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ललितादित्य के मार्तंड – 21 श्रेष्ठ नारीमन की कहानियां जम्मू

छत्रपाल मैं अडोल बैठा रहता हूं। व्यस्त-से वे भीतर आते हैं और सामान बरामदे में रखवाकर सप्ताह भर के आए पत्रों को जल्दी-जल्दी पढ़ते हैं। प्रत्येक पत्र उनकी मुखाकृति पर अलग-अलग भाव प्रतिबिंबित कर रहा है। रेखाएं बन-मिट रही हैं। उस पत्र में डूबते-उतरते चले गए हैं। अस्पष्ट-सा कुछ बुदबुदाकर उसे जेब में रख लेते […]

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