‘पान खाओगी?’

‘नहीं।’

‘कुछ पिपरमेण्ट की गोलियाँ पर्स में रख लो।’

‘मुझे चक्कर नहीं आते।’

‘टिकट ठीक से रख लिया न?’

‘हूँ।’

ये औपचारिक वाक्य दोनों के बीच घिर आये मौन को तोड़ने में कितने असमर्थ हैं, दोनों ही इस बात को जान रहे हैं, पर मौन तोड़ने के लिए शायद कुछ और है भी नहीं।

अब से कोई पाँच घण्टे पहले चाय पीते-पीते बिन्नी ने बिना किसी प्रसंग और भूमिका के कहा था, ‘कुंज, मैं आज ही वापस लौट जाऊँगी।’

‘क्यों?’ हल्के-से विस्मय से उसने पूछा था।

‘बस, अब लौट ही जाऊँगी।’ चाय के साथ-ही-साथ आँसुओं का घूँट-सा पीते हुए उसने कहा था, तब स्वयं उसके मन में भी शायद यह बात नहीं थी कि आज ही उसे चल देना पड़ेगा।

‘तुम तो लंबा प्रोग्राम बनाकर आई थीं न?’ कुंज के स्वर में जैसे नमी आ गई थी, पर उसे रोकने का आग्रह या मनुहार जैसी कोई बात नहीं थी। उसके चेहरे के रह-रहकर बदलते भावों से उसके मन की दुविधा का आभास ज़रूर मिल रहा था। बिन्नी बूंद-बूंद चाय सिप करके अकारण ही समय को खींच रही थी। तभी बैरा अखबार दे गया, तो कुंजी को जैसे एक सहारा मिल गया।

बिन्नी उठी और सूटकेस ठीक करने लगी। अधिकतर साड़ियों की तह भी नहीं खुली थी, फिर भी उन्हें निकाल-निकालकर जमाने लगी। हर क्षण उसे लगा था कि कुंजी दोनों के बीच खिंच आए इस तनाव को तोड़कर उसे बुरी तरह डाँटेगा और गुस्से में आकर सूटकेस का एक-एक कपड़ा निकालकर बाहर फैला देगा। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। बड़ी देर तक बिन्नी इधर के कपड़े उधर करती रही, फिर जाकर खड़ी होकर नीचे से गुजरते सैलानियों को देखती रही और कुंज बड़े निरर्थक से कामों में अपने को व्यस्त बनाये रखने का अभिनय करता रहा। और उस समय का मौन यहाँ तक खिंचा चला आया।

कंडक्टर ने सीटी बजायी। बिन्नी ने देखा कि एक बड़ी ही निरीह-सी कातरता कुंज के चेहरे पर उभर आई है। बिन्नी का अपना मन बहने-बहने को हो आया, पर अपने को भरसक साधती-सी बस में चढ़ने लगी। कुंज ने हल्के-से उसकी पीठ पर हाथ रखकर उसे सहारा दिया। बस स्टार्ट हुई तो, कुंज ने कहा, ‘पहुँचकर लिखना।’ बिन्नी से स्वीकृति में सिर भी नहीं हिलाया गया।

बस चल पड़ी, तो उसके खाली मन पर आक्रोश निराशा, अवसाद और आत्मग्लानि की परतें जमने लगीं। आँसुओं को आँख की कोरों में ही पीते हुए वह बाहर देखने लगी। मोड़ पर एक बार उसने पीछे की ओर मुड़कर देखा। बस धूल के जो गुबार छोड़ आई थी, उसके बीच कुंज का सिर दिखाई दिया। पता नहीं वह किस ओर देख रहा था। मोड़ के साथ ही बस ढलान पर चलने लगी। चारों ओर फैली हुई पहाड़ियों और उसके बीच अंगड़ाई लेती हुई सुनसान घाटियाँ। कुंज ऊपर ही छूट गया है, और बस उसे तेजी से नीचे की ओर ले जा रही है, नीचे-नीचे।

पीछे कोई बराबर खाँस रहा है, जैसे दमे का मरीज हो। इस लगातार की खाँसी से बिन्नी को बेचैनी होने लगी। उसने पीछे मुड़कर देखा। सबसे पिछली सीट पर एक बूढ़ा पैर ऊपर उठाये, घुटनों में मुँह छिपाये लगातार खाँसे जा रहा है। थोड़ी देर में उसकी खाँसी बंद हो गई, तो बिन्नी बड़ी बेकली से उसके फिर खाँसने की प्रतीक्षा करने लगी। जब फिर खांसी चलने लगी, तो उसे जैसी राहत मिली। और हर बार यही होता, उसके खाली मन को टिकने के लिए जैसे एक सहारा मिल गया।

बस से उतरी तो बिन्नी को लगा, जैसे उसका सिर बहुत भारी हो आया है। हवा वास्तव में शायद उतनी गरम नहीं थी, जितनी पहाड़ पर से आनेवालों को लग रही थी। बिन्नी ने वेटिंग रूम में जाकर हाथ-मुंह धोया, सिर पर ढेर सारा ठंडा पानी डाला और पंखे के नीचे बैठ गई।

प्लेटफार्म पर इस समय सन्नाटा-सा ही था। बस से उतरे हुए यात्री वेटिंग-रूम में समा गये। नीली वर्दीवाला कोई-कोई खलासी इधर-उधर आता-जाता दिखाई दे जाता था।

धीरे-धीरे साँझ उतरने लगी, तो बिन्नी की आँखों में कल की साँझ उतर आई।

हवा में काफी ठंडक थी, फिर भी चढ़ाई के कारण बिन्नी और कुंज के चेहरे पर पसीने की बूंदे झलक आई थीं। बिन्नी चुपचाप चल रही थी, अपने में ही डूबी, आत्मलीन-सी।

कुंज शायद समझ रहा था कि फूली हुई सांस के कारण उससे कुछ बोला नहीं जा रहा है। पर नहीं, बिन्नी के पास उस समय बोलने के लिए कुछ था ही नहीं। केवल यह अहसास था कि सारी बात खिंचकर ऐसे बिंदु पर आ गई है, जहाँ शायद कहने-सुनने के लिए कुछ भी नहीं रह जाता।

‘कहीं बैठ जाये अब तो,’ चुप-चुप चलने से ऊबकर बिन्नी ने कहा

‘बहुत थक गईं?’

‘हाँ, अब तो सचमुच बहुत थक गई।’ और जब उसने कुंजी की कुछ टटोलती-सी नजरों को अपने चेहरे पर टिका पाया, तो उसे लगा जैसे कुंज ने उसकी बात को किसी और ही अर्थ में ग्रहण किया है।

बैठते ही कुंज ने उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया। यह स्पर्श, होश सँभालने के बाद पुरुष-स्पर्श से उसका परिचय इस स्पर्श ने ही कराया था। इसी स्पर्श ने भीतर तक गुदगुदाकर और रोम-रोम में बसकर उसे उठते यौवन का एहसास कराया था। आज एकाएक ही कितना अपरिचित हो उठा है यह स्पर्श-सर्द और निर्जीव।

फिर भी उसने अपना हाथ खींचा नहीं। सुनी-सुनी नजरों से सामने फैली पहाड़ियों और नीचे उतरती घाटियों को ही देखती रही। कुंज का हाथ थरथराने लगा। वह समझ गई कि कोई बात है, जो उसके भीतर घुमड़ रही है। पहले जब कभी उसे इस बात का आभास भी मिलता था, तो कितनी उत्सुक हो उठती थी वह जानने के लिए। आज वह न कोई उत्सुकता दिखा रही है, न आग्रह कर रही है। भीतर-ही-भीतर तो वह जानती भी है कि कुंज क्या बात करेगा। उसने मधु का पत्र पढ़ लिया था। शायद कुंज ने जान-बूझकर ही ड्रेसिंग-टेबिल पर वह पत्र छोड़ दिया था, जिससे कि बिन्नी स्वयं सारी स्थिति समझ ले। फिर भी आशंका और आशा का मिला-जुला भाव बिन्नी के मन में रह-रहकर तैर रहा है। कुंज सारी बात को किस रूप में रखता है? किस अधिकार से वह कहेगा कि ‘बिन्नी तुम लौट जाओ, अपने को काट लो।’ वह जानने-सुनने को उत्सुक भी है, साथ ही यह भी चाहती है कि दोनों के बीच कभी यह प्रसंग उठे ही नहीं। बस, ऐसा ही एकान्त हो, ऐसी ही निर्विघ्न शांति हो और इसी प्रकार कुंज उसका हाथ अपने हाथ में लिए बैठा रहे। ‘बिन्नी!’ कुंज अटक जाता है। फिर धीरे-धीरे बिन्नी का हाथ सहलाने लगता है। बिना देखे भी बिन्नी जान लेती है कि बड़ी ही दयनीय-सी विवशता उसके चेहरे पर उभर आई है।

‘बिन्नी, तुम्हीं बताओ मैं क्या करूँ? मेरी आस्था ही मेरे लिए बहुत भारी पड़ रही है। यह सब अब मुझसे चलता नहीं। यह दुहरी जिंदगी, यह हर क्षण का तनाव…।’ वाक्य उससे पूरा नहीं हो पाता। बचे हुए ‘शब्द’ स्वर के भर्रायेपन में ही डूबकर रह जाते हैं।

बिन्नी कुछ नहीं कहती, केवल अँधेरे में कुंज के चेहरे पर उभर आये भावों को देखने की कोशिश करती है। विश्वास करने की कोशिश करती है कि यह सब कुंज ही कह रहा है। भीतर-ही-भीतर कुंज के ही कुछ वाक्य टुकड़ों-टुकड़ों में गूंजते हैं-‘बिन्नी, शादी मुझे इतना संकीर्ण नहीं बना सकेगी कि मैं अपने और सारे सम्बन्धों को झुठला ही दूँ। शादी अपनी जगह रहेगी और मेरा तुम्हारा संबंध अपनी जगह!’ पता नहीं उस समय इन बातों से उसने अपने को समझाया था या बिन्नी को…। कुंज उसके बाद कुछ नहीं कह पाता। थोड़ी देर बाद वह कहता है, तो केवल यही, ‘बहुत अँधेरा घिर आया है, अब लौट चलें, वरना…’

और बिन्नी चारों ओर घिरते हुए इस अंधेरे को मन की अनेक परतों पर उतरता हुआ महसूस करती है, लौट जाने की आवश्यकता को भी महसूस करती है, पर समझ नहीं पाती कि आखिर लौटकर जाये कहाँ?

रात आधी के करीब बीत चुकी है। कमरे के सारे खिड़की-दरवाजे बंद हैं। फायद-प्लेस में जलती लकड़ियों का चट्ट-पट्ट शब्द ही कमरे के मौन को चीर रहा है। कुंज ने कमरे की बत्ती बंद कर दी है। केवल लकड़ियों का पीला-पीला आलोक ही कमरे में थिरक रहा है, जिसके साथ दीवालों पर न जाने कैसे बेडौल से साये काँप रहे हैं। उसे लगा, वह जब भी कंज के साथ होती है, ऐसी ही बेडौल छायाएँ उसे हमेशा घेरे रहती हैं। कॉफी के खाली प्याले टेबिल पर पड़े हैं और थकी-सी बिन्नी सोफे पर ही तकिया दबाकर अधलेटी-सी पड़ी है। सिगरेट के धुएँ के पारदर्शी बादलों के पीछे से झांकता हुआ कुंज का चेहरा बिन्नी को एक भावहीन मूर्ति की तरह लग रहा है।

एकाएक बिन्नी को लगा, जैसे बड़ी देर से चुपचाप बैठे हैं और इस अहसास के साथ ही उसे वह एकान्त बड़ा बोझिल लगने लगा। ऐकांतिक क्षणों का मौन यों शब्दों से भी ज़्यादा मधुर होता है, पर लगा, इसके पीछे तो कुछ और ही है। शायद चाहकर भी कुछ न कह पाने की विवशता, बिना सुने ही सबकुछ जान लेने की व्यथा।

कुंज सिगरेट का आखिरी कश लेकर उसे मसलकर भरी हुई एश-ट्रे में ठूँस देता है। फिर शब्दों को ठेलता हुआ-सा वह कहता है, ‘बिन्नी, तुम्हें लेकर मैं अपने को बहुत अपराधी महसूस करता हूँ।’ और अब अपनी बात की प्रतिक्रिया जानने के लिए बिन्नी के चेहरे की ओर देखने लगता है। बिन्नी का अपना मन हो आता है। कि वह देखे कि उस पीले-पीले आलोक में उसका चेहरा कैसा लग रहा है? कुंज की सीधी नजरें उसे हमेशा बेचैन कर देती है। उसे लगता है जैसे अनायास ही कुंज की नजरों में तुलना का भाव उभर आया है। यों किसी और के संदर्भ में देखे-परखे जाने की भावना हमेशा उसके मन को कचोटती है। पता नहीं कुंज के मन में यह भाव रहता भी है या नहीं, पर वह स्वयं इस भाव से कभी मुक्त नहीं हो पाती।

‘तुम शादी कर लो, बिन्नी। मेरी दुर्बलता की कीमत आखिर तुम क्यों चुकाओ-मुझे लगता है कि जब तक मैं निर्ममता से अपने को काट नहीं लेता तुम किसी और दिशा में सोचोगी ही नहीं। इस बार मुझे कुछ निर्णय ले ही लेना चाहिए।’ और वह जैसे आँखों के आगे छायी धुंध को दूर करने के लिए दोनों हाथों से आँखें मसलने लगता है।

एकाएक ही बिन्नी का मन बेहद-बेहद कटु हो जाता है। मन होता है सुलगती नजरों से एक बार कुंज को देखे, पर वह छत की ओर देखने लगती है। आँखों के आगे मधु के पड़े हुए पत्र की पंक्तियाँ उभर आती हैं, ‘तुमने विवाह से पहले एक बार भी मुझे बता दिया होता कि तुम किसी और के साथ वचनबद्ध हो तो मैं कभी तुम दोनों के बीच नहीं आती। किसी और का अधिकार छीनने की मेरी आदत नहीं। पर जो अधिकार तुमने स्वेच्छा से दिया उसमें बँटवारा करना भी मेरे लिए सम्भव नहीं। आज भी अपना मन साफ करके मुझे बता दो, मैं चुपचाप लौट जाऊँगी। पर उस समय फिर गोद में छिपाकर आँसू मत बहाना। तुम जानते हो, तुम्हारे आँसू मुझे कितना दुर्बल बना देते हैं। मैं तुम्हारे निर्णय की प्रतीक्षा करूँगी, इधर या उधर।

और कुंज ने शायद निर्णय लेने के लिए ही उसे यहाँ बुलाया है। वह जानती है, निर्णय उधर का ही हुआ है। इधर तो जब होना चाहिए था तब नहीं हुआ, जब हो सकता था, तब नहीं हुआ, तो अब क्या होगा। कुंज शायद अपने निर्णय का समर्थन करवाना चाहता है। चाहता है कि बिन्नी स्वयं कहे कि ‘मैं अपने को काट लेती हूँ’, और वह इस कटने की जिम्मेदारी सीधे बिन्नी पर या ‘बिन्नी के हित’ पर डालकर अपराध-भावना से मुक्त हो सके। निर्णय उधर का हो चुका है, इसीलिए तो कुंज ने गोदी में सिर रखकर रोने के लिए उसे यहाँ बुलाया है। यदि इधर का होता, तो शायद आज मधु की गोदी में सिर रखकर कुंज रो रहा होता।

बात फिर वहीं टूट गई। पर बिन्नी ने अच्छी तरह महसूस किया कि जो कोमल तंतु उन दोनों को वर्षों से बाँधे चला आ रहा था, आज जैसे वह टूट गया है। उन दोनों के बीच ‘कुछ’ था, जो मर गया है। टूटने-मरने का यह बोध रात में और भी गहरा हो गया था, अब दो लाशों की तरह वे साथ सोये थे।

कुंज सो सका था या नहीं, पर बिन्नी की नम आँखों के सामने सारी रात जाने कैसे-कैसे चित्र ही तैरते रहे-पिछले साल नैनीताल में कुंज के साथ बिताये हुए दिनों के चित्र थे। श्री ओर श्रीमती कुंज ने श्रीवास्तव के नाम से होटल में कमरा लिया था, और बैरा लोग जब मेम साहब कहकर सम्बोधित करते, तो उसे न कुछ अस्वाभाविक लगता था, न अनुचित। उसका सारा व्यवहार इतना स्वाभाविक था मानो वह वर्षों से उसके साथ रहती आई है, उसकी एक-एक आदत और आवश्यकता से वह खूब अच्छी तरह परिचित है। झील के किनारे की वे बातें आज भी उसे याद हैं, जो शायद कभी उसके जीवन की सच्चाई नहीं बन सकीं, शायद कभी बन भी नहीं सकेंगी-उन्मुक्त प्यार का वह संबंध जिसे विवाह या किसी ऐसे औपचारिक बंधन की आवश्यकता नहीं होती।

बिन्नी की आँखों में आँसू चू पड़े। मन बहुत डूबने लगा, तो उसने आँख खोल दीं। फायर प्लेस की लकड़ियाँ बुझ चुकी थीं। अंगारों पर भी राख जम चुकी थी। केवल हल्की-सी गंध कमरे में अब भी फैली हुई थी।

उसने धीरे-से करवट ली और मन-ही-मन तय किया, ‘कल ही वह लौट जाएगी।’

रेंगती हुई ट्रेन कब प्लेटफार्म पर आ खड़ी हुई-आधी सोती, आधी जागती बिन्नी जान ही नहीं पायी।

‘अभी गाड़ी ख़ाली है, अपना बिस्तर लगा लीजिए,’ कुली ने कहा, तो वह चौंकी।

प्रतीक्षालय में बंद यात्री कुलियों पर सामान लदवाये प्लेटफार्म पर आ-जा रहे थे। दो-तीन बसें और भी अनेक यात्रियों को पहाड़ से नीचे ले आई थीं और हलका-सा शोर चारों ओर फैलने लगा था।

बिन्नी ने जल्दी से सामान उठवाया और जनाने डिब्बे में घुसकर ऊपर वाली बर्थ पर अपना बिस्तर फैला दिया। उसे लगा, आज रात वह नहीं सोएगी, तो उसका सिर फट जायेगा। थोड़ी देर तक खिड़की के पास बैठी प्लेटफार्म की भीड़ को ही देखती रही, पर जब भीड़ बढ़ने लगी, तो ऊपर चढ़ गई। आँख बंद करने पर भी उसे रोशनी का चौंधा असह्य लगता है। जैसे किसी ने चेहरे के सामने टार्च जला दी हो। उसने साड़ी का पल्ला आँख पर डाल लिया।

नीचे का शोर, बच्चों का रोना-चिल्लाना निरन्तर बढ़ता जा रहा है, पर उस सबसे तटस्थ बिन्नी अपने में ही डूबी है। गाड़ी चली तो पहली बात उसके दिमाग में आई-यों चार दिन में ही लौट आने की क्या सफाई देगी वह सुषी को? कुंज का पत्र पाकर जब उसने अपने जाने की बात कही थी, तो सुषी विस्मित-सी उसे देखती रह गई थी। रात में सोते समय केवल इतना ही कहा था-‘पहले का जाना तो तब भी समझ में आता था, बिन्नी, पर अब? जो आदमी बार-बार वायदा करके मुकर जाए, उससे क्या आशा करती है तू?’

‘आशा? क्या हमेशा कुछ पाने की आशा से ही संबंध रखा जाता है।’ कहकर ही बिन्नी को लगा था कि वह सुषमा को समझा रही है या अपने मन को?

‘संबंध?’ सुषमा के स्वर में वितृष्णा भरी खीज उभर आयी। ‘तू अभी भी समझती है कि तू उसे प्यार करती है या कि यह प्यार है जिसके ज़ोर से तू खिंची हुई चली जाती है? क्यों अपने को धोखा दे रही है, बिन्नी? अब तेरे सम्बन्ध का आधार प्यार नहीं, प्रेस्टीज है, कुचला हुआ आत्म-सम्मान। तुझे कुंज नहीं मिला, तो तू अपने को बरबाद करके भी यह संभव नहीं होने देगी कि वह मधु को मिले-‘

बिन्नी भीतर तक तिलमिला उठी। मन हुआ चीखकर सुषमा को चुप कर दे, पर वह भिंचे गले से केवल इतना ही कह सकी, ‘तू चुप हो जा, सुषमा।’ थोड़ी देर तक बिन्नी प्रतीक्षा करती रही थी कि सुषमा कोई और कड़ी बात कहेगी, लेकिन सुषमा सचमुच ही चुप हो गई। बिन्नी समझ गई, सुषी बहुत नाराज है। हल्की नाराजगी में सुषी खूब लड़ती है, पर जब बात उसके लिए असह्य हो जाती है तो वह चुप हो सकती है। कुंज ने उन दोनों के बीच एक दीवार खड़ी कर दी है और हर बार ही कुछ ऐसा होता है कि उस दीवार पर अनचाहे ही एक पलस्तर और चढ़ता जाता है। बिन्नी सुषमा के आक्रोश को समझती है, पर सुषी है कि उसके मन की बात नहीं समझ पाती, शायद कभी समझ भी नहीं पायेगी।

बिन्नी का मन हुआ सुषमा उससे लड़ ले, कुछ और कटु बातें उसे सुना दे, पर यों चुप न हो। सब घरवालों से अपने को काटकर बिन्नी यहाँ रह रही है-कैसी-कैसी मानसिक यंत्रणाओं से वह गुजरी है, पर सुषी का सहारा उसे हमेशा मिलता रहा है, गलत और सही कामों में उसका समर्थन मिलता रहा है। पर इस बार जैसे वह उस आखिरी सहारे को भी तोड़कर कुंज के पास चली आई थी।

अब क्या कहेगी वह सुषी को! उसकी बंद पलकों में आसूँ चू पड़े।

बिन्नी को लेकर ताँगा जब स्टेशन के बाहर निकला, तो पौ भी नहीं फटी थी। सड़क सुनसान थी और हवा सुहानी। जमादार एन भोर की मस्ती में-‘हवा तुम धीरे बहो,’ की तान के साथ सड़क झाड़ रहा था। स्टेशन रोड से तांगा झील के रास्ते की ओर मुड़ा, तो सड़क के किनारों पर सुने गुलमोहर और अमलतास के पेड़ों की कतार की कतार खड़ी दिखायी दी। और बिन्नी का मन लौटकर उस सुबह की ओर चला गया, जब गुलमोहर के पेड़ लाल-लाल फूलों से भरे थे और उसका मन विचित्र-से संशकित उल्लास से।

कंज ने बाँहों में भरकर, अनेक चुंबन अंकित करके उसे नैनीताल में विदा किया था, इस आश्वासन के साथ कि वे जल्दी ही एक नयी जिंदगी की शुरुआत करेंगे। उस दिन जब उसका ताँगा इस तरफ मुड़ा था, तो उसे लगा था कि उसकी जिंदगी भी अब फूलों के रास्ते की ओर मुड़ गई है।

इसी तरह सुषी को बिना सूचना दिये वह आई थी, पर सारे रास्ते उसे लगता रहा था कि घोड़ा बहुत धीरे चल रहा है, या कि रास्ता खिंचकर बहुत लंबा हो गया है।

सुषमा तांगे की आवाज़ से ही जागी थी और उसने उनींदी आँखों से ही बिन्नी को बांहों में भर लिया था।

उसके बाद बिन्नी जहाँ कहीं भी जाती उसे गुलमोहर के लाल-लाल फूल ही दिखाई देते। लोगों का कहना था कि उस साल जैसा गुलमोहर शहर में कभी नहीं फूला था।

फिर एक-एक दिन सरकता गया और गुलमोहर के फूल धीरे-धीरे झड़ते चले गये।

दिन ठंडे होते चले गए थे और अकारण ही यह ठण्डक सुषमा के मन में पैठती चली जा रही थी। उसने कुंज के पत्र पढ़ना बंद कर दिया था और कुंज के पत्रों को पढ़कर अकेले झेलना बिन्नी को बहुत भारी लगने लगा था। कुंज को लेकर उसके अपने मन में न जाने कितना आक्रोश और क्षोभ भरा था, पर सुषमा के सामने होते ही उसे कुंज का मुखौटा ओढ़ना पड़ता था। और तब उसका कष्ट कई गुना हो जाता था।

दिसंबर में सुषमा अपने देवर-देवरानी के आग्रह की बात कहकर कानपुर चली गई थी। बिन्नी का बहुत मन हुआ था कि उसे रोक ले, पर उससे कुछ नहीं कहा गया था। चलते समय केवल इतना ही कह पायी थी, ‘सुषी, जल्दी आना, मेरा मन बिल्कुल नहीं लगेगा।’ तो सुषमा की आँखों में आँसू आ गए थे और बिन्नी को जैसे आश्वासन मिल गया था कि दोनों के बीच कहीं कोई नहीं हैं, कभी कोई हो भी नहीं सकता, कि सुषमा जल्दी ही लौटकर आयेगी।

तांगे की आवाज़ सुनकर मांजी निकलीं और उसे देखकर हैरान-सी बोलीं, ‘अरे बीबी, तुम कैसे लौट आयीं?’

बिन्नी ने ताँगेवाले को पैसे दिये, माँजी को जवाब नहीं दिया। उसने सोच लिया है कि वह किसी को कुछ नहीं कहेगी, सुषमा को भी नहीं।

मांजी ने होल्डाल उठाया और बिन्नी ने सूटकेस। ‘सुषमा बीबी कल शाम को ही शर्मा साहब के यहाँ चली गईं। बीबी जी खुद आकर ले गईं। आज दोपहर में आने को कह गई हैं।’

बिन्नी को बड़ी राहत मिली। मित्रता के इतने वर्षों में यह पहला मौका था कि सुषी की उपस्थिति उसे असह्य लग रही थी। पर अपनी इस भावना पर उसका मन ग्लानि से भर उठा।

बरामदा पार करके बिन्नी कमरे में घुसी। वही कमरा, वही सामान। फिर भी उसे लगा कि जैसे दीवालें सिमट आयीं हैं और कमरा छोटा हो गया है। इस छोटे से कमरे में ही उसे बहुत बड़ी जिंदगी काटनी है। हाथ-मुँह धोकर उसने चाय पी है और फिर अपने कमरे के पलंग पर आकर लेट गई। माँजी आईं, तो उसने खिड़की खोल दी और परदा एक ओर को सरका दिया। सुबह की कोमल धूप में बिन्नी का शरीर नहा उठा, पर खिड़की की सलाखों ने उसके शरीर को कई टुकड़ों में बाँट दिया। और यों कटी-बंटी बिन्नी दोपहर तक यों ही लेटी रही।

सुषमा आई तो हैरान। ‘तू कैसे लौट आई?’

‘यों ही, मन नहीं लगा इस बार।’

इस बात पर ध्यान दिये बिना सुषी की तेज नज़रें बिन्नी के मन में उतरती जा रही थीं। बिन्नी खुद जानती थी कि जो कुछ उसने कहा, वह विश्वास करने लायक नहीं है।

‘लड़ाई हो गई कुंज से?’

‘नहीं तो,’ कहने को कह तो दिया बिन्नी ने, पर भीतर से रुलाई का वेग जैसे फूट पड़ना चाहता था। किसी तरह अपने को संयत करके वह अखबार पढ़ने की कोशिश करने लगी। सुषमा भीतर गई, तो बिन्नी ने सोचा कि अब वह लौटकर नहीं आयेगी, वह उससे कोई बात नहीं करेगी, साथ रहकर भी उन्हें अजनबियों की तरह ही रहना पड़ेगा, हो सकता है सुषमा यहाँ से चली ही जाये। पर तभी हाथ में बिनाई लिए सुषमा आकर सामने की कुर्सी पर बैठ गई। सुषमा हमेशा की तरह सहज लग रही थी, मानो चार दिन पहले उसके बीच कुछ हुआ ही न हो।

बिन्नी अखबार एक ओर पटककर पलंग पर ही बैठ गई। नहीं, सुषमा को वह अपने से यों कटने नहीं देगी। उसने पीठ पर फैले वालों को हथेली पर लपेटकर ढीला-सा जूड़ा बना लिया और सब-कुछ बता देने के लिए भीतर-ही-भीतर जैसे अपने को तैयार करने लगी।

‘तेरा यों लौट आना बड़ा विचित्र संयोग है, कहूँ बड़ा शुभ संयोग।’ और सुषमा ने अपनी नज़र बिनाई पर से उठाकर बिन्नी के चेहरे पर गड़ा दी, जहाँ विस्मय का भाव गहरा होता जा रहा था।

‘दिनेश भैया का पत्र देख लिया न!’

‘नहीं तो। कहाँ है?’ सुषमा की बात का सूत्र इस पत्र में होगा, इस बात का अनुमान-सा लगाते हुए उसने पूछा।

‘तेरी दराज ही में तो रख दिया था मैंने।’ और सुषमा ने उठकर उसे पत्र पकड़ा दिया। पत्रों की बेसब्री से राह देखनेवाली बिन्नी सबेरे से आकर दराज तक न खोले, यह सब, उसकी जिस मानसिक स्थिति का सूचक है, सुषी उसे खूब समझ रही है, पर उसने सोच लिया है कि वह उस बारे में कोई बात नहीं करेगी।

बिन्नी बंद लिफ़ाफ़े को यों ही उलट-पलटकर देखती रही और मन में जो सबसे पहली बात उठी वह यह कि क्या सचमुच ही सुषी ने अपने को बिन्नी से एकदम काट लिया है? वरना सुषमा तो नाराज होने से पहले तक कुंज तक के पत्र इस अधिकार से पढ़ती थी, मानो वे उसी के लिए लिखे गए हों। सुषमा के विवाह के पहले तक दोनों का हर काम साझे में चलता था। श्यामजी के विदेश जाने के बाद सुषमा बिन्नी के पास आकर रहने लगी, तो वह टूटा हुआ क्रम फिर जुड़ गया था। लेकिन अब?

बिन्नी ने पत्र पढ़ लिया, तो सुषमा ने प्रतिक्रिया जानने के लिए उसकी ओर देखा। बिन्नी भावहीन चेहरा लिए पत्र को मोड़ती-खोलती रही। उसकी कुछ भी समझ में नहीं आया वह क्या कहे। पत्र में विशेष कुछ था भी नहीं। इधर-उधर की दो-चार बातों के बाद सूचना थी कि नंदन अपने काम से आ रहा है। शायद दस-बारह दिन ठहरेगा। उसके साथ रसगुल्ले का एक टिन भेज रहे हैं।

‘अच्छा हुआ तू आ गई। मैं तो समझ ही नहीं पा रही थी कि दिनेश भैया को क्या जवाब दूँ?’

बिन्नी समझ गई कि दिनेश भैया ने सुषमा को अलग से भी पत्र लिखा है। बिन्नी ने अपने को परिवार से काट लिया है, फिर भी कभी-कभी भैया का कर्त्तव्य-बोध जाग ही जाता है। नंदन के बारे में उन्होंने पहले भी लिखा था, बिन्नी को कई बार आने का आग्रह भी किया था, पर बिन्नी के अपने मन में नंदन को लेकर कभी कोई दिलचस्पी नहीं जागी। वही नंदन अब यहाँ आ रहा है। सुषमा का वाक्य मन की किसी अदृश्य परत पर गूँजा-शुभ संयोग।

‘गेस्ट हाउस में ठहरेंगे। तू कहे तो मैं यहीं ठहरने को कह दूँ?’ सुषमा की इस बात से बिन्नी भीतर तक गल गई। क्या हो गया है इस सुषी को? अपने सारे अधिकार समेटकर यों निरीह बनकर वह बिन्नी से पूछे। शादी के बाद से सुषमा कैसे अनायास ही उसकी अंतरंग मित्र से अभिभाविका बन बैठी- यह आज तक वह नहीं समझ सकी थी। पिछले डेढ़ साल से जो सुषमा साधिकार आदेश ही देती आई है, वह निरीह बनकर यों उसकी अनुमति ले? उसका मन हुआ सुषमा के दोनों कंधे झकझोरकर पूछे, ‘तू भी मुझे अपने से काटकर अलग कर देना चाहती है, तो साफ़ क्यों नहीं कहती… ये इस तरह की बातें।’ पर उससे केवल इतना ही कहा गया, ‘मुझसे क्या पूछती है, यह तेरा घर नहीं है क्या?’ स्वर में कुछ ऐसी आता थी कि सुषमा हैरान-सी देखती रह गई और बिन्नी उठकर भीतर चली गई।

चार बजे के करीब घर के सामने जीप रुकी, तो एक क्षण के लिए भी अनुमान लगाने की आवश्यकता नहीं हुई। हाथ की बिनाई पलंग पर पटककर स्वागत के लिए सुषमा बाहर निकली। बिन्नी से चाहकर भी दरवाज़े से आगे नहीं बढ़ा गया। सुषमा ने कुछ इस आत्मीयता से नंदन को लिया मानो उसकी पुरानी परिचिता हो, पर बिन्नी उसके बरामदे में आने और परिचय करवाने के बाद ही नमस्कार कर सकी।

परसों से ही सुषमा ने कमरा अच्छी तरह सजा रखा था। ‘हम तो कल से ही आपकी राह देख रहे थे।’

नंदन ने एक उड़ती-सी नज़र कमरे पर डाली, तो सुषी के चेहरे पर संतोष का भाव उभर आया। उसका सजाना व्यर्थ नहीं गया।

‘कल दोपहर में तो पहुँचा ही था-कुछ लोग आ गए, काम का प्लान डिस्कस करना था, सो शाम उसी में बीत गई।’

फिर रसगुल्ले का टिन बढ़ाते हुए बोला, ‘इसे सँभालिए। सारे रास्ते मुश्किल से अपने को रोकता आया हूँ। कलकत्ते में रहकर भी रसगुल्ले मेरी कमजोरी है।’ और वह खुलकर हँस पड़ा।

तब बिन्नी के मन में कहीं कुंज की हँसी कौंधी। उसने पहली बार भरपूर नज़र से नंदन को देखा। अपेक्षाकृत थोड़ा दुबला और लम्बा। रंग थोड़ा साँवला, पर चमकता हुआ चौड़ा ललाट और सिर पर घुँघराले बाल। तभी लगा जैसे अदृश्य रूप में कुंज भी नंदन के साथ-साथ ही आया है।

बिना परिचय के बातचीत का आधार दिनेश भैया का परिवार ही हो सकता था, पर सुषमा ने नंदन से ही सीधा सूत्र जोड़ा। उसके अनेकानेक आत्मीय प्रश्नों ने अपरिचय के इस बोध को टिकने नहीं दिया-‘सफर में तकलीफ तो नहीं हुई? ठहरने की जगह पसंद है? असुविधा न हो तो यहाँ आकर ठहरिए, हमें बड़ी खुशी होगी जैसे दिनेश भैया वैसे आप। कितने दिन ठहरेंगे। क्या कार्यक्रम रहा करेगा?’

और बिन्नी सोच रही थी कि वह भी इसी सहज भाव से क्यों नहीं हँस-बोल पा रही है। वह तो इस तरह बैठी है, मानो नंदन उसे देखने आया है और वह लाज से सिमटी जा रही है। इस भावना मात्र से वह बेचैन हो उठी, मन हुआ एक चक्कर भीतर का ही लगा आये। तभी मांजी चाय की ट्रे ले आईं, तो बिन्नी को जैसे सक्रिय होने के लिए आधार मिल गया।

‘बिन्नी जी, आपको दिनेश बहुत याद करते हैं और मिकी पिंटू ने तो आदेश दिया है कि बुआ को साथ ही लेते आइये।’

चाय का प्याला बढ़ाते हुए बिन्नी ने नंदन को देखा-क्या सचमुच उसे सबने बुलाया है या कि-क्या भैया ने नंदन को इस तरह का कोई संकेत दे रखा है?

‘यहाँ आपका काम क्या रहेगा? किस प्रोजेक्ट पर आये हैं आप?’ इतनी देर में बिन्नी की ओर से पहला प्रश्न था।

‘हमें विभिन्न प्रान्तों के आदिवासियों की विवाह-पद्धति पर तथ्य इकट्ठे करने हैं।’

‘यह तो बड़ा दिलचस्प काम है!’

‘ओह, बड़ा दिलचस्प। वेरी इंटरेस्टिंग। मैं तो चकित हूँ कि इस अकेले देश में कितनी तरह के रस्म-रिवाज हैं!’ और फिर बातें विभिन्न प्रकार की विवाह-पद्धतियों पर ही चल पड़ीं। नंदन जब जाने लगा, तो यह तय हुआ कि जब भी वह खाली होगा, बिना किसी औपचारिकता के यहाँ आ जाया करेगा। यहाँ के जो तीन-चार दर्शनीय स्थान है, वे साथ ही देखे जायेंगे।

उस दिन चले जाने के बाद भी बड़ी देर तक नंदन उस घर में बना रहा।

बीतते अक्तूबर की साँझ। बिन्नी छत पर चली आयी। सामने सड़क पर गायों का एक झुंड सारे वातावरण को मटमैला बनाता हुआ गुज़र गया है। पीछे के मैदान में गुल्ली-डंडा खेलते हुए बच्चों का शोर बहुत साफ़ सुनायी दे रहा है। बिन्नी निरुद्देश्य-सी वही सब देख रही है।

उस दिन के बाद तीन दिन बीत गए, नंदन नहीं आया। यों वह कह गया था कि दो-दो, तीन-तीन दिन के अंतराल से ही वह आ पायेगा, फिर भी हर दिन सुषमा ने उसकी राह देखी है, शायद बिन्नी ने भी। नंदन के आगमन ने बिन्नी और सुषमा के बीच आ गए खिंचाव को अनायास ही तोड़ दिया था। पर आज सवेरे जब से कुंज का पत्र आया हैं, सुषमा फिर चुप है। बिन्नी जानती है कि चौदह साल पुरानी इस घनिष्ठ मैत्री का आज अपना कोई अस्तित्व नहीं रह गया है। दूसरे ही उसके निर्णायक हो गए हैं। बस, सवेरे से वह अकेली अपने कमरे से उठकर कभी सामने के छोटे-से लॉन में गई है, तो कभी पीछे के आँगन में। नयी आई पत्रिका की हर कहानी उसने शुरू की है, पर पूरा किसी को नहीं किया। दिन में एक घंटा लेटी है, पर नींद एक मिनट को नहीं आयी। सुषमा तनाव के ऐसे क्षणों में भी कैसे इतनी सहज रह लेती है? सवेरे से ही वह श्याम जी के लिए स्वेटर बना रही है। बिन्नी अपना मन ऐसे कामों में ज़रा भी नहीं लगा पाती। आज तो उसे खुद विश्वास नहीं होता कि कभी वह और सुषमा होड़ लगाकर सिलाई, कढ़ाई और बिनाई किया करती थीं। घंटों घूम-घूमकर साड़ियाँ और चूड़ियाँ खरीदती थीं। सुषी को आज भी इन सारे कामों में वैसी ही रुचि है, यह तो बिन्नी ही है जो बदल गई है।

उसने मांजी की खाट बिछायी और बाँह का तकिया बनाकर चित लेट गई। कुंज ने उसे अब पत्र क्यों लिखा? कई बार उसने वह पत्र पढ़ा है। वे ही शब्द-कुछ प्यार के, कुछ मजबूरी के, कुछ अपनी आस्था और मान्याताओं के। भावनाओं की लाश ढोते हुए ये शब्द उसे अब कहीं नहीं छूते। वह जानती है या मात्र एक औपचारिकता है, जिसे निभाने के लिए कुंज मजबूर है। वह आज तक नहीं समझ पायी कि कुंज उससे आख़िर चाहता क्या है? सुषमा की बात तो उसे भीतर तक कंपा देती है। सुषमा कुंज को लेकर बहुत संकीर्ण और कटु हो गई है। आज से पाँच साल पहले तक कुंज दुनिया का सबसे उत्कृष्ट व्यक्ति था। आज सबसे निकृष्ट। सारी मजबूरियों के बावजूद वह उसे माफ नहीं कर पाती है। उसे वह मजबूरी ही नहीं लगती। वह कभी सुषमा की बात से सहमत नहीं हो पायी है, पर सुषमा अपनी हर बात दावे के साथ कहती है, व्यक्तियों का विश्लेषण करने की अपनी क्षमता पर उसे गर्व है। बिन्नी को न कोई ऐसा दावा है, न गर्व। वह तो जितनी सोचती है, उतने ही उलझती जाती है और फिर उसका दिमाग सुन्न हो जाता है।

‘बिन्नी!’

बिन्नी ने ज़रा-सा सिर उठाकर देखा, तो सीढ़ियों पर सुषी खड़ी थी।

‘नंदन आए हैं।’ और वह जैसे आई थी, वैसे ही लौट गई। बिन्नी क्षण-भर यही सोचती रही कि यह मात्र सूचना है या बुलावा। फिर वह उठी। खड़े होते ही सामने फाटक पर खड़ी जीप दिखायी दी। आश्चर्य है, उसने जीप की आवाज़ तक नहीं सुनी!

नीचे उतरकर उसने साड़ी और बाल ठीक किये। खयाल आया सुषमा ने सूचना देने के लिए ऊपर आने का कष्ट यों ही नहीं किया। वह चाहती है कि नंदन के सामने बिन्नी ठीक से ही आये। उसका अपना मन हो रहा है कि कम-से-कम वह साड़ी बदल ही ले-पर फिर वह यों ही घुस गई।

बिन्नी के घुसते ही नंदन ने स्वागत किया, ‘आइए बिन्नी जी!’ तो बिन्नी को लगा यह बात या ऐसी ही कोई बात तो उसे कहनी चाहिए थी। वह मुस्कराकर बैठ गई।

नंदन बात का टूटा सूत्र जोड़कर फिर सुषमा के साथ व्यस्त हो गया। यहाँ के आदिवासियों की तलाक की प्रथा पर बात हो रही थी शायद। बिन्नी का मन बात में नहीं है शायद, रह-रहकर उसकी नज़र नंदन की बाईं कनपटी पर बने घाव के निशान पर चली जाती है। वह सोच रही है-किस चोट का होगा यह निशान, कैसे लगी होगी?

‘आप लोग अनुमति दें तो एक सिगरेट पी लूं?’ और अनुमति का अवसर दिये बिना ही उसने जेब से सिगरेट और लाइटर निकाला। लाइटर देखकर बिन्नी चौंकी! कुछ-कुछ इसी तरह का लाइटर उसने कुंज को उपहार में दिया था।

‘नहीं, आज वह केवल कुंज से ही मिलेगी।’ भीतर-ही-भीतर उसने जैसे निश्चय किया।

सुषमा किसी बात पर नंदन से बहस करने लगी है शायद। बिन्नी सुन अवश्य रही है, पर केवल सुन भर रही है। उसे लग रहा है, जैसे कुछ ध्वनियाँ हैं, जो कमरे में तैर रही हैं, कुछ शब्द हैं, जो कमरें में बिखरे हुए हैं-विवाह, प्रेम, तलाक, आज का जीवन…!

एकाएक बिन्नी अपने चेहरे पर नंदन की सीधी नज़रें महसूस करती है। उसकी नज़रें हैं कि उसे कहीं भीतर से खींचकर बाहर ले आती हैं।

‘आप इस विषय पर क्या सोचती हैं, बिन्नी जी?’

बिन्नी चुप! उसे पता ही नहीं, विषय क्या है? पर नंदन की नजरे हैं कि हट नहीं रही हैं। तब किसी तरह होंठों पर जबरन हल्की-सी मुस्कराहट खींचकर धीरे-से वह कहती है, ‘मैं इन विषयों पर कुछ भी नहीं सोचती।’

‘लीजिए, तब आप क्या सोचती रहती हैं इतना चुप-चुप रहकर? आत्मा-परमात्मा की बातें?’ और वह हँसा तो बिन्नी के मन में पहली बात आई-नंदन जानता है कि वह दर्शन-शास्त्र पढ़ाती है। और क्या-क्या जानता है उसके बारे में?

‘सुषमाजी, आप तो इतना बोलती हैं, पर अपनी मित्र को बोलना नहीं सिखाया आपने?’

और जब सुषमा ने भी हँसते हुए कहा, ‘दोनों ही इतना बोलने लगेंगे तो फिर सुनेगा, कौन, नंदनजी, किसी को तो श्रोता होना ही चाहिए।’ तो वह बड़ी देर तक यही सोचती रही कि कितना अच्छा होता यदि यही बात वह कह पाती। उसने एक बार अपने को पूरी तरह झकझोरना चाहा। चाहा कि वह भी उनकी बातों में, उनकी हँसी में खुलकर भाग ले सके। जो कुछ कहा-सुना जा रहा है, उसे मात्र सुने ही नहीं, समझे भी।

उसे क्या होता जा रहा है? आज सवेरे से उसने कितनी बार कुंज का पत्र पढ़ा है, पर हर बार उसे लगा जैसे वे निरे वाक्य हैं, अर्थहीन और बेजान! केवल आज से नहीं, पिछले कुछ दिनों से बराबर उसे यही लग रहा है कि जैसे सब चीज़ों के, सब बातों के, सब सम्बन्धों के अर्थ चुक गए हैं। देखा, सुना, पढ़ा कुछ भी तो उसकी समझ में नहीं आता है। और यही अर्थहीनता फैलते-फैलते उसके जीवन में समा गई है। सामने बैठा यह नंदन उसे केवल एक आकार मात्र लग रहा है। उससे अधिक उसका या उसकी बातों का कोई भी तो अर्थ उसकी समझ में नहीं आ रहा है। धीरे-धीरे शायद यह फैलती ही चली जायेगी, फैलती ही चली जाएगी…।

बिन्नी एकाएक उठकर भीतर चली गई। भीतर जाकर और कुछ समझ में नहीं आया, तो माँ जी की मदद करने के लिए रसोईघर में चली गई। थोड़ी देर बाद एक ट्रे माँ जी के हाथ में और एक अपने हाथ में लेकर वह चली, तो आँखें सूखी थीं और हर चीज उसे बहुत साफ़ दिखायी दे रही थी।

इस बीच कमरे में बत्ती जला दी गई थी और उस दूधिया आलोक में वह कमरा, कमरे की हर वस्तु और सामने बैठा नंदन उसे एक बार बिलकुल नया-सा लगा।

पता नहीं किस बात पर नंदन हंस रहा था। उसे देखते ही बोला, ‘देखिए, बिन्नी जी, मैं इनसे कह रहा हूँ कि कहाँ आपने भी अकेले-अकेले श्यामजी को दो साल के लिए विदेश भेज दिया। कहीं मेम-वेम ले आये तो…।’

बीच में ही सुषमा सुर्ख होती हुई बोली, ‘ऐसा कभी हो ही नहीं सकता। ये तो कभी ऐसा कर ही नहीं सकते। दो साल क्या, पाँच साल के लिए भी रह लें तो…!’

और सुर्खी उसके गालों से फैलकर कानों तक को लाल कर गई। चाय बनाते-बनाते बिन्नी के मन का कोई अदृश्य कोना बुरी तरह कराह उठा-काश, वह भी किसी को लेकर इतने ही विश्वासपूर्ण ढंग से कह पाती। किसी का संपूर्ण और एकनिष्ठ प्यार उसके गालों पर भी ऐसी ही सुर्खी पोत पाता।

अनायास ही उसकी नज़र नंदन की ओर उठ गई।

फाटक पर खड़े-खड़े ही आनेवाली सन्ध्याओं का कार्यक्रम बन रहा है। अभी-अभी सामने से गायों का एक झुंड गुज़र चुका है। धूल का गुबार और गले में बँधी घंटियों की आवाज़ धीरे-धीरे दूर होती जा रही है।

तीसरी बार और अन्तिम बार नमस्कार करके नंदन जीप में बैठ गया। घर-घर के जोरदार शब्द में एक क्षण को और सारी ध्वनियाँ जैसे डूब गईं।

कच्ची सड़क पर पहियों के गहरे निशान छोड़कर नंदन की जीप दूर जाकर अदृश्य हो गई।

बिन्नी और सुषमा के बीच में से केवल नंदन ही नहीं गया, वह अपने साथ, दोनों के बीच सवेरे से आये तनाव को भी लेता गया।

गायें चली गईं, जीप चली गई। केवल वे शब्द, वे ध्वनियाँ बड़ी देर तक बिन्नी के मन में गूंजती रहीं।

रात में बिन्नी ने सोचा, तो सुषमा उसके बालों को सहलाते हुए समझा रही थी, ‘देख बिन्नी, अब पागलपन मत करना। नंदन जैसा आदमी तुझे मिलेगा नहीं। दिनेश भइया ने आखिर कुछ सोचकर ही इतनी बार लिखा। इन हवाई बातों में कुछ नहीं रखा है, जिंदगी अपने ढंग से ही चलती है।’

और मन में कहीं कुंज के शब्द टकरा रहे थे, ‘हम उस अभागी पीढ़ी के हैं, बिन्नी, जो नये विचारों और नयी भावनाओं को जन्म देने में हमेशा ही खाद बन जाती हैं।’

पूरी तरह खाद बना हुआ-किसी भी बात को ग्रहण करने में असमर्थ बिन्नी का मन केवल यही चाह रहा था कि वह खूब-खूब रो ले।

सर्दी के वे दिन बड़े मनहूस और उदास बीते थे। उसने तभी महसूस किया था कि आदमियों की भी अपनी एक गर्मी होती है। सारे घर में किसी को न देखकर सर्दी जैसे फैल-पसरकर बैठ गई थी। नैनीताल जाने से पहले वह ‘कुछ सुखों’ से अपरिचित थी, पर अब रात में जब शरीर की अपनी भूख जागती, तो अपने को साधना उसके लिए कठिन हो जाता।

उसने कुंज को लिखा था कि तुम जैसे भी हो एक सप्ताह के लिए आ जाओ। पर कुंज व्यस्त था और कुंज की व्यस्तता उसकी इच्छा से बड़ी थी। बिन्नी जानती है कि कुंज के सारे समय पर उसका अधिकार नहीं है, केवल उसका खाली समय ही बिन्नी के लिए है। खाली समय में भी यदि वह चाहे तो। तब उसके मन-ही-मन निर्णय लिया था कि वह जैसे भी होगा अपनी जिंदगी को नया मोड़ देगी, अपने को इस मोह से मुक्त करेगी। पर कुंज के पत्रों के सामने उसके सारे निर्णय गल गए थे और अपने को मोड़कर वह कहाँ ले जाए, इस असमंजस में लौटकर फिर कुंज के पास ही आ गई थी।

पर अब?

कल नंदन चला जायेगा।

उसके बाद जब भी नंदन आया, वे लोग साथ घूमने गये। लौटकर साथ खाना खाया। यह सुषमा का विशेष आग्रह था। सुषमा नंदन, नंदन की आत्मीयता, उसके स्वभाव को लेकर बहुत प्रसन्न है। बिन्नी केवल इतना महसूस कर पायी है कि पिछली दो मुलाकातों में वह उसके बीच अकेला ही रहा है। कुंज अनुपस्थित होता चला गया।

आज का प्रोग्राम यों बना था कि नंदन गेस्ट हाउस से सीधे झील पर पहुँचेगा और ये दोनों घर से जायेंगी। जाने का समय हुआ तो सुषमा ने कहा, ‘बिन्नी, आज तू अकेली ही चली जा।’

‘क्यों?’ आश्चर्य से बिन्नी ने पूछा।

‘मैं कह रही हूँ इसलिए।’ फिर रुककर बोली, हो सकता है वे तुमसे कुछ बात ही करना चाहते हों।’

बिन्नी चुप रही। पर इस मौन में सुषमा का प्रस्ताव मानने की स्वीकृति नहीं थी।

‘देख बिन्नी, आज तक तू जो कुछ सही-गलत करती आई, मैंने इच्छा या अनिच्छा से तेरा साथ दिया। पर आज मेरा इतना-सा आग्रह तुझे रखना ही होगा।’ और बिन्नी की कुर्सी के हत्थे पर बैठकर ही वह उसकी पीठ सहलाने लगी।

सुषमा के इस अभिभावकपन से बिन्नी के अहं को पहले कभी-कभी बड़ी ठेस लगा करती थी, पर अब वह उसकी आदी हो गई है। बल्कि अब तो वह उससे ऐसे व्यवहार की अपेक्षा करती है।

‘देख, नंदन कोई संकेत दे, पत्थर बनकर मत बैठी रहना।’ तो बिन्नी का मन भीतर से हँसा भी, रोया भी। क्या-क्या सोचती है यह सुषमा भी। पर सुषमा ने उसे अकेले जाने पर मजबूर कर दिया।

बिन्नी जब पहुँची, तो दूर से ही देखा, नंदन उनकी प्रतीक्षा कर रहा है। पता नहीं क्या बात है कि चाहकर भी वह कभी समय पर नहीं पहुँच पाती है। एक बार सुषी इतनी खीज पड़ी थी कि बददुआ देती-सी बोली थी, ‘भगवान करे कभी तुझे जिंदगी-भर प्रतीक्षा करनी पड़े। तब उसने कल्पना भी नहीं की थी कि किसी पहुँचे हुए ऋषि की तरह उसका शाप बिन्नी के जीवन का सबसे बड़ा, सबसे कटु सत्य बनकर रह जायेगा। सुषी तो शायद भूल भी गई होगी, पर बिन्नी का तो मन ही ऐसा है कि हर बात वहाँ खुदकर रह जाती

एक क्षण चुपचाप खड़े रहने के बाद धीरे-से बिन्नी ने कहा, ‘नमस्कार’ तो नंदन चौंककर पीछे को घूमा। बिन्नी ने देखा, टी-शर्ट ने उसकी उम्र के दो-तीन साल कम कर दिये हैं।

‘सुषमाजी कहाँ है?’ उसने सिगरेट को होंठों से निकालते हुए पूछा।

‘सुषी नहीं आई, और अपनी बात की प्रतिक्रिया जानने के लिए उसने एक क्षण को नंदन के चेहरे की ओर देखा। पर तभी उसे स्वयं यों अकेले चले आना बड़ा अजीब-सा लगा। क्या सोचेंगे नंदन? बात को संभालते हुए बोली, ‘वह आज आपके लिए एक स्पेशल डिश बनाने के लिए घर पर ही रुक गई।’

लीजिए, आज तो हमारा फेयरवेल-डिनर है। मुझे ठीक आठ बजे गेस्ट हाउस पहुँच जाना है, वहाँ सब मेरा इंतज़ार करेंगे।’?

‘पर यह तो पहले ही तय हो चुका है कि हम लोग जब भी घूमने का प्रोग्राम रखेंगे, तब आप खाना हमारे साथ ही खाएँगे। फिर यों भी आज तो आपका आखिरी दिन है।’ कहने के साथ ही लगा कि कहीं नंदन अभी सुषमा के पास जाने का प्रस्ताव न रख दें। पर नंदन ने केवल इतना ही कहा-

‘क्या करता, उन लोगों का बहुत आग्रह था’ और धुआँ छोड़ता हुआ नंदन झील की ओर देखने लगा, बिन्नी ने सोचा-सुषमा के बिना वह क्या बात करेगी नंदन से? नंदन को क्या सचुमच उससे कुछ कहना है? आज कुछ कहेगा वह?

‘चलिए, हम उसी कच्ची जगह पर बैठे।’ और कहने के साथ ही नंदन चल पड़ा। बिन्नी चुपचाप उसके बराबर चलने लगी। घाट के आखिरी सिरे पर थोड़ी-सी जगह कच्ची छट गई है, जहाँ पानी में पैर डालकर बैठा जा सकता है। वह हिस्सा अपेक्षाकृत सुनसान भी है, लोग इस पक्के किनारे पर ही घूमते हैं।

वहां पहुंचकर नंदन ने जेब से रूमाल निकाला और बिछाकर बोला, ‘आप इस पर बैठिए।’

‘नहीं, मैं वेसे ही बैठ जाऊँगी।’ बिन्नी को स्वयं अपना स्वर बहुत मद्धिम लगा। ‘अरे, वाह, आपकी साड़ी खराब हो जाएगी।’ और उसने भरपूर नजरों से बिन्नी को ऊपर से नीचे तक देखा, तो बिन्नी भीतर तक सिमट गई। चन्देरी की हल्की पीली साड़ी का गहरा चटक बैंगनी बॉर्डर और ज़्यादा मुखर लगने लगा। उसे यह साड़ी पहनकर नहीं आना चाहिए था। क्या सोचा होगा नंदन ने? वह अपनी ओर से ऐसी किसी बात का संकेत नहीं देना चाहती। अच्छा हुआ उसने बालों में लगे बैंगनी फूल के गुच्छे को रास्ते में ही निकाल दिया, जो चलते समय सुषमा ने हँसते हुए खोंस दिया था।

ख़याल आया मेरठ में घरवालों से छिपकर जब वह कुंज से मिलने जाया करती थी, तब भी सुषमा इसी तरह अपने घर ले जाकर उसे अपनी चीजें पहना दिया करती थी। कुंज हो, नंदन हो, सुषमा के लिए कोई फर्क नहीं पड़ता शायद। और उसे?

‘आप संकोच मत करिए, बैठ जाइए।’ और वह बैठती उसके पहले ही नंदन पूरा पैर फैलाकर बड़ी बेतकल्लुफी से बैठ गया। तब बिन्नी रूमाल पर बैठ गई।

‘आपकी यह झील मुझे बहुत ही पसंद आई। जानती हैं, कल रात को पता नहीं क्यों नींद उचट गई। बहुत कोशिश करने पर भी जब सो नहीं सका, तो उठकर यहाँ चला आया। रात के सन्नाटे में किनारे पर बैठकर बड़ी ही विचित्र अनुभूति हुई। अद्भुत!’

और बिन्नी सोच रही थी-नंदन के नींद न आने का कारण क्या रहा होगा? रात बारह बजे देर तक सामने लगे युकेलिप्टस के ऊँचे-ऊँचे पेड़ों की कतार में नजर उलझाये न जाने क्या-क्या गुनती-बुनती रही थी।

अक्सर ही सुषमा जब सो जाती है, तो अनचाहे ही कुंज उसके मन में जाग जाता है। आज भी सुषमा की अनुपस्थिति में उसे हल्के-से कुंज की उपस्थिति का अहसास हो रहा है।

नंदन एकटक सामने की झील को देख रहा था। इस समय भी क्या वह किसी अनुभूति के क्षणों में से गुजर रहा है! झील का पानी एकदम शान्त था और सामने की त्रिभुजाकार पहाड़ियों की पूरी कतार पानी में तैर रही थी।

‘आप और सुषमाजी बहुत ही घनिष्ठ हैं न? दिनेश बता रहे थे।’

‘घनिष्ठ!’ बिन्नी को सुषमा के सम्बन्ध के लिए यह शब्द बहुत ही हलका लगा।

‘हूँ। मेरठ में हमारे घर लगे हुए थे, सो सारा परिवार ही यों तो बहुत घनिष्ठ हो उठा था। फिर हम हम-उम्र और एक साथ पढ़ने वाले। आठवीं से लेकर एम.ए. तक साथ-साथ पढ़े। इसके बाद उसने शादी कर ली और मैंने यहाँ नौकरी कर ली। शादी के एक साल बाद ही श्यामजी विदेश चले गए, दो साल के लिए, तो मैंने आग्रह करके अपने पास बुला लिया। जनवरी में आकर वे इसे भी अपने साथ ले जायेंगे।’ फिर एक क्षण ठहरकर बोली, ‘मेरे लिए तो फ्रेंड, फिलॉसफर, गाइड सभी कुछ है।’ मन में कहीं कौंधी-‘पितु-मात-सहायक-स्वामी-सखा’, कुंज कहा करता था।

‘इनके जाने से तो आप बहुत अकेली हो जायेंगी?’ और सिगरेट का आखिरी कश खींचकर, ज़रा-सा आगे को झुककर उसने टोंटे को पानी में उछाल दिया। वह जलता हुआ टुकड़ा ‘डुप्’ से पानी में डूब गया और छोटे-छोटे नामालूम-से वृत्त पानी की सतह पर फैलते ही चले गये। उन वृत्तों को बिन्नी ने भीतर तक उतरते हुए महसूस किया।

‘इसमें संदेह नहीं कि यह जगह बहुत खूबसूरत है, पर हमेशा यहाँ रहना पड़े, तो आदमी शायद बुरी तरह बोर हो जाए। आपको ऐसा नहीं लगता?’ नंदन के स्वर की आत्मीयता बिन्नी को अच्छी लगी।

‘कोई खास नहीं। अब तो कॉलेज खुल गए, दिन यहाँ गुज़र जाता है और शाम अपनी झोंपड़ी में या इस झील के किनारे।’

‘आप कलकत्ता क्यों नहीं आ जातीं? वहाँ दिनेश भी है, फिर काम के अलावा और पचास तरह की एक्टिविटीज़ हैं। यहाँ तो मुझे कुछ भी नज़र नहीं आता।’

बिन्नी ने गौर से नंदन को देखा। इस निमन्त्रण के पीछे, इन आग्रह भरे शब्दों की पीछे कुछ और भी अर्थ लिपटे हैं या नहीं? क्या नंदन सचमुच चाहता है कि बिन्नी कलकत्ता चली जाये।

‘मुझे बड़े शहरों की भीड़-भाड़ पसंद नहीं। शुरू से ही छोटी जगहों पर रही हूँ।’

‘और कुछ चुप्पी भी हूँ, इसलिए सब-कुछ चुपचुप अच्छा लगता है।’ हँसते हुए नंदन ने बिन्नी के वाक्य को जैसे पूरा किया, तो बिन्नी भी हँस पड़ी।

‘सचमुच आप बहुत इंट्रोवर्ट हैं। इतना चुप-चुप रहकर दम नहीं घुटता आपका? इस उम्र में तो आदमी को खूब बोलना चाहिए, खुलकर हँसना चाहिए। नहीं, सुषमा जी को देखिए, कितना हँसती-बोलती हैं।’ तो ऊपर से वह मुस्करा दी। भीतर-ही-भीतर लगा, काश! उसकी जिंदगी भी सुषमा की तरह होती निश्चिन्त और आश्वस्त।

नंदन ने जेब से दूसरी सिगरेट निकाली और उसे सुलगाकर कुछ सोचते हुए बोला, ‘अच्छा, एक बात बताइये।’ फिर जाने क्या सोचकर रुक गया। आँखों में प्रश्नवाचक भाव आँजें बिन्नी एकटक नंदन को देखती रहीं।

‘देखिए, कुछ गलत मत समझिए। यों ही मेरे मन में कुछ जिज्ञासा है।’

बिन्नी को अपने हृदय की धड़कन तक सुनायी देने लगी-सीधे ही कुछ पूछ लिया तो?

‘सुषमाजी और श्यामजी के सम्बन्ध तो बहुत अच्छे हैं न?’

‘हाँ, क्यों?’ विस्मय से बिन्नी ने पूछा।

‘उन्होंने दुनिया भर की बातें कीं, पर श्यामजी के बारे में पूछने पर ही कुछ बताया, जबकि औरतों के पास बात करने के लिए पति-पुराण के सिवाय और कोई विषय ही नहीं होता।’ और नंदन हँस पड़ा।

बिन्नी के मन में मुक्ति और हल्की-सी निराशा की भावना एक साथ ही जागी। ‘बहुत-बहुत अच्छे हैं। मैंने तो ऐसा डिवोटेड कपल नहीं देखा।’ और कहने के साथ ही उसके अपने भीतर कहीं एक बिखरा स्वप्न कसमसा उठा।

‘उनको देखकर तो मुझे भी यही लगता है, पर जब-जब वे मिली, उनकी प्रेम और विवाह वालों बातों से लगा, जैसे ये मात्र जिज्ञासाएं नहीं है, मानो इनका सम्बन्ध कहीं व्यक्तिगत जीवन से जुड़ा हुआ है।’

एक क्षण को बिन्नी भीतर तक सिहर उठी, पर फिर अपने को सहज बनाती-सी बोली, ‘उसको तो आदत है कि किसी बात के पीछे पड़ जाती है, तो जब तक उसका रेशा-रेशा न उधेड़े दे उसे चैन नहीं मिलता।’ और वह मुस्करा दी।

‘रियली शी इज ए नाइस लेडी।’ फिर सिगरेट के दो कश एकसाथ खींचकर उसने कहा, ‘ये सोलह दिन कैसे निकल गए, पता ही नहीं लगा। दिनेश ने मुझे कहा था कि खाली समय के लिए यू विल फाइंड देम एक गुड कम्पनी। आप लोगों के साथ बिताये ये दिन याद आएँगे। खासकर के झील के किनारे की ये शामें।’ बिन्नी को लगा जैसे नंदन का स्वर कहीं दूर से आकर उसके मन की गहराइयों में गूंजता चला जा रहा है और अर्थ है कि खुलते चले जा रहे हैं। सुषमा की बात याद आई, ‘कोई संकेत दे तो पत्थर होकर मत बैठना’ और उसकी तेज निगाहें नंदन के मन तक पहुँचने के लिए छटपटाने लगीं। पर नंदन अपने में ही खोया-सा झील की ओर देख रहा था।

चुपचुप बिन्नी घुटने पर ठोढ़ी टिकायें उँगली से जमीन पर आड़ी-टेढ़ी लकीरें बनाने लगी।

समय के साथ-साथ उसकी बेचैनी बढ़ने लगी। एक बार उसने उड़ती-सी नज़रों से नंदन की ओर देखा भी और उसे लगा जैसे नंदन शब्द ढूँढ़ रहा है। ऐसा कुछ कहने के पहले शायद आदमी इसी तरह चुप हो जाता है। वह शब्द ढूँढ़ता है, मन-ही-मन उन्हें दोहराता है, साहस जुटाता है, सामनेवाले पर होनेवाली प्रतिक्रिया के लिए अपने को तैयार करता है। क्या कहेगा नंदन?

‘दिनेश आपसे पाँच बड़े हैं न?’

‘हूँ,’ मन की खीज को दबाते हुए उसने कहा।

‘बहुत बातें किया करते हैं वे आपकी।’ तो बिन्नी का मन हुआ कि पूछे कि भैया उसके बारे में क्या-क्या बातें करते हैं?

‘आप पिछले दो सालों से कलकत्ता क्यों नहीं आयीं?’

‘बस, उधर का प्रोग्राम ही नहीं बना।’

‘इस बार क्रिसमस में आइये। उन दिनों कलकत्ता बहुत प्लेजेंट हो उठता है। देखिए तो, उस शोर-शराबे का भी अपना एक आनंद होता है। फिर मैं आप लोगों को कतई ऊबने नहीं दूंगा।’

इस आग्रह से बिन्नी कहीं आर्द्र हो उठी। इच्छा हुई खुलकर कह दे-नंदन मैं बहुत-बहुत ऊबी हुई हूँ, इस जगह से, इस नौकरी से, इस जिंदगी से। पर वह कुछ नहीं कह पायी, केवल कुछ और सुनने की आशा से नंदन की ओर देखती रही।

देखते-ही-देखते अंधेरा असमान में उतरकर सबको धूमिल बनाता हुआ पानी में घुल गया और उसने झील में तैरते हुए पहाड़ों को निगल लिया। तभी एकाएक घाट की सारी बत्तियां जल उठीं। और झील में एक सिरे से दूसरे सिरे तक सुनहरे खंभे झिलमिलाने लगे।

‘बिन्नी जी, उसे लगा जैसे नंदन का हाथ उसके कंधे पर आ गया है। उसने चौंककर देखा-नहीं, नंदन वैसे ही दोनों फैली हुई हथेलियाँ पीछे टिकाये बैठा है। उसने साड़ी का पल्ला खींचकर अपना कंधा ढक लिया। उसे ऐसा क्यों लगा? नंदन को क्या एक बार भी खयाल नहीं आया कि यह भी तो एक तरीका हो सकता है। अभी कुंज होता तो?

‘आप बुरा न मानें तो मैं यहाँ थोड़ी देर लेट लूँ।’ और बिन्नी कुछ कहती उसके पहले ही बिना उससे पूछे उसने बिन्नी का पर्स उठाया और उसका तकिया बनाकर चित्त लेट गया।

बिन्नी को हल्की-सी निराशा हुई। क्या वह कुछ देर और बात नहीं कर सकता था? पर साथ ही वह आश्वस्त भी हुई। वह लौट चलने की बात भी तो कह सकता था। नहीं, वह लेटकर शायद अपने को साध रहा है। बिन्नी को भी समय दे रही है। हो सकता है कि इस बार उठकर साफ़-साफ़ ही पूछे। बिन्नी ने ज़रा-सा फिर घुमाकर नंदन की ओर देखा-छाती पर दोनों हाथों का क्रास बनाये आँखें बंद किये नंदन चित लेटा था। एक झटके-से सारा दृश्य बदल गया।

रीगल के सामने के मैदान का ऐसा ही अंधेरा कोना था और ठीक इसी तरह मुँह पर रूमाल डाले कुंज लेटा था। मुड़े हुए दोनों घुटनों को बाँहों से घेरकर उस पर गाल टिकाये बिन्नी बैठी थीं।

दुविधा के ऐसे ही क्षण उन दोनों के बीच में से भी गुज़र रहे थे। कनॉट प्लेस की सारी चहल-पहल से अछूता उसका मन इस बात पर केन्द्रित हो आया था कि कुंज क्या कहेगा? बात टूटी भी तो ऐसी जगह थी कि…

‘बिन्नी, झगड़ा किया तो तीन साल तक मुड़कर ख़बर तक नहीं ली। मैंने लिखा कि तुम यदि मुझसे संबंध नहीं रखना चाहती हो, तो मेरे सारे पत्र लौटा दो और तुमने बिना एक क्षण भी यह सोचे कि मुझ पर उसकी क्या प्रतिक्रिया होगी, सारे पत्र लौटा दिये। मैंने भी समझ लिया कि तुमने पत्र नहीं, मेरी सारी भावनाएं, मेरा सारा प्यार मुझे लौटा दिया। उस समय मेरे पास था ही क्या? बेकार, निठल्ला-सा घूमा करता था…तुमने सोचा होगा कौन लड़की मुझ जैसे व्यक्ति की जिंदगी में आना पसंद करेगी-बेकारी की मुसीबतें और परेशानियों से भरे वे दिन और ऊपर से तुम्हारा यों कटकर निकल जाना। कितना टूटा-टूटा लगता था उन दिनों मुझे। कितना अकेला हो आया था उन दिनों मैं! और ऐसे में ही मधु जो आई तो बस आती ही चली गई?’

बिन्नी कुछ नहीं बोली थी। केवल उसकी आँखों से आँसू बहते रहे थे। कुंज उन आंसुओं के सामने जैसे बह-सा आया।

‘अच्छा, बिन्नी, मान लो मैं अपनी जिंदगी के इन दो सालों को पोंछ दूँ और फिर तुम्हारी ओर हाथ बढ़ाऊँ तो? पहले की तरह फिर तो छोड़कर नहीं चल दोगी न? मैं कहीं का भी नहीं रहूँगा।’

‘अपनी ही बिन्नी पर तुम्हें विश्वास नहीं?’ भीगे-से स्वर से वह केवल इतना ही कह पायी थी। फिर पूछा था, पर मधु का क्या होगा?’

‘उसे समझाऊँगा, उसे समझाना ही होगा।’ कहीं दूर खोया हुआ कुंज बोल रहा था। फिर एकाएक ही फूट पड़ा, ‘पर क्या समझाऊँगा? उसका दोष ही क्या है, जो उसे इतनी बड़ी सजा दूँ?’

और वह मुँह पर रूमाल डालकर घास पर चित लेट गया था। बिन्नी निःशब्द रोती रही थी। कनॉट प्लेस का सारा माहौल अपनी रफ्तार से पूरे शोर शराबे के साथ गुज़र रहा था।

थोड़ी देर बाद ही कुंज झटके से उठा था और उसका हाथ अपने हाथ में लेकर बोला था, ‘व्ही आर मैरिड बिन्नी, व्ही आर मैरिड।’

बिन्नी अवाक्-सी उसका मुँह देखने लगी-मानो उन शब्दों का अर्थ समझने की कोशिश कर रही हो। और तब कनॉट प्लेस की सारी लाल-नीली जगमगाती बतियाँ उसके चारों ओर सिमट आई थीं और आसमान के सारे तारे दिप-दिप करके उसी वाक्य को दोहराने लगे थे।

पर ठीक एक महीने बाद ही-

वह औंधी लेटकर रो रही थी-फूट-फूटकर और बिलख-बिलखकर और सुषी गुस्से में बावली हो, हवा में मुट्ठियां उछाल-उछालकर चिल्ला रही थी, ‘झूठा, नीच, धोखेबाज!’

विवाह की सूचना देते हुए कुंज के पत्र के टुकड़े इधर-उधर छितरे पड़े थे।

‘अब चला जाये।’

अपने में ही डूबी बिन्नी नंदन का उठना नहीं जान सकी। पर इस वाक्य ने जैसे उसे कहीं गहरे पानी से उबार लिया। अनायास ही उसके हाथ आँखों पर चले गए, कहीं आँसू तो नहीं आ गए?

‘यहाँ लेटा तो समय का कुछ खयाल ही नहीं रहा, वहाँ खाने पर सब मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे।’ खड़े होकर कमीज़ और पतलून झाड़ते हुए कहा।

तब बिन्नी को ख़याल आया कि नंदन को कुछ कहना था। वह आशा कर रही थी कि नंदन कुछ कहेगा। उसने बड़ी याचना-भरी दृष्टि से देखते हुए कहा, ‘इंतज़ार तो सुषमा भी कर रही होगी।’ और अनमनी-सी बिन्नी उठी।

‘मुझे बहुत-बहुत अफ़सोस है, क्या करूं आप मेरी ओर से माफी माँग लीजिए। उनसे तो गुड-बाई भी नहीं हो सकीं।’

बिन्नी घाट पर फैली रोशनी में धीरे-धीरे सरकती दोनों परछाइयों को देखती-देखती आगे बढ़ रही थी। ज़रा-सा आगे-पीछे होने पर दोनों परछाइयाँ एक-दूसरे में घुल-मिल जातीं।

घाट की अन्तिम बत्ती के नीचे नंदन ने घड़ी देखी : ‘आठ बीस।’ फिर क्षमा याचना के स्वर में बोला, ‘आज तो मैं आपको छोड़ते हुए भी नहीं जा सकूँगा। रात हो गई है, आप अकेली…!’

‘मेरी चिंता मत करिये, मैं चली जाऊँगी। खेत पार करके ही तो सड़क मिल जाएगी। शायद कोई ताँगा ही मिल जाये।’

दोनों कच्चे रास्ते पर आये, तो नंदन ने जेब से टार्च निकालकर जला ली, ‘आपके पास टार्च भी नहीं है? खेत का यह रास्ता तो बड़ा ऊबड़-खाबड़ है। न हो तो आप मेरी टार्च ले जाइये।’

‘नहीं, नहीं, आप ज़रा भी परेशान न हों। तीन सालों में इस रास्ते से बहुत परिचित हो गई हूँ। मुझे आदत है।’

और जहाँ दोनों के रास्ते अलग होते थे, नंदन रुका, ‘अच्छा बिन्नी जी, अब आप अकेले कलकत्ते आएँगी तभी मुलाकात होगी। सवेरे तो बहुत जल्दी ही हमको रवाना होना है, मिलने के लिए भी नहीं आ सकूँगा। सुषमाजी को नमस्कार कहिए और मेरा निमंत्रण उन तक भी पहुँचा दीजिए।’ फिर एक क्षण ठहरकर बोला, “धन्यवाद तो क्या दूँ, फिर भी आप लोगों के साथ समय बहुत अच्छा कटा।’

बिन्नी चुपचुप बस नंदन के चेहरे को देखने की कोशिश करती रही।

‘अच्छा बा-बाई,’ और उसने बिन्नी का हाथ अपने हाथ में लेकर हल्के-से दबाकर छोड़ दिया।

किसी तरह शब्दों को ठेलकर उसने कहा, ‘भैया, भाभी को याद करिएगा।’

‘ज़रूर-ज़रूर।’ और वह मुड़ गया।

बिन्नी पेड़ की आड़ में खड़ी होकर उसको देखती रही। अंधेरे में नंदन की आकृति एक बड़े-से धब्बे में बदल गई, जो धूमिल और छोटी होते-होते पेड़ों के झुरमुट में अदृश्य हो गई।

अनमनी-सी बिन्नी खेत पार करके सड़क पर आई। घर अभी यहाँ से भी दूर था।

सड़क के दोनों ओर दूर-दूर तक मैदान फैले थे। सिर के ऊपर साफ नीला आकाश तना हुआ था, जिस पर सप्तऋषि मंडल का प्रश्नवाचक दिप्-दिप् करके चमक रहा था।

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