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होलीडे वाईफ-21 श्रेष्ठ नारीमन की कहानियां पंजाब: Holiday Wife Story
Holiday Wife Story

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Holiday Wife Story: क्या आप जानते हैं, मैं होलीडे वाईफ हूं।

मैं भी पागल, एकदम झल्ली। यह बात आपको कैसे मालूम होगी। इसकी जानकारी तो मुझे खुद ही कल हुई। मेरा सो कॉल्ड ‘हबी’ मुझे कल ही तो बता कर गया था। वैसे उससे पहले मैंने वाईफ की ऐसी किसी किस्म के बारे में नहीं सुना था।

मैं अपने ‘हबी’ को इस किस्म के बारे में पूछना चाहती थी, मगर फिर भी मैंने उससे कोई सवाल नहीं किया क्योंकि आज कल हर सवाल का जवाब तो गूगल से मिल जाता है। वैसे भी वह अपने देश जाने के लिए उतावला था और मुझे भी जल्दी थी कि वह यहां से चलता बने।

हमारे रिश्ते में रफनैस पता नहीं कहां से आ गई। पहले जब जगजीत सिंह उर्फ मेरा ‘हबी’ इंडिया आता तो मैं खुशी से फूली ना समाती। किसी कोने में दबे चाव-ख्वाहिशें बाहर निकलने के लिए तड़पने लगते। इतना बड़ा घर जो काटने को दौड़ता था, बसंत बहार-सा महकने लगता। परन्तु अब ऐसा कुछ नहीं होता।

शायद पहले उम्मीद थी कि वह मुझे साथ ले जाएगा। मगर अब जब भी आता, जहां मेरे मन को ढाढस देने के लिए काफी कुछ मेरे सामने रख देता था, वही अब नए बैंड (वीजा अधिनियम) का बहाना भी मेरे लिए ले आता। मैं तड़प जाती तो वह खीझ कर कहता, “सब कुछ तुम्हें बता कर ही तो विवाह किया था, कोई झूठ तो नहीं बोला था।”

वह ठीक कह रहा था। सब कछ बता कर तो विवाह करवाया था और मैं बाहर जाने के चक्कर में सब कछ मान गई थी। उसने कहा था, “तुम्हें तीन साल इंडिया रहना पडेगा फिर जब उससे निपटारा हो जाएगा तुम्हें साथ ले जाऊंगा।” वहां जाकर उसने किसी मेम से शादी की स्थाई होने के लिए। परन्तु पूरे सात साल हो गए मेरे विवाह को, वहां पता नहीं इसने मेम से निपटारा किया या नहीं। लेकिन मैं निपटारे तक पहुंच गई। कई बार जी चाहता, सब कुछ छोड़-छाड कर, मुक्त हो जाऊं। यूं ही अपनी जान को जंजाल में फंसा रखा है। मगर फिर लड़के की ममता मार जाती है। जब कोख में था तो बड़े यत्न किए थे कि मेरा छुटकारा हो जाए। मगर जिस जीव ने सांस लेना था, उसी जीव ने मुझे इस घर से बांध दिया था। अब अपनी कोख से पैदा किए पुत्र से बहुत मोह है।

कभी वो भी वक्त था, जमीनों के मालिक, जगजीत सिंह को विवाह के लिए कोई लड़की पसंद नहीं आती थी। मगर मुझे देख तुरन्त राजी हो गया। मेरा नाम चन्नप्रीत जो था। जगजीत सिंह कहता, “चन्न (चांद) के साथ प्रीत लगाई हमने।” विवाह के दिन बिरादरी के ननदों ने गिद्दे में बोली डाली, “वीर लिआया नी…चन्न वरगी भरजाई।” उस समय इसने मेरे कान में कहा, “चन्न जैसी नहीं, मैं तो चांद ही लाया हूं।”

विवाह के पूरे दो साल बाद वह आया था। जब भी वह बेड पर आता, कई गोरी मेमों के अनुभव सारे बिस्तर पर बिछ जाते और मैं वहां होते हुए भी, ना होती। जिन पलों के लिए मैं वर्षों से मुतजिर थी। वे पल मेरे पास आते तो मुझे उबकाई आने लगती। पता नहीं मेरे पास क्या खा-पी कर आता था। पूरा जोर लगा कर भी उससे निपटना मुश्किल हो जाता था। जब में खुद को देखती तो लगता, मुझसे अधिक सुन्दर और कौन हो सकता है मगर मेरे खसम को तो ब्लू फिल्मों जैसी औरत चाहिए थी। एक दिन स्वाभाविक ही मैंने उससे पूछ लिया, “क्या कमी है मुझ में?”

“कमी तुम में नहीं, पूरे इलाके में जटट की रन्न जैसी कोई और औरत नहीं होगी। यू आर ब्यूटीफुल मगर गोरियों जैसा तरीका नहीं है तुम में।”

उसका यह जवाब सुन कर मैं तड़प उठी। मुझ जैसी भरी-पूरी औरत का अर्धागिनी होने का हिस्सा सिकुड़ गया। मैंने उससे कुछ ना कहा। बाथरूम में जाकर खुद को देख कर रोती रही और नहाती रही। पोष-माघ के दिन थे और ठंडे पानी से ही नहा लिया था।

पता नहीं, यह सच्चा था या वो सच्चे थे जो मुझे देखने के लिए कॉलेज के आगे कितने चक्कर लगाया करते थे। अब भी पता नहीं कितने ही फेसबक पर मझे फ्रेंड रिकएस्ट भेज-भेज कर थक गए थे। मगर मेरे खसम को मेरी कद्र नहीं थी और अब वह मुझे ‘होलीडे वाईफ’ की उपाधि देकर चलता बना था।

‘होलीडे वाईफ’ से याद आया, देखू तो सही, यह क्या बला होती है। गगल पर सर्च किया। इस संबंधी सारा लिट्रेचर मेरे सामने आ गया। मेरे माथे पर पसीना झलकने लगा। सारा शरीर झूठा पड़ने लगा। मेरी आंखों के सामने कई ‘होलीडे वाईफस’ घूमने लगी। एक तो हमारे पड़ोस में ही रहती है, जिसे सारे गांव के लोग ‘बुआ’ कहते हैं, मगर मुझे उस जैसी नहीं बनना। अपनी सारी उम्र दांव पर लगा कर, उसकी बीमार मां और उसके बड़े घर की चौकीदारी मैं नहीं कर सकती। फिर जब बच्चे का ख्याल आता तो बेबस हो जाती हूं। बच्चे मां के लिए हाड-मांस की दीवारें बन जाते हैं और इस दीवार को लांघने का जिगरा किसी मां के पास नहीं होता।

मेरी बेबसी ने मुझे रातों को तारें गिनना सिखा दिया। स्थिर सूनी रात में मैंने चांद को देखा, वह अकेला नहीं था। उसके पास आकाश भी था और तारे भी। मगर मैं अकेली थी, रात का सूनापन मुझे डराने लगा और मैंने अपने बच्चे की बांह को अपने गिर्द लपेटने की कोशिश की। परन्तु उसकी छोटी बांह का घेरा मेरे दुख के सामने बहुत छोटा था। आधी रात को बादल घिर आए। चांद कभी किसी बादल के पीछे और कभी किसी के पीछे छिपने लगा। मुझे लगा, जैसे चांद बादलों संग लुका-छिपी खेल रहा हो। यह दृश्य देख, मुझे अपने ‘चन्न माही’ (पति) की याद आ गई, जो पता नहीं इस समय किस बादल के पीछे भागदौड़ कर रहा होगा। एक बार उसने कहा था, “बड़ा गरूर है चन्न तुझे अपने आप पर।” मैंने भी हंसते हुए जवाब दिया था, “हो भी क्यों ना, चांद जो हूं।” याद रखना, चांद को ग्रहण भी लगता है।” उसकी इस बात का मेरे पास कोई जवाब ना था। मगर सचमुच ही उसने मुझे ग्रहण ही लगा दिया था।

सात बरस पीछे मुड़ कर देखती हूं तो कल की बात प्रतीत होती है। इन सात बरसों में विवाह के पहले चार-पांच महीने ही अच्छे से गुजरे थे। अब तो कई बार लगता है, हर साल वह अपनी जमीन का ही हिसाब-किताब करने के लिए आता है और लगे हाथ मेरा भी हिसाब कर जाता है। वैसे जमीन की सारी जिम्मेवारी रिश्ते में लगते मेरे जेठ के जिम्मे थी। ठेके का हिसाब-किताब देते हए जेठ ने मेरी ओर पडताली निगाह से देखा था। उसी पल गले में पड़े दुपट्टे को मैंने अच्छे से शरीर पर ओढ़ लिया था। मुझे लगा. जैसे जेठ की नजरें मेरा हिसाब-किताब कर रही हों। मगर इस बडे हिसाबी-किताबी को क्या मालूम, आग जैसी उम्र में जब अंगार दहकते हैं तो संभलना कितना मुश्किल हो जाता है।

जब तक मेरे घरवाले ने मुझसे रिश्ता ठीक निभाया, तब तक मैंने इन अंगारों को भभकने नहीं दिया। मन को समझा लिया, दिल को समझा लिया। तन को समझाने के लिए ‘पाठ’ करने लगी। पाठ करते हुए जब “अज न सुती कंत सिडु अंगु मुड़े मुड़ि जायि।। जायि पुछहु दोहागणी तुम किडु रैणि विहायि।।” (गुरबाणी) शलोकु उच्चारण करते हुए मेरा मन भर आता। मेरी आवाज कांपने लगती। मुझे लगता, जैसे सारा कसूर मेरा ही हो।

अजीब हालत थी मेरी। आस-पड़ोस में जब किसी दंपत्ति को हंसते-खेलते देखती तो मुझे कुछ होने लगता। मैं सोचती, मेरे दिन कहां चले गए। मेरी हंसी की उम्र पतासे-सी खुर गई प्रतीत होती और हंसी की पगडंडी नापते हुए मैं अपने मायके चली गई।

मुझे देख कर मां उल्लास से भर गई। मगर भाभी कितनी देर तक अपने कमरे से बाहर ना निकली। वैसे भी बाप के मर जाने के बाद यह घर पराया सा ही हो गया था। भाई को मुझ पर पता नहीं किस बात का अविश्वास था कि हर दूसरी बात पर कहने लगा, “यह घर मेरा है।” मैंने स्वाभाविक ही कह दिया, यह घर मेरा भी तो है। भाई ने मेरी ओर कड़वाहट से देखा। मेरी मां ने टोकते हुए कहा, “ना बेटी! अब यह घर मेरे पुत्र-बहू का है।” उसी समय मां ने, मुझे पास बैठी भाभी के सामने हीन कर दिया। कुछ कहे बगैर, भाभी बड़े विजयी भाव से उठी। बरामदे के कोने में मेरी भतीजी ‘बेबी डॉल’ के घर को संवार रही थी। वह उसे देख कर, खुश हो रही थी। भाभी के मन में पता नहीं क्या आया, बेबी डॉल के घर को ठोकर मारते हुए बोली, “एक तो सारा दिन तुम्हारी इस बेबी डॉल के घर का बिखराव ही खत्म नहीं होता।” मुझे अपना सारा शरीर मिट्टी होता प्रतीत हुआ। भतीजा गन ले कर अपनी मां से कहने लगा, “मैं इस गन से अभी इसके बेबी डॉल के घर को तहस-नहस कर दूंगा।” उसके फिल्मी से डॉयलाग पर सभी हंस दिए। भतीजी डर गई। वह दौड़ कर मुझसे लिपट गई और रोने लगी। उसे रोते देख मेरी भी आंखें भर आई। उसके आंसू पोंछते हुए मैं बस इतना ही कह पाई, “मां-बेटी जात-कुजात, बुआ-भतीजी एक ही जात।”

वैसे मैं इस घर में रात रहने के लिए आई थी लेकिन पल-क्षण में ही यह घर मुझे काटने लगा। सोचा, मां से बातें करके ध्यान दूसरी ओर लग जाएगा मगर मां तो काम-धंधे में ही लगी रही। मेरे पास बैठने की उसे फुरसत ही नहीं थी।

“अच्छा मां। मैं चलती हैं।”

“मैं तो काम-धंधे में ही लगी रही, तू रात यहीं रह जाती।”

“नहीं मां, सास घर में अकेली है।”

“चल बेटी, फिर जा। वही तेरा ‘अपना घर’ है।”

“हां मां, अब तो मुझे भी समझ आ गया है, वही मेरा ‘अपना घर’ है, घरवाले के बिना भी।”

“अरे घरवाले के बिना कैसे बेटी, जीता रहे, जहां भी रहे, तुम अपना दिल छोटा मत करो। ऐसे ही होते है घरवाले।”

“हां मां, ऐसे ही होते हैं घरवाले।”

“बेटी! अपने पुत्र की खैर मनाया करो। अगर यह ना होता तो जो थोडी बहुत पूछताछ रखता है, वह भी ना करता। इतना बड़ा घर, नित नई गाड़ी तुम्हारे पास होती है और भला क्या चाहिए होता है।”

“हां मां और मुझे क्या चाहिए।” इतना कह कर मैं उस घर की दहलीज लांघ आई थी। जो घर कभी मेरा भी था। मां ने पल्ले के कोने में बंधे पैसे मुझे देते हुए कहा, “ले बेटी! मां का प्यार!”

“नहीं मां, बहुत कुछ है मेरे घर में।”

“हैं पागल। बेटियां, मां-बाप के घर से कभी खाली हाथ नहीं जाती।” मां ने जबर्दस्ती मेरे हाथों में पैसे दबा दिये। मगर मां को मालूम नहीं, मैं तो उसके घर से खाली हाथ ही चल दी थी।

भरे मन से मैंने गाड़ी स्टार्ट की और अपने घर की ओर चल दी। कार में शब्द गूंज रहा था, “जगत में झूठी देखी प्रीति!’ शब्द सुन कर मैं फफक कर रो दी। कार रोक कर, खुद को थोड़ा शांत किया और कांपते होंठों से शब्द दुहराया, ‘ज..ग…त…में. झू ..ठी.. देखी प्रीति।’ इससे आगे मैं बोल ना पाई। उस पल मुझे लगा, दुनिया की इस भीड़ में कोई भी अपना नहीं, सभी पराए हैं।

“आ गई बेटा।” सास ने आंगन में घुसते ही पूछा।

“हां जी, आना ही था अपने घर।” मैंने सरसरी-सा जवाब दिया।

वैसे मां ठीक ही तो कहती थी, “क्या कमी है मुझे इस घर में। जिन्दगी की सभी सुख-सुविधाएं दे रहा है मुझे यह घर। मगर मैं अपने मन को कैसे समझाऊं। शायद मन को समझाने के लिए ही मैंने अपने ‘सो कॉल्ड हबी’ को फोन कर दिया।

“हां बोलो।” उसकी रूखी आवाज ने मेरी आवाज को दबा दिया।

“और क्या हाल-चाल है आपका।”

“हाल-चाल बढ़िया है। मित्रों की हर रात दीवाली होती है।”

“तुम सुनाओ, ठीक है। चल छोड़ मेरे पुत्र का क्या हाल है, उसके साथ मेरी बात करवा दो। तम से मैं वीकएंड पर बात करूंगा। अब ट्राला लौड करवा रहा हूं।”

“मेरे लिए आपके पास टाईम ही नहीं होता। आप मुझे प्यार ही नहीं करते।”

“अरे, और प्यार क्या होता…तेरा फोन सुन लेता हूं। पैसे की कोई कमी नहीं रहने देता। अगर तुम से प्यार नहीं करता तो यह लड़का कैसे हो गया।”

यह कह कर उसने फोन बंद कर दिया। हर बार उसकी कही-सुनी बातें मेरे सीने पर ततैए-सा डंक मारती। बाहर आई तो नौकर भैंस को मैदान में लेकर जा रहा था। कल से यह किला उखाड़ने पर लगी थी। दिल चाहा, अपने खसम को मैदान में खड़ा कर पूछू, “बच्चे तो गाय-भैंसें भी पैदा कर लेती हैं।”

मुझे मालूम है, उसके पास मेरे लिए टाईम नहीं था। मगर पता नहीं हर बार क्यों उसे फोन करने लगती और हर बार उसकी बेरुखी मुझे पत्थर कर जाती।

इन पत्थराए पलों में मैं सोचती, मैं कैसे रिश्ते को ढो रही हूं जो हमेशा मेरा तिरस्कार करता था। वह इतना निर्मोही हो गया था कि प्यार के दो बोल भी बोल न पाता था। चलो छोड़ो अगर किसी को कोई चाव नहीं तो मुझे भी परवाह नहीं। ऐसे समय में मैं अपने पुत्र को अपने सीने से भींच लेती थी। जब वह मेरे पास होता तो मेरी चिंताएं दूर भाग जाती। पुत्र पैदा होते ही जवान हो जाते हैं। इसके स्कूल में एक दिन मैं पी.टी. मीट पर गई। रास्ते में आते हुए मुझसे कहने लगा, “मम्मा, आप वहां सभी की मम्मीज से सुन्दर लग रहे थे।” उस पल मेरी आंखें छलक उठीं। वह अपने नन्हें-नन्हें पोरों से मेरे आंसू पोंछने लगा। उस दिन बहुत अर्से के बाद मुझे महसूस हुआ कि मेरा भी इस धरती पर कोई अपना है।

वैसे एक और बात बता दूं अब मुझे इस घर की अमीरी भी अच्छी लगने लगी। मेरी भीतरी औरत मुझे कम-अधिक के बारे में समझाने लगी। सास बिस्तर से लगी हुई थी। उसे आंखों से अधिक दिखाई नहीं देता था। वह कब तक बैठी रहेगी। वह मुझ से बहुत स्नेह करती थी और मैं भी ‘मम्मी जी. मम्मी जी’ करती रहती है। अब मैं अपना नफा-नुकसान तोलने लगी हूं। यदि सब कुछ छोड़-छोड़ कर एक ओर चल भी दी तो ऐसा कौन सज्जन होगा….वह भी इस जैसा ही होगा। वैसे भी इस देश का यही रिवाज रहा है, बाप ने जिसे दामन थमाया, उसी का थाम लिया।

फेरे लेने से पहले मां ने कहा था. “पल्ला कस कर पकडना. कहीं कोई बदशगनी ना हो जाए। डर के मारे मैंने पल्ला अपने हाथ में लपेट कर पकड लिया। पल्ला तो कस कर ही पकड़ा था फिर भी छुट गया। मेरी चीख निकल गई, मैं चौंक गई। आंख खुली तो पता लगा यह तो सपना था। पहली बार जब ऐसा सपना आया था तो मैं बहुत डर गई थी।

कल रात फिर मुझे ऐसा ही सपना आया, परन्तु इस सपने से मुझे ना डर लगा और ना ही मेरी नींद टूटी। सपने में मैंने पल्ला कस कर पकड़ा हुआ था परन्तु चौथे फेरे पर मैंने खुद ही पल्ला छोड़ दिया था। मां के चेहरे का रंग फीका पड़ गया। जगजीत सिंह डर गया मगर मैं हंस रही थी।

सभी पल्ले अब छूट गए थे।

मैंने मन से उसे छोड़ दिया, फिर क्या फर्क पड़ता है। वह पास रहे या दूर रहे। इस बात की तो उसे जानकारी ही नहीं, जिस का दामन थाम कर इस घर में आई थी। अब मैं सिर्फ अपने पुत्र की मां हूं, जगजीत सिंह की पत्नी नहीं।

मुख्य गेट पर दस्तक हुई।

आंगन में खड़े हो कर देखा तो बाहर ‘बूढी’ होलीडे वाईफ खड़ी थी।

“घर में ही हो बेटी।”

“हां बुआ, घर पर ही हूं, और कहां जाना है।”

“और सुनाओ, आया कोई फोन बाहर से।”

“छोड़ो बुआ, कोई और बात सुनाओ।”

“क्या सुनाऊं बेटी। मैं तो ना विधवा में और ना ही सुहागन में।”

मेरी खैरियत पूछने आई बुआ, अपना दुख ले बैठी। गहरी सांस ले, कहने लगी, “दुल्हन वही जो पिया मन भाए।”

मैं चौंक गई। सोचा, इसे कैसे मालूम, मैं अपने पति को भाती नहीं। फिर मुझे याद आया, वह भी ‘होलीडे वाईफ’ थी और हमारे दर्द की जात एक थी।

“बुआ, कोई यह क्यों नहीं कहता, वही खसम भला जो बीबी को भा जाए।”

“तुम दुनिया से अलग की बात मत करो। मेरी ओर देखो, मैं अपने पति को पसंद ना आई और सारी उम्र अपने मायके में ही बिता दी।”

मैंने कोई जवाब नहीं दिया था। मगर उसे क्या पता अब मुझे, मेरा पति बिलकुल नहीं भाता।

“बेटी! आदमी मर जाए तो सहन हो जाता है मगर जब जीते जी आदमी पीठ दिखा जाए तो सहन नहीं होता।”

“बुआ! सहन करना आना चाहिए, सब सहन हो जाता है। मर गए भी और जो जीते जी मरे बराबर हो गए वह भी।”

बुआ को इस बात का कोई जवाब ना सूझा और वह ‘वाहेगुरू वाहेगुरू’ कह कर चलती बनी।

सास के कमरे से किसी के बातें करने की आवाज आ रही थी। मुझे लगा, जेठ आया होगा। आता तो पहले भी था मगर मैंने कभी ध्यान नहीं दिया था। हमारे घर के अंदर-बाहर के काम वही निपटाता था। घरवाली से बनी नहीं थी और तुरन्त संबंध तोड़ दिया था। पहले-पहल वह जब आता, मेरी सास के पास ही बैठ कर चला जाता था। मगर आज का किस्सा अद्भुत था। मेरा जी चाहा, मैं भी उसके पास जा कर बैठ जाऊं। शीशे में अपने आप को देखा। नाईट-सूट में मैं खूब जंच रही थी। दुपट्टा गले में पहन लिया। फिर खुद ही उतार दिया और दुपट्टे बगैर ही उसके पास जा बैठी।

“और पुत्र। फसल वगैरह बाहर सब ठीक है।”

“चाची! सब ठीक है। चक्कर लगाता रहता हूं।”

“हां पुत्र, घर बसने वालों के और खेत बीजने वाले के…।”

“यह तो है चाची। खेत-घर कभी सूना नहीं छोड़ना चाहिए।”

इतना कह कर उसने सरसरी-सा मेरी ओर देखा। उसका देखना मुझे अच्छा लगा। “बेटी, श्राद्ध करना है बड़ों का इसलिए मैंने इसे बुला भेजा था। तुम्हें सारी रसद ला देगा और भी जो खत्म हो, वो भी बता देना इसे।”

“सब कुछ खत्म हो गया।” जेठ की ओर देख कर मैंने इतना ही कहा।

“अरे, मेरे होते हुए सब कुछ कैसे खत्म हो सकता है भाभी।” यह कह उसने सवालिया नजर से मेरी ओर देखा। मगर मैंने उससे आंख मिलाए बगैर नौकरानी को चाय बनाने के लिए कहा। वह शायद जल्दी में था। उठ खड़ा हुआ, मैं भी उसके साथ खड़ी हो गई। “चाय तो अवश्य पीऊंगा भाभी और वह भी तेरे हाथों की, मगर आज नहीं।” इस के बाद उसने बड़ी तसल्ली से मेरी ओर देखा। उसकी नजर मुझे छू गई। मुझे पता ही ना लगा, मैं किस समय उसके साथ चलते-चलते घर के दरवाजे तक बाहर तक आ गई थी।

सास ने कहा, “ग्यारह बूढ़े जो तेरे ससुर की उम्र के हों, उन्हें श्राद्ध का खाना देना है।” मगर मेरे मन में पता नहीं क्या आया कि मैंने ग्यारह जवान व्यक्तियों को भी श्राद्ध का खाना दे दिया। सारे काम कर, जब मैं सास के कमरे में गई तो वह कहने लगी, “बेटी! तूने बहुत पुण्य कमाया। हर साल इसी तरह श्राद्ध किया करना अपने पुरखों का।” मगर सास को क्या मालूम, आज मैंने सिर्फ उसके मरे हुए पति का ही श्राद्ध नहीं किया था, अपने जीते-जी खसम का भी श्राद्ध कर दिया था।

श्राद्ध कर मुझे बहुत तसल्ली महसूस हुई।

शीशे के आगे जा कर मैंने कस कर बांधे बालों को थोड़ा-सा ढीला छोड़ दिया। हाईलाईट किए बालों की लट मेरे चेहरे पर झूलने लगी। आंखों में काजल लगाया। पूरी तरह तैयार होकर घर से निकली। उसी बुआ के भतीजे की शादी का न्यौता था।

वैसे मैंने किसी के दुख-सुख में शामिल होना छोड़ दिया था। कब जाओगी? बना नहीं तुम्हारा काम? सभी मुझसे ऐसे ही ऊल-जलूल सवाल करतीं, फिर तरस भरी नजर से मेरी ओर ऐसे झांकती, जैसे मेरी चिन्ता उन से ज्यादा किसी को नहीं हो सकती थी। पहले-पहल मेरे पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं होता था मगर मेरी आंखें भर आती थीं। आज फिर सभी ने ऐसे ही सवाल किए। मगर मेरी आंखों में एक भी आंसू ना आया। मैंने बहुत समझदारी से कहा, “मैं चली गई तो इतना बड़ा घर कौन संभालेगा। सुख से मेरा पुत्र है। जीता रहे मेरा घरवाला जहां भी रहे।” उस समय मुझे प्रतीत हुआ, मेरे भीतर से कोई और ही बोल रहा था।

शाम के घुसमुसे तक ‘जेठ’ भी आ गया। डी.जे. पर सभी नाच रहे थे। जेठ भी नाचते हुए मेरी ओर देख रहा था। मैं जब तक विवाह के घर में रही, वह मुझे ही ताकता रहा। मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। सिर से पैरों तक थराथराहट होने लगी।

डी.जे के गाने बंद होने पर बुढ़ी औरतें घेरे में नाचने लगी। किसी बोली पर मैं भी नाच उठती। नाचते हुए आंखें जेठ को तलाश करने लगतीं। जब उससे नजर मिल जाती, मैं गिद्दे में धमाके से नाचने लगती। बुआ भी बहुत जंच रही थी। जवानी में अवश्य सुन्दर रही होगी, फिर भी इसके खसम ने सारी उम्र इसे मुंह नहीं लगाया। गिद्दा जोबन पर था। मुझे घेरे में खींच कर, बुआ ने बोली डाली,

कदे ना खाधे, तेरे खट्ट मिठे जामनूं

कदे ना खाधा, वे कड़ाह करके।

छड़ गिउं वैरिआ, वे विवाह करके।

मैं इस बोली पर नाच नहीं पाई। बोली सुन कर मेरा शरीर झूठा पड़ने लगा। जबकि ढ़लती उम्र में वह इस बोली पर खूब नाची। नाचते हुए वह गिर गई और उसे दौरा पड गया। उसका भतीजा चम्मच उसके मंह में डाल उसका दौरा तोड़ने की कोशिश करने लगा।

“दुखों की मारी है बिचारी, सोने जैसी देह थी, रोगन हो गई।” ऐसी कई आवाजें उसके बीते कल की बात सुनाने लगी।

भतीजे ने बताया, “बआ को होश आ गया।” जबकि यह भतीजे की गलतफहमी थी। यह बेहोशी तो उम्र से भी लंबी थी, जो ना किसी को दिखाई देती थी और ना ही किसी से दूर की जा सकती थी।

मैं इस प्रकार तबाह नहीं हो सकती। मैं क्यों तबाह हो जाऊं? मैं अपने घर पहुंच गई। मगर उस बोली की आवाज मेरा पीछा नहीं छोड़ रही थी। ऐसे समय में मुझे जेठ का ख्याल आया। जी चाहा, उसे फोन करके कहूं, मुझे बचा ले। मुझे इस प्रकार तबाह नहीं होना। मगर मैं उसे फोन ना कर पाई। मुझे बेचैनी होने लगी। दिल घबराने लगा। कुछ भी मेरे वश में नहीं था। मैंने उन सभी की फ्रेंड रिकुएस्ट स्वीकार कर ली, जो पता नहीं, कब से मेरी एक-एक तस्वीर को पागलों समान लाईक कर रहे थे।

मेरा दिल भी जेठ पर आ गया था, भले मैं दिल्लगी कईयों संग कर रही थी। वट्सअप, मैसंजर पर एक ही बार में तीन-तीन आदमी मुझसे चैट करते, मैं सभी को ‘बहाने लगा, टालती रहती’। वह भी झुनझुना बजाते हुए थकने लगे, मगर उनकी आस पूरी ना होती। उन्हें तरसा कर मुझे बहुत मजा आता। इन वट्सअपी मंजनुओं से अपनी खूबसूरती के बारे में सच्ची-झूठी बातें सुन कर विशेष तसल्ली मिलती। इन सभी मंजनुओं को भी तो तन ही चाहिए था। औरत के पास तन के अलावा और भी कुछ होता है, यह बात इनके दिल-दिमाग में ही नहीं थी।

सुबह उठी। रूटीन में मोबाईल चेक किया। कइयों के मैसेज थे, मगर जेठ का मैसेज सबसे गहरा था। मैसेज उसने पहले भी कई बार किए थे परन्तु मैंने कभी दिलचस्पी नहीं दिखाई थी। मगर आज मैंने जबर्दस्त दिलचस्पी दिखाई। उसने दुबारा लिखा, ‘अधीए का नशा चढ़ गया, दरसन तेरे करके नी।” मैंने इस मैसेज को कई बार पढ़ा। जेठ को पता नहीं सचमुच नशा हुआ था कि नहीं। मगर मैं सारा दिन नशिआई रही। रात को सोने से पहले सारी चैट पढ़ने लगी। मोबाईल पर ‘तेरा जिंद’ आंखों सामने फैल गए। जो लोगों के लिए गुरजिंदर था और आज से पहले मेरे लिए सिर्फ जेठ था, आज ‘मेरा जिंद’ बन गया। मुझे लगा, जैसे उसने अपना आप मुझे समर्पित कर दिया हो। वह रोज किसी ना किसी गाने का लिंक भेज देता और मैं पागलों की तरह सारा दिन वो गीत सुनती रहती, जो कब से मेरे लिए खामोश हो गए थे। अब मेरे सिर पर चढ कर बोलने लगे थे।

दिन को जेठ की यादें थी और रात को जेठ हर नजर से बचते-बचाते मेरी आंखों में ठहरने लगा। आंखें बंद हो जाती और उनमें सपने तैरने लगते। सभी वट्सअपी, फेसबुकी मंजनुओं को सामने खड़ा कर मैं अपना स्वंयवर रचा रही थी। मैंने सभी के झुनझुने छुड़ा कर बांसुरी थमा दी। मेरी शर्त थी, जो सब से सुन्दर बांसुरी बजाएगा, मैं उसकी हो जाऊंगी। सब से सुन्दर बांसुरी जेठ ने बजाई। बांसुरी बजाते-बजाते वह मेरा ‘रांझा’ ही बन गया। मैंने अपना हाथ उसके हाथ में दे दिया।

वह जेठ जो कभी घर के बाहर वाले कमरे में अपनी चाची संग व्यावहारिक-सी बातें कर चला जाता था, अब मेरे साथ ड्राईंगरूम में बैठ कर मन की बातें करने लगा था। उससे बातें कर, मेरा मन शांत हो जाता। दिल को तसल्ली मिलती कि इस भरी दुनिया में मैं अब अकेली नहीं।

“दूध उबल गया भाभी।” रसोई की ओर ध्यान देते हुए उसने कहा।

“उबल जाने दो, कोई बात नहीं।” मैंने आंख में शरारत भर कर कहा।

“मैं भी उबल रहा हूं भाभी।”

“फिर मैं क्या करूं?”

“तुम सब कुछ कर सकती हो भाभी।”

कर तो मैं सब कुछ सकती थी मगर इतनी जल्दबाजी क्यों थी। मैंने उसे टालते हुए कहा, “मैं चाय बना लाऊं, अपने जेठ के लिए।”

“चलो यही सही। जहां चाह वहां राह।”

वैसे यहां का रिवाज यह था कि जेठ को भाभियां ‘लस्सी’ देने से भी इन्कार कर देती थीं। मगर मैं अपने जेठ के लिए चाय बना रही थी। मैं सब समझती थी, चाह के रास्ते वह कौन-सा राह तलाश रहा था। मैं उन राहों के बारे में जानती नहीं थी परन्तु अब मेरा उन राहों पर चलने का मन कर रहा था।

साल में एक महीना जेठ का भी होता है, भाभी और आज से मेरा महीना शुरू।” जेठ का महीना चढ़ते ही उसने यह मैसेज भेजा। वैसे हर महीने के पहले दिन घर में कड़ाह बनता था। मगर अब वो बनाना कब से छोड़ दिया था। मगर उस जेठ महीने मैंने बड़े मन से कड़ाह बनाया। फिर इसी महीने ही ड्राईमरूम में हुई मन की बातों ने बैडरूम में जा कर तन से भी स्वीकार कर लिया।

आज से पहले यही सुना था, ‘मरते हुए उसने आक को चबाया’ मैंने हार कर जेठ से संबंध बना लिया। मैंने हंसते हुए आक को चबा लिया था। आज से पहले जेठ महीना मझे कभी अच्छा नहीं लगा था। मगर अब दिल करता था. सभी महीने जेठ के हो जाएं। सबह-सबह जेठ का मैसेज आया,

“पता नहीं कैसा डंक मारा भाभी, अभी तक उठ नहीं पाया।”

जेठ के इस मैसेज से मेरी सारी रूह खिल गई। पता नहीं जेठ सच कहता था या झूठ। परन्तु उसके सच-झूठ ने मेरे अंदर मर चुकी औरत को जीवित कर दिया था। मेरा दिल चाहा, मैं भी अपने खसम को बताऊं, मैं कितनी खूबसूरत हूं, मुझ में भी डंक है। परन्तु यह बात मैं उसे कैसे बता सकती थी।

इस महीने मुझे महसूस होता रहा, जैसे मैं धरती पर चल ना रही हूं, नाच रही हूं। मगर एक ही हफ्ते बाद ही मेरा मन बुझ गया। फोन पर बहुत खुश होकर जगजीत सिंह ने बताया, “मैं इंडिया आ रहा हूं। पन्द्रह दिनों के लिए। बेबे बीमार रहती है। सोचा, उसे देख आऊं।” मां का श्रवण पुत्र आना ही था तो अगले महीने आ जाता। ‘जेठ महीने’ आने की क्या जरूरत थी। चलो छोड़ो, मेहमान को हंसते हुए भी और रोते हुए भी झेलना पड़ता है। पन्द्रह दिन तुरन्त निकल जाएंगे। वैसे भी आने पर वह कौन-सा मेरे पास ही बैठा रहता है। उसे तो बस दोस्ती-यारी प्यारी है या फिर घुड़सवारी से। वह कभी भी मेरे पास मेरी जरूरत के कारण नहीं आया था। सिर्फ अपनी जरूरत के कारण ही आता रहा था।

जो लोगों की नजर में मेरा खसम था, घर आ पहुंचा। मेरा दिल करे, इससे पूछे, किस लिए आया है अब। फिर याद आया, यह मेरा खसम है और खसम कभी भी आ सकता था। वैसे मुझे मालूम था, वह अलग-अलग ढाबों पर खाना खाने का शौकीन था। फिर भी मैंने बहुत प्यार से उसके लिए खाना बनाया।

ड्राईनिंग टेबल पर बैठ कर उसने कहा, “इतनी मेहनत करने की क्या आवश्यकता थी। मैं तो ढाबे का खाना खा कर ही निहाल हो जाता हूं।”

“मगर जो मजा घर के खाने में है, वो ढाबे की रोटी में नहीं होता।” जेठ की बात सुन कर मैं मुस्कुराई। इतने प्यार से बनाया यह खाना जेठ के लिए ही था।

“मैं बहुत थक गया हूं यार। तुम भी आज यहीं सो जाओ।”

मैंने बेबसी में जेठ की ओर देखा। मेरा भी दिल कर रहा था, वह आज रात यहीं रह जाए। मगर वह फिर भी चला गया। जगजीत सिंह का ढ़ाबे के खाने से इतना पेट भरा हुआ था कि वह बेड पर लेटते ही गहरी नींद में सो गया।

अगले दिन उसने सूटकेस से बहुत सारे कपड़े और बहुत कुछ निकाल मुझे दिया। मैंने लापरवाही से सारा सामान अलमारी में रख दिया। मेरे हाईलाईट किए बाल बिखरे हुए थे। उसने गौर से मेरी ओर देखा, फिर बेडरूम में लगी मेरी तस्वीर की ओर देखने लगा। वह तस्वीर विवाह के समय की थी। उस तस्वीर में मेरे बाल कस कर बंधे थे। आंखें झकी हई और होंठों पर मुस्कुराहट थी। यह तस्वीर जगजीत को बहुत पसंद थी। पहली बार जाते समय उसने कहा, “तुम हमेशा, इस तस्वीर समान बन कर रहना।” उस समय मैंने बहुत ही आज्ञाकारी बच्चे की तरह हां में हां मिलाई थी।

उसने फिर अविश्वास से मेरी ओर देखा। मेरे हाईलाईट किए बालों की लट को चेहरे से एक ओर कर कहने लगा, “तुम बदली-बदली सी लग रही हो, इस तस्वीर जैसी तो बिलकुल भी नहीं लग रही।”

“तस्वीर तो बेजान है मगर मैं तो जिन्दा हूं। बस इतना ही फर्क है। मैं और मेरी तस्वीर में।”

“अच्छा। आ जा फिर जिन्दा जान। देखू तुम में कितनी जान है।” कह कर उसने मुझे अपनी ओर खींच लिया।

कोई मोह नहीं, कोई प्यार नहीं फिर भी मुझे उसके साथ सोना पड़ा। मैं उबासी ले, उसकी ओर सरक गई। शरीर एकदम ठंडा। फिर दिल पर हाथ रखा, वो धड़क रहा था। फिर जेठ का ख्याल बंद दरवाजों से निकल कर मेरे और उसके दरम्यान आ कर लेट गया। फिर ठंडा शरीर दहकने लगा। सुरति संभलने पर जगजीत सिंह कहने लगा, “वाउ ग्रेट, तुमने तो आज कमाल ही कर दिया।” मैं चुप रही। उसे क्या मालूम, यह कमाल किस के लिए और क्यों आया था।

जिसके लिए रात को मैं आंधी बन कर, उड़ती रही थी। उसने तड़के ही आ कर दर खड़काया। मुंह अंधेरे ही दोनों घर से निकल गए। वापसी पर जेठ तो अच्छा-भला घर लौटा मगर जगजीत सिंह को चोट लग गई थी। चोट अधिक लग गई थी। दो दिन अस्पताल रहा, फिर फिजियोथैरेपिस्ट खुद ही घर आने लगा।

‘यार, तुम इतनी घोड़ियों का सफल सवार रहा फिर भी इस घोड़ी से कैसे गिर पड़ा।” जेठ ने शरारती ढंग से हंसते हुए कहा।

“यार, घोड़ी तो अच्छी-भली चल रही थी। मगर मेरे मन में पता नहीं क्या शरारत आई, कभी उसकी लगाम ढीली छोड़ देता, कभी जोर से खींच देता।”

“अच्छा, फिर क्या हुआ?”

“फिर क्या यार, दो-तीन बार तो वह यह हरकत सह गई। फिर पता नहीं शायद मैंने जोर से लगाम खींच दी या ढीली छोड दी। बस फिर घोडी मेरे काब में नहीं आई। मैं घोडी की काठी से रगड खा कर नीचे गिर गया।” बिलकुल पास बैठी मैं सोचने लगी, घोड़ियों के सफल सवार को क्या मालूम, कुछ घोड़ियां अड़ियल होती हैं जो किसी के काबू में नहीं आतीं।

“क्या हआ मेरे पुत्र, चोट लगवा ली। अपने परिवार के साथ ढंग से उठ-बैठ भी ना पाया।” मेरे मन में आया सास को बता दूं, परिवार के साथ उठने-बैठने का सलीका इसके पास कभी भी नहीं था।

“चल बेबे, छोड, मैं जल्दी ठीक हो जाऊंगा। तुम बताओ, बहू तुम्हारी सेवा करती है कि नहीं।”

“अरे पुत्र! ऐसी बहू तो भगवान सभी को दे, कभी तंग नहीं किया इसने।”

सास की बात सुन कर मैं धीमा-सा हंस दी। जगजीत सिंह अपनी मां से मेरे चाल-चलन की रिपोर्ट लेकर सुकून महसूस करने लगा। मेरी ओर देख कर कहने लगा, “यू आर मॉय वंडरफुल वाईफ!”

मैंने उसकी आंखों में झांकते हुए पूछा, “वंडरफुल वाईफ के बारे में तो मैं जानती हूं मगर यह ‘होलीडे वाईफ’ क्या होती है।”

“अरे यार! वैरी सिंपल। जिसके साथ आदमी होलीडेज में फन-शन करे। वही होती है होलीडे वाईफ।”

“इस हिसाब से तो आप भी मेरे ‘होलीडे हस्बेंड’ ही हुए?”

मेरी बात का उसके पास कोई जवाब नहीं था। गुमसुम सा हो गया। भौंचक्के से उसने लैपटॉप अपने पास खींच लिया। मैं चाय बना कर कमरे में आई तो बड़े विजयी अंदाज से मुझ से कहने लगा, “ऐसे ही मुकाबला मत कर। ‘होलीडे हस्बैंड’ नहीं होता, ‘होलीडे वाईफ’ ही होती है। नहीं यकीन तो गूगल पर सर्च मार कर देख लो।”

उस पल मैं खिलखिला कर हंस दी और दूसरे ही पल सोचने लगी।

यह भी पागल है। सिरे का झल्ला!

इसे कैसे समझाऊं कि मन के भेद गूगल पर नहीं होते।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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