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अंतः प्रेरणा-21 श्रेष्ठ नारीमन की कहानियां मध्यप्रदेश: Inspiration Story
Hindi Inspiration Story

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Inspiration Story: शीतल पवन के मंद-मस्त झोंके उसके कपोलों को स्पर्श कर उसे नई खुशी का एहसास करा रहे थे। वह खुश होकर अपने पति की आरती उतारकर हार पहनाकर भगवान से विनती कर रही थी कि “भगवान बस मुझे पति से अंतः प्रेरणा मिलती रहे ताकि मैं जीवन में आने वाली बाधाओं को पार कर अपने बच्चों को खुशहाल जीवन दे सकूँ। पति का साथ तो भगवान ने छीन लिया लेकिन मुझे उनसे आत्मिक शक्ति मिलती| रहे ताकि मैं बच्चों को आत्मनिर्भर बना सकूँ।”

ईश्वर से कामना करते-करते नीलिमा अतीत के झरोखों से झांकने लगी। उसके पति 15 साल पहले उसे रोता-बिलखता छोड़ गए थे। उन्हें पीलिया हुआ था। उसने 2 महीने तक इलाज करवाया। इंदौर के सारे अच्छे डॉक्टरों को दिखाया। एक बार ठीक होने पर उन्हें दोबारा पीलिया हो गया। नीलिमा ने डटकर सेवा-सुश्रुषा की। स्कूल से 1 महीने की छुट्टी लेकर पति का ध्यान रखा। जब पति की हालत में सुधार हुआ तो उसने स्कूल जाना प्रारंभ कर दिया और पति को घर पर आराम करने दिया, लेकिन अचानक उसके पति की हालत बिगड़ी और डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बावजूद उसके पति उसके हरे-भरे संसार को सूना कर चले गए।

नीलिमा इस नये शहर में अपने जीवन में आए अंधकार भरे तूफान से हतप्रभ रह गई कि वह अपने दोनों बच्चों के साथ इतने बड़े संसार में कैसे रहेगी? बड़ा बेटा बारहवीं कक्षा में था। उसने अपने सभी ताऊ जी, चाचा जी और नाना-मामा को फोन किया। नीलिमा बिल्कुल बदहवास-सी हो गई थी। बार-बार यही कहती कि गुप्ताजी सो रहे हैं, अभी उठेंगे। बड़ी मुश्किल से उसके स्कूल की अध्यापिकाओं ने उसे रुलाया और एहसास कराया कि उसके पति इस दुनिया में नहीं हैं। सभी रिश्तेदारों ने आकर दाह संस्कार कर दिया। बारहवें पर उसके ससुराल वालों ने उसे लखनऊ पैतृक घर चलने पर जोर दिया। नीलिमा की मां ने उसे इलाहाबाद चलने को कहा “बेटा यहाँ क्या रखा है वहीं हमारी आँखों के सामने रहना।”

पर नीलिमा ने किसी की ना सुनी। सबके मना करने के बावजूद वह यहीं रही। उसने बच्चों को पढ़ाया, आर्थिक संकट आने पर बेटे ने ट्यूशन की। उसने अपनी पढ़ाई और छोटे भाई की पढ़ाई पर ध्यान दिया। नीलिमा 15 दिन के बाद स्कूल आई तो सभी ने उसका साथ दिया, उसे बिल्कुल महसस नहीं होने दिया कि वह अकेली है। एक महीने तक वह सफेद वस्त्र में आती रही। बाद में सभी ने उसे समझाया कि नीलिमा हल्के रंग पहनने में कोई बुराई नहीं है। तुम्हारा दु:ख इतना बड़ा है कि कोई उसे दूर नहीं कर सकता, लेकिन समाज में अपना स्थान बनाने के लिए सुविधाओं का सहारा भी आवश्यक है। दुनिया इतनी बड़ी है, यहाँ तुम्हारे वैधव्य को सम्मान नहीं देंगे, बल्कि इसका गलत फायदा उठाने की कोशिश करेंगे। लेकिन अगर तुम पहले की तरह रहोगी तो कोई तुम्हारी तरफ उंगली उठाने की कोशिश नहीं करेगा।

पर नीलिमा हिम्मत नहीं कर पाई। एक दिन उसका छोटा बेटा, जो आठवीं में पढ़ता था, पीछे पड़ गया माँ आज तुम यह सफेद साड़ी पहन कर नहीं जाओगी अगर ऐसे जाओगी तो मैं स्कूल नहीं जाऊँगा। नीलिमा को हारकर रंगीन साड़ी पहनकर माथे पर बिंदी लगा कर जाना पड़ा।

एक दिन नीलिमा की भाभी उसके स्कूल की अध्यापिका को मिली “देखा हमारी टीचर दीदी को, हमारे जीजा जी की मृत्यु को अभी 6 महीने भी नहीं हुए हैं और कैसे बन ठन कर रहती हैं।”

लेकिन नीलिमा भाभी बन-ठन कर रहती है? केवल रंगीन साड़ी पहनकर स्कूल आती है। हम लोगों ने उसको हल्के रंग के कपड़े पहनने के लिए कहा है। उसका दु:ख सफेद साड़ी पहनने से तो कम नहीं होगा, उसका दु:ख तो उसको ही झेलना है। अकेले ही अपनी समस्याओं को सुलझाना है। उसका बड़ा बेटा समझदार है जिसने अपनी माँ को संभाल लिया है। मकान का लोन चुकाना है, कहाँ जाना है, किससे मिलना है? सारी जानकारी लेकर अपनी माँ के साथ दौड़ता रहता है। नीलिमा ने किसी से मदद नहीं ली। मालूम है ना सब कुछ अपने आप करती रहती है और सबसे बड़ी बात कि पैसे की परेशानी आने पर स्वयं ट्यूशन करती है। नीलिमा की भाभी चुपचाप सुनती रही और बोली, “हाँ, ऐसे तो हमारी ननद बड़ी हिम्मत वाली हैं, सबने कहा इलाहाबाद चलो पर चलने को तैयार नहीं हई।”

नीलिमा जैसा उसका नाम था वैसे ही उसकी नीले रंग की बड़ी-बड़ी आंखे थीं, धुंघराले बाल, सीधी नुकीली नाक थी। नीलिमा के पिता अपनी पुत्री को देखकर बड़े खुश होते थे। तीन भाइयों की अकेली बहन, सभी की लाड़ली, शोख, चंचल, घर में उछल-कूद करने वाली नीलिमा वक्त की मार से एकदम खामोश हो गई थी। सुबह उठकर खाना बनाकर स्कूल जाना, दोपहर में आकर फिर ट्यूशन, अपने घर का काम, स्कूल का काम नीलिमा की यही दिनचर्या हो गई थी। वह बच्चों से यही कहती, “बेटा तुम बिल्कुल मत सोचो पापा हमारे साथ नहीं हैं, वह हर पल हमारे साथ हैं।” उसने बेटे को बी.कॉम. करने के बाद पुणे एमबीए करने के लिए भेज दिया। छोटा बेटा भी इंजीनियरिंग में पढ़ने लगा।

दो साल बाद बड़ा बेटा एमबीए करके एचडीएफसी बैंक में सर्विस करने लगा। नीलिमा जब कोई शुभ कार्य करती है तो पहले अपने पति की फोटो के सामने जाकर शिकायत करती, रोती “तुम मुझे मझधार में अकेले छोड़ गए हो, कोशिश करती हूँ तुम्हारे बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो जाएँ, देखो तुम्हारा बड़ा बेटा ऑफिसर हो गया है। अब मुझे शक्ति दो कि छोटे बेटे को भी कामयाबी दिला सकूँ।”

स्कूल में आने पर हर खुशी को पूरे स्टाफ के साथ बाँटती कि आज मेरे बच्चे आप लोगों की दुआओं से कुछ बने हैं। मुझे आप सबका नैतिक सहयोग मिला है कि मैं अकेली तूफानों का सामना करती रही और आगे भी करती रहूँगी।

“माँ तुम कहाँ हो, अरे आपकी पूजा खत्म नहीं हुई क्या?” अचानक नीलिमा की तंद्रा भंग हुई और नीलिमा वर्तमान में लौट आई।

“हाँ बेटा अभिनय अन्दर आजा, तू नेहा को लेकर आने वाला था, क्या हुआ, नहीं आई क्या?”

“माँ वह शाम को आएगी लेकिन माँ क्या आपको मालूम पड़ा कि मामाजी नौकरी छोड़कर जा रहे हैं?”

“हाँ बेटा, क्योंकि तेरे मामा को डर है, कहीं तेरे नाना अपनी संपत्ति में से मुझे कुछ ना दे दे, इसलिए वह जाकर पहले ही अपना हिस्सा लेकर अपना बिजनेस शुरू करना चाहता है।”

“माँ संपत्ति तो नाना की है फिर मामा जी को क्यों डर है? और वैसे भी माँ अब मेरी नौकरी लग गई है, आपकी नौकरी है ही, बस दो साल बाद अभिषेक भी आत्मनिर्भर हो जाएगा। हमें किसी से कुछ नहीं चाहिए। मेरे पापा ने काफी कुछ इंतजाम पहले ही कर दिया है।”

“वह तो ठीक है बेटा, मैं भी बाबा से कुछ नहीं चाहती। जीवन में कष्टों के समय हमने किसी से कुछ नहीं मांगा तो अब हमें किसी के सहारे की जरूरत नहीं है। लेकिन तेरे मामा को डर है कि बाबा मुझे कुछ ना दे दें।” नीलिमा गंभीर होकर बोली।

“माँ मुझे स्वयं ऑफिस से लोन मिल सकता है और मैं अभिषेक को बाहर पढ़ने भेज दूंगा। माँ आप चिंता मत करो, मामा जी ने हमें कौन-सा सहारा दिया है। अब हम समर्थ हैं माँ, आप नाना-नानी को यहीं बुला लो।”

नीलिमा अपने बेटे की बातें सनकर गदगद हो गई। उसे लगता कि उसका बेटा अब इतना बड़ा हो गया है। कल उसकी शादी हो जाएगी, कहीं वह उसे छोड़ कर अलग घर तो नहीं बसा लेगा।

नीलिमा अपने पति के फोटो की तरफ देखकर सोचने लगी, नहीं-नहीं, ऐसा नहीं होगा। मेरे बच्चे मेरा ध्यान रखेंगे। यह सोचकर उसकी आंखों से मोती बिखरने लगे। “अरे माँ तुम रो क्यों रही हो? अब सब-कुछ ठीक हो रहा है। आपने ड्राइंग रूम पूरा बदलने के लिए कहा था, पूरा बदल गया ना और क्या चाहिए बताओ? आपकी आँखों में आँसू अच्छे नहीं लगते।” अभिनय ने माँ के गले में बाँहें डालते हुए कहा।

“नहीं बेटा मैं रो नहीं रही हूँ। ये आँसू तो खुशी के हैं। तू नेहा को मुझसे मिलवाने ला रहा है ना। देख, अब घर में खुशियाँ आएंगी। देख तेरे पापा तो कोई खुशी जीवन में देख न सके। बस ऊपर से हमें अन्तःप्रेरणा देते रहे और हम काँटों भरी राह पर चलते रहे। तुम दोनों भाई ही तो मेरा सबसे बड़ा संबल हो, मेरी दो भुजाएँ हो।”

“माँ, आपने कितनी मेहनत की है हमारे लिए। सुबह से शाम तक जो मेहनत की है, वह हम कैसे भूल पाएँगे।”

“बेटा संघर्ष ही तो जीवन है, ईश्वर ने जो मुझे शक्ति दी, धैर्य और हिम्मत दी, उसी के बल पर मैं आज तुम लोगों के लिए कुछ कर पाई। तुम्हारे पापा से मुझे एक आत्मिक प्रेरणा मिलती रही, अनवरत उनका साथ मिलता रहा और मैं आगे बढ़ती रही। बस, ऐसे ही आगे बढ़ती रहूँ जिससे मेरी जीवन संध्या खुशी से चमकती रहे।”

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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