपने-सब कुछ चूर-चूर हो गया। न जाने किसकी नजर लगी मेरी तकदीर को कि एक भाग्यशाली इंसान हमेशा के लिए अभागा बनकर रह गया। एक दार्शनिक-जिसकी दृष्टि में जीवन एक दर्शन के अतिरिक्त और कुछ न था-आज अपने ही दर्शन में उलझकर रह गया। न जाने कैसे हो गया यह सब-कैसे हो गया?’ कहते-कहते आनंद की आवाज रुंध गई और आंखों में आंसुओं की बूंदें झिलमिला उठीं।

मनु उससे बोली- ‘क्या तुम-तुम अपना निर्णय नहीं बदल सकते?’

‘निर्णय अपना स्वयं का होता तो बदल भी डालता।’ उंगलियों से आंसू पोंछकर आनंद बोला- ‘किसी दूसरे के निर्णय को किस प्रकार बदलूं? किस मुंह से कहूं कि तुम्हारा निर्णय ठीक नहीं?’

मनु दर्पण के सामने से हटकर आनंद के समीप आ गई और बोली- ‘हां-निर्णय तो मेरा उचित नहीं-किन्तु विवशता यह है कि…।’

‘मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं मनु! मैं यह भी नहीं कहता कि तुम्हारा निर्णय उचित नहीं, किन्तु मैं इतना अवश्य कहूंगा कि तुम्हें यों मेरे जीवन में आग लगाने का कोई अधिकार न था। मैंने तो तुमसे कभी नहीं कहा था कि तुम मुझे चाहो-कभी नहीं कहा था कि मुझसे विवाह करो। यह निर्णय तो तुम्हारे ही थे। मैं तो केवल तुम्हारे वादों पर विश्वास कर बैठा था। सिर्फ विश्वास ही नहीं किया-चाहने लगा तुम्हें-पागलों की भांति। और आज-आज तुमने मेरी चाहत को कच्चे धागे की भांति तोड़ दिया। यों मुख मोड़ लिया मेरी ओर से-मानो तुम्हारा-मेरा कोई रिश्ता ही न था। मानो न तुमने मुझे चाहा था और न ही मैंने तुम्हें। अग्नि के इर्द-गिर्द किए फेरे और फेरों के समय दिए गए वचन। सब कुछ भुला दिया तुमने। आखिर क्यों-किसलिए? ऐसी कौन-सी कमी थी मेरे अंदर-ऐसा कौन-सा अपराध किया था मैंने, जिसकी सजा तुम मुझे तलाक के रूप में दे रही हो? बताओ मनु! बताओ।’

मनु ने उसके प्रश्नों से घबराकर चेहरा घुमा लिया और बोली- ‘आनंद! मैंने तुमसे पहले ही कहा था कि मेरे पास तुम्हारे किसी भी प्रश्न का उत्तर नहीं है। मैं सोचती हूं-शायद मैंने तुमसे प्यार ही नहीं किया था। मेरा तुम्हें चाहना-तुमसे मिलना और तुमसे विवाह करना-एक नाटक था शायद। और यह तुम भी जानते हो आनंद! कि नाटक का एक समय निर्धारित होता है। कुछ घंटे-कुछ माह अथवा कुछ वर्ष। समय पूरा हो गया तो नाटक भी खत्म हो गया है। मेरी विवशता यह रही कि मैं नाटक के समय को आगे न बढ़ा सकी और एक दिन मुझे पर्दा गिराना ही पड़ा।’

मनु यह सब बिना रुके ही कह गई।

आनंद तड़पकर रह गया। मानो-मनु ने यह सब कहकर उसके कानों में पिघला हुआ सीसा उड़ेल दिया हो। इस पीड़ा से उसका रोम-रोम चीख उठा।

‘वैसे’ मनु फिर बोली- ‘तुम चाहो तो इस नाटक को और भी आगे बढ़ा सकते हो।’

‘बस करो मनु! बस करो।’ आनंद इस बार घृणा से चीख पड़ा- ‘मत कहो मुझसे कि जो कुछ हुआ-वह एक नाटक था। और यदि यह नाटक भी था तो इसकी सूत्रधार तुम थीं। तुम! तुमने रचाया था यह नाटक। मैंने तो सिर्फ प्यार किया था तुमसे। वह प्यार-जिसे इस संसार की सबसे कोमल, सबसे अधिक मूल्यवान और सबसे पवित्र अनुभूति कहा जाता है। बस प्यार-जिसे संसार भर की दौलत देकर भी नहीं पाया जाता। वह प्यार, जिसकी एक बूंद को पाने के लिए लोग अपने रक्त की अंतिम बूंद तक कुर्बान कर देते हैं। वह प्यार नाटक नहीं बन सकता मनु! और कभी मिटता भी नहीं है।’

मनु ने बेचैनी से होंठ काट लिए।

‘और।’ आनंद कहता रहा- ‘यह भी याद रखना मनु! कि मेरा वह प्यार कभी मिटेगा नहीं। मेरा यह प्यार तब तक रहेगा-जब तक यह धरती है-यह आकाश है और इन दोनों के बीच मेरा अस्तित्व है। मैं तुम्हें कल भी उतना ही चाहूंगा-जितना आज चाहता हूं। कभी मेरी चाहत को समझ सको तो अपना यह फैसला बदल देना और चली आना! मैं हर पल तुम्हारी राहों में पलकें बिछाए रहूंगा। जीवन की अंतिम सांस तक प्रतीक्षा करूंगा तुम्हारी।’ इतना कहकर आनंद ने अपनी आंखों के कोने साफ किए-सूटकेस उठाया-एक बार दयनीय दृष्टि से मौन खड़ी मनु को देखा और इसके पश्चात् वह थके-थके कदमों से बाहर चला गया।

abhishap

मनु निढ़ाल-सी बिस्तर पर गिर पड़ी।

निखिल ने बोतल उठाई और पूरी ताकत से दीवार पर दे मारी। बोतल दीवार से टकराते ही टुकड़े-टुकड़े हो गई। कमरे में कांच फैल गया और इसके उपरांत वह जैसे पागल हो उठा।

पागलपन में वह चिल्लाया- ‘बोल निखिल-बोल! क्या मिला है तुझे इस दौलत से? कौन-सी खुशी मिल गई तुझे? तेरा घर तेरे लिए पराया हो गया-जो अपने थे-वो बगाने हो गए। ठोकर मार दी सबने तुझे। यहां तक कि तेरे छोटे भाई ने तुझे अपमानित किया। यहां तक कि एक दो टके की छोकरी भी तेरे गाल पर थप्पड़ मार गई। सिर्फ थप्पड़ ही नहीं मारा उसने-बहू बन गई तेरे घर की। रोक भी न सका तू उसे। किसी से कह भी न सका कि शिल्पा एक बाजारू लड़की है। कैसे कहता-उस लड़की के साथ तू भी तो जुड़ा था। यदि तू उसके संबंध में कुछ कहता तो क्या तू बेदाग रह जाता? तेरे माथे पर चरित्रहीनता का दाग न लगता? कितना मजबूर हो गया तू-कितना बेबस। करोड़ों की दौलत रहते भी तू शिल्पा को अपने घर की बहू बनने से न रोक सका। और-और वह लड़की मनु जो तेरा पहला प्यार थी-वह भी पराई हो गई-सदा के लिए पराई हो गई।’ कहते-कहते सिसक पड़ा निखिल।

तभी कोई कमरे में आया और उसने बोला- ‘पहला प्यार कभी पराया नहीं होता निखिल! वह तो जन्म-जन्मांतर तक हृदय में बसा रहता है। अतः यह मत कहो कि मनु पराई हो गई है।’

निखिल ने पलकें झपकाकर देखा।

यह मनु थी-उसकी मनु। वह कुछ क्षणों तक तो मनु को आंखें फाड़-फाड़कर देखता रहा और फिर न जाने क्या हुआ कि वह उसके हृदय से लगकर किसी अबोध बच्चे की भांति रो पड़ा।

मनु उसके यों रोने का कारण न जान सकी और बोली- ‘क्या हुआ निक्की! तुम रो क्यों रहे हो? क्या तुम्हें विश्वास नहीं होता कि मनु आज भी तुम्हारी है? क्या-क्या तुम मुझे पराई समझते हो निक्की?’

निखिल फिर भी रोता रहा।

मनु ने उसका चेहरा हथेलियों में ले लिया और बोली- ‘निक्की! निक्की तुम कुछ बताते क्यों नहीं?’

‘मत पूछो मनु! मत पूछो।’ रोते-रोते निखिल बोला- ‘बस यूं ही रोने दो मुझे। यूं ही बहने दो मेरे आंसुओं को। बहुत शांति मिल रही है मुझे। तुमसे लिपटकर रोते हुए यों लगता है-मानो जीवन में कोई भी पीड़ा न हो। कोई भी छटपटाहट न रही हो। मुझे-मुझे यूं ही अपने हृदय से लगाए रहो मनु! मेरी अच्छी मनु।’

‘पर-यह तो पता चले कि तुम रो क्यों रहे हो?’

निखिल उससे रोने का कारण बताना न चाहता था। उसे कोई अन्य बहाना भी न सूझ सका। अंततः उसने अपने आंसू पी लिए और सोफे पर बैठ गया। मनु उसके निकट ही बैठ गई और उसके बालों में स्नेह से उंगलियां फिराते हुए बोली- ‘निक्की!’

‘सॉरी मनु! मैं न जाने किन भावनाओं में बह गया था। न जाने कौन याद आ गया था मुझे कि रो पड़ा।’

‘मैं जानती हूं। तुम्हें बीता हुआ वक्त याद आया होगा।’

‘हां-हां मनु!’ निखिल ने झूठ कहा- ‘मुझे वास्तव में गुजरा हुआ जमाना याद आ गया था। वह-वह दिन कितने रुपहले थे मनु! जब हम हाथों में हाथ दिए घंटों रोशनी बाग में घूमते थे।’

‘हां निक्की!’

‘तुम्हें वह दिन तो याद होगा-जब एक सूखे हुए फूल को शाख से हटाते हुए तुम्हारी उंगली में कांटा चुभ गया था?’

मनु ने जैसे स्वप्नलोक में विचरते हुए कहा- ‘हां-हां निक्की! मेरी उंगली में कांटा चुभ गया था। बहते हुए खून को देखकर तुम घबरा गए थे और तुमने मेरी उंगली को अपने होंठों में दबा लिया था। तुम्हारे गर्म होंठों का स्पर्श पाते ही मेरी पीड़ा मिट गई थी।’

‘और वह दिन-हम सागर सरोवर पर घूमने गए थे।’

‘बहुत जोरों का तूफान आया था। ऐसा तूफान कि वृक्ष उखड़-उखड़कर गिरने लगे थे। घबरा गई थी मैं तो। चारों ओर काली धुंध-कुछ भी तो दिखाई न दिया था। तब तुमने मुझे देर तक अपने सीने से लगाए रखा था। है न निक्की?’ मनु ने कहा और अपना सर निखिल के कंधे पर रख दिया।

निखिल बेचैनी से बोला- ‘बस! अब बस करो मनु! मत याद करो उन दिनों को। याद करते ही हृदय में पीड़ाओं का तूफान उठता है।’ कहकर उसने निःश्वास ली ओर बोला- ‘कितने सपने सजाए थे मैंने उस समय। कितनी कल्पनाएं की थीं भविष्य की। किन्तु हुआ क्या? सपने जलकर राख हो गए। कल्पनाएं रेत के टीले की भांति बिखर गईं। रह गया दर्द-सिर्फ दर्द।’

‘ऐसा न कहो निक्की! मत कहो ऐसा। क्योंकि तुम्हारे सपने आज भी जीवित हैं। तुम्हारी कल्पनाओं का महल आज भी वैसी ही स्थिति में खड़ा है।’

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‘क्या मतलब?’

‘मतलब यह कि मनु अब सिर्फ तुम्हारी है। सिर्फ तुम्हारी।’

निखिल ने चौंककर पूछा- ‘और-आनंद?’

‘मैंने उससे हमेशा के लिए संबंध तोड़ लिए हैं। आनंद अपने घर चला गया है।’

निखिल को यह सुनकर प्रसन्नता हुई। मनु को अपनी ओर खींचकर वह बोला- ‘किन्तु-यह सब हुआ कैसे?’

‘हम दोनों की हठ के कारण।’

‘तुम्हारी क्या हठ थी?’

‘यह कि मैं तुमसे हमेशा मिलती रहूंगी।’

‘आनंद क्या चाहता था?’

‘आनंद को तुम्हारे नाम से भी घृणा थी। मैंने उससे कहा था कि वह इस घृणा को अपने हृदय से निकाल दे। किन्तु जब ऐसा न हुआ तो वह अपना सामान उठाकर भाई के पास चला गया।’

‘खैर-अब क्या इरादा है?’

‘मैं उससे तलाक ले रही हूं। मैं इस संबंध में एक वकील से भी बातें कर चुकी हूं। तुम क्या सोचने लगे?’

‘क…कुछ नहीं मनु!’ निखिल ने मनु को बांहों में भर लिया और उसे चूमकर बोला- ‘यह तुमने अच्छा किया-बहुत अच्छा किया। आज मुझे अपने जीवन की तमाम खुशियां मिल गईं।’

‘और-मुझे भी निक्की!’ इतना कहकर मनु ने अपनी आंखें मूंद लीं।’

निखिल उसके बालों से खेलता रहा।

अभिशाप-भाग-17 दिनांक 07 Mar. 2022 समय 04:00 बजे साम प्रकाशित होगा

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