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गृहलक्ष्मी की कहानियां : टेलीफोन
Stories of Grihalaxmi

गृहलक्ष्मी की कहानियां : अचानक बजी फोन की घंटी से श्वेता उठ गई। फोन उठाया तो शायद रांग नंबर था। बाहर बालकनी में आकर देखा तो शाम के 6 बजे रहे थे। उसने किचन में जाकर अपने लिये चाय बनाई और चाय का कप लेकर आराम कुर्सी पर बैठ गई। चाय पीते हुए सोचने लगी अगर ‘काश’ वो फोन इस तरह नहीं बजा होता तो शायद ये उठा-पटक जो दिमाग में चल रही थी, होती ही नहीं। कल एक फोन की घंटी ने उसका सारा संसार हिला कर रख दिया। कल तक तो वह रोहित के साथ कितनी खुश थी। बीता वक्त एक किताब के पन्ने की तरह पलटना शुरू हो गया। वह अपनी मां की एकलौती संतान थी। मां ने लाड़-प्यार से पाल-पोस कर बड़ा किया था।

रोहित एक सुंदर सजीला नौजवान था। कॉलेज टाइम से वो एक दूसरे को प्यार करते थे। कॉलेज लड़कियां उससे दोस्ती करने को आतुर रहती। जब घरवालों को प्यार के बारे में बताया तो घरवालों ने खुशी-खुशी रिश्ता मंजूर कर लिया, करते भी क्यों नहीं, न की कोई वजह नहीं थी। रोहित एक प्राइवेट फर्म में नौकरी करते थे। अच्छी खासी कमाई थी। सारे सुख आराम थे जो एक आदमी अपनी बेटी के लिये सोचता है।

धूमधाम से शादी हुई और शादी के बाद दोनों बम्बई आ गये। बम्बई आने के बाद लाइफ में सिर्फ खुशियां ही थी। दोनों अपनी दुनिया में मस्त रहते। रोज सुबह रोहित को प्यार से ऑफिस भेजती फिर सारा दिन इंतजार करती। जब शाम को रोहित आते तो साथ में घूमने जाते। खाना अक्सर बाहर ही खाते थे। अपनी दुनिया में खोये कब दो साल गुजर गये, पता ही नहीं चला। पर कल उस फोन की घंटी से जैसे सब कुछ थम सा गया। फोन पर वो लडक़ी अपना नाम गरिमा बता रही थी। कह रही थी वो उससे मिलना चाहती है। रोहित के बारे में कुछ बताना है। वो तुमको धोखा दे रहा है। वो लडक़ी मुझसे क्या कहना चाह रही थी? क्या करे? रोहित से बात करे या न करे? कुछ समझ नहीं पा रही थी क्योंकि रोहित से बात करने का मतलब था, प्यार पर शक करना। उसे अपने प्यार पर विश्वास होना चाहिये या उस अनजान लडक़ी के फोन पर, जिसे वो जानती तक नही.. वो ख्यालों में खोई थी कि रोहित ने पीछे से आकर गले में बांहें डाल दी और प्यार से बोला, मैडम किस ख्याल में खोई हुई हो। अरे आप कब आये? मैडम इतनी देर से डोर-बेल बजा रहा था। दरवाजा नहीं खोला तो मैंने सोचा आप बाहर हैं, अपनी चाबी से दरवाजा खोल कर आ गया। क्या बात है, सुंदर चेहरे पर बारह क्यों बजे हैं? अच्छा तुम बैठो, मैं चाय बनाकर लाती हूं।

  रोहित ने प्यार से उसको अपनी तरफ खींचते हुए बोला- जानेमन कोई प्रॉब्लम है क्या? श्वेता ने रोहित को प्यार से देखा फिर बोली नहीं ऐसी कोई बात नहीं और मुस्कुराते हुए चाय बनाने चली गई, मन ही मन सोचा कि रोहित से इस बारे में कोई बात नहीं करेगी। चाय बनाते हुए उसने रोहित से पूछा, खाना खाओगे? रोहित बोला ऐसा करो बहुत देर हो गई। तुम भी थकी लग रही हो, आज बाहर ही खाने चलते हैं। तुम चाय पीकर तैयार हो जाओ, पास ही नया होटल खुला है, आज वहीं चलते हैं। श्वेता सिर हिलाकर अंदर चली गई। उसने रोहित की पसंद की पिंक साड़ी पहनी और तैयार हो गई। अपने आप को शीशे में देखकर सोचने लगी आज तो वो बहुत सुंदर लग रही है। हिरणी जैसी बड़ी-बड़ी आंखें, गुलाब की पंखुड़ी की तरह होंठ जो भी देखे, देखता ही रह जाये, भला रोहित किसी के चक्कर में क्यों पड़ेगा।

अरे मैडम आज खाना खिलाने का इरादा है या यूं ही… कि श्वेता बाहर आ गई। रोहित उसे देखता ही रह गया। अरे बाप रे, आज तो जनाब के इरादे ही समझ में नहीं आ रहे। हाय डाॄलग, मार ही डाला। रोहित ने कुछ शायराना अंदाज में इस तरह कहा कि श्वेता हंस पड़ी अच्छा अब जल्दी चलो और दोनों बाहर आ गये। 

वापस आने पर श्वेता काफी रिलेक्स महसूस कर रही थी। सुबह उठी अपनी दिनचर्या शुरू की, रोहित को नाश्ता दिया। रोहित आफिस चला गया। रोहित को भेजकर वापस लौटी तो देखा चारों तरफ घर बिखरा हुआ था। चारों तरफ कपड़े, सामान सब इधर-उधर फैला था। गैस पर चाय चढ़ाई और घर समेटने में जुट गई। चाय का एक घूंट पीया ही था कि कॉलबेल बज उठी। श्वेता बड़बड़ाने लगी- लगता है आज बाई जल्दी आ गई। आज इसकी अच्छे से खबर लेंगे। बड़े गुस्से से श्वेता ने दरवाजा खोला तो सामने एक लडक़ी को देखकर श्वेता चौंक गई। उस लडक़ी ने नीली जींस टॅाप पहन रखा था। बालों को खुला छोड़ा हुआ था। रंग गोरा, सुंदर नैन नक्श। उम्र कोई 27-28 साल होगी। जी आप कौन? श्वेता अपने को संभालती हुई बोली, अरे अंदर आइये, लडक़ी बोली। आप मुझे नहीं जानती पर मैं आपको अच्छी तरह जानती हूं। आप रोहित की पत्नी श्वेता हैं। मैंने ही आपको फोन किया था, इतना सुनते ही श्वेता के होश उड़ गये और चेहरा लाल हो गया।

लगभग चिल्लाती हुई बोली, तुम्हारी इतनी हिम्मत कि तुम मेरे घर तक आ गई। इसी समय बाहर जाओ। लडक़ी बोली, मेरी बात तो सुनिए फिर मैं खुद ही चली जाऊंगी। श्वेता ने उसको घर से बाहर धक्का दिया। लडक़ी गुस्से में बोली, जिस पति पर इतना विश्वास करती हो, वो तुमसे ज्यादा मुझे प्यार करता है। फिर, भी अगर तुम देखना चाहती हो तो शाम को जब रोहित आये तो कहना, गरिमा तुम्हारा इंतजार नीचे पार्क में कर रही है, और वह पैर पटकती हुई बाहर चली गई। श्वेता ने दरवाजा बंद किया और धड़ाम से सोफे पर पसर गई। उस लडक़ी का आत्मविश्वास देखकर यही लग रहा था कि वो सच कह रही है। श्वेता सोचते ही अंदर तक कांप गई कि कहीं ये सच हुआ तो वह क्या करेगी? क्या यूं ही सब खत्म हो जायेगा। वो रोहित के बिना एक पल भी नहीं रह सकती। क्या वो रोहित को माफ कर पायेगी। सोचते-सोचते न जाने कब आंख लग गई, पता भी नहीं चला। डोर बेल फिर बजी तो घबरा गई, दरवाजे पर काम वाली बाई खड़ी थी। क्या मेमसाहब, कितनी देर से आपको आवाज लगा रही हूं, बड़-बड़ करती काम में लग गई।

  श्वेता किचन में गई पर कुछ करने का मन ही नहीं किया। अनमने मन से बाहर आकर अखबार उठा लिया, पर मन तो कहीं और ही था, जिसकी एक मुस्कुराहट पर जान देने को तैयार रहता वो उसको धोखा कैसे दे सकता है? फिर खुद ही सोचने लगी, ऐसा हो ही नहीं सकता। मुझे अपने प्यार पर शक नहीं करना चाहिये। ऐसा लगा कि अभी कल ही की तो बात थी, जब रोहित उससे दोस्ती करने के लिये कितने जतन करता था। बस स्टाप से कॉलेज तक पीछा करता, कभी उसकी सहेली से दोस्ती का बहाना करता। दोनों एक कॉलेज में पर वह आर्ट की और वो साइंस स्टूडेण्ड था। रोहित बहुत कोशिश करता और वो थी कि घास ही नहीं डालती थी, पर एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि वो और उसकी मां मंदिर जा रहे थे, उस दिन काफी तेज बारिश हो रही थी। अचानक रोड पार करते समय मां गाड़ी के नीचे आ गई। तभी अचानक रोहित कहीं से आ गया।

मां को उठाया और अस्पताल तक ले गया। जब तक मां को होश नहीं आ गया वो वहीं रहा। धीरे-धीरे हम मिलने लगे। मुलाकातें प्यार में कब बदल गई, पता ही नहीं चला। एक दिन पार्क में उसकी गोद में सर रखकर लेटे हुए पूछा कि उस दिन तुम वहां कैसे आ गये थे। रोहित हंसते हुए बोला, मैडम आपका पीछा करते हुए पहुंच गये। मैंने बड़े प्यार से उसकी आंखों में आंखें डालकर कर पूछा, क्या सचमुच इतना प्यार करते हो, उसने बड़े ही प्यार से बोला ‘हां’ और उसकी इस हां में इतना प्यार था। अगले ही पल शरमाकर उसकी बांहों में समां गई। मैडम जा रही हूं.. की आवाज से चौंक गई। ठीक है तुम चलो मैं आती हूं। बाई के जाने के बाद पता नहीं क्यूं आज मैंने दरवाजा कुछ ज्यादा ही ध्यान से बंद किया। नहाने गई, पूजा की और मन ही मन संकल्प किया कि ये सब झूठ है पर फिर भी मन के किसी कोने मेें डर था। फैसला किया कि रोहित को आने दो, जरूर बात करूंगी। आज ढंग से तैयार होने का भी मन नहीं किया। घड़ी देखी तो दो बजे थे और रोहित को आने में अभी 6 घंटे बाकी थे। ये घंटे उसे 6 साल की तरह लग रहे थे, फिर उसने सोचा, चलो क्यों न थोड़ी देर सहेली के घर जाती हूं, शायद अच्छा लगे। उसके बगल के फ्लैट में सविता रहती थी। उसके घर गई तो देखा वहां पहले से दो-तीन सहेली और बैठी थी।

फिर चाय पकौड़े व ताश का दौर चला तो पता नहीं चला, कब शाम हो गई। वो घर वापस आ गई। पर मन अभी भी परेशान था..। तभी डोरबेल बजी तो दौडक़र दरवाजा खोलेने गई उसे पता था ये रोहित के आने का समय था। पर ये क्या, ये तो धोबी था। जाओ भैया अभी कपड़े नहीं है। बिना जवाब सुने ही दरवाजा बंद कर लिया वो वापस जाने के लिये मुड़ी ही थी कि रोहित आ गया। रोहित आते ही बोला, श्वेता जल्दी चाय बनाओ, सरदर्द हो रहा है। आज ऑफिस में बहुत काम था। तुम चेंज कर लो मैं चाय बनाती हूं, श्वेता बोली। चाय बनाते हुये उसने सोचा, चाय के बाद रोहित से बात करूंगी। रोहित ने चाय पी और बोला अब अच्छा लग रहा है। सुनो आप किसी गरिमा को जानते हैं क्या? वो आज अपने घर आई कह रही थी कि आप उसे… क्या? गरिमा आई थी, रोहित ने पूरी बात सुने बिना ही पूछा। श्वेता ने कहा हां वो नीचे पार्क में आपका इंतजार कर रही है क्या? रोहित सीधे सीढ़ी की तरफ भागा। अरे सुनो तो पर रोहित चला गया। इसका मतलब वो लडक़ी सच कह रही थी। आज पहली बार ऐसा हुआ रोहित ने मेरी बात पूरी नहीं सुनी। उसे लगा अब जीने का क्या फायदा और गुस्से में अपने कमरे में इधर-उधर कुछ ढूंढने लगी, सारा सामान यहां वहां फेंकने लगी। इतनी देर में रोहित की आवाज आई। श्वेता जल्दी बाहर आओ तुम्हें किसी से मिलाना है। श्वेता गुस्से में मुंह फुलाये बाहर आई। इससे पहले वो कुछ कहती, रोहित बोला श्वेता ये है मेरी प्यारी छोटी बहन ‘गरिमा’ है और ये मेरे मामा की बेटी है। हमारी शादी के समय ये विदेश में थी।

बचपन से ही हम दोनों अच्छे दोस्त थे। ये छोटी है पर एहसान बड़े किये हैं और गरिमा, ये है तुम्हारी भाभी श्वेता। अरे आप लोग आराम से बैठो, गरिमा मैं अभी आता हूं। भाभी, मैंने तो आपको डरा दिया, असल में मेरी और भैया की शर्त लगी थी कि मैं आप दोनों की लड़ाई करा दूंगी। अफसोस मैं हार गई और आपका विश्वास जीत गया। तभी रोहित भी वापस आ गया और हंसने लगे। श्वेता कहीं सच में तो शक नहीं हुआ। कैसी बात करते हो, मैं आप पर कभी शक नहीं कर सकती। अच्छा, आप बातें करो मैं खाना लगाती हूं। किचन में जाकर श्वेता ने चैन की सांस ली और अपने अंतर्मन में चलने वाले तूफान को समेटा। उसने एक लंबी सांस ली। किचन में वापस आकर काम करने लगी। इतने दिनों से दिमाग में जो उथल पुथल मची थी वो सब अब खत्म हो गई थी। आइने में देख कर चेहरा ठीक किया और नई स्फूर्ति के साथ मुस्कुराते हुए ड्राइंग रूम की तरफ बढ़ गई। आज उसके रिश्ते को एक नया मोड़ मिल गया था। 

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