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कुरूक्षेत्र-21 श्रेष्ठ नारीमन की कहानियां: Mother Story
Kurukshetra

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Mother Story: हर समय डर-सा क्यों लगता है? अंतर्मन किसी अदृश्य भय से कांपता रहता है।

औरतें मायके के लिए आकर्षित रहती हैं, सारी उम्र। मेरे साथ भी ऐसा ही था। हफ्ता से अधिक गुजरने नहीं देती थी। त्रिया-चरित्र भी दिखाना पड़ता था कई बार। रूठने-मनाने का नाटक। कैसे भी करके, मनीष को साथ लिजाने के लिए तैयार कर ही लेती थी। खुदा-ना-खास्ता, बिजनेस के मामले में मनीष के पास जाने का समय ना होता तो ड्राईवर को साथ लेकर खुद ही चली जाती थी मायके की ओर।

परन्तु अब….?

अब तो मनीष मेरे मायके की ओर जाने का नाम भी ले तो घबराहट होने लगती है। सात-आठ सालों में इतना परिवर्तन आ गया। अब कोई चाव नहीं रहा मायके जाने के लिए। कोई न कोई बहाना बना कर टाल देती हूं। मम्मी से मिलने का रत्ती भर जी नहीं चाहता। हां. पापा को अवश्य मिस करती हूं। परन्तु पापा से अकेले में कैसे मिल सकती हूं, पेरेंटस की ओर जाऊंगी तो मम्मी भी मिलेंगी ही, मगर मम्मी को देखते ही मन डूबने लगता है। धड़कन मानो रुकने लगती है।

रिश्तों की उधेड़बुन में ही उलझी रहती हूं।

मां से बने अपने रिश्ते को नए अर्थ देने लगती हूं।

इस नए रिश्ते की परिभाषा किसी शब्दकोष में भी तो नहीं मिलती। जब शब्दकोष बने। तब शायद ऐसे रिश्तों का कोई कन्स्पैट था ही नहीं।

ये रिश्ते भी अजीब शै हैं?

मनुष्य आए दिन नित नए रिश्ते गढ़ना चाहता है। आदिकाल से ही मनुष्य की प्रवृत्ति ऐसी ही रही है। यदि ऐसा ना रहा होता तो मनुष्य बच्चे ही क्यों पैदा करता।

कौन चाहता है, उसके बच्चे ना हों।

बच्चों के आगे फिर बच्चे ना हों।

इस प्रकार वंश आगे बढ़ता ही रहे पीढ़ी दर पीढ़ी।

मनीष भी तो यही चाहता रहा होगा। उसके खून से कोई फूल खिले। उसके बारे में सोचते हुए वह सही लगने लगता।

कहां-कहां नहीं ले कर गया है मुझे। महंगे से महंगे डॉक्टर के पास। देसी वैद्य-हकीमों के पास। मंदिर, गुरुद्वारे। जंगलों, पहाड़ों और ज्योतिषियों के पास, बाबाओं के पास। वैष्णों देवी, गोपाल मोचन, राम तीर्थ, कोई भी मार्ग उसने छोड़ा नहीं।

उसकी सोच तो हर समय अपना वारिस पैदा करने में ही लगी रहती। शायद दुनिया के हर मर्द को अपना वारिस चाहिए ही होता है।

अक्सर सोचती हूं, केवल मर्द को ही वारिस की आवश्यकता होती है? औरत को वारिस नहीं चाहिए क्या? शायद नहीं, तभी मैंने कभी सुना नहीं, ना ही कहीं पढ़ा कि औरत ने औलाद की खातिर दूसरा विवाह किया हो। शायद औरत सोचती है, वारिस के रूप में एक मालिक ही तो पैदा करना है। अपनी गुलामी का एक और साधन।

कितना सब्र है औरत जात में। धरती मां समान….।

धरती मां पर कोई मिट्टी का ढेर लगा देता है, कोई कुआं खोद देता है, बेचारी उफ्फ! तक नहीं करती।

आदमी तो भरा घड़ा है। जल्दी ही उछलने लगता है। इसमें कोई सब्र या संयम नहीं। मनीष में भी संयम कहां था?

मुझसे छोटी बिन्दू पीएमटी की कोचिंग लेने के लिए यहां आई थी। एक से बढ़ कर एक कोचिंग अकादमियां हैं इस शहर में। वह महीना भर मेरे पास रही। वह महीना मेरे लिए एक साल नहीं एक युग-सा हो गया। भगवान को याद करते हुए मैंने वक्त निकाला। बाद में मैं पछताती रही, बिन्दू को कोचिंग के लिए अपने पास क्यों बुलाया। मैंने ही मम्मी-डैडी को फोन करके बिन्दू को यहां भेजने के लिए कहा था। यहां ब्रिल्येंट अकादमी का अपना नाम है। आए साल उसके विद्यार्थी आई.ए.एस. और पी.सी.एस. में सलेक्ट होते हैं। परन्तु मैं जैसे अपने जाल में खुद ही फंस गई थी। मानो, मैंने अपने पैर पर स्वयं कुल्हाड़ी मार ली थी। मर्दो का क्या है। फिसलते बर्तन हैं। जीज, जीज, करती बिन्दु मुझे जहर-सी प्रतीत होती। हर समय मनीष के साथ खिलखिलाती रहती। उसे देख मैं जल-भुन जाती। किसी न किसी बात पर घर में हंसी-मजाक चलता ही रहता। मैं ऊपरी मन से हंसती। कितनी डर गई थी मैं अंदर से। मनीष कुछ ज्यादा ही रुचि दिखाने लगा था बिन्दू में। मनीष जो पहले देर रात तक काम से नहीं लौटता था, अब शाम के पांच भी नहीं बजने देता था। कई बार तो काम से छुट्टी मार लेता था। आए दिन घर में बढ़िया ड्राई-फ्रूट्स, फूट और स्वीट्स आने लगे। मनीष की घर में बढ़ती दिलचस्पी और मौजूदगी ने मेरे दिमाग के कीड़े को और भी सक्रिय कर दिया था। घर में बिन्दू की मौजूदगी असहनीय प्रतीत होने लगी थी। टेस्ट खत्म होने के बाद बिन्दू कुछ दिन और यहां रहना चाहती थी परन्तु मैं चाहती थी कि वह तुरन्त गाड़ी पकड़े और लौट जाए। मेरी हीन भावना मुझे चैन नहीं लेने दे रही थी। मेरी जमीन पर बीज फूटे होते तो शायद मैं इतनी शक्की ना हुई होती।

बिन्दू के मेरे पास रहते ही मुझे अजीब से सपने आने लगे, डरावने से। ऐसे ही सपने मुझे अब आने लगे हैं। जैसे मैं और मनीष चले जा रहे हैं, दूर, बहुत दूर, किसी घने जंगल में। कहीं से जंगलियों का झुंड आ कर हमें घेर लेता है। मैं कस कर मनीष का हाथ पकड़ लेती हूं। जंगली लोग मनीष को मुझ से छीनने लगते हैं। कितनी ही देर तक जोर अजमाईश होती है, आखिर वे मनीष को मुझसे छीन कर ले जाते हैं। मेरी चीख निकल जाती। चौंक कर उठती और देखती, सारा तन-बदन पसीने से तर होता।

कभी सपना आता, मैं और मनीष चले जा रहे हैं। एक साधू हमें मिलता है, जो हमें इस दिशा में आगे बढ़ने से रोकता है। मनीष अनसुना करके, मेरा हाथ पकड़ कर आगे बढ़ता ही जाता है। घाटियों और गुफाओं में से। किसी राजा के सिपाही हमें पकड़ लेते हैं। वास्तव में यह राजा नहीं कोई दैत्य है। दैत्य मनीष को अपने जादू से तोता बना कर पिंजरे में रख देता है, जहां पहले से ही अनेक मनुष्य तोते के रूप में कैद हैं। मैं चीखते हुए, पागल-सी, पिंजरे के आसपास चक्कर काटती हूं। आखिर हांफते हुए गिर जाती हूं। दैत्य का अट्टहास वातावरण की नीरवता को भंग कर देता है। मेरी चीख निकल जाती। गहरी नींद में सोया मनीष चौंक कर उठ बैठता। मेरे खुश्क होंठों से कोई स्वर नहीं फूटता। दीवानों-सी मैं मनीष की गोद में सिर रख कर रोने लगती।

ऐसा हर दूसरे-चौथे दिन होने लगा।

मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. कुंतल का कहना है कि मेरे भीतर कोई अनजाना भय घर कर गया है। मेरे स्वास्थ्य के लिए इस डर को दूर करना आवश्यक है। डॉक्टर अनुसार, मैं घर में खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करती। मेरे भीतरी डर का कारण भी यही है। मुझे बाहर भेज कर डॉ. कुंतल कितनी देर तक मनीष से बातें करते रहे।

मुझे सुरक्षित करने के इरादे से मनीष ने अपनी बहुत सारी प्रॉपर्टी मेरे नाम कर दी। वह अपने बिजनेस की सारी कमाई मेरे हाथों में रखता। जैसे वह मुझे जतलाना चाहता हो कि घर में सब कुछ तुम्हारा ही है।

परन्तु मुझे हर समय यही लगता रहता कि मेरे पास से सब कुछ खोता जा रहा है।

अपने भीतरी डर के बारे में डॉ. कुंतल को क्या बताऊं? मम्मी और मनीष की बढ़ती निकटता ही मेरा वास्तविक डर है।

मनीष जब मम्मी कहता तो जैसे शब्द उसके मुंह में ही दम तोड़ देता है। उसके चेहरे के हाव-भाव बदल जाते है।

मुझे महसूस होने लगा जैसे मम्मी का व्यवहार भी मनीष के प्रति बदलने लगा है।

मम्मी भी जब मनीष को पुकारती है तो ‘बेटा’ शब्द हवा में ही कहीं खो जाता है।

मैं कुछ और ही सोचने लगती हूं। मुझे और मम्मी को मिलने वालों को अक्सर ही भ्रम होता है और वे हमें मां-बेटी की बजाय, बहनें समझने लगते हैं। उनका ऐसा समझना स्वाभाविक भी है। हमारी उम्र में अंतर ही कितना है महज 16-17 वर्ष का। मम्मी के अनुसार, उनकी शादी दसवीं पढ़ते ही हो गई थी, जब वह सोलह बरस की थी। मनीष मुझसे छः वर्ष बड़ा है। इस प्रकार मम्मी और मनीष की उम्र में अंतर केवल दस वर्ष का ही है। वैसे भी मैंने कहीं पढ़ा था कि आकर्षण में उम्र की कोई सीमा नहीं रहती। मुझे लगता है, दस साल के इस अंतर को भी मम्मी और मनीष के बने नए रिश्ते ने खत्म कर दिया हो।

ऐसे गैर-कुदरती रिश्ते गढ़ने की बीमारी भी बस हम जैसे तथाकथित कुलीन लोगों में ही है। मम्मी जैसे लोग इसे सिविलाईज्ड सोसाइटी का क्लास कल्चर कह कर गर्व महसूस करते हैं।

सिविलाईज्ड सोसाइटी के सदस्य होने के नाते मम्मी और मनीष इस नए बने रिश्ते से खुश हैं। बेहद खुश हैं। मैं क्यों उदास हूं? मुझे इस नए रिश्ते से उबकाई आती है। मैं ही क्यों अनसिविलाईज्ड हूं? मुझे बार-बार अपनी क्लासमेट इंदरप्रीत और उसके पति जमील की याद आती है। हमारी तरह उनकी भी औलाद नहीं हई। दोनों ने अनाथालय से एक बच्चा गोद ले लिया। कितने खुश और आनंदित हैं दोनों। जब भी उनसे मिलती हूं, सोचती हूं, हम भी तो अनाथालय से बच्चा गोद ले सकते हैं। कानूनी तौर पर मैं उसे अपना नाम दे सकती हूं। मां के कॉलम में मेरा ही नाम भरा जाएगा और पापा के तौर पर मनीष का। फिर मम्मी और मनीष को ऐसा करने की आवश्यकता क्या थी। अचानक उस दिन मम्मी साथ ही थी, जब डॉ. डेजी ने फाइनल चैकअप के बाद ‘नो होप’ कहते हुए असहमति और निराशा में सिर हिला दिया था। अपनी दो-ढाई वर्ष की लगातार कोशिश के बाद भी असफल होने का उसे दुख था।

“यू शुड परैफ़ इंवाईटरो फर्टिलाईजेशन।” डॉ. डेजी ने मुझे और मनीष को देखते हुए गौर से मम्मी की ओर देखा था। सारे रास्ते मैं डॉ. डेजी द्वारा मम्मी को भेदभरे ढंग से देखने के बारे में सोचती रही।

इस भेदभरे ढंग से देखने के अर्थ जल्दी ही मुझे समझ में आ गए। इसे अर्थ देने में मम्मी की सहेली डीएवी. गर्ल्स कॉलेज की प्रिंसीपल विभा ने अपना योगदान दिया। बड़ी बोल्ड लेडी है। किसी ना किसी मामले के कारण चर्चित रहती है। चर्चा में रहना उसे अच्छा लगता है।

“यू शुड यूज यूअर मदर,” मैडम विभा ने अत्यन्त सहजता से मुझ से कहा। मैं मनीष और मम्मी रात के खाने पर उनके घर आमंत्रित थे। मेरी समझ में कुछ ना आया।

“यस, यूअर मदर कैन डू इट, स्टिल सी इज यंग।” एक भेदभरी नजर से उसने मम्मी की ओर देखा। मनीष की नजरें मम्मी के शरीर की ओर, विशेषकर छाती की ओर घूमते देख, मुझे शर्म और कोफ्त महसूस होने लगी। मुझे अभी भी मैडम विभा की समझ नहीं आई थी, आखिर वह कहना क्या चाह रही थीं। बस इतना समझ पाई थी कि बात कुछ अजीब हो रही है। इखलाक और परंपरा से बाहर की। हमारा कुलीन वर्ग भी अजीब है। ऐसी बातें करने के लिए अंग्रेजी का सहारा लेता है। शायद ऐसी बातें अपनी मातृ-भाषा में नहीं की जा सकती।

“आंटी! विमल को मैं खुद समझा दूंगा सब कुछ।” मैं कितने ही दिन मैडम विभा की बातों के इधर-उधर के अर्थ निकालती रही। जब तक मनीष ने सही मौका देख कर मझे समझा नहीं दिया था।

“विम…। प्रिंसीपल आंटी के बाद, मैंने और मम्मा ने डॉ. डेजी से भी डिस्कस किया है। यू नो डॉ. डेजी कभी गलत गाईड नहीं करतीं। उन्होंने मम्मी का चेककप भी कर लिया है। एवरीथिंग इज ओके। दे कैन सोल्व अवर प्रॉब्लम, एज ए सरोगेट मदर। हम अपने बच्चे के लिए मम्मा की कोख को इस्तेमाल कर सकते हैं। दे कैन गिव अस बेबी।”

नाईट बल्ब के लाल प्रकाश में भी मनीष का चेहरा सफेद था। भरी सर्दी में भी पसीने की बूंदें उसके चेहरे पर चमक रही थीं।

“इफ यू डोंट माईंड, वी कैन।”

“जब तुम्हें कोई एतराज नहीं, मम्मा को कोई एतराज नहीं, मेरे माईंड करने या ना करने से क्या फर्क पडेगा? फिर तुम ने इरादा कर ही लिया है।” मैंने अत्यन्त संयम से कहा, जबकि अंतर्मन में मैं शांत नहीं थी।

फिर मनीष कितनी देर तक बताता रहा, आर्टिफिशियल तरीके से कैसे उसका सीमैन मम्मी की कोख में टिकाया जाएगा। मम्मी की कोख से पैदा होने वाला बच्चा उनका अपना खून होगा। इस बच्चे के साथ जो ममता आएगी, वो अनाथालय से गोद लिए किसी बच्चे के साथ कैसे बन सकती है। अब जब मम्मी की कोख में मनीष का अपना खून पल रहा है, मुझे लगता है, मेरे सारे रिश्ते रुठ गए हैं।

मैं उखड़ी-उखड़ी रहने लगी। खाली-खाली सी।

मनीष आजकल भरा-भरा सा महसूस करता।

प्रिंसीपल विभा आजकल फिर से जोरदार चर्चा में है। उसकी काली शीशों वाली पिजारौ की पिछली सीट पर उनसे बीस वर्ष छोटा उनका एक विद्यार्थी बैठता है।

प्रिंसीपल विभा मम्मी की तारीफ करती है, “आप बच्चों की खातिर सैक्रीफाईस कर रहे हो। दिस इज दा ग्रेट कंटरीब्यूिशन फॉर अवर सोसाइटी।”

मैं इस वर्ग के खोखलेपन पर भीतर से हंस देती हूं। इस वर्ग के लिए कुर्बानी के भी अपने ही अर्थ हैं। जी चाहता है, इस प्रिंसीपल से कहूं, अपने स्टूडेंट को गाड़ी में झूले देते हुए, आप भी बहुत बड़ी कुर्बानी दे रही हैं।”

“शी इज रीयली ए ग्रेट वोमैन। शी ब्हेवज लाईक ए फ्रेंड, नॉट लाईक ए मदर-इन लॉ।’ मनीष अक्सर मम्मी की तारीफ करता। मुझे कोफ्त होने लगती, उसके इन शब्दों से। मनीष के चेहरे पर बनावटी झलक स्पष्ट प्रतीत होती, जैसे वह अदाकारी कर रहा हो।

मम्मा भी प्रिंसीपल विभा की अक्सर तारीफ करती, “ग्रेट लेडी। सारे समाज को नोक पर रखती है। अपने ढंग से जिन्दगी जीती है। अपना रास्ता खद तलाश करती है।”

“रास्ते तो आप ने भी स्वयं ही चुना है!” कहते हुए भी मैं कह नहीं पाती।

प्रिंसीपल विभा अक्सर अपने नए रास्ते के बारे में कहती, “सदियों से आदमी औरत को यूज करता आया है, नाउ वी आर यूजिंग ए मैन।” वह विवाह संस्था का भी मजाक उड़ाती है। अक्सर कहती है, “बच्चे की आवश्यकता हुई तो सीमैन बैंक से सीमैन इंजेक्ट करवा कर बच्चा पैदा कर लूंगी, इसके लिए विवाह करवा कर सारी उम्र की गुलामी सहने की क्या आवश्यकता है?”

अपनी हालत संबंधी अनुकर्णिका को फोन करती हूं, “तुम अभी भी अठारहवीं सदी में जी रही हो क्या। दुनिया कहां से कहां पहुंच गई है।” उसका जवाब सुन कर मैं सुन्न रह गई। यह वही अनुकर्णिका है, जो कॉलेज में स्टूडेंट लीडर हुआ करती थी और औरत की आजादी की खैरख्वाह! औरत की आजादी की बड़ी-बड़ी बातें करने वाली।

मनीष हर समय घर में आने वाले नए बच्चे की बातें करता रहता है। मेरा अस्तित्व पल-पल मुझे नकारता महसूस हो रहा है। मैं आने वाले बच्चे के साथ बने अपने नए रिश्ते के बारे में सोचती हूं। फिर मम्मी और मनीष के बने नए रिश्ते के बारे में। मम्मी और अपने बने नए रिश्ते के बारे में।

आजकल मुझे अजीब से दौरे पड़ने लगे हैं। जीभ तालू से चिपक जाती है। आंखें बाहर निकल आती हैं। कितनी देर तक बेहोश रहती हूं। बेहोशी में ही बुदबुदाती रहती हूं। सुनने वाले बताते हैं कि मैं बार-बार कुरूक्षेत्र-कुरूक्षेत्र कहती हूं। डॉ. कुंतल ने मुझे डीएमसी के मनोरोग के विशेषज्ञ डॉ. विशिष्ट को दिखाने के लिए कहा है।

मैं हूं कि कैसे समझाऊं सभी को कि मुझे किसी डॉक्टर को दिखाने की आवश्यकता नहीं।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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