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नई कोंपल-21 श्रेष्ठ युवामन की कहानियां पंजाब: Hindi Story for Kids
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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Hindi Story for Kids: सुबह-सुबह ही प्रोफेसर कुलकर्णी कॉफी हाउस में आ बैठे तो बीवी को कुछ हैरानी हुई।

यहां कॉफी हाउस से मुराद हजरतगंज वाला ‘ओल्ड इंडियन कॉफी हाउस’ नहीं, बल्कि घर के ड्राईंग-रूम का वो कोना, जिसे कॉफी हाउस जाने की लत को पूरा करने के इरादे से कॉफी हाउस में तब्दील कर लिया जाता था।

कॉफी हाउस!

यह वो स्थान है, जहां रोजाना उतरने वाली शामों को वह जीवन की गहमा-गहमी से भर कर, भरी दोपहर में ही वहां उतार लिया करते थे। दोस्तों के साथ बैठ कर, राजनीति की गंदगी, धर्मों का संकीर्ण दृष्टिकोण, साहित्य की गुटबाजी को वह नयी सभ्यता की रोशनी में नापते-तौलते, परखते और बातों ही बातों में जीवन की तस्वीर को दिलकश रंगों से सरोबार कर जाते।

लेकिन यह तो पुराने बीत चुके वक्त की बातें है। उन दिनों यूनिवर्सिटी से निकल कर, उनकी शामें कॉफी हाउस में गप्प-शप्प करते या फिर क्लब में व्हिस्की का चूंट भरते गुजरती थी तो उनके जीवन में एक मस्ती-सी छा जाती थी।

अब नब्बे बरस की आयु तक पहुंचते-पहुंचते उनके लिए यह मुश्किल हो गया था कि गोमती नगर से मीलों का सफर तय कर के कॉफी हाउस या क्लब तक जाएं। एक तो संतान ने उन्हें कार चलाने की मनाही कर रखी थी परन्तु सच तो यह है कि अब उनमें इतनी भी ताकत रही नहीं थी।

उन्होंने कई बार वहां जा कर देखा भी था। इतनी दूर जाने पर एक ओर थकावट होने लगती, दुसरा वहां जा कर उन्हें महसूस होता मानो किसी अजनबी स्थान पर आ बैठे हो। कोई भी जाना-पहचाना चेहरा वहां नजर नहीं आता था।

नए चेहरे!

नावाकिफ लोग!

बात करें भी तो किससे?

और तो और! वे वेटर भी अब नहीं रह गए थे, जिन्हें बिना कोई ऑर्डर दिए ही मालूम होता कि अब प्रोफेसर साहब का पकौड़ी खाने का समय हो गया है या अब वह स्लाईस और हॉफ फ्राई अंडा खाएंगे। …..या किस दोस्त के आने पर ठंडी कॉफी मंगवाई जाएगी या गर्म कॉफी ….. और किसे वह केवल ठंडे पानी से ही चलता कर देंगे।

बढ़ती उम्र के साथ, जब उनकी जिन्दगी, घर की चारदीवारी में सिमट कर रह गई तो खाली पलों को भरने के लिए पहले-पहल उन्हें यूनिवर्सिटी के स्टॉफ-रूम की कमी खलती। उस समय वह अपने घर की लाइब्रेरी में चले जाते। क्लब जाने का मन करता तो व्हिस्की का गिलास ले, मेहमानों के कमरे में जा बिराजते और ड्राईंग-रूम की बड़ी खिड़की के कोने वाला स्थान शाम उतरते ही कॉफी हाउस बन जाता।

लेकिन अब मुश्किल यह आ पड़ी थी कि उनका गेस्ट-रूम पहली मंजिल पर है, लाइब्रेरी दूसरी मंजिल पर। जबकि समय ऐसा आ गया है कि सीढ़ियां चढ़ने-उतरने में ही सांस फूलने लगता है।

इस कारण प्रोफेसर कुलकर्णी ने अपना दिल बहलाने के लिए ड्राईंग-रूम के अलग-अलग हिस्सों को ही गेस्ट-रूम, लाइब्रेरी और कॉफी हाउस में तब्दील कर लिया है।

वक्त जब रुक जाता, आगे बढ़ता ही नहीं। घड़ी की सूईयां भी अटके प्रतीत होते तो वह जिन्दगी की शाम में कॉफी हाउस वाले कोने में जा बैठते।

आज सुबह-सुबह ही. कॉफी का प्याला ले कर प्याला ले कर बैठ गए तो बीवी को हैरानी हुई। वह देख रही थी, प्रोफेसर कुलकर्णी के सामने रखा प्याला वैसे ही भरा रखा था। अब तो उसमें से भाप निकलना भी बंद हो गई थी। कभी वह बाहर गली की ओर देखते और कभी कॉफी की ओर।

“प्रोफेसर साहब! कॉफी पी लीजिए। ठंडी हो गई तो कोल्ड कॉफी का बिल अदा करना पड़ेगा।” बीवी ने प्रोफेसर साहब का ही सुनाया हुआ मजाक दुहराया। फिर पूछा,

“क्या बात है? आज सुबह ही सुबह कॉफी हाउस में क्यों आ बैठे?”

“आज मन उदास है। मालम नहीं क्यों?”

“मालूम तो आपको भी है। मुझे भी है। बेटे को आपने फोन किया था. उसने कहा. इस समय गाडी चला रहा है। घर जा कर बात करूंगा।”

“और उसका फोन आया नहीं….इसलिए आप उदास हैं।”

प्रोफेसर साहब फिर से बाहर गली की ओर देखने लगे।

“ऐसे मुंह लटका कर न बैठे। किसी से बात कर ले।” कहते हुए बीवी टेलीफोन डायरी उनके पास रख कर वापस रसोई में चली गई।

थोड़ी देर बाद उसने देखा, प्रोफेसर साहब उसी प्रकार बुत बैठे थे। कॉफी एकदम ठंडी हो चुकी थी। बर्फ की मानिन्द!

“कहीं फोन लगाया?”

“किसे फोन करूं? जिन दोस्तों से दिल की बात हो सकती थी, वो तो कब के उस जगह पहुंच गए, जहां कोई फोन पहुंचता ही नहीं।”

प्रोफेसर साहब के शब्दों में जिन्दगी के सूनेपन का दर्द भरा था। उसी में डूबे हुए उन्होंने कहा, “जो बाकी बचे हैं, उनके ठौर-ठिकानों का कोई अता-पता नहीं।”

एक पल के लिए उन्होंने आसमान की ओर देखा, फिर बोले, “नए लोगों से बात करता हूं तो….।”

“तो क्या….?”

“वे रस्मी-सी बात कर, कह देते है, अच्छा जी, अपनी दुआ में हमें याद रखिएगा। इसका अर्थ यह होता है कि बुड्डे, हमारी जान छोड़ो। हमें और भी कई काम है दुनिया जहान के।” ऐसा ही एक व्यक्ति है, अब उसका नाम क्या बताऊं। जब भी फोन करूं, कहेगा, अभी मैं कहीं बैठा हूं। घर जा कर बात करूंगा और उसका फोन पलट कर कभी नहीं आता।”

“कभी-कभी तो लगता है कि फोन-डायरी के सभी पन्ने कोरे हो गए हों।” उन्होंने डायरी एक ओर फेंकते हए कहा।

“कोई खाली नहीं है। सारी डायरी भरी हुई है।” बीवी ने डायरी खोल कर उसके सामने बढ़ाते हुए कहा।

जुबैर का नंबर था, सब से ऊपर। जुबैर, जिसके साथ प्रोफेसर साहब की कभी नहीं बनी थी।

उन्होंने बीवी के हाथ से डायरी ले कर, उसी का नंबर घुमा दिया।

“आज प्रोफेसर साहब को हमारी याद कैसे आ गई?”

“याद इसलिए आई कि मुझे ख्याल आया कि कई बरस पहले तुमने मुझे गाली दी थी ।”

“हां… दी थी।”

“आज मैं तुम्हें गाली देना चाहता हूं।”

“चलिए, आप अपना दिल खुश कर लीजिए। हिसाब बराबर हो जाएगा।”

“जाओ, तुम्हारी उम्र सौ साल हो जाए।”

“यह तो गाली न हुई। दुआ है। बहुत शुक्रिया जनाब!”

“बच्चू! उम्र बढ़ने के साथ जब जिन्दगी में सूनापन उतरेगा, तो यही दुआ गाली बन जाएगी।” यह कहते हुए प्रोफेसर कुलकर्णी ने तुरन्त फोन रख दिया।

तभी घर के आंगन से बीवी ने पुकारा।

“बाहर आइए प्रोफेसर साहब! आप को एक खुशखबरी दूं।”

“अरे कुछ बताओ तो सही।”

“आपने आम का जो छोटा-सा पौधा लगाया था, उसमें से नयी कोंपल फूट आई है।”

प्रोफेसर साहब बाहर आए। मेहरून रंग की नयीकोंपल को देख कर ऐसा लगा, जैसे उनकी जिन्दगी की शाम, नयी सुबह में बदल गई हो। नयी सुबह…। धुली…धुली..! शबनम-सी धुली।”

इस खुशी को दिल में भरकर कितनी देर तक बच्चों को, दोस्तों को और जान-पहचान वालों को फोन कर-कर के बता रहे हैं…

“नयी कोंपल बहुत सुन्दर है…।”

“जिन्दगी को ताजगी से भर रही है….नयी कोंपल…।”

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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