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पड़ोसी की बदलती परिभाषा—गृहलक्ष्मी की लघु कहानी: Neighbour Story
Padoshi ki Badlati Paribhasha

Neighbour Story: एक समय था जब पड़ोसियों का दर्जा रक्त संबंधों से भी उॅचा था। लोगों का विश्वास था कि संकट के समय में सबसे पहले पड़ोसी ही काम आते है। फिर रिश्तेदार—नातेदार। हर कोई अच्छा पडोसी चाहता था। उससे बेहतर व्यवहार की उम्मीद करता था और निश्चिंत रहता था। एक कप चीनी हो या दूध अक्सर पड़ोसी होने के नाते हम एक दूसरे पर निर्भर रहते थे। न कोई बुरा मानता था न ही किसी की नींद में खलल पहुॅचती थी। रात बिरात हम बेहिचक पडोसी की मदद ले सकते थे। पडेासी हमारा संबल होता था।
आज परिवर्तन के इस देौर में यह सवाल लाजिमी हो गया है कि क्या पडेासी की परिभाषा बदल चुकी है? यह जानना मुश्किल नहीं है। हम तब ओैर आज के माहौल पर नजर डाले तो यह अंतर साफ दिख जायेगा। एक समय था जब लेागो की जरूरतें सीमीत थी। सुख—सुविधा के इतने साधन नहीं थे। लेागो के बीच मान सम्मान और अर्थ को लेकर कोई प्रतिस्पर्धा नहीं थी। मगर जैसे—जैसे भोगवादी संस्कृति हावी होती गयीं व धन दौलत बटोरने की होड़ लग गयी तो लेागों के सोच में बदलाव भी होने लगा। बदलाव ने ईर्ष्या को जन्म दिया।
आज यही ईर्ष्या पड़ोसी धर्म की मूल भावना को दीमक की तरह चाट रही है। जो एक खतरनाक संकेत है। खतरनाक इसलिए है कि अब हम बुरे वक्त पर किसपर निर्भर रहेंगे? जाहिर है हम भी डूबेंगे सनम आपको भी ले डूबेंगे। आज पडोसियों के बीच यह कहावत चरितार्थ हो गयी है, ‘न हम आपके लिए खड़े होंगे न आप हमारे लिए।’ संकट की घडी में हमदोनों परेशान होंगे। जो चिंताजनक है। “शहरों की हालत यह है कि ऐसी कोई विपदा जिसमें पडोसी की जान आफत में पडने वाली हो कोई जल्दी हाथ नहीं लगाता।” एक सज्जन के घर में सांप निकला। वे चिल्लाते रहे कोई सामने नहीं आया। आया कब जब उन्होंने अपनी जान जोखिम में डाल कर उस सांप को डंडे से मार दिया। यही गांव में होता तो पूरा गांव एक आवाज पर लाठी लेकर उस सांप पर टूट पड़ता। माना की “शहरियों” को सांप मारने की आदत नहीं होती तो भी फर्ज तो बनता है कि उसके आवाज पर खड़े हो जाए। यहां तो कोई घर से निकला ही नहीं।
“शादी हो या कोई अन्य मांगलिक अवसर पड़ोसियों को न्यौता न दिया जाए तो बुरा मान जाते है। वहीं किसी मृतक को कंंघा देना हो तो सौ बार सोचेंगे। उन्हें लगेगा ऐसा करके उनके स्वयं के कामों का हर्ज होगा। किसी की दुकान छूटेगी तो किसी का काम। आज का पड़ोसी सोचेगा यह उनका निजी मामला है लिहाजा रिश्तेदार नातेदारों का फर्ज बनता है कि लाश को कंधा लगाये। वे ऐन मौके पर चेहरा दिखाकर लुप्त हो जाएगे। इंतजार करेंगे तो तेरहवी के भोज का। नहीं मिला तो मोहल्ले में निंदा पुराण का पाठ करेंगे।
एक सज्जन पेशे से डाक्टर है। उनके आस—पड़ोस में और कोई डाक्टर नहीं है। उनकी हालत यह है कि किसी के घर न्यौता देने के बावजूद नहीं जाते है। बहुत हुआ तो पांच मिनट के लिए खड़े हो जाते हैं। किसी मृतक की अर्थी के साथ चलना हेा तो दो कदम चल कर, वापस अपने क्लीनिक चले जाऐंगे। कहावत है कि हमें कम से कम चार लोगों से अवश्य मित्रता रखनी चाहिए। ताकि मरने पर शमशान घाट ले जाने में आसानी हो। डाक्टर साहब की मॉं मरी। पड़ोसियों ने भी उनके साथ वही रवैया अपनाया। परिणाम यह हुआ कि महज उनके दो बेटों और एकाध ससुराल पक्ष के रिश्तेदारों के कोई लाश के साथ चलने वाला नहीं था। उन्हे अपने पेशे का अहंकार था। ऐसे तो किसी को भी अपने दौलत और रूतबे का अहंकार हो सकता है। तो क्या बिना दुनियादारी के जीवन की गाड़ी चल सकती है? पडोसी धर्म निभाना दुनियादारी का हिस्सा है। दुर्भाग्य से लोग इसे भूलते जा रहे है। न स्कूल, न ही मां—बाप बच्चों को पड़ोसी धर्म के बारे में बताते हैं। पड़ोसी से वे खुद प्रतिस्पर्घा रखते है बच्चों को क्या सिखायेंगे?
गांवों की इस मामले में स्थिति बेहतर है। वजह है लेाग सैकड़ों सालों से अपनी जमीन और संस्कृति से जुड़े हुए है। वहीं ”शहर में तरह तरह के लोग एक दूसरे के पडोसी बन जाते हैं।” जड़ों से जुडाव न होने के कारण इनकी एक दूसरे के प्रति कोई जबावदेही नही बनती। इसके अलावा शक भी होता हेै पता नहीं कैसा पड़ोसी हो। सो वे एक दूरी बना कर रहते है। दूसरे हमसे क्या मतलब? ज्यादतर “शहरियों” की यही सेाच रहती। एक सज्जन “शादी” में गये। रात एक बजे लैाट कर आये तो देखा की घर का फाटक खुला हुआ था। संशकित घर में घुसे। कमरे का मुख्य दरवाजा खुला देखकर समझ गये कि कुछ अनहोनी हुयी है। ऐसा हुआ भी। चोर गहने,रुपये यहां तक कि एलइडी टीवी तक उठा ले गये। सवाल उठता है कि क्या किसी की नजर उस घर में होने वाली आवाजाही पर नहीं पडी होगी? अवश्य पड़ी होगी मगर वही खुदगर्ज सोच कि हमसे क्या मतलब?पहले ऐसा नही था। जरा सा संदिग्ध गतिविधि देखी नही कि तुरंत अपने घरो से निकलकर लेाग वस्तुस्थिति का जानकारी लेते थे। क्योंकि पडोसी उनका अपना होता था उनकी उसके प्रति जवाबदेही होती थी। कल जब पड़ोसी उलाहना देगा तब उसका कैसे सामना करेगे? यह उनके लिए लज्जाजनक था। साथ में अपराधबोध होता था सो अलग। आज किसी को ऐसा कुछ महसूस नहीं होता है। कभी किसी लडकी की ”शादी” होती थी तब सबसे पहले पडोसी ही अपना घर खाली करके देता था। ‘‘बहनजी, आपके रिश्तेदारों को रहने में दिक्कत होगी। मेरे पास दो कमरे खाली पड़े हैं। आप चाहे तो ले सकती है।’’ एक दो दिन की बात होती थी सो खुद कष्ट सह कर दूसरे भी बिना हिचक देने के लिए तैयार हो जाते थे। इस तरह उस लडकी की “शादी” बिना किसी दिक्कत के हो जाती थी। आज ऐसा कुछ नहीं देखने को मिलता है। आज का पडोसी सोचता है कि अगर उसे कमरे दे देगे तो खुद के रहने की दिक्कत होगी। चार लोगो की आवाजाही हेागी तो गंदगी फैलेगी। घर का फाटक हमेशा खुला रहेगा। चोरी चकारी का भय बना रहेगा आदि।
बेशक हम कह सकते है कि हमारे पास वक्त नहीं है। महानगरों में ऐसा है भी। दस बारह घंटे काम करके आदमी थका मादा घर आता है तेा सिवाय थकान मिटाने के और कुछ नहीं सेाचता। उसे कल की चिंता रहती हैं। ऐसे में वह पड़ोसियों के यहां होने वाले किसी लफड़े में फंसना नहीं चाहता। उसे लगता है बिना वजह समय बर्बाद हेागा। काम सिर्फ काम। यही दिनचर्या होती है लोगों की। तभी तो कोई दुर्घटना होने पर कोई जख्मी के लिए समय नहीं देता। सभी को अपने काम की चिंता होती है। क्या यह उचित है, एक संवेदशनील इंसान इसे कभी भी तर्कसंगत नहीं ठहरा सकता? अपनी नींद को तोड़कर अगर हम किसी पड़ोसी की मदद कर दे क्या जाएगा। कुछ नहीं उल्टे एक आत्मसंतोष होगा कि हम किसी कि काम आये। ऐसा करके हम भविष्य के लिए एक अच्छा पड़ोसी तैयार करेगे। उसका फल वैसे ही होगा जैसे पेड़ लगाने से हमें होता है।

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