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Abhishap by rajvansh Best Hindi Novel | Grehlakshmi
Abhishap by rajvansh

हाथ में सूटकेस, आंखों में घोर निराशा और हृदय में पीड़ाओं का तूफान लिए आनंद जब घर पहुंचा तो उस समय उसका भाई अशोक, अपनी पत्नी सुनीता एवं बच्चों के साथ बैठा दोपहर का खाना खा रहा था।

आनंद को देखकर वह बोला- ‘शुक्र है आनंद! आज तुम्हें हम लोगों की याद तो आई। अन्यथा मैं तो सोच बैठा था कि तुम हमें बिलकुल ही भूल चुके हो।’

आनंद मौन बैठा रहा।

सुनीता बोली- ‘तुम भी कैसी बातें करते हो अशोक! इतनी खूबसूरत पत्नी और धनवान ससुराल पाकर भी कोई किसी को याद करता है? और फिर-यह तो तुम जानते ही हो कि आनंद ने हमें आरंभ से ही पराया समझा है।’

‘अब यह सब छोड़ो और आनंद के लिए खाना ले आओ।’

‘नहीं भैया!’ आनंद बोला- ‘मुझे भूख नहीं। मैं खाना खा चुका हूं।’

‘सेठजी कैसे हैं?’ अशोक ने उससे पूछा।

‘अच्छे हैं।’

‘मनु को क्यों नहीं लाए?’ जब से गई है-एक बार भी नहीं आई।’ मनु के नाम पर आनंद के हृदय में नश्तर-सा उतर गया।

अशोक ने फिर कहा- ‘देखो आनंद! सामाजिक दृष्टि से यह ठीक नहीं। मनु को यह तो सोचना चाहिए था कि उसकी वास्तविक ससुराल यही है। दुलहन तो वह इसी घर की कही जाएगी। यह ठीक है कि हम लोग उसके पिता की तरह अमीर नहीं। हम उसे कुछ दे नहीं सकते। किन्तु अपनापन और स्नेह तो दे ही सकते हैं। क्या उसे हमारे स्नेह की भी आवश्यकता न थी?’

सुनीता बोली- ‘आवश्यकता होती तो क्या यहां आती नहीं? यदि वह हमें अपना समझती तो क्या वह हमारी कुशलक्षेम न पूछती? मैं तो सोचती हूं कि इसमें मनु का नहीं, आनंद का ही दोष है। आनंद ने ही न चाहा होगा कि वह यहां आए।’

‘भैया!’ अशोक एवं सुनीता के प्रश्नों से घबराकर आनंद उठा और बोला- ‘मैं दिवाकर के पास जा रहा हूं। काफी समय हो गया उससे मिले हुए।’

‘एक मिनट।’

आनंद रुक गया।

अशोक खाना समाप्त कर चुका था। उठकर वह आनंद के समीप आया और उसे ध्यान से देखते हुए बोला- ‘आनंद!’

‘कहिए भैया!’

‘तुम मुझे कुछ परेशान से लग रहे हो। क्या बात है-किसी से झगड़ा हुआ क्या?’

‘न-नहीं तो।’ आनंद ने कांपती आवाज में कहा और शीघ्रता से चेहरा घुमा लिया।

‘नहीं आनंद! मैं तुम्हारी बात पर यकीन नहीं करता। हालांकि मैं मुखाकृति एवं मनोविश्लेषक नहीं, किन्तु मैं पूरे दावे के साथ कह सकता हूं कि आज तुम्हारे साथ कोई अनहोनी घट गई है। तुम्हारे साथ कुछ-न-कुछ बुरा अवश्य हुआ है।’

आनंद इस बार अपने आंसू न रोक सका।

अशोक ने उसके आंसुओं को देखा तो बोला- ‘झगड़ा हुआ न मनु से? यह भी हो सकता है कि गोपीनाथ ने तुम्हारा अपमान किया हो। ससुराल में रहने का परिणाम यही होता है।’

‘म-मुझे माफ कर दीजिए भैया!’ आनंद मानो फूट पड़ा और सिसकते हुए बोला- ‘मैंने आपकी इच्छाओं के विरुद्ध मनु से विवाह किया और…।’

‘संबंध टूट गए क्यों? भूत उतर गया प्यार का?’

‘भैया!’

‘और अब रोता है-मर्द होकर रोता है। आंसू बहा रहा है एक औरत के लिए। लाज नहीं आती? दर्शन शास्त्र का प्रोफेसर होते हुए भी तू छला गया। भरोसा कर बैठा उन लोगों पर। कितने अरमानों से तूने मनु को अपनी दुलहन बनाया था। कहता था-मनु मेरे जीवन की सबसे बड़ी खुशी है। और आज उस खुशी ने तुझे दिए ये आंसू, यह अपमान, यह पीड़ाएं।’ क्रोध एवं घृणा से अशोक कहता रहा- ‘मूर्ख! तेरे स्थान पर कोई दूसरा होता तो चुल्लू भर पानी में डूबकर मर जाता! और तू मेरे पास चला आया-यह बताने के लिए कि मनु और गोपीनाथ ने तुझे ठोकर मार दी। अपमानित करके निकाल दिया घर से। वाह रे मर्द! वाह रे प्रेम पुजारी!’

आनंद सिसकता रहा।

तभी सुनीता ने अशोक को बांह पकड़कर पीछे खींच लिया और बोली- ‘अब बस भी करो अशोक! आनंद पहले ही इतना दुखी है और तुम यह सब कहकर उसका दुःख और बढ़ा रहे हो।’

‘सुनीता!’ अशोक की आंखों से घृणा की चिंगारियां छूट रही थीं।’

‘खैर वैसे भी।’ सुनीता कहती रही- ‘आनंद यह तो नहीं जानता था कि भविष्य में उसके साथ ऐसा होगा। मनु सुंदर थी, सुशील भी लगती थी और सबसे बड़ी बात यह है कि वह आनंद को चाहती भी थी। ऐसे में आनंद उस पर भरोसा कर बैठा तो क्या हुआ?’

‘सुनीता! मैं जानता था-एक दिन यही होगा। मैंने इससे कहा भी था कि रिश्तेदारी और दोस्ती बराबर वालों से ही ठीक रहती है। मगर इसके मन-मस्तिष्क पर तो गोपीनाथ की लाखों की संपत्ति छाई थी। मनु की खूबसूरती ने इसे पागल बना दिया था।’

‘बात खत्म करो।’

‘बात तो अब आरंभ हुई है सुनीता! तुम्हें पता नहीं कि इस बात का अंत क्या होगा।’

‘क्या होगा?’

‘देवदास बन जाएगा यह मनु के लिए। पागलों की तरह मारा-मारा फिरेगा सड़कों पर। नौकरी छोड़ देगा और मजनूं की तरह दिन-रात मनु-मनु चिल्लाएगा।’

आनंद अपनी सिसकियां पीने लगा।

सुनीता उसकी ओर देखकर अशोक से बोली- ‘आनंद इतना मूर्ख नहीं।’

‘सुनीता! प्यार का यह भूत तो अच्छे-अच्छों को मूर्ख बना देता है। क्या तुम किसी पागलखाने में गई हो?’

‘म-मैं भला–?’

‘देखना किसी पागलखाने को, मिलना उन लोगों से जो वहां रहते हैं। तुम्हें पता चलेगा कि उस पागलखाने में अधिकांश संख्या उन लोगों की होती है जो किसी-न-किसी रूप में औरत की बेवफाई का शिकार होते हैं। जो चोट खा चुके हैं प्यार में। मुझे भय है कि कहीं दर्शन शास्त्र का ये प्रोफेसर भी पागल न हो जाए।’

इतना कहकर अशोक बैठ गया।

आनंद ने अपने आंसू पोंछ लिए। इसके उपरांत उसने अपना सूटकेस उठाया और चल पड़ा।

सुनीता उसे रोककर बोली- ‘कहां जा रहे हो आनंद?’

‘मैं जा रहा हूं भाभी!’ आनंद रुककर धीरे से बोला।

‘मगर कहा?’

‘किसी ऐसे स्थान पर जहां चैन मिले।’

‘देखो आनंद! हिम्मत से काम लो और यह पागलपन छोड़ दो। तुम्हारे लिए लड़कियों की कमी नहीं।’

‘मुझे लड़कियों की आवश्यकता नहीं भाभी!’

अशोक ने फिर व्यंग्य किया- ‘सुनीता! यह ठीक कह रहा है, इसे तो सिर्फ अपनी मनु की आवश्यकता है। अब यह शहर से दूर किसी एकांत स्थान पर माला लेकर बैठेगा और मनु के नाम का जाप करेगा। मुझे लगता है-जाप के पश्चात् इसे शांति जरूर मिल जाएगी। करने दो इसे जो कुछ करता है। बनने दो संन्यासी। हमारे वंश में वैसे भी आज तक कोई संन्यासी नहीं हुआ। इसके संन्यासी बनने से हमें भी मोक्ष मिल जाएगा।’

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‘तुम चुप नहीं रह सकते क्या?’

‘ठीक है-हो गया चुप।’ अशोक ने कहा और इसके पश्चात् एक पुस्तक उठाकर वह उसके पृष्ठ उलटने लगा।

अशोक के शब्द आनंद के हृदय में सैकड़ों नश्तरों की भांति उतर गए थे। पीड़ा से उसका रोम-रोम चीख उठा था, किन्तु उसने कुछ न कहा और तेजी से बाहर चला गया।

सुनीता ने उसे पुकारा- ‘आनंद! आनंद मेरी बात सुनो।’

किन्तु आनंद ने कुछ न सुना।

बारात सजी, शिल्पा दुलहन बनी और पिया के घर आ गई। राजाराम का घर खुशियों से महक उठा, किन्तु यह महक राजाराम के हृदय तक न पहुंच सकी। एक कांटा था-जो उसके हृदय में बार-बार चुभ रहा था। एक कमी थी जो उन्हें बुरी तरह से पीड़ित कर रही थी।

और-यह कमी थी निखिल की। निखिल जो उसका बड़ा बेटा था। शादी में निकट एवं दूर के सभी मेहमान आए थे। घर में तिल रखने को भी जगह न रही थी, सिर्फ आया न था तो उसका बड़ा बेटा। बुलाया ही नहीं गया था। उसे बुलाया जाता तो अवश्य आता, राजाराम इस बात को जानता था। एक बाद दिल में आया भी था, जाकर ले आए उसे। पिता तो पिता ही होता है-हृदय रहते ममता से छुटकारा कहां? किन्तु उसकी अपनी हठ, उसका अपना स्वाभिमान-नहीं झुका राजाराम। पीड़ा को मुस्कुराते हुए पी गया-किन्तु फिर भी बेटे की कमी कचोटती रही।

इस समय आंगन में दुलहन के आने की खुशी में नाच-गाना चल रहा था। खूब कहकहे उछल रहे थे, मुस्कुराहटें खनक रही थीं, किन्तु राजाराम इस खुशी से अलग और मुस्कुराहटों से दूर छत पर बैठा हुआ डूबते सूरज को देख रहा था। मन में वही पीड़ा थी-हृदय में इस समय भी वही कांटा चुभा था।

एकाएक कौशल्या ने छत पर आकर उससे कहा- ‘आप भी कमाल करते हैं जी! नीचे मेहमान आपको याद कर रहे हैं और आप यहां अकेले बैठे हैं।’

‘अकेले बैठना अच्छा लग रहा है कौशल्या!’

‘क्यों-तबीयत ठीक नहीं है क्या? जरूर आपने बारात में कुछ ज्यादा खा लिया होगा। आपको ऐसा न करना चाहिए था।’

‘खाना तो मैंने खाया ही नहीं कौशल्या!’ इतना कहकर राजाराम ने निःश्वास ली और बोला- ‘प्लेट में खाना लेकर एक कौर उठाया था कि कौर भी छूट गया और प्लेट भी गिर गई।’

‘तबीयत बिगड़ गई होगी।’

‘तबीयत तो ठीक थी-सब कुछ ठीक था।’

‘फिर क्या हुआ था?’

‘मन ठीक न था। और यह तुम भी जानती हो कौशल्या! कि संसार भर के दुखों का कारण यह मन ही होता है। मन न हो तो दुखों का पता ही न चले।’

कौशल्या पति को ध्यान से देखने लगी और बोली- ‘आप इस शादी से खुश नहीं क्या?’

‘बहुत खुश हूं कौशल्या! प्रत्येक बाप जब अपने बेटे का विवाह करता है तो वह बहुत खुश होता है।’

‘मगर आप तो खुश नहीं।’

‘उस कपूत की वजह से।’ राजाराम का मन दुःख कह गया।

‘आप निखिल की बात कर रहे हैं?’

‘हां!’ राजाराम ने पीड़ा से होंठ काट लिए। बोला- ‘शादी में सभी लोग आए। घर मेहमानों से भर गया और जिसका घर था वह कहीं दूर बैठा रहा। क्या यह दुःख की बात नहीं।

‘आप उसे बुलाते तो जरूर आता।’

‘कैसे बुलाता? किस मुंह से बुलाता उसे? जिस बेटे को ठोकर मारकर घर से निकाल दिया हो, उससे कैसे कहता कि तू घर चल। और फिर उसकी अपनी हठ। यदि वह अपनी हठ छोड़ देता तो क्या बिगड़ जाता उसका? अरे! घर तो घर होता है। घर से बड़ा आश्रय और कहां? औलाद के लिए माता-पिता से बढ़कर कौन होता है? एक वही तो उसे जन्म देते हैं। वही तो उसे अपना खून पिला-पिलाकर बड़ा करते हैं। अपनी हर खुशी को कुर्बान कर देते हैं औलाद के लिए। और वही औलाद जब मां-बाप की आज्ञा का पालन नहीं करती और दौलत को ही सब कुछ मान बैठती है तो कितना दुःख होता है मां-बाप को।’

कौशल्या बोली- ‘मैं आपके दुःख को समझती हूं जी! आपने दिल की बात कहकर मन हल्का तो कर लिया। किन्तु-मैं तो मां होकर भी किसी से कुछ नहीं कह सकी। एक ओर मेरा धर्म था और दूसरी ओर ममता! किन्तु मैंने धर्म के लिए ममता ठुकरा दी। पत्थर रख लिया छाती पर। कुछ कहती तो आपको बुरा लगता। आंसू बहाती तो आपको पीड़ा होती।’ कहते-कहते कौशल्या की आंखें भर आईं।

‘लेकिन।’ धोती के पल्लू से आंसू पोंछकर कौशल्या फिर बोली- ‘दुःख तो होता ही है जी! शादी होनी चाहिए थी निखिल की और हुई अखिल की। घर मेहमानों से भरा रहा और सिर्फ वही नहीं आया। दुःख तो उसे भी हुआ होगा।’

‘नहीं कौशल्या!’ राजाराम ने कहा- ‘उसे दुःख न हुआ होगा। मुझे तो यों लगता है कि उसने अपना हृदय पत्थर बना लिया है। भूल गया है वह हम सबको। कोई रिश्ता नहीं रहा उसका हमसे। उसके लिए तो बस उसकी दौलत ही सब कुछ है। मगर यह दौलत उसके पास रहेगी नहीं। मुझे तो भय है कि कहीं इस दौलत की वजह से उसे अपना शेष जीवन जेल में न गुजारना पड़े।’ इतना कहकर राजाराम ने निःश्वास ली और उठकर कहा- ‘खैर छोड़ो-जो होना है-हो जाएगा। तुम उसके लिए अपने मन को दुःख न दो और जाओ।’

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‘और आप…?’

‘बैठा हूं अभी। हवा अच्छी लग रही है।’

‘चलकर खाना खा लेते।’

‘अभी भूख नहीं।’

‘मैं आपके लिए चाय ले आती हूं।’

इतना कहकर कौशल्या चली गई और राजाराम फिर से दृष्टि उठाकर पश्चिम की दिशा में देखने लगा। सूर्यास्त हो चुका था। वातावरण पर तेजी से अंधकार के साये फैल रहे थे।

अभिशाप-भाग-18 दिनांक 08 Mar. 2022 समय 04:00 बजे साम प्रकाशित होगा

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