नारीमन की कहानियां
Bharat Katha Mala

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

दिल्ली चंडीगढ़ हाईवे पर कार सरपट दौड़ी जा रही थी। एक बेहतरीन चार लेन का हाईवे। दिल्ली की भीड़-भाड़ और कभी समाप्त न होने वाला ट्रैफिक भी बहुत पीछे छूट गए थे और कार रफ्तार से दौड़ रही थी। बेटी के पास चन्द दिन बिता कर लौट रहे थे आकाश और रेवा। हर बार इकलौती बेटी को विदा करना या फिर उसके घर से खुद विदा हो कर आना आसान नहीं होता। बेटी ब्याहे दस साल हो गए थे और अब तो जुड़वाँ नाती-नातिन भी थे। अभी छः महीने के ही तो थे। याद कर आँखें भर आती बार बार। फिर कुछ ट्रैफिक की, कुछ मौसम की, कुछ नए खुले फूड जॉइंट्स की बात कर अपने आप को और एक-दूसरे को सम्भाल लेते दोनों।

पहले तो महीने दो महीने में मिलने आ ही जाते थे बेटी दामाद। पर अब कुछ समय से बेटी आ ही नहीं पा रही थी। पहले मुश्किल प्रेगनेंसी और अब दो छोटे बच्चे, उनकी दो नैनी और ढेरों सामान। फिर अपना बिजनेस भी देखना। आना मुश्किल हो गया था उनके लिए। पर बच्चों के आने से मोह के धागे और मज़बूत हो गए थे। खींचते थे अपनी ओर बार-बार। बिटिया का संयुक्त परिवार है। हिचक तो रहती ही है, पर क्या करें इन मोह पगे धागों का? कहाँ रह पाते थे दोनों निर्लिप्त! तीन महीने के अंतराल पर चक्कर लग ही जाता था।

कार के पहिए तेज़ी से घूम रहे थे और रेवा और आकाश को लग रहा था जैसे बच्चे पीछे, बहुत पीछे छूटते जा रहे थे। न जाने कब करनाल भी आ गया। एक जगह कार रोक कर दोनों ने कॉफी पी और तरोताजा हो गए। फिर चल दिए घर की ओर। फिर वही ख्याल। कब मिलना होगा? कार में जगजीत सिंह का मशहूर गीत ‘वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी’ चल रहा था। लिखा था सुदर्शन फ़ाकिर जी ने फिल्म ‘आज’ के लिए।

वो बुढ़िया जिसे बच्चे कहते थे नानी

वो नानी की बातों में परियों का डेरा

वो चेहरे की झुर्रियों में सदियों का फेरा

भुलाए नहीं भूल सकता है कोई

वो छोटी-सी रातें, वो लम्बी कहानी

कितने खूबसूरत शब्द और कितनी खूबसूरती से गाया गया। रेवा को याद आ गया अपना बचपन। गर्मी की छुट्टियाँ नानी के यहाँ ही गुजरती थी। गर्मी के दिन और गर्मी की रातें। शाम को बच्चों का काम होता था छत पर पानी का छिड़काव करना और फिर सबके बिस्तर लगाना। खुले में, तारों तले झक्ख सफेद बिस्तर पर सोने का मजा कुछ अलग ही था। आसमान में ध्रुव तारा और सप्तऋषि तारामंडल ढूँढने का इंतज़ार रहता था। काम समेट जब नानी छत पर आती तो बच्चों से घिर जाती। कहानी जो सुननी होती थी और सच्च में रात बीत जाती थी कहानी सुनते सुनते। शायद जब तक हमें नींद न आ जाती, तब तक नानी भी कहानी खींच लेती। “याद है आकाश तुम्हें अपना बचपन? तब तो हर घर में यही होता था।” “हाँ रेवा, हम भी कस्बे में नानी के यहाँ जाते थे, छुट्टियों में। दादी तो साथ ही रहती थी। कजिंस के साथ खुले आँगन में रात भर मस्ती करना और नानी से कहानी सुनना आज भी याद है। अक्सर नाना की डाँट के बाद ही सोते थे। कभी-कभी तो नाना बीच में केमिस्ट्री, मैथ या फिजिक्स के सवाल भी ले आते थे। सब बच्चों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती थी।

कार अब अंबाला पहुँचने वाली थी। बचपन पीछे छूट गया और रेवा को याद आया, जब वह कालेज हॉस्टल से घर आती थी। छोटा भाई उससे ग्यारह बरस छोटा था। उसे रोज़ रात दीदी के साथ ही सोना होता था वह भी रोज़ एक कहानी सुन। रेवा भी हर बार उसके लिए कहानी की किताब ही ले जाती थी तोहफे में। समय कैसे बदल गया। पापा तो अब रहे नहीं। सब बहन-भाई अपनी-अपनी गृहस्थी में, अपने अपने प्रोफेशन में उलझे। साल में दो-एक दिन का मिलना, फोन पर बात कभी-कभार और फिर वही दूरी। रेवा का सारा जीवन उसकी आँखों के आगे गुजर रहा था। जगजीत सिंह का गीत तो कब का समाप्त हो गया था पर मन का ताना-बाना तो चलता ही जा रहा था। अपनी बिटिया आई। उसका उठना-बैठना, खाना-पीना, सोना सब कहानी के साथ। रेवा और आकाश ने न जाने कितनी कहानियाँ सुनाई होंगी और न जाने कितनी बनाई होंगी। “याद है आकाश कितनी कहानियाँ गढ़ते थे हम। कभी भालू, बन्दर या चूहे की, कभी चिड़िया या तोता मैना की, कभी ऑफिस की और कभी कॉलेज की।” आकाश भी हंस दिया और बोला ‘हाँ भई मुझे तो कॉरपोरेट सेक्टर छोड़ वाल्ट डिसने में होना चाहिए था। न जाने कितनी कहानियाँ बनाई होंगी टॉम और जैरी की।’ “हाँ याद है मुझे जब बिल्ली चूहे को खा गई थी। पर चूहा भी स्मार्ट था। उसके पास चाकू था। बिल्ली का पेट काट कर बाहर आ गया। बिल्ली मौसी दौड़ी थी अस्पताल, पेट सिलवाने।” दोनों बच्चों की तरह खिलखिला कर हंस रहे थे। बिटिया के बचपन के साथ रेवा और आकाश का भी बचपन लौट आया था। कैसा रंगीन कैनवस था उन बचपन की कहानियों का। कभी-कभी अपने बचपन की बातें भी कहानी के रूप में सुना दी जाती थी। बचपन के पहाड़ी घर की छोटी-सी टेरेस को छूता हुआ अलूचे का पेड़। टेरेस से कूद कर पेड़ पर चढ़ जाना। किसी ऊँची डाली पर छिप कर बैठ नंदन, पराग या चंदामामा पढ़ना। या फिर एक डाल से दूसरी डाल पर कूद कर जाना और खट्टे-मीठे अलूचे खाना और फिर माँ-पापा की डाँट।

यादों की लड़ी लम्बी होती जा रही थी। कहानी का सफ़र चल रहा था अभी। याद आया रेवा को जब एक रात लव कुश की कहानी सुनने की फरमाइश की थी बेटी ने। सारे दिन की भाग दौड़ के बाद वह खुद भी थकी हुई थी। पर कहानी सुनाए बिना तो खैर नहीं थी। सुनाते-सुनाते शायद झपकी आ गई। बिटिया उसे झकझोर रही थी और पूछ रही थी ‘मम्मा क्या लव-कुश भी कैमिस्ट्री पढ़ते थे? आप तो कैमिस्ट्री बोल रहे हो।’ शायद अगले दिन का लेक्चर आ बैठा था कहानी में। आज भी इस बात को याद कर पूरा परिवार हँसता है।

अब चंडीगढ़ भी पहुँचने ही वाले थे वे। ट्रैफिक भी बढ़ रहा था अब। अचानक रेवा को याद आया कि अब तो वह भी दो बच्चों की नानी है। अगली बार मिलने तक तो वह भी कहानी सुनने लायक हो जाएँगे। फिर सोचने लगी कौन-कौन सी कहानी सुनाऊँगी। अब जाकर कुछ बच्चों की किताबें खरीदूंगी और नई-नई आजकल की कहानियाँ पढूंगी। फिर ख़याल आया कि उनके पास तो अलेक्सा है। बटन दबाओ और कहानी हाज़िर। अलेक्सा के पास तो वायस मौडयूलेशन भी है। फिर नानी से उसके नन्हे-मुन्ने कहानी सुनेंगे क्या? वैसे भी उन्हें चाहिए होगी स्मार्ट-सी नानी। शायद मुझे भी कहें नानी आप पार्लर क्यों नहीं जाती? मैं तो सीधी-सादी नानी हूँ। क्या वे समझ पाएँगे वो चेहरे की झुर्रियों में सदियों का डेरा।’ क्या मुझे भी प्लास्टिक सर्जरी करवाने को कहेंगे? यह सब तो मेरे बस का नहीं। रेवा फिर उदास हो गई।

चंडीगढ़ भी आ गया। गोल चक्कर कितने अपने से लग रहे थे। चौड़ी सड़कें, सब तरफ खुलापन और हरियाली देख महसूस हुआ कि अब खुल कर साँस आ रही है। सब अपना-अपना सा लग रहा था। अपने शहर की बात ही कुछ और होती है। शादी के बाद रेवा और आकाश चंडीगढ़ में ही सैटल हो गए थे। आकाश की अच्छी नौकरी थी और रेवा खुश थी अपने कॉलेज में। सुबह लेक पर सैर और शाम दोस्तों के संग गुजरती। कभी-कभी नाटक या डाँस फेस्टीवल देखने चले जाते। पहाड़ नज़दीक होने से अक्सर शिमला, कसौली या नालदेहरा घूम आते। घर भी आ गया इतने में और दोनों व्यस्त हो गए सामान उतरवाने में। सूटकेस खाली करना, कपड़े समेटना, कितना काम हो जाता है। रात का खाना भी बनवाना है। सुबह-सुबह आकाश ने गोल्फ खेलने भी जाना है। रेवा उलझ गई अपनी गृहस्थी में।

रात को बिटिया से बात हुई तो मैडम अलेक्सा भी याद आ गई। सुन कर हंस दी बिटिया। माँ यह कहानी की रीत तो सदियों से चली आ रही है और चलती रहेगी। कौशल्या माँ भी सुनाती थी राम को कहानी और यशोदा माँ सुनाती थी कहानी कृष्ण को। जो मजा नानी, दादी या माँ से कहानी सुनने में है, वह अलेक्सा में कहाँ। बार-बार एक ही बात को दोहराना और खुल कर हँसना, क्या हो पाएगा अलेक्सा या फिर किसी और गैजेट के साथ? उनके मन के अनुसार कहानी को घुमाना तो हम ही कर सकते हैं। आपकी अलेक्सा के साथ कोई प्रतिस्पर्धा नहीं। जल्दी-जल्दी प्रोग्राम बनाओ और आकर बच्चों को कहानी सुनाओ। आप जैसी हो वैसी ही अच्छी लगती हो हमें। आप जैसा प्यार और कहाँ मिलेगा। कोई ज़रूरत नहीं फेस लिफ्ट या प्लास्टिक सर्जरी की। हमारी सादी-सी माँ ही भली।

सुन कर खुश हो गई रेवा। मन को सुकून-सा मिल गया। अब कोई उलझन नहीं। बेटी और नन्हे-मुन्नों पर प्यार उमड़ आया और आँख फिर भीग गई। आकाश को बताया तो हंस पड़ा वह। ‘पागल हो तुम। न जाने क्या-क्या सोच लेती हो। बहुत रात हो गई है ‘सो जाओ अब’। रेवा भी जल्दी से बिस्तर में घुस गई। कल बहुत काम है। बिटिया के बचपन की किताबें निकालनी हैं। कुछ को जिल्द बाँधने के लिए भेजना है। रात सपनों में भी रेवा कहानियाँ बुन रही थी। कहानियाँ सुना रही थी। कहानी का सफ़र तो अभी भी चल रहा था। उसकी दुनिया बेहद रंगीन और खूबसूरत हो उठी थी। सुबह उठी तो मन में एक नई उमंग थी।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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