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गांधी जयंती पर विशेष: Mahatma Gandhi special
Mahatma Gandhi special

Mahatma Gandhi special: गांधी जी ने दुनिया को सत्याग्रह का अस्त्र  दिया। आज परमाणु बम और आतंक के दौर में सत्याग्रह की प्रांसगिकता है?

सत्याग्रह से पहले मैं सत्य की बात करती हूं। यदि आपने सत्य को जान लिया, तो सत्याग्रह को समझना आसान है। गांधी जी ने दुनिया के हर
मजहब, हर धर्म, हर दर्शन में सत्य को खोजा। अपनी जिंदगी में हर छोटे-बड़े कदम को उससे आंका। स्वयं की चुनौती में खरा उतरना बहुत कठिन काम होता है। सत्याग्रह की प्रासंगिता पहले भी थी और सदा रहेगी। अफसोस कि हम लोग स्वयं से हार रहे हैं। इससे गांधी और सत्यग्रह की प्रासंगिकता पर असर नहीं पड़ता। केवल खादी पहन कर कोई गांधी नहीं होता। आज गांधी मिलेंगे, उस जगह जहां कल्पना नहीं कर सकते।

बुद्ध की अहिंसा, भगवान महावीर की अहिंसा और गांधी जी की अहिंसा में क्या फर्क है?
बुद्ध और जैन की अहिंसा गांधी जी की अहिंसा से फर्क हैं। यह मैं कहने के काबिल नहीं हूं। मैं महावीर जी से भी बहुत प्रभावित रही हूं। उनसे प्रेरित लोग अहिंसा की बात कर रहे हैं। वो नहीं होते तो अहिंसा की बात न होती। गांधी दूसरे संदर्भ में हुए। वह कर्मयोगी थे। बाहरी ताकत को हटाना था। गांधी जी जहां जाते थे वहां की मुश्किलें देखते थे और वहीं बस जाते थे। छह महीने, सात महीने, एक साल, पांच साल, कुछ  करके आते थे। मैंने गांधी को कर्मयोगी देखा है जिन्होंने जीवन के हर क्षेत्र में सत्य का प्रयोग किया। वे गृहस्थी में रहकर साधु थे। उन्होंने खादी अपनाई। चरखे पर जोर दिया। महावीर और बुद्ध के जमाने में जो भी होता था, हाथ का ही बना हुआ होता था। गांधी के सत्य और अहिंसा को आप अलग नहीं कर सकते। दोनों अभिन्न हैं।

 गांधी जी के समय में चरखा आत्मनिर्भरता का प्रतीक था। आज  आत्मनिर्भरता का प्रतीक क्या है?

सत्य और अहिंसा का मेरा कोई दावा नहीं है। जब अयोध्या में कांड हुआ तो मैं देखने गई थी कि आखिर यह झगड़ा क्या है? मैंने देखा, सडकों पर
इतनी गंदगी थी कि मैं अपनी साड़ी बचाती रही। मुझे लगा यहां बंदूक नहीं झाडू चाहिए। अब देखिए झाडू की बात अरविंद केजरीवाल ने ले ली
और खादी मोदी साहब ने। प्रतीक बहुत सूक्ष्म चीज है। आज स्वावलंबन का प्रतीक क्या है, मैं आपको नहीं बता सकती। आप मूर्ति की पूजा करें और बाद में उल्टा काम करें। ऐसे में मूर्ति काहे की प्रतीक रह गई। मुझे चरखा रखना बहुत पसंद है। मुझे लगता है कि वो मां की तस्वीर है। 

डायन के नाम हजारों महिलाओं के साथ बदसुलुकी की जाती है, खासकर ग्रामीण  अंचलों में। कुछ कहना चाहेंगी?
जब मैं पत्रपत्रिकाओं में पढ़ती हूं, खबरें सुनती हूं कि महिलाओं पर अत्याचार हुआ है, एक शब्दहीन दुख से भर जाती हूं। समाज की अन्य कुप्रथाओं की तरह ही डायन कुप्रथा है। जब तक ऐसे समाज में शिक्षा की समुचित व्यवस्था एवं जागरूकता की अलख नहीं जगाई जाएगी, ऐसा होता रहेगा।

 कस्तूरबा गांधी स्मृति पूरे देश में आपके ही नेतृत्व में काम कर रही है। उसमें राज्य सरकारें क्या सहायता करती हैं?
आंगनबाडिय़ों को चलाने में सरकार से बहुत मदद मिलती है। वह केंद्र हो या राज्य की। पीछे पडऩा पड़ता है। आज हमारी 25 शाखाएं हैं पूरे हिंदुस्तान में और कई छोटी-छोटी शाखाएं हैं। हमारा ध्येय है कि देहाती इलाके से जरूरतमंद बच्चों व लड़कियों की मदद की जाए।

गांधी शांति प्रतिष्ठान गांधी स्मृति-दर्शन, गांधी निधि का काम क्या संतोषजनक है?
इस पर मैं कोई राय नहीं दे सकती। नागरिक की जिम्मेदारी है देश को गांधी संस्था बनाना। गांधी ने किसी संस्था को अपना नाम नहीं दिया था। उन्होंने सिर्फ कस्तूरबा गांधी ट्रस्ट को परिवार का नाम दिया। जेल में जब कस्तूरबा गांधी गुजरीं तब गांधी ने कहा कि कस्तूरबा के लिए मंदिर-मस्जिद या मूर्ति नहीं बनें। हम उन महिलाओं की मदद करें जो शिक्षित होते हुए भी निरक्षर हैं। 

गांधी उपनाम का प्रचलन जोरों पर है, क्या है इसका नफा-नुकसान?
हमारे विवाह के दूसरे रोज हम दोनों विवाह पंजीकरण के लिए गए। वहां एक जगह मुझे शादी से पहले का नाम लिखना था और शादी के बाद का। शादी के बाद के लिए मैंने तारा भटटाचार्य लिखा। इस पर मेरे पति ज्योति प्रसाद भटटाचार्य जी ने आश्चर्य और कुछ निराशा में मुझसे पूछा, क्या तुम गांधी उपनाम नहीं लिखोगी? उन्होंने सोचा होगा कि स्वतंत्र विचारों की यह आधुनिक नारी स्वेच्छा से पति का नाम लिख रही है और परंपरा में अपने पिता का नाम नहीं लिख रहीं। फिर उन्होंने इसके बाद इस बात को लेकर कोई विवाद नहीं किया। यदि मैं गांधी नाम रखती तो मेरे पति के अनुसार स्वाभाविकता में मेरे स्वाधीन व्यक्तित्व का वह सही परिचय होता।