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जनरेशन गैप-21 श्रेष्ठ युवामन की कहानियां पंजाब: Generation Gap Story
Generation Gap

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Generation Gap Story: रोमी के कहने पर हमने सभी स्थान देख लिए परन्तु गुनगुन हमें कहीं नहीं मिली, ना ही उसका स्कूटर हमें कहीं दिखाई दिया।

“अंकल कहां गई होगी गुनगुन?” कहते हुए रोमी उदास हो गई। मैं उसके मुरझाए चेहरे की ओर देखने लगा।

“चलो, घर चले….यह लड़की भी अजीब है…। कहां ढूंढे उसे…।” कह कर मैंने कार स्टार्ट की ही थी कि आरती का फोन आ गया, “हां मिली कि नहीं?….नहीं….। कहां मर गई यह स्टूपिड…। कितना परेशान किया है इसने …। आप वापस आ जाएं…।” आरती शायद रो रही थी।

एक घंटा पहले मैं लंच करने के बाद ऑफिस में आ कर बैठा ही था कि आरती का फोन आया, “पूरन, आप अगर कोई जरूरी काम नहीं कर रहे तो दो मिनट के लिए घर आ जाएं…। गुनगुन को गए एक घंटा हो गया है…मार्किट से नूडल्स लेने गई थी। अभी तक लौटी नहीं। प्लीज आप घर आ जाएं….।” आरती तिलमिला कर बोली। गुनगुन के आस-पास जो भी तीन-चार सहेलियां थी, वह उन सभी को फोन कर चुकी थी। मगर गुनगुन का कोई पता नहीं लगा था।

“पूरन, आप रोमी को साथ ले जाएं…इसे लेकर कई बार वह सत्रह की मार्किट की ओर जाती है…जरा चक्कर लगा आएं…हो सकता है, किसी फ्रैंड के साथ वहां बैठी हो…।” आरती काफी परेशान लग रही थी। एक ओर किताब लेकर, सहमी-सी बैठी रोमी मेरी ओर टुकर-टकर देखते हुए खड़ी हो गई।

आरती और मैं एक ही शहर में अलग-अलग समाचार-पत्रों में कार्यरत हैं। पहले हम एक ही समाचारपत्र में कार्य करते थे। आरती मेरी सीनियर थी। पता नहीं उसे क्या परेशानी थी कि उसका व्यवहार सभी कलीग्स के साथ ही बहत बरा था। परन्त टेबल वर्क में वह एकदम सख्त और परी तरह से परफेक्ट। कोई ढील नहीं, कोई कर्पोमाईज नहीं। यही रिर्पोटरों को फील्ड में कवरेज के लिए भेजती। कई बार अच्छी-भली खबर की ऐसी कांट-छांट करती कि उसका असल चेहरा-मोहरा ही बदल कर रख देती। फोटोग्राफरों को भगाए रखती। बुरी तस्वीर देख कर फोटोग्राफरों को काफी बुरा-भला कहती।

आरती का स्वभाव जैसा भी था मगर मालिक उसके काम से अत्यन्त प्रसन्न थे। उसे आरती पर काफी गर्व था। उसे घर से लाने-लिजाने के लिए ऑफिस की गाड़ी तैनात थी।

फस्ट लैसन सेलीब्रेशन करने की पार्टी ऑफिस से बाहर हुई। वहीं हमारी पहली मुलाकात हुई। मैंने महसूस किया, वह मुंह से जितनी कड़वी थी, भीतर से उतनी ही नरम थी। बीयर सिप करते हुए बोली, “आदमी हर काम में परफेक्ट हो…जर्नलिज्म कोई गुल्ली -डंडे का खेल नहीं…यू नो…। यह वो चिराग है, जिस के लिए जितना अपना खून दोगे, यह उतनी अधिक रोशनी देगा। ये जो लड़कियां-लड़के इस प्रोफेशन में ऐंटर कर रहे हैं, इन्होंने तो इसे प्रेस क्लब बना कर रख दिया है…”

कुछ देर तक वह चुप रही। चार मिनट के बाद जैसे चौंक कर बोली, “बीयर में तो जान ही नहीं…मुझे तो वोदका दो…पूरनवीर, आप ले आएंगे वोदका…छोड़ो बीयर को…।” और उसने वेटर को बुलाया और उसे वोदका लाने को कहा।

मैंने कहा, “आप को याद है, आप चार साल पहले पी.यू. में हमें लैक्चर देने के लिए आए थे। मैं बहुत इम्प्रेस हुआ था आपसे…। वह प्रभाव अभी भी कायम है।”

अपनी प्रशंसा सुन कर आरती ने मेरा हाथ थाम लिया और उसे धीरे-धीरे सहलाने लगी। मुझे उसका यह अंदाज बहुत अच्छा लगा। जब कुछ मिनट इसी प्रकार बीत गए, तब मैंने अपना हाथ उसकी बाजू के साथ सटा दिया। फिर उसने मेरी आंखों में झांका और बोली, “आओ चलें” कहते हुए वह उठ खड़ी हुई।

मैं उसे उसके घर छोड़ने के बाद चलने लगा तो वह बोली, “अरे रुको-रुको…। आओ अंदर आओ।” कमरे में आने पर कहने लगी. “गर्मी बहत है. परनवीर. आप बैठे. मैं अभी चेंज करके आई। प्लीज बैठे…।” इतना कह कर उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा और इस प्रकार से निकली कि उसका आधा जिस्म मझसे छ गया। मैंने हाथ बढ़ा कर उसे रोक लिया और उत्साह में दो-तीन बार उसे चूम लिया।

“हाय-हाय पूरनवीर …क्या हो गया?” कहते हुए वह वहीं दीवान पर गिर गई।

आरती के साथ काम करते हुए मैंने दो साल में बहुत कुछ सीखा। मुहब्बत करना भी सीखा, रिलेशंस को जीना भी सीखा, यहां तक कि…हां, आरती द्वारा पेपर को छोड़ने से पहले आखिरी दो महीनों में हम काफी निकट आ गए। मेरा जी चाहता कि मैं अधिक से अधिक समय आरती के पास ही रहूं। मैंने उससे कह दिया कि मुझे फील्ड में जरूर भेजे परन्तु शहर के भीतर ही। वह मेरे इस पागलपन पर खीझने लगी। कोई भी उसके निकट आने की कोशिश करता तो मुझे जलन होने लगती। कई बार मैं इस मामले में आरती के साथ झगड़ने भी लगा कि वह प्रेस क्लब में फलां आदमी के साथ क्यों बैठी थी।

फिर चक्र उल्टा चलने लगा। आरती मेरे अधिक नजदीक होने लगी, जैसे मैं चाहता था। मुझे मजा आने लगा। मैं ऑफिस से घर आता तो आरती के फोन आने लगते। वह घर पर होती तो ऑफिस में फोन आ जाते। रात बारह बजे तक यह सिलसिला चलता रहता।

आरती का पति मर्चेट नेवी में था। कई-कई महीने वह विदेशी पानी में घूमता रहता। उनकी दोनों बेटियां मसूरी हिल स्टेशन में पढ़ती हैं।

आरती बीमारी के कारण कुछ दिनों से छुट्टी पर थी। आज जब मैं उसके घर में दाखिल हुआ तो सोफे पर बैठे के.के. पर नजर गई। के. के. को देख कर दो मिनट के लिए मेरा फ्यूज उड़ गया। मुझे खुद पर गुस्सा आया कि मैंने सड़क पर खड़ी के.के. की गाड़ी की ओर ध्यान क्यों नहीं दिया। …बड़ी अजीब शख्सियत है यह के. के.। साठ से ऊपर…। हल्की-हल्की सफेद दाढ़ी, गोरा रंग। वह बहरा था…उसे ऊंचा सुनाई देता था। इस कारण उससे बात करते हुए आरती बहुत ऊंचा बोलती थी। उसके कानों में मशीन लगी थी परन्तु आरती के अनुसार, वो मशीन अधिकतर खराब ही रहती थी। वह बाहर के ठेके लेता था। मुझे सोलन के एक आदमी ने बताया था कि के.के. हिमाचल के जंगलों से लकड़ी उठाने के ठेके लेता था। उसकी शिमला में चीफ मिनस्टर के ऑफिस से कई व्यक्तियों से सांठ-गांठ थी। जब कभी उसका काम अटक जाता तो यह आरती को हैरतअंगेज खबरें ला और अपना कारोबार चलाए रखता था। आरती को शायद इस बीच के सिरे की जानकारी नहीं थी।

मेरे बैठते ही के. के. उठ खड़ा हुआ और बोला, “अच्छा…मैडम जी…फिर मुलाकात होगी।” कहते हए वह बैग उठा कर चला गया। मैं के. के. को लेकर तीसरी बार गर्म हुआ था। आरती भी तैश में आ गई… बोली, “मिस्टर पूरनवीर सिंह, इतना हक तो मैंने अपने हसबैंड को भी नहीं दिया…।”

“हस्बैंड को हक देने की नौबत कहां आती है….उसे तो खुद-ब-खुद हक हासिल होते हैं…मगर वह अवेल करें कब? …भई नौकरी सब हक निगल जाती है…”

इस तकरार के बाद ही मैंने जॉब से रिजाईन दे दिया था। जिस समय यह खबर आरती तक पहुंची तो वह तड़प उठी, “आपका दिमाग खराब हो गया है क्या…क्या तकलीफ है आपको? चुप करके रिजाईन वापस ले लो…मैं चीफ से कहूंगी, वो उसे एक्सैप्ट न करें।”

उस शाम मुझे शांत करने के लिए वह मुझे ग्रीन लेकर आई। “…देखो पूरन मेरा के.के. से कोई रिलेशन नहीं….आपको मेरी वीकनैस मालूम ही है कि मुझे अधूरे बुजुर्ग अच्छे लगते हैं। मुझे इनकी भावनाओं, इनकी इच्छाओं से बहुत हमदर्दी पैदा हो जाती है…मेरी चाहत होती है, मैं इनके किसी काम आ पाऊं। पूरन आप मेरी दिल की भावनाओं को क्यों नहीं समझते….”।

परन्तु मैंने रिजाईन वापस नहीं लिया।

एक रात पुड्डा के इंजीनियर संधू ने हम सात पत्रकारों को प्रेस क्लब में डिनर पार्टी दी। जैसे ही हम फारिग हुए, कोने वाली टेबल पर बैठे औलख रिपोर्टर ने मुझे रोक लिया। उसने कई बरस तक आरती के साथ काम किया था और अब वह कालका से दैनिक के लिए काम करता था। मैंने हाथ मिलाते हुए उससे कहा, “क्या बात है, अकेले बैठे हो….हमारे पास आ जाते…।”

“वो जो बैठी थी झगड़ालू…। तुम इसके साथ कैसे? तुमने तो वहां से छोड़ दिया था?”

“एक पार्टी ने इंवाईट किया था…मैं तो उधर हूं….उजाला की ओर…।”

“सर, मैडम, बुला रही हैं…।” वेटर ने मुझसे कहा।

“यार तुम उसके साथ हो? शेरा जरा बच कर रहना…के. के. को तो लोग जानते हैं…। उसका सारा फार्म चट कर गई है, कसौली वाला…”। मेरा हाथ सहलाते हुए औलख आख दबाते हुए हसा।

में जल्दी से आरती के पास पहुंचा। वह गुस्से से बोली. “आप पागल हो क्या पूरन…। मैं बाहर वेट कर रही हूं और आप उस बदतमीज के साथ गप्पें लगा रहे हो। क्या बक रहा था वो कुत्ता औलख…? यह बेवकूफ यहां क्या कर रहा है…?” गाड़ी की पार्किग तक आते हुए वह बोलती रही।

डेढ महीने से मसूरी में स्कूल बंद थे। स्कूल के खुले वातावरण में रहने की आदी लडकियां चडीगढ आकर भी उसी हिसाब से रहती है। छोटी तो अभी मासूम है, परन्तु गुनगुन जवान है। पन्द्रवां पार कर रही है। एक बरस पहले उसकी ओर देख कर आरती कहने लगी, “पूरनवीर, देख मेरी बेटी कितनी ब्यूटीफुल है। हाय…इतनी स्मार्ट है कि इसकी ओर देख कर मैं जैलस होने लगती हूं।…यह कहती है, मम्मा, मुझे मॉडलिंग में जाना है…. कभी कहेगी…मैं ब्यूटी कंटैस्ट में जाऊंगी…। लेकिन अभी यह बच्ची है…।”

एक दिन मैं आरती को साथ लेकर पार्किन में आ बैठा। एक-एक ड्रिंक लिया और लंच के बाद हम आरती के घर आ गए। जैसे ही हम बाहर गेट पर पहुंचे, फुल वाल्यूम पर बजते डैक की आवाज सुन कर आरती ने घूर कर मेरी ओर देखा, “यह न्यू जनरेशन का कल्चर…शोर…हल्ला-गुल्ला!”

बड़ा दरवाजा अंदर से बंद था, इसलिए डोर-बैल बजाई। दो बार फिर दबाई तो कहीं म्यूजिक बंद हुआ। हांफते हुए गुनगुन ने दरवाजा खोला। ड्राईंग-रूम में खड़े दो लड़के और लड़कियां हमारी ओर हैरानी से देख रहे थे। फिर वे एकदम बोले, “हैलो अंकल… हैलो आंटी…।” दोनों बेटियों का रंग फीका पड़ गया था।

आरती ने कुछ सूंघा, फिर बोली, “आओ ऊपर बैठते हैं।”

ऊपर आ कर भी आरती डिस्टर्ब रही। अलमारी खोल वह एकदम से वोदका के दो पैग नीट ही गटक गई। अब कुछ सहज हुई और मुझसे कहने लगी, “पूरनवीर सिंह…सॉरी यार…। आप इस वक्त जाओ…मुझे अकेला छोड़ दो। प्लीज डोंट माईंड।”

मैं धीरे से उठा और नीचे आ गया। गुनगुन के फ्रैंड खिसक गए थे। गुनगुन ने मेरा हाथ पकड़ कर मिन्नत करने के अंदाज में कहा, “अंकल! मम्मा गुस्से में है? अंकल प्लीज आप रुक जाएं न…।”

“कुछ नहीं होगा…डरो मत। सब चलता है…। रोमी कहां है? तुम यहां की सफाई कर दो… घबराओ मत..।” मैंने उसे हौंसला दिया।

“अंकल, रोमी तो कल ही नाना पापा के साथ फीरोजपुर गई है…। आप बैठ जाएं अंकल…। आप कोक लेंगे।” गुनगुन मुझसे ऐसे सट गई, जैसे उसे मेरे सहारे की आवश्यकता हो।

अब मैं और रोमी जब आधे घंटे के बाद वापस लौटे तब आरती मायूसी से निढाल. पीछे के आंगन में झूले पर बैठी, सूखे पौधों की ओर देखते हुए सोच में डूबी हुई थी।

“पूरन! पुलिस में रिपोर्ट कर दे? मेरी बेटी को कोई किडनैप करके ले गया है…। मेरे तो कई दुश्मन है। फिर मार्किट में तो हर ओर ही लफंगे घूमते रहते हैं। दो दिन पहले ही एक लड़की को जीप में डाल कर नहीं ले गए थे? अमीरों के जितने भी बिगड़े हुए छोकरे हैं, इसी मार्किट में ही आते हैं…हम तो रोज ही देखते हैं।”

“इतनी जल्दबाजी मत करो…। आप शांत रहो। कुछ देर और वेट कर लेते है…।”

“बहुत तंग करती है यह लड़की। देखो मैं कितनी परेशान हूं। मेरा बी. पी. लो हो गया है।” फिर आरती रोने लगी।

“आप देखना, वो अभी आ जाएगी। ऐसे ऊंट-पटांग मत सोचें।”

मुझे आरती से इतना प्यार था कि हफ्ते में एक दिन तो मैं जरूर आ ही जाता था। इस हालत में आरती की दोनों बेटियों से मेरा स्नेह स्वाभाविक ही था। फिर वो आती भी नवंबर-दिसंबर में ही थी।

गुनगुन स्वाभाविकता से मेरे गले में बांहें डाल कर कहती, “पूरन अंकल, टैन रुपीज निकालो….बाहर मैगी वाला आया है…।” वह खुद ही मेरी जेब से पर्स निकाल कर पैसे ले, बाहर दौड़ जाती।

“पूरनवीर, इन्हें यूं लाड़ कर बिगाड़ो ना…। मुझे यह सब अच्छा नहीं लगता। बच्चों को घूर कर रखना चाहिए। फिर अब यह बड़ी भी होने लगी है।”

“भई, यह मेरी भी बेटी है…। आप बेकार की बातें मत सोचा करें।” मैं खीझ जाता।

“नहीं डियर पूरन…मैं बेकार नहीं सोचती….लड़कियों को अधिक आजादी नहीं देनी चाहिए। मैं तुम्हें अपनी एक फ्रैंड की बात बताती हूं…बुरा मत मानना…। वह कहती है, “ये जो अंकल होते हैं, इनसे लड़कियों को बचा कर रखा करो।”

मुझे यह बात चुभ गई, “हां, जिस प्रकार का किसी का एक्सपीरियंस होगा, वह वही बताएगा….।” इस बात को लेकर मैं कई दिनों तक आरती के घर नहीं गया था।

एक हफ्ते बाद आरती का फोन आया। ऐसे मौके पर वह झूठ बोलेगी, बहानेबाजी करेगी और रोकर भी दिखाएगी। मझे उसके घर जाना ही पडा। अंधेरा ही अंधेरा….सब ओर शांत-शांत…। क्या बात है भई…। बहत खामोश माहौल बना रखा है….आखिर माजरा क्या है?”

“बस चुप रहो पूरन…शांत…” कहते हुए आरती ने मुझे बाहों में भर लिया। फिर गहरी सांस भर कर बोली, “यह न्यू जेनरेशन….तौबा मेरी मां…। यह कैसा कल्चर क्रिएट हो रहा है? ….उस दिन आपके जाने के बाद…करीब एक घंटे के बाद गुनगुन वापस आई। मैंने गुस्से से उसे थप्पड़ जड़ दिया, जैसे ही दूसरा थप्पड़ लगाने लगी, उस बेवकूफ ने मेरा हाथ पकड़ लिया और चीख कर बोली, “डोंट ट्राई टू स्लैप मी अगेन मम्मा! मैंने क्या गलत किया है?” मैंने कहा, “तुम दस मिनट का कह कर गई थी और अब आ रही हो टू फिफ्टी पर…कहां थी इतनी देर?” कहने लगी, “मुझे मेरा फ्रैंड मिल गया था मार्किट में। हम मार्किट में एक कॉफी शॉप में बैठे थे। मेरे फ्रैंड ने कहा, गुनगुन तुम चली जाओगी, आओ दस मिनट बैठ कर बातें करते हैं। मैंने आपको पांच बार फोन किया मगर आपका फोन बिजी ही रहा।”

मैंने गुस्से से कहा, ‘मुझे नहीं पसंद, तुम्हारा फ्रैंड्स से मिलना-जुलना।” वह मुझे चीख कर बोली, “क्यों मैं आपकी गुलाम हूं? आई एम नॉट योर स्लेव….मम्मा! आप अपने फ्रेंड्स से मिल सकते हो…उन्हें घर बुला सकते हो…फिर बच्चों के लिए आप इतने नैरो माईडिड क्यों हैं? मुझे आपकी थिकिंग पर गुस्सा आ रहा है…” पूरन उसकी बातें सुन कर मेरे पैरों तले से जमीं खिसक गई, जब उसने कहा, “पूरन अंकल के साथ आपका क्या रिलेशन है?”

मैंने उठ कर उसे पानी का गिलास थमाया, “लो आप पानी पिओ….शांत हो जाओ…। दो मिनट चुप बैठो।”

मगर आरती कहां चुप रहने वाली थी। वह मेरे चुप करने से पहले ही बोल उठी, “वास्तव में कल्चर के नाम पर हम ही सभी कुछ इन बच्चों को दे रहे हैं। असली दोषी तो हम ही है। फिर हम ही जेनरेशन गैप का रोना रोने लगते हैं।…देखो…फिर कहने लगी, आप इतने बड़े न्यूज पेपर में न्यूज आ देते हो लोगों को प आ कर उसका मुंह तो बंद कर दिया मगर खुद सोच में डूब गई। गुनगुन ने मुझे फैडअप कर दिया….मैं नौकरी छोड़ दूंगी…। हम भी आगे से कम ही मिलेंगे। बुरा मत मानना…प्लीज पूरन, मुझे माफ कर दो।”

आरती सचमुच बहुत परेशान लग रही थी…।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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