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गृहलक्ष्मी की कहानियां - एक दिन अचानक
Stories of GrihalaxmI

 

गृहलक्ष्मी की कहानियां – रचना को आमतौर पर सिरदर्द रहता था। उसे लगता था कि शायद थकान के कारण उसे सिरदर्द हो रहा है और वह एक दर्द की गोली खा  लेती थी, जिससे उसे कुछ आराम मिल जाता था और वह फिर से अपने कार्य में लग जाती थी। रचना एक विद्यालय में अध्यापिका थी। वह अपना काम बड़ी लगन व मेहनत से करती थी ।  सभी उसे बहुत प्यार करते थे। घर में वह अपनी सास ससुर पति व बच्चों के साथ बड़े मेल मिलाप से रहती थी। कहा जाये तो रचना का परिवार एक आदर्श परिवार था।  पिछले कुछ दिनों से उसे बहुत असहनीय सरदर्द होने लगा था।  एक दिन खाना बनाते बनाते उसे अचानक दर्द उठा और इससे पहले कि वह दवा लेने जाती, वह चक्कर खा कर गिर पड़ी।  गिरने की आवाज़ सुनकर उसके पति, बच्चे और सास ससुर दौड़ कर रसोई में पहुंचे। उन्होंने  देखा कि रचना ज़मीन  पर गिरी पड़ी है और बेहोश हो गयी है।

तुरंत उसके पति विनोद जी ने अस्पताल में फोन कर एम्बुलेंस बुलवाई और आनन् फानन में रचना को अस्पताल में ले गए।  डॉक्टर ने प्रारंभिक जांच  के बाद उपचार शुरू कर दिया। विनोद जी ने उनसे बेहोश होने का कारण जानना चाहा तो उन्होंने कुछ टेस्ट करने के बाद ही कुछ कहने की बात कही । 

अगले दिन टेस्ट हो गए और शाम को रिपोर्ट्स भी आ गई। डॉक्टर ने विनोदजी को अपने केबिन में बुलाया और बताया कि रचना को ब्रेन ट्युमर है और काफी एडवांस स्टेज पर है। अब तो विनोद जी वहीँ सर पकड़ कर बैठ गए और सोचने लगे, ऐसा कैसे हो सकता है। अब तक उनके मां -पापा भी वहां आ गए थे।  उन्होंने भी डाक्टर साहब की बात सुन ली थी।  सब आवाक थे कि  क्या करें ।  

डाक्टर साहब ने उन्हें ढाढस बंधाया और दो दिन बाद ही आपरेशन करने की बात कही।  विनोदजी के पास स्वीकृति देने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था।  सारी व्यवस्था करके वे रचना के पास ही बैठ गए और प्यार से उसका सर सहलाने लगे। जीवन की आपाधापी में दोनों इस तरह से लगे रहे कि कभी अपनी तरफ ध्यान ही न दिया।  

मन ही मन वे मना रहे थे कि बस एक बार रचना ठीक हो कर घर आ जाये तो सब ठीक हो जायेगा। क्यूं उन्होंने पहले से ही उसकी जांच नहीं कराई। ऐसे विचार उन्हें रह रह कर परेशान कर रहे थे।  वे इस सब के लिए अपने को ही दोषी मान रहे थे। 

अंततः आपरेशन का दिन भी आ गया। सुबह छह बजे ही रचना को तैयार कर ऑपरेशन के लिए ले गए। लगातार पांच घंटे तक आपरेशन चला। जैसे ही डाक्टर साहब बाहर आये, विनोदजी उनकी तरफ लपके। डाक्टर साहब ने हाथ के इशारे  से बताया कि सब ठीक है, चिंता की ज़रूरत नहीं है। जैसे ही रचना को होश आयेगा, वे उनसे मिल सकते हैं।

 

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