googlenews
बंटी के सूरजदादा-21 श्रेष्ठ बालमन की कहानियां गुजरात: Sun and Boy Story
Bunty ke Surajdada

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Sun and Boy Story: बंटी ने दीपावली की रात ढेर सारे पटाखे फोड़े। देर रात तक बहुत आनंद किया। आखिर थककर सो गया। दूसरे दिन नया साल, मम्मी ने बंटी को जल्दी-जल्दी जगाया।

“उठ, बेटा बंटी, हमें सबको साल मुबारक करने जाना है… देर हो रही है। जल्दी उठ।”

बंटी बिस्तर में उठकर बैठा। दो हाथ जोड़कर आंखें मूंद कर भगवान को प्रार्थना करने लगा। फिर सीधा खिड़की के पास जाकर खड़ा रह गया।

आ… हा… हा… सामने पूर्व दिशा में आकाश में कैसा लाल-लाल, गोल-गोल, बड़ा-सा सूरजदादा! बंटी बोल उठाः “हाय! गुड़ मोर्निंग, सूरजदादा!” सूरजदादा ने भी बंटी को गुड़ मोर्निंग कहा।

बंटी ने कहाः “सूरजदादा, आज तो आप कितने जायन्ट लग रहे हो! मैंने तो आप को इतने बड़े कभी नहीं देखें। आज नये साल की सुबह है इसलिए सूरजदादा?”

सूरजदादा बोले: “मैं तो रोज सुबह इतना बड़ा ही होता हूँ। तू रोज सुबह जल्दी उठकर मुझे देखेगा तो मैं तुझे ऐसा ही दिखाई दूंगा।”

बंटी ने कहाः “मुझे तो ब…हो…त ही मजा आया। अब से मैं हर रोज सुबह जल्द ही उठ जाऊँगा। आप मेरी राह देखना। चले मत जाना! आज मैं सबको साल मुबारक करने जाता हूँ। आप को भी साल मुबारक, सूरजदादा!”

सूरजदादा हंसने लगे। उन्होंने भी बंटी को नये साल का आशीर्वाद दिया।

दूसरे दिन से बंटी ने खुद ही जल्दी उठना शुरू कर दिया। रोज सुबह उठकर वह खिड़की के पास आकर सूरजदादा के साथ बातें करने लगा।

“सूरजदादा, आप मुझे बहुत ही अच्छे लगते हो। आप कितने ब्राईट हो! मुझे भी आप जैसा बनना है… कैसे बनूँ?”

सूरजदादा ने कहाः “बहुत पढ़ने से बंटी, जैसे-जैसे पढ़ोगे वैसे-वैसे अधिक ब्राईट बनोगे।”

“सूरजदादा, आप क्या रोजाना जल्द ही उठ जाते हो? क्या कभी-भी देर से नहीं उठते?” बंटी ने नया प्रश्न पूछा।

“नहीं रे बेटा! मेरा देर से उठना संभव ही नहीं है। मैं आऊँ, मेरी किरणें पृथ्वी पर पड़े। उसके बाद ही सुबह होती है। इसलिए मैं देर से उठ नहीं सकता न!”

इस तरह सूरजदादा और बंटी दोनों के बीच हर दिन नई-नई बातें होने लगी। थोड़े समय के बाद सर्दी का मौसम शुरू हुआ। कड़ाके की ठंड पड़ने लगी। बंटी को उसकी मम्मी रात के समय कंबल ओढ़ा के सुलाती। बंटी ने सर्दी में भी सुबह जल्द ही उठ जाने का नियम जारी रखा। वह उठता तो बहुत ठंड लगती पर वह जैसे खिड़की के पास आता और सूरजदादा उस पर किरणें फेंकते उसके साथ ही बंटी की ठंड छू हो जाती। बंटी कहताः “वाह! सूरजदादा, मजा आ गया! ठंड में भी आप कितने उष्मापूर्ण लगते हो! आपके सामने से हटने का मन ही नहीं होता है।”

सूरजदादा ने कहाः “बेटा, ऐसा नहीं करना चाहिए। तुम्हें दूध-नाश्ता करना है। तैयार होकर स्कूल जाना है। मुझे भी पूरा दिन चलना है। इधर खड़ा रहना न तो तेरी लिए या न तो मेरे लिए ठीक है।”

इस तरह ठंड के दिन पूरे हो गए। अब गरमी के दिन शुरू हुए। अब बंटी को गरमी होने लगी।

उसने सूरजदादा से कहाः “सूरजदादा, अब तो आप बहुत गरम लगते हो। क्या गुस्से में हो?”

सूरजदादा हंसने लगे और बोले: नहीं रे, बेटा! तेरे जैसा सुंदर, समझदार बालक पृथ्वी पर हो फिर मैं क्यों गुस्सा होऊँगा? पर सर्दी गई और गरमी का मौसम आया तो मुझे गरमी छोड़नी पड़ती है।”

जैसे-जैसे गरमी बढ़ती गई, वैसे-वैसे धूप भी बढ़ती गई। सब असह्य धूप से त्रस्त हो गए। यह देखकर एक दिन बंटी ने सूरजदादा से पूछा : “सूरजदादा, आप इतनी तेज धूप न छोड़ो तो नहीं चलेगा? देखिए न, सब लोग, पशु-पंखी, पेड़-पौधे आप की धूप से कितने परेशान हो रहे हैं। आप तो बहत अच्छे हो। फिर भी आपको उन सब पर दया नहीं आती?”

सूरजदादा ने कहाः “बेटा, तेरी बात सच है। लेकिन मैं दया जताऊँ तो कैसे चलेगा? मैं धूप बरसाऊँ तो ही अनाज पकेगा, आम पकेंगे। तुम्हें आम पसंद है कि नहीं?”

बंटी ने उत्तर दियाः “मुझे तो आम बहुत ही पसंद है।”

“तो फिर?” सूरजदादा आगे बोले: “और मैं इतनी धूप बरसाता हूँ, इससे ही समंदर का पानी गरम होता है। उसकी भाप ऊपर उठती है और आकाश में बादल बनते हैं। बादल बनने के बाद ही बारिश होती है। बारिश के बिना अनाज उगेगा नहीं। तुम सबको पानी मिलेगा नहीं। बोल, मुझे धूप बरसाना चाहिए या नहीं?”

बंटी ने कहाः “हां, सूरजदादा, मैं समझ गया। आप भले ही गरम रहो। हम सब थोड़े समय तक गरमी सह लेंगे। पर बाद में बारिश में नहाने का कितना मजा आएगा!”

जैसे ही गरमी का मौसम पूरा हुआ कि बरसात का मौसम शुरू हुआ।

एक सुबह बंटी उठा तब बिजली दमक उठी और गर्जना के साथ बारिश टूट पड़ी। बंटी खुश हो गया। वह बारिश का समाचार सूरजदादा को देने के लिए खिड़की के पास दौड़ा। पर खिड़की के पास आकर वह निराश हो गया। सूरजदादा कहीं भी दिखाई नहीं दिए। ऐसी खुशी के मौके पर सूरजदादा कहाँ चले गए? उसकी आंखों में आँसू आ गए। दूसरे दिन भी बारिश हुई। सूरजदादा दिखाई नहीं दिए। तीसरा दिन…चौथा दिन…इस तरह लगातार सात दिन तक सूरजदादा दिखाई नहीं दिए। बंटी रोज सुबह उठकर खिड़की के पास जाता पर सूरजदादा को न देखकर वह मायूस हो जाता।

आठवें दिन बंटी खिड़की के पास गया और देखा तो सूरजदादा हाजिर हो गए थे।

वे बोलेः “गुड़ मोर्निग, बंटी!”

बंटी ने जवाब दिया नहीं। वह उठकर चला गया। सूरजदादा ने बहुत बुलाया। तब वह रोनी आवाज में कहने लगाः “आप कहाँ चले गए थे इतने दिनों तक? कितनी अच्छी बारिश होती थी! मुझे आप के साथ बातें करनी थी पर आप ही गायब हो गए!”

सूरजदादा ने कहाः “क्या करूँ बेटा? मैं बादलों के पीछे छुप जाऊँ तो ही बारिश होगी। हम दोनों के बीच समझौता हुआ है कि बारिश बरसे तब मैं नहीं दिखूगा और जब मैं होऊँ उस समय बारिश नहीं आएगी। इसलिए मैं तुझे नहीं दिखता था।”

बंटी ने कहाः “तब तो आपने ठीक ही किया। अब फिर से छुप नहीं जाओगे न?”

सूरजदादा बोले: “क्यों? अभी तो बहुत बारिश होगी। बारिश आएगी तो मैं नहीं आऊँगा। वह जाएगी उसके बाद मैं वापिस आ जाऊँगा, ठीक है न?”

बंटी ने कहाः “ओके, सूरजदादा, मैं आपकी राह देखूगा।”

फिर तो बारिश का मौसम भी पूरा हुआ। सूरजदादा नियमित आने लगे। फिर से बंटी और सूरजदादा रोज सुबह ढेर सारी बातें करने लगे।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

Leave a comment