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सृजन-गृहलक्ष्मी की कहानियां
Srajan-Grehlakshmi ki kahaniyan

सृजन-विदिशा दी अपने माता -पिता के विवाह के ग्यारह वर्षों के बाद जन्मीं थी। वह एक जाने माने ख़ानदान की बड़ी बेटी थी| कई धर्मस्थलों में माथा टेकने के बाद वह अलभ लाभ के रूप में आयीं थीं| उनमें उनके पिता की जान बसती थी| उनके जन्म के उपरांत तो और भी भाई बहन आये पर शायद सभी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने में ही उनके विवाह का नंबर जल्दी आ गया और अच्छा घर-वर मिला तो 12वीं में ही उनके पिता ने उनका चट मंगनी पट ब्याह संपन्न करा दिया|
हमारी आखिरी मुलाकात मुझे अच्छी तरह याद है| लाल बनारसी साड़ी में सजी -धजी एक चंचल हिरणी सी विदिशा दी और उनका हाथ थामे बैठे हुए जीजाजी जैसे जरा सी असावधानी सा पकड़ ढीली हो जाती तो वह फिर से हॉस्टल के चार चक्कर लगा आतीं क्यूंकि उन्हें भी पता था कि अब ये सुनहरे दिन लौटकर न आने वाले| उस दिन हम दो दर्जन सालियाँ जीजाजी से गाना सुनाने की  जिद्द कर बैठे| उन्होंने धवल दंतपंक्तियां दिखाती अपनी सहचरी की ओर एक बार देखा और गाना शुरू किया….
“बड़े अच्छे लगते हैं ये धरती …ये नदिया…ये रैना..ऽऽऽऽ”
“और ..”मेरी साँवली सलोनी दी आँखें गोल कर बोली
“और तुम…ऽऽऽऽ!”
उनकी जोड़ी बहुत प्यारी थी,बिल्कुल बालिका वधु के नायक नायिका दिख रहे थे फिर उन्होंने हॉस्टल छोड़ दिया तो उनसे मिलना भी ना हो सका| 

हाल -फ़िलहाल उनकी फेसबुक में फ्रेंड रिक्वेस्ट आयी तो मैं देखते ही पहचान गयी| कितना ओजमयी चेहरा,और आत्मविश्वास से भरी ऑंखें,प्यारी तो वह पहले भी बहुत थी,अब लावण्य के साथ गरिमा ने व्यक्तित्व में चार चाँद लगा दिया था| नाम के साथ डॉक्टर  लग गया था|
”डॉ विदिशा मिश्रा! वाह दी! वजनदार !”मैंने उन्हें मैसेज किया तो उधर से उनका जवाब आया| “संडे को क्या कर रही हो ?”
“खाली हूँ|”मैंने कहा
“मिलने आ जाओ| सैटरडे शाम की टिकट्स बुक करती हूँ|”

हमेशा से वह ऐसी ही थीं| बहुत प्यार करने वाली और अपने अधिकारों को न छोड़ने वाली,जैसे हक़ से मुझे बुला लिया| घर आलीशान था पर उनका कमरा २० साल पुराने स्टाइल में सजा सा दिखा | दीवार पर जीजाजी की तस्वीर थी और उस पर चंदन का हार लगा था|

फोटो पर हार देखकर स्तब्ध रह गई पर वह हँसे जा रही थीं,”गले न लगोगी?”

मेरी चंचला बाला एक दिव्य व्यक्तित्व में तब्दील हो गयीं थीं,बस एक चीज़ जो न बदली थीं वह थी उनकी गूंजती हुई हँसी |

भाग कर मैं उनके गले से लग गयी तो तुरंत ही उन्होंने टोका …”अब मैं विदिशा नहीं बल्कि विदिशा आदित्य मिश्रा हूँ |तुम विशु दी के साथ जीजू से भी गले मिल रही हो|”

“जीजाजी का नाम अपने नाम के साथ जोड़ लिया?”
“न..न ….ऐसा नहीं..वह तो मुझमें समा चुके हैं….|”कहकर उन्होंने ज़ोरदार ठहाका लगाया|
“मैं शरमाकर झट से अलग हो गई पर नज़रें तस्वीर पर जा टिकीं|”
“ओह! कैसे दी! कब हुआ ये सब ….कैसे झेला आपने इतना दुख….|” “बहुत कुछ बताना है तुझे पर पहले हॉस्टल वाली मैगी और कॉफ़ी हो जाये? ” मैंने ‘हाँ ‘में सर हिलाया,खुद को संयत करने की निरंतर कोशिश किए जा रही थी फिर उन्होंने वहीँ से शुरू किया:——
“आदित्य ने मुझे हमेशा बच्ची ही समझा जब तक कि मैं २० की ना हो गई| कहते थे ‘टीन ‘हो अभी| थोड़ी बड़ी हो जाओ फिर बताऊंगा ….……|”
“दो साल तक हम दोनों एक ही छत के नीचे मित्रवत रहे!किशोरी पत्नी और युवा पति नजरों से ही एक-दूसरे से बंधे थे| इन्होंने काॅलेज लेक्चररशिप ज्वाइन कर रखा था| मेरा भी एडमिशन करा दिया था| दिन कॉलेज में कट जाता और रातें आँखों में| वह सोफे पर लेटते और मैं पलंग पर..आदित्य ने ड्रेसिंग टेबल के शीशे का एंगल कुछ यूँ व्यवस्थित किया था कि मैं उन्हें नज़र आती रहती थी|”
ये बताते हुए उनके चेहरे की लाली,उनके आँखों की हया…….उन दोनों के बेपनाह मोहब्बत का पुख्ता सबूत दे रहीं थीं फिर कहा,
“आदित्य ने  मेरा  इंतज़ार किया| मुझे हँसता-खेलता देख कर मोहित होते पर नाज़ुक कली समझ,हमेशा ही सहेजना चाहते थे| उन्हें पता था कि वो मुझे किसी भी क्षण हासिल कर सकते थे पर प्यार का वह अहसास हमेशा के लिए मर जाता जो धीरे धीरे परवान चढ़ रहा था| मेरा ग्रैजुएशन पूरा हो गया तब एक दिन…………,
“एक अनुरोध मानोगी?”
“क्या?”
“मेरी ओर कभी पीठ करके मत सोना|”
“क्यों? 
“बस यूँही…….!”
जीजाजी की बात दोहराती हुई वह लाल हो गई थीं,फिर कहा कि मुझे अपनी आँखों के सामने रखना उन्हें अच्छा लगता था|
“अहा! सो रोमांटिक !”मेरे मुंह से निकला………. 
“रोमांस ही रोमांस…..! बहुत प्यार व धैर्य के साथ वह क़रीब आये| उसके बाद तो हमने तमाम उम्र गुज़ार ली थी उन 20 सालों में! उस बीच दो बेटों की माँ बनी| अच्छे -बुरे सभी उतारों -चढ़ावों को हमने साथ-साथ देखा| एक दिन अपने हाथों में मेरा हाथ लेकर यही कहा था कि उन्हें पूरा विश्वास है कि मैं बच्चों का और अपना ख्याल रख सकुंगी| पता नहीं क्या हुआ था उन्हें | चेहरे पर एक दाना था जो शेविंग के समय कट गया था| घर में ही जेठानी डॉक्टर थीं,उन्होंने परीक्षण कर कहा कि सब कुछ ठीक है,और हमने विश्वास भी कर लिया| वह घरवालों पर विश्वास करने वाले सरल हृदयी व्यक्ति थे| छोटी जगहों में तो अब भी मेडिकल सुविधाओं का अभाव है| जरा भी अंदेशा होता तो समय पर बड़े अस्पताल लेकर जाती| जब तक मैं समझ पाई और उन्हें शहर के अस्पताल में भर्ती कराया,उनका घाव कैंसर बनकर फ़ैल चूका था| वह दर्द सह रहे थे…मैं उन्हें तकलीफ उठाती बस देख रही थी | अस्पताल के डॉक्टरों ने भी जवाब दे दिया था| यह उनके कैंसर की अंतिम अवस्था थी|  फिर एक दिन अस्पताल में मुझसे पेपर -पेन माँगा,उस वक़्त वह बोलने में भी स्वयं को अक्षम पा रहे थे तब लिखकर यह अनुरोध किया कि मेरे बच्चों को पढ़ाई पूरी करा देना! मैंने पढ़ा और आँखों से ही उन्हें निश्चिन्त किया| उन्हें पता था कि उनका आदेश ही मेरे लिए ब्रह्मवाक्य है| शब्दहीन हो गई थी मैं| मेरे आदित्य,जिनसे मेरे जीवन के हर तार जुड़े थे वह किसी भी क्षण मेरा साथ छोड़कर जाने वाले थे| मेरे ही आँखों के सामने उन्होंने आखिरी सांसे लीं| आह! अपने प्रियतम को खोना जीवन का सबसे बड़ा दर्द होता है,यह उस रोज महसूस किया। उनके जाते ही घरवालों के व्यवहार बुरी तरह बदल गए थे| मैं वहीं उसी घर में रहना चाहती थी| आखिर 20 वर्ष उसी छत के नीचे साथ जो काटा था पर मायकेवाले स्नेह व फिक्र के वशीभूत अपने संग ले आए| पहले ६ माह क्या हुआ इसका तो मुझे कुछ भी याद नहीं।  होश ही नहीं था……..कब  सोती-जागती क्या करती..कुछ भी याद नहीं| शायद जीने की इच्छा ही समाप्त हो गयी थी फिर एक दिन मेरे छोटे बेटे ने कहा, “माँ तुम भी क्यों न मर गयी,पापा के साथ?” 
“ऐसा आपके बेटे ने कहा?”
“हां और वही बात सीधे कलेजे में लगी……! उसने ठीक ही तो कहा था| तब मैंने सोचा मर ही तो गयी हूँ ….मैं तो जीतेजी मर गयी हूँ,ना खुद का होश -न बच्चों की खबर ! ऐसे कैसे चलेगा? पति से किया गया वादा भला मैं कैसे भूल सकती हूँ| मैंने अपने बच्चों का ख्याल रखने का वादा किया था उनसे| मुझे स्वयं को संभालना ही होगा| एक झटके से उठी और आदित्य की पुरानी चिट्ठियाँ निकालकर पढ़ने लगी जो मायके की अलमारी में मेरी धरोहरों के साथ सुरक्षित थीं| उनके शब्दों में जान जीवित थे। उसी संजीवनी की ताक़त पर ससुराल आने का फैसला कर लिया| उन खतों में स्नेह के साथ रचा बसा वादा था कि मैं दोनों बेटों को बड़ा आदमी बनाउंगी| अब पति के सपनों को उड़ान देने का समय आ गया था| मार्ग में रोड़े ही रोड़े थे पर मुझमें भी ज़िद्द थी| जाने किस ताक़त पर अपनी लड़ाई लड़ती चली गयी,शायद उद्देश्य का होना बहुत जरुरी है जीने के लिए| अब मेरा उद्देश्य मेरे सामने था मेरे पति का सपना और मेरे बच्चे !! मुझे याद है कि माँ से विदा लेते समय मैंने कहा कि सदा सुहागन रहने का ही आशीर्वाद दो माँ! वह मुझमें हैं,कहीं नहीं गए हैं,मैं उनकी अर्धांगिनी उनसे पूर्ण होकर तुमसे आशीर्वाद मानती हूँ ! फिर मैंने अपनी जो भी जमा पूँजी थी उसे लगाकर अपने बच्चों को हॉस्टल भेजा और खुद यहाँ आ गयी| 

मेरे ससुरालवाले मेरे वापसी के विरुद्ध थे| सास नहीं थी,उन्हें तो एक बार दिवंगत पुत्र के परिवार का मोह हो भी सकता था पर यहां दो मीठे बोल बोलने वाला एक भी व्यक्ति नहीं था| जेठ जी सबसे सुदृढ़ थे| करोड़ों की अथाह संपत्ति को अपनी मन -मर्ज़ी से चलाने वाले को,अन्य उत्तराधिकारी कहाँ भाते हैं| उन्हें देखा तो उनकी कही बातें याद आ गई जो मुझे अपना पैरों पर खड़े करने में प्रेरक साबित हुयी थी| पति की चिता जब जल ही रही थी तब जेठ जी के शब्द कि,देखता हूँ..अब ये बच्चे कैसे पलते -बढ़ते हैं.! उनकी वह ललकार,मैं कभी भूल ना पाई….अगर वह शब्द कानों में न गूंजते तो शायद मैं ,मज़बूत न हो पाती……| 

यहाँ मैं अकेली नहीं थी। मेरे आदित्य की किताबें और कमरे की दीवारें,मैंने खुद को यहीं क़ैद कर लिया था| खाली वक़्त न कटने लगा तो कॉलेज ज्वाइन कर लिया था| मुझे उन्हें वही -वहीँ ढूँढना था, जहाँ उन्हें जाते देखती थी | उनका ही विषय,वही किताबें,खुद को उनकी किताबों में डुबोकर एक शांति महसूस करने लगी थी | पोस्टग्रैजुएशन में भी अच्छे नंबरों से पास हो गयी| उनके ही कॉलेज में उनकी जगह नियुक्ति प्राप्त की| साथ ही साथ पीएचडी में रजिस्ट्रेशन करा लिया| अपनी आर्थिक आत्मनिर्भरता की हर कोशिश की | मैं स्वावलम्बी हो चुकी थी | मैंने उनके सपनों को साकार करने में अपने जीवन को लगाया | हर कोने में बसी यादें,उनसे किये गए वादे सब मेरे जीने का आधार हैं! पूरा कमरा ज्यों का त्यों सहेजा है | यहाँ कुछ फेर -बदल नहीं करती और पता है,सच में मुझे लगता कि वो कहीं नहीं गए हैं|”
यह सब बताते हुए जो अलौकिक मुस्कान उनके चेहरे पर थी, वो देख मैं आश्वस्त हो गयी थी कि उन्होंने अपनी जंग जीत ली है| वह कोई अबला नारी नहीं बल्कि शक्ति का वह पुंज हैं, जिनसे बात करके कोई भी प्रेरित हो सकता है |

“बहुत खूब दीदी! प्रेम में मरना आसान है पर मोहब्बत को जीना कोई आपसे सीखे!”
“याद रखना कि प्रेमिका या पत्नी जो नहीं कर सकती वह माँ कर सकती है। एक माँ अगर अपने बच्चों का सृजन कर सकती है तो स्वयं का क्यों नहीं?”

उनसे मिलकर ऐसा लगा जैसे वह स्वयं ही सृजनकर्ता हैं। जिन्होंने अल्पायु में ही जीवन के सब रस देख लिए और सबकुछ जी लिया। जिस तरह वह मौत के नजदीक आकर उन्होंनेे न केवल जीवन पाया बल्कि लौहस्तंभ के समान,अपने शत्रुओं के बीच सम्मान खड़ीं है | बिना किसी बाहरी सहायता खुद को ही नहीं बल्कि दोनों पुत्रों को भी उनके पैरों पर खड़ा किया। उनसे मिलकर नतमस्तक हो गई। उनका ह्रदय से सम्मान करती हूँ| इस कहानी को लिखने का उद्देश्य नारियों में सृजनात्मक शक्तियों का संचार करना है! आशा है यह सत्यकथा सबके लिए प्रेरणास्पद साबित होगी।

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