रूप तो सारा काम इस प्रकार कर रही थी मानो वह भी साथ जा रही हो। सारी तैयारी हो गई। जाने के जब केवल तीन दिन रह गए तो साँझ को ललित रूप के पास पहुँचा। आज उसका मन बड़ा उदास हो रहा था…
‘रूप!’
‘बोलो!’
‘आज मन बड़ा भारी-भारी हो रहा है। सोचता हूँ, तीन दिन बाद ही मैं यहाँ से चला जाऊँगा और यहाँ का सब-कुछ पीछे छूट जाएगा।’ कुछ रुककर वह फिर से बोला-‘इन तीन सालों में तेरे साथ रहते-रहते जिस चीज़ को महसूस नहीं कर पाया, आज इस विदाई बेला में जैसे वही पूरे वेग से मुझे मथे डाल रही है। पता नहीं, तू भी ऐसा महसूस करती है या नहीं, पर सच रूप! मेरा तो रोम-रोम आज तेरे वियोग की कल्पना से ही दुखी हो रहा है।’
‘मुझे तुमने क्या पत्थर समझ रख है ललित! जानते नहीं, किस प्रकार मैं अपने को पत्थर बनाए बैठी हूँ, नहीं तो तुम डाँटने लगोगे कि कैसी कमज़ोर लड़की है। अब तुम यों कमज़ोरी दिखाओगे तो मैं क्या करूँगी ललित? और उसकी आँखें छलछला आईं। ललित कुछ देर उसकी ओर देखता रहा, फिर बोला-‘देख, मैं तुझे अपनी रूप सौंपकर जा रहा हूँ, इस विश्वास के साथ कि लौटूँगा तो मुझे इसी हालत में लौटा देगी। ऐसा न हो कि मैं लोटूँ और देखें कि तूने रूप को किसी और के घर का श्रृंगार बना दिया है। तू बड़ी कमज़ोर है, इसी से मन डरता है। बोल रूप! मेरी धरोहर को रख सकेगी ना?’
‘सब बातें क्या मुँह से कहनी होती हैं ललित! इतना विश्वास रखो, जान रहते तो तुम्हारी सौंपी हुई धरोहर को किसी को हाथ नहीं लगाने दूंगी।’
‘जानता हूँ, जानता हूँ, रूप, कि तू मेरी है। दुनिया की कोई ताकत तुझे मुझसे नहीं छीन सकती। पर फिर भी कहे जाता हूँ, यदि कुछ भी ऐसा-वैसा हो गया तो दुनिया के किसी भी कोने से तुझे भगा लाऊँगा, उस समय मुझे कोई नहीं रोक सकेगा।’
ऐसी नौबत ही नहीं आएगी।’ तभी चाची ने दोनों को चाय के लिए बुलाया और दोनों उठकर चले गए।
ललित चला गया। चाची और रूप खूब रोईं, कुछ दिनों तक घर में भयानक सन्नाटा छाया रहा, फिर धीरे-धीरे सब-कुछ वैसे ही चलने लगा। जिस दिन ललित का पहला पत्र आया, पचासों बार उसे पढ़ा गया, जितने लोग आए सबसे कहा गया। फिर धीरे-धीरे पत्रों की बात भी पुरानी पड़ गई। रूप ने अपना सारा ध्यान किताबों में लगा दिया इस बार भी उसे फ़र्स्ट डिवीज़न में पास होना ही था। ललित के पत्रों में भी तो बराबर यही लिखा रहता था कि खूब पढ़ना, खूब मेहनत करना। रूप को उन पत्रों से बड़ा बल मिलता, बड़ी प्रेरणा मिलती। पर…
प्रिय ललित,
कभी सोचा भी नहीं था कि परसों ही पत्र लिखने के बाद आज फिर आधी रात के भयानक सन्नाटे में तुम्हें पत्र लिखने बैठना पड़ेगा। यह भी नहीं जानती कि जो कुछ लिखना है वह कैसे लिखूँ? बस इतना समझ लो ललित कि इतने विश्वास के साथ अपनी जिस धरोहर को मेरे पास छोड़ गए थे, मेरे देखते-देखते उसे सब लोग छीन रहे हैं और मैं कुछ नहीं कर पा रही हूँ! तुम तो मेरी सारी दृढ़ता, सारे साहस को लेकर कोसों-कोसों दूर बैठे हो, अब किसका सहारा लेकर घरवालों का विरोध करूँ? तुम्हारे बिना कितनी बेबस, कितनी असहाय मैं अपने को महसूस कर रही हूँ, तुम सोच नहीं सकते! तुम्हीं बताओ ललित, अब क्या होगा?
नहीं जानती, पिताजी ने कौनसे जन्म का बदला निकाला है! एक बार मुझसे पूछ तो लिया होता। उस हालत में मैं साफ-साफ कह देती, पर किसी ने मुझसे पूछने की ज़रूरत ही नहीं समझी, और शादी की तारीख तक निश्चित कर दी। मेरी इच्छाओं की, मेरे अरमानों की कोई परवाह तक नहीं की। इतनी साध से सपनों का सुनहला संसार सँजोया था, वह क्या यों ही बिखरकर चूर-चूर हो जाएगा? नहीं-नहीं, ऐसा नहीं होने दूंगी, तुम कोई रास्ता बताओ, नहीं तो सच कहती हूँ मर जाऊँगी, मैं आत्महत्या कर लूँगी। अपने जीते-जी इस अन्याय को नहीं होने दूंगी। जिंदगी-भर घुट-घुटकर मरने से फाँसी का फंदा कहीं अच्छा है। बस एक ही गम मन को कचोटे डाल रहा है…तुम्हें पाने की कितनी साध थी मन में, पर मन का चाहा क्या कभी पूरा होता है? अगले जन्म में विश्वास नहीं करती, पर यदि होता तो यही प्रार्थना कि इस जन्म की अधूरी साध को पूरी कर देना ईश्वर!
ललित! या तो समय रहते मुझे इस अन्याय से बचा लेना या फिर जो कुछ भी कर गुज़रूँ उसके लिए क्षमा कर देना!
अच्छा विदा…कौन जाने यही मेरी अंतिम विदा हो।
तुम्हारी ही
रूप
तुमने तो पत्र लिखने में बहुत देर कर दी ललित! बहुत देर कर दी। तुम्हारा पत्र मुझे उस समय मिला, जब अग्नि को साक्षी देकर मैं सदा के लिए पराई हो चुकी थी। चार दिन पहले यह पत्र मिला होता तो सोचती हूँ शायद इसी का सहारा लेकर कुछ कर सकती। पर आज तो इसका शब्द-शब्द मेरे हृदय को मथे डाल रहा है।
कितने जोश के साथ मैंने लिखा था कि यदि मैं कुछ भी नहीं कर सकी तो आत्महत्या कर लूँगी। मैं मर जाऊँगी, पर मैं मर भी न सकी। तुम भी सोचते होगे कितनी ज़ाहिल लड़की है, पर नहीं जानती कि सब-कुछ लुट जाने पर भी किसका मोह प्राणों को यों अटकाए है। शायद मन के किसी अज्ञात कोने में तुमसे दंड पाने की लालसा छिपी बैठी है, जिसने मुझे मरने भी नहीं दिया। तुम्हारे साथ इतना बड़ा विश्वासघात करके, बिना तुमसे उचित दंड पाए यदि मर भी जाती तो विश्वासघात की यह भावना निरंतर मेरी आत्मा को सालती न रहती, अब तो जब तक तुम लौटकर नहीं आ जाते और मुझ जैसी ज़ाहिल लड़की को जी भरकर इस कुकर्म की सज़ा नहीं दे लेते, तब तक मैं तुम्हारा आसरा देखती बैठी रहूँगी! यों तो विधाता ने ही मेरे लिए दंड सँजोया है, वह संसार के भयंकर-से-भयंकर दंड से भी कड़ा है, पर विधाता से भी बड़ी अपराधिनी तो मैं तुम्हारी हूँ, सो जब तक तुम्हारे हाथों दंड नहीं पा लेती, मानो मरने का अधिकार भी मुझे नहीं है।
मैं तो अपनी कमज़ोरी का फल भोगूँगी ही, पर इस सारी बात से अकारण ही तुम्हें इतना दुखी होना पड़ा, यह सब सोच-सोचकर ही मन बिंधा जा रहा है। शायद अपात्र को प्यार करने से दुख ही उठाना पड़ता है। अब मुझे भूल जाओ ललित! स्वप्न में भी मेरा ख्याल मत करना। जितनी उमंग और जितने उत्साह के साथ तुम्हारे प्यार को सहेजा, उसी उत्साह के साथ, मन को ज़रा भी मलिन बनाए बिना मैं तुम्हारी उपेक्षा और भर्त्सना को भी अपने आँचल में समेट लूँगी, इतना विश्वास रखना। मुझ जैसे अनेक रूप तुम्हें मिल जाएँगी।
अब और कुछ नहीं लिखूँगी ललित! अब लिखने को शेष रह ही क्या गया है भला? इस पत्र का उत्तर मत देना और यों भी कभी मुझे पत्र मत लिखना। अपने जीवन के पिछले पृष्ठों से रूप का नाम धो-पोंछकर बिल्कुल साफ कर देना, जिससे मेरी अपवित्र छाया भी तुम्हारे सुनहले भविष्य को धूमिल न बना सके।
इसी अनुरोध के साथ
रूप
ललित,
पूछती हूँ, मना करने पर भी तुमने पत्र क्यों लिखा? मेरे इतने अनुरोध को भी रख सके! जानते हो, मैं तो यों ही बहुत कमज़ोर हूँ, फिर, क्यों मेरी मिट्टी बिगाड़ने पर तुले हो? तुम भी औरों के साथ मिलकर यों सताने लगोगे तो किसका आसरा लेकर जिंदा रहूँगी, यह तो सोचा होता।
इतने ढेर सारे प्रश्न तुमने पूछ डाले, पर पूछती हूँ, क्या करोगे यह सब जानकर? जिस लड़की ने तुम्हारे जीवन की सारी खुशियों को यों अकारण ही बर्बाद कर डाला, आज भी उसके दुख-सुख की चिंता से तुम त्रस्त हो। यह सब लिखने के बजाए यदि तुमने खूब भर्त्सना की होती, खूब फटकारा होता तो मन की व्यथा कुछ तो घटती, पर तुम्हारा यह स्नेह मुझसे सहा नहीं जा रहा ललित!
इन मेहँदी लगे हाथों से कैसे अपनी बर्बादी की कथा लिखूँ। बस यही समझ लो ये बहुत अच्छे हैं, और मैं सुखी हूँ। एक छोटा-सा शहर है। और ये इसके नामी वकील हैं। काम में बहुत व्यस्त रहते हैं, यों भी काफ़ी साधु प्रकृति के पुरुष हैं। परिवार का कोई झंझट नहीं, घर में अकेली ही हूँ। साधनों का कोई अभाव नहीं, पर जिसकी सब साध ही मर गई हो, वह क्या करे इन साधनों को लेकर? मेरे लिए बहुत-सी पुस्तकें मँगा दी गई हैं, जिससे इस बड़े घर में अकेली रहकर भी मेरा मन लगा रहे, पर कैसे बताऊँ उन्हें कि जिसका मन ही मर गया, उसके मन लगने न लगने का प्रश्न ही कहाँ उठता है भला!
बस और जो है सब ठीक ही है। जिंदगी को घसीट रही हूँ या जिंदगी मुझे घसीट रही है। कुछ भी समझ लेना, एक ही बात है।
अब भूलकर भी मुझे पत्र मत लिखना। हाथ जोड़कर मैं तुमसे यही प्रार्थना करती हूँ।
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