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नमस्कार-21 श्रेष्ठ युवामन की कहानियां पंजाब: Hindi Stories
Namaskar

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Hindi Stories: जब दूसरा विश्व युद्ध आरंभ हुआ, उस समय कॉलेज में पढ़ रहे या पढ़ चुके अधिकतर नौजवान फौज में भर्ती हो गए। जिसे दोनों आंखों से स्पष्ट दिखाई देता था और वह दसवीं श्रेणी पास था, वह लेफ्टिनेंट बनने की अर्जी दे सकता था। अर्जी देने के बाद नौजवान अंग्रेजी बोलना सीखते क्योंकि भर्ती समय इंटरव्यू अंग्रेजी में ही होता था। साथ ही वह बनना-संवरना भी सीखते ताकि उनका ताल्लुक बड़े खानदान से दिखाई दे। स्टालिन और हिटलर जैसे जो मोची व कहारों की श्रेणी से थे, उनके संसार में प्रगट होने के बावजूद अभी भी यही विचार कायम था कि अंग्रेज केवल संपन्न हिन्दुस्तानियों को ही अधिकारी के योग्य समझते हैं। इस विपत्ति के समय अंग्रेजों के पास ऐसे भुलावे देखने की फुरसत नहीं थी। विशेषकर जब हिन्दुस्तान में भर्ती का उनका काम ठीक चल रहा था। जिन हजारों हिन्दुस्तानियों को उन्होंने ‘लेफ्टिनेंट’ बनाया, उनमें से एक मैं भी था। यह बात कोई विशेष उल्लेखनीय नहीं थी क्योंकि आस-पास सभी नौजवान लेफ्टेिनेंट बन रहे थे। प्रत्येक गांव से ही अनेक लेफ्टिनेंट गए थे। प्रशिक्षण केन्द्र, जिसे अधिकारी ट्रेनिंग स्कूल कहते थे, जा कर ऐसे मालूम हुआ मानो सारी फौज में लेफ्टिनेंट ही होंगे, सिपाही कोई नहीं होगा।

परन्तु प्रशिक्षण के बाद यूनिटों में पहुंचने पर मालूम हुआ कि हिन्दुस्तानी फौज में भी हिन्दस्तानी अफसर आटे में नमक के बराबर ही थे। आम यनिट में तीस-पैंतीस अफसरों में से दो-तीन ही हिन्दस्तानी होते और अन्य अंग्रेज ही। बडा अफसर तो कोई हिन्दस्तानी था ही नहीं। भले हमारी तनख्वाह. अधिकार और सरदारी में कोई अंतर नहीं था, खाना-पीना और सोना-बैठना भी एक साथ ही था, फिर भी ना अंग्रेज हमें अपने बराबर का समझते थे और ना ही हम स्वयं को उनकी बराबरी का मानते थे। किसी गोरे सिपाही का नम्रतापूर्वक सलाम करना या किसी अंग्रेज नर्स का प्यार से बात करना ही हमारे लिए स्वर्ग का झूला झूलने के समान था। इस ना-बराबरी की स्थिति के लिए ना वह पूर्ण रूप से कसूरवार थे और न ही हम। सौ-डेढ साल से हालात ही ऐसे रहे थे। इस प्राकृतिक अंतर का उस समय एक बड़ा संकेत यह था कि हम अपनी फौजी नौकरी को परमात्मा और सरकार की अत्यन्त कृपा समझते थे और उस नौकरी का इस प्रकार स्थाई हो जाना, हमारे लिए एक सुंदर सपना था जबकि अंग्रेजों को जबरदस्ती फौज में भर्ती किया गया था और वे प्रतीक्षा कर रहे थे कि कब जंग समाप्त हो और कब उनकी फौज की इस नौकरी से खलासी हो। भले उनमें कई बहुत अच्छे व्यक्ति थे परन्तु उनका और हमारा आपसी समन्वय नहीं था, दिल की कोई साझ नहीं थी। हम एक साथ शराब पीते, औरतों, अपने देश के रीति-रिवाजों की, धर्मों की और बोली-भाषा की झूठी-सच्ची बातें करते और फिर हंसते-हंसते सो जाते। कभी किसी अंग्रेज ने यह नहीं कहा था कि, अगर तुम छुट्टी लेकर गांव जा रहे हो, तो मैं भी छुट्टी लेकर तुम्हारे साथ गांव चलता हूं।

हां, एक अंग्रेज अफसर था, जिसे हम हिन्दुस्तानियों से स्नेह था। उसका नाम मिलंग्टन था।

मिलंग्टन कैंब्रिज यूनिवसिर्टी में पढ़ते हुए हिन्दुस्तान आया था। वह धर्म व फिलासफी का छात्र था। बहुत कोमल-सा दिखाई देता था। उसकी आंखों में सदा प्यार दिखाई देता। उसकी नजर हर किसी को उसके निकट होने के लिए आमंत्रित करती प्रतीत होती थी। अंग्रेज अधिकारियों में वह अधिक ऊंचे स्तर का नहीं माना जाता था। मैस में वह अधिक बोलता नहीं था। परेड के समय भी वह अधिक फुर्ती नहीं दिखाता था। परन्तु उसे घटिया भी नहीं माना जाता था। वास्तव में जो अंग्रेज अफसर सुबह-सवेरे उठ कर बामुश्किल अपनी दाढ़ी संवार कर परेड पर आ जाए और मुश्किल से ही अपना काम पूरा कर ले, उसे आखिर घटिया तो नहीं कहा जा सकता। जबकि अन्य अंग्रेज अफसर इस प्रकार चलते-फिरते थे, जैसे सौ-सौ मील तक कोई उनके स्तर का हो ही न सकता हो।

ड्यूटी से फारिग होकर वह हिन्दुस्तानी कपड़े पहन लेता, पठानी सलवार-कमीज और सिर पर तुर्रेदार पगड़ी। अपने बैरे के साथ वह हिन्दुस्तानी में बात करता। उसे अंग्रेजी सिखाने की बजाय स्वयं उससे हिन्दस्तानी सीखता रहता। भारतीय सभ्यता संबंधी उसके पास कई पुस्तकें थी। मैं उसे कोई नई बात नहीं बता पाया। उसे सब पहले ही मालम ही होता था। मेरे मंह से बातें सनने की बजाय वह मझे भीतर से टटोलता रहता था। हम बिना बात किए ही कितनी-कितनी देर तक एक साथ बैठे रहते। छुट्टी के दिन शिकार खेलने के बहाने, हम गांवों की ओर निकल जाते और वह मेरे द्वारा लोगों से बातें करता रहता। उनके घर-घाट घूम-फिर कर देखता। सामान्य कपड़े पहन कर हम शाहजहांपुर के बाजारों में घूमते रहते। लखनऊ की कोठेवालियों का गाना सुनते और उनका नाच देखते। जिस प्रकार फौजी अफसरों की कोठियां उसकी दुनिया थी और मैं एक आमंत्रित या बिन बुलाया अतिथि था। इस प्रकार ये बाजार मेरी दुनिया थे। मगर यहां भी वह मुझ से अधिक स्वाद लेता था। उसे हिन्दुस्तानी नृत्य और संगीत की काफी समझ थी। मैं तो घोषणा किए जाने के बाद ही यह बता सकता था कि ठुमरी गाई जा रही है या दादरा। बरेली में हम ‘प्राईवेट’ गानेवालियों के घरों में जाते। उनके बिस्तर पर बैठ कर वह उनके साथ बच्चों समान बातें करता रहता। वहां से उठ कर बाहर आ कर बैठा रहता या टहलता रहता और देखता कि कौन-से लोग उनके पास आते थे? क्या बातें करते थे?

ऐसा प्रतीत होता था कि इस देश में अंग्रेजी सत्ता को बचाने के लिए आने के बावजूद उसे इस देश से स्नेह हो गया हो। अपनी नौकरी करने की बजाय उसका अधिक ध्यान भारत की आत्मा को टटोलने की ओर था। एक बार मोटर से अल्मोड़ा जाते हुए, रास्ते में अत्यन्त सुंदर पहाड़ी दृश्य देखने को मिले। वह मस्त हो कर उन्हें देखता रहा, फिर उसने हाथ जोड़ कर माथा टेक दिया।

“तुम किसे नमस्कार कर रहे हो?” मैंने पूछा।

“पता नहीं किसे, मगर मेरा जी चाहा।” उसने कहा।

उसी यूनिट के दौरान ही मुझे फौज से छुट्टी मिल गई।

नौकरी छोड़ कर आते समय, मैं मिलंग्टन से मिलने गया।

“यहां से फारिग होकर, मैं अपने देश वापस लौट जाऊंगा।” उसने कहा। “अगर तुम कभी उस ओर आए तो मुझसे अवश्य मिलना। मेरा स्थाई पता ग्ररिंडले बैंक, लंदन है। मेरा उनके साथ हिसाब है। मैं जहां कहीं भी रहूं, उन्हें मालूम होता है। मेरी प्रत्येक चिट्ठी वह मुझे वही भेज देते है। एकदम सरल और सीधा पता है मेरा। अब तुम्हारे पास मुझे अपना पता ना देने का कोई बहाना नहीं रहा।”

“अगले कई वर्षों तक मेरे इंग्लैंड जाने की कोई उम्मीद नहीं।” मैंने उसे बताया। “हो सकता है, बाद में कभी मेरा वहां जाने का मन ही न करे। इसलिए इस पते का मैं कभी इस्तेमाल नहीं कर पाऊंगा। तुम इस मुलाकात को आखिरी ही समझो।”

“नहीं….नहीं…। शायद यह आखिरी साबित न हो। दुनिया बहुत छोटी हो रही है। संभव है, मैं ही कभी इस ओर आ जाऊं। तुम मुझे अपना एकदम स्थाई पता लिख कर दे दो।”

एक कागज पर मैंने उसे अपना नाम, गांव, डाकखाना और जिला लिख कर उसके हाथ में दे दिया।

उसने उस एड्रेस को पढ़ कर देखा कि वह सारे अक्षर पढ़ सकता है कि नहीं।

“यह तुम्हारा स्थाई पता है?” उसने पूछा। वह मेरे गांव को इंग्लैंड के एक बड़े बैंक से कम स्थिर समझता था ।

“हां अनगिनत सदियों से मेरे पूर्वजों का यही पता-ठिकाना रहा है। तुम्हारी उम्र तक तो यह कायम ही रहेगा।” मैंने गर्व से कहा।

उसने मेरी बात सुनकर खड़े-खड़े ही माथा निवा दिया।

“तुम ने किसे नमस्कार किया?”

“पता नहीं, मगर मेरा जी चाहा।”

“नहीं, तुम्हें मालूम है, तुमने मुझे नमस्कार किया है।”

“नहीं, बिलकुल भी नहीं। मैं प्राणियों को ऐसा नमस्कार नहीं करता। तुम्हारे जाने पर क्या मैं तुम्हें बड़ा अफसर समझ कर सैल्यूट करूंगा।”

मैं उससे कुछ समय पहले ही भर्ती हुआ था।

इसके कुछ समय पश्चात् ब्रिटिश शासन समाप्त हो गया। विदेशों में कई प्रकार की बातें हुई। किसी ने कहा, यह देश डूब जाएगा। टुकड़े-टुकड़े हो कर खत्म हो जाएगा। किसी ने कहा, यह देश अभी स्वतंत्र नहीं हुआ, यह केवल भम्र है, छल है। कुछ कहते, बात कुछ इसी प्रकार की है। इन सभी शंकाओं के बीच नया भारत धीरे-धीरे कदम बढ़ाने लगा। यह उम्मीद बनने लगी कि किसी दिन यह उठ कर खड़ा हो जाएगा और फिर चल कर या भाग कर, दूसरे बड़े देशों के साथ जाकर मिल जाएगा। काम कैसे हो रहा है? करोड़ों की आबादी की गुजर-बसर कैसे हो रही है? यह देखने के लिए विदेशों से लोग आने लगे। कुछ यह देखने के लिए आते कि दुनिया के दो बडे गुटों में से यह किस के साथ जा कर खडा होगा। जैसे जटों के दो धड़े किसी औरत से बयान दिलवाते समय किरपानें खींच, अदालत के बाहर घूमते रहते हैं।

कुछ बरस और निकल गए। एक दिन मेरी मां ने कहा, “एक अजीब-सी टिकट वाली चिट्ठी आई है।” मैंने चिट्ठी देखी, उस पर अंग्रेजों की मलिका की तस्वीर थी। टिकट पर इसके बाप की तस्वीर को मैं अजनबी नहीं समझती थी, मगर यह तस्वीर उसे अजनबी प्रतीत हुई। चलो, कुछ तो अंतर है, मैंने सोचा। चिट्ठी खोली। मिलंग्टन की थी। वह भारत आ रहा था। वहां बैठे बिठाए ही उसने दिल्ली के एक होटल में कमरा ले लिया था। मुझे उस ने उसी होटल में मिलने के लिए लिखा था।

मैं दिल्ली गया। मिलंग्टन को पहचानना अधिक मुश्किल नहीं था। उसने पहली की तरह ही छोटी-छोटी मूछे रखी हुई थी, जो पहले की तरह ही भूरी थी।

“चलो, तुम्हारे पंजाब चलते हैं।” उसने कहा।

“क्यों, दिल्ली पसंद नहीं आई। ” मैंने पूछा।

“पसंद-ना-पसंद का सवाल नहीं। यह मेरी पकड़ में नहीं आ रही। कोई दाना हाथ में नहीं आता, जिसे देख कर दाल का अंदाजा हो सके। मैं नये भारत की नब्ज देखना चाहता हूं।” उसने अखबारी भाषा में कहा।

“पंजाब में दो ही स्थानों को अधिकतर नया माना जाता है, एक भाखड़ा नांगल और दूसरा चंडीगढ़।” मैंने टूरिस्ट गाइड की तरह कहा।

“इन दोनों के बारे में मैंने सुना है। मैं ये देखने यहां नहीं आया। ये तो कहीं भी बन सकते हैं।”

“फिर मैं तुम्हें क्या दिखाऊं?”

“बस, तुम मुझे घुमाते जाना, शायद मेरे पल्ले कुछ पड़ जाए।”

मैं उसे पंजाब ले आया। हम जगह-जगह घूमने लगे।

एक दिन एक मुख्य सड़क पर जा रहे थे। दो सड़कों के मध्य बने गोल चक्कर पर वह अकेली खड़ी थी। यदि किसी ने किसी शहजादी को कभी चौक में खड़े देखा हो तो वह वैसे ही लगती रही होगी। यदि शहजादी इतनी सुंदर और लंबी नहीं होगी तो और कौन होगा? उसने अत्यन्त सलीकेदार वस्त्र पहने हुए थे। शोख भी कहे जा सकते है। हर आने-जाने वालों का ध्यान वह खींच रही थी मगर उसका अपना ध्यान इस बात की ओर नहीं था। वह बड़े ध्यान से सड़क पर आने-जाने वालों में से किसी को तलाश कर रही थी। ऐसा लग रहा था, जैसे वह आंखों द्वारा सांस ले रही हो। जब उसकी नजर हम पर पड़ी तो वह मुझे देख कर मुस्करा दी। मेरा ख्याल है कि मिलंग्टन भी मेरी तरह उसी की ओर देख रहा था, हालांकि अभी हमने उससे कोई बात नहीं की थी।

“तुम इसे जानते हो?” मिलंग्टन ने एकदम चौकन्ना होते हुए कहा।

“हां, लग तो कुछ ऐसा ही रहा है।”

“कौन है यह?”

“डॉक्टर है। इसने मेरे बच्चे का इलाज किया था। तभी से मुझसे वाकिफ है।”

“मैं इससे बातें करना चाहता हूं।”

“मैं भी। क्योंकि जब मैंने इसे पहले देखा था, तब से अब इसके चेहरे पर अधिक रौनक है।”

उसके पास पहुंच कर, हम भी दोनों उस चक्कर पर चढ़ गए। आस-पास ट्रैफिक घूम रहा था, लोग आ-जा रहे थे। मिलंग्टन से परिचय करवाने के बाद मैंने पूछा, “यहां क्या कर रही हो?”

“कुछ खास नहीं। किसी आने वाले को देख रही थी लेकिन अब लगता है, वह नहीं आएगा।”

“चलो फिर कॉफी पीते हैं।”

“चलिए…।”

हम एक होटल में चले गए।

“सुनाओ, तुम्हारी डॉक्टरी का क्या हाल है?” मैंने मिलंग्टन की ओर से उसे अंग्रेजी में कुरेदना शुरू किया।

“डॉक्टरी? ठीक है। मगर एक बात हुई है। शहर छोड़ कर मैं गांवों में जा घुसी हूं।” फिर उसने स्पष्ट किया, “अब मैं बस अपने इलाके में ही घूमती हूं, जिनकी मैं बेटी हूं।”

“क्यों? शहर क्यों बुरा लगने लगा?”

“यहां काम कुछ मशीनी-सा लगता है। डॉक्टर बस रोग हटाने की एक मशीन हैं। पैसे दो, रोग दूर भगा लो। फर्क समझते है न? बहुत सूक्ष्म-सा है….। ऐसा लगता है जैसे मुझसे किसी का कोई संबंध नहीं, केवल मेरे काम से ही मतलब है।”

“परन्तु बीमार को तो डॉक्टर की जरूरत होती है, तुम्हारी नहीं।”

“मान लिया। मगर वहां बात कुछ और ही है।” फिर उसने नम्रतापूर्वक, कुछ मजाक से मिलंग्टन से कहा, “मैं एक किस्सा सुनाऊं?”

मिलंग्टन उसकी ओर देख कर प्रेम से मुस्कराया, जैसे कह रहा हो, ‘तुम जो भी कहोगी, तौल कर ही कहोगी, किस्सा या गप्प बिलकुल नहीं कहोगी।’

“कभी-कभी तो मुझे लगता है, जैसे मैं अपने गांवों में अपने तरीके से, घूम-फिर कर वहां की औरतों में जान डाल रही हूं। जैसे उनके लिए जीने का रास्ता खोल रही हूं।”

मुझे उसकी बात अस्पष्ट-सी लगी। वह अपने शख्सियत द्वारा औरतों को आजादी का एहसास करवा रही थी। अपना संशय दूर करने के लिए मैंने कहा, “पता नहीं, मैं तुम्हारी बात पूरी तरह से समझ पाया है कि नहीं, मगर यदि स्यालकोट की बेटी हीर, अपना किस्सा लिखवा कर और हर आदमी के मुंह से उसे गाए जाने पर भी, औरतों का रास्ता ना खोल पाई तो तुम घूम-फिर कर कैसे यह रास्ता खोल दोगी?”

“नहीं, वो बात और है।” उसने तुरन्त सिरा थाम लिया और कहा, “आदर मरी हुई हीर का हुआ है। जीते जी हीर का कहीं कोई आदर नहीं था। मौत के बाद मिले आदर की तुलना किसी जीवित औरत के साथ नहीं की जा सकती। मेरे ओहदे के कारण और मेरे पेशे से लाभ होने के कारण, मेरा जीते जी सम्मान है। अन्य जीवित स्त्रियां भी इसमें हिस्सेदार हो सकती है।”

“मगर सभी तो डॉक्टर नहीं। वो किस प्रकार हिस्सेदार हो सकती हैं?” मिलंग्टन ने तर्क का एक सिरा अपने हाथों में थाम लिया।

“आप जैसे अंग्रेजों के लिए यह बात अचरज वाली होगी। मगर यहां सही है। जब एक स्त्री जहां चाहे घूमती-फिरती हो, जिस प्रकार के चाहे कपड़े पहनती हो, जो चाहे करती हो और फिर भी सम्मानपूर्वक रहती हो तो यह बात लोगों के मन में घर कर जाती है, कि उनकी एक बेटी के पास उच्च शिक्षा है, जिसके द्वारा वह उन्हीं के कल्याण के लिए गांव-गांव घूम रही है तो फिर उससे अधिक आदरणीय और कौन होगा? मेरी सूरत इलाके के प्रत्येक पुरुष-स्त्री के सामने है। अन्य औरतों को कैसा जीवन मिलना चाहिए, इस बात की कल्पना करने पर, मैं कहती हूं, इसमें मेरी इस तस्वीर का योगदान है।”

मिलंग्टन चुप हो गया। वह होटल की सामने वाली दीवार की ओर एकटक देखने लगा। वह शायद उसे गांवों में घूमते देख रहा था, कभी साइकिल पर, कभी तांगे पर। गांव के बूढ़े लोगों व किसानों के लिए वह एक आदर्श स्त्री की तस्वीर थी।

“अरे! मैंने कितनी गप्पें मार ली। हम हिन्दुस्तानियों को कोई शर्म-लिहाज छु तक नहीं गया।” मिलंग्टन को अपने में मगन देख कर उसने कहा। “अच्छा, अब इजाजत दीजिए। आज आप लोगों ने मुझसे कैसी बातें उगलवा ली।” उसने उठ कर खड़े होते हुए कहा।

होटल के बरामदे में आ कर हमने उसे विदा किया।

वह कुछ दूर चली गई तो मिलंग्टन ने पहले की भांति ही हाथ जोड़ कर शीश नवाया।

“तुम ने किसे नमस्कार किया?” मैंने पूछा।

“उस स्त्री को।”

“तुम तो कहते थे, मैं किसी प्राणी को इस प्रकार का नमस्कार नहीं करता।”

“नहीं, वह अकेली प्राणी नहीं। यह एक लहर की तरह है, एक हवा है, एक रंग है। वास्तव में यही तुम्हारे नवीन भारत की पहचान है।”

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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