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कथा-कहानी

प्रतीक को भी दाह संस्कार तक वहीं बने रहना था इसलिए उसने घर फोन कर दिया था। राघव सर उसके गॉड्फादर थे. आज इंडस्ट्री में सिंगर प्रतीक का जो भी नेम और फ़ेम है वह राघव सर की बदौलत ही तो है। उन्होंने ही सबसे पहले उसकी प्रतिभा को पहचानकर उसे ब्रेक दिया था. वरना वह तो सारी जिंदगी उस रेस्तरां में एक फिलर की तरह गाने गाता सड़ता ही रहता। बीते दिन याद करता प्रतीक ए सी हाल में भी पसीने से नहा उठा.थमकर रह जाती है जिंदगी जब जमकर बरसती है पुरानी यादें  लोगों के भद्दे हतोत्साहित करने वाले कमेंट्स तब भी उसे ऐसे ही पसीने से तरबतर कर देते थे।

‘थोड़ा सुर नीचे रखो भाई, हम यहाँ खाने और बतियाने आए है।’

‘गाने दो न,बेचारा अच्छा तो गा रहा है।’

‘तुम यहाँ इसका गाना सुनने आई हो?—-अभी गाना खत्म  होते ही आ जाएंगे टिप मांगने।’

प्रतीक का मन होता एक मुक्का लगाकर बता दे उसे कि वह सिंगर है, वेटर नहीं. पर उससे होगा क्या? बंधी बंधाई नौकरी चली जाएगी. लोग सुनें न सुनें;तारीफ करें न करें उसे तो अपने बंधे बँधाये पैसे मिलने ही हैं. फिर वह क्यूँ अपेक्षा रखता है कि लोग खाने बतियाने से ज्यादा उसके गानों पर ध्यान दे. उससे अलग अलग गानों की फरमाइश करे; उसकी स्वरलहरियों पर झूमे नाचे। 

रोज रात में रेस्तरा बंद होने पर घर लौटते वक्त वह हताशा से घिर जाता. ‘कब तक वह ऐसे ही भैंस के आगे बीन बजाता रहेगा?क्या उसे अपनी कला का कद्रदान कभी नहीं मिलेगा?’

मास्क लगाए लोग पुष्पांजलि देने के लिए पंक्तिबद्ध होने लगे तो प्रतीक वर्तमान में लौटा.  पुष्पांजलि देते वक्त उसकी नजरें मृत चेहरे पर टिकी तो वह लड़खडा गया। 

‘विशु काका ?वे राघव सर के पिता है? मतलब थे ? नहीं,ऐसा कैसे हो सकता है? अवश्य मुझे कुछ दृष्टि  भ्रम हुआ है.’ प्रतीक भीड़ में पीछे जाकर खड़ा हो गया।

‘कैसे हो प्रतीक बेटे?’ पीछे लगी कुर्सियों पर बैठे एक वृद्ध ने उसे पुकारा तो प्रतीक चौंक उठा। 

‘बंसी काका? अरे माधव काका भी है?’ प्रतीक ने उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया. मन में ढेरों सवाल उमड़ घुमड़ रहे थे. किन्तु यह स्थान और अवसर उन सवालों के लिए अनुपयुक्त था. आसमाँ में बादलों के उमड़ घुमड़ के स्वर अंदर तक सुनाई दे रहे थे. ‘आश्रम लौटने तक बारिश शुरू न हो जाए वरना केब के लाले पड़ जाएंगे.’ बंसी काका माधव काका के कान में फुसफुसाये,जिसे प्रतीक ने सुन लिया। 

‘में छोड़ दूंगा आप दोनों को. आप बिल्कुल भी परेशान न हों.’प्रतीक के आश्वासन से वृद्ध जनों के चेहरों पर सुकून खिल उठा था. खुद प्रतीक भी आश्वस्त था कि तब लौटते में उसे अपने समस्त प्रश्नों के उत्तर मिल जाएंगे. लेकिन राघव सर को देखने का अब उसका नजरिया बदल चुका था. मन में उनके प्रति बसा अहसान और सम्मान का भाव कही विलुप्त हो चुका था. एसे कपूत से तो तकिया ही अच्छा है;जो कम से कम सिर तो ऊंचा रखता है. दिल कह रहा था अभी इसी वक्त इस पाखंडी के घर से दूर चले जाना चाहिए. लेकिन फिर विशु काका का पार्थिव शरीर उसे रोक लेता. नहीं ,काका के पार्थिव शरीर को मुक्ति मिले बिना वह यहाँ से कैसे जा सकता है?बेटे की तरह प्यार करते थे वे उसे वैसे तो वृद्धाश्रम के सभी वृद्ध उसके गाने दत्तचित्त होकर सुनते थे. लेकिन जो दीवानगी और मंत्रमुग्धता उसे विशु काका की आँखों में अपने लिए नजर आती वह अल्हदा थी। 

एक मित्र के संग उसे उस वृद्धाश्रम जाने का अवसर मिला था. मित्र के किसी परिचित वृद्ध रिश्तेदार का उस दिन जन्मदिन था. बलून,मिठाई,कचौरी आदि पाकर ही समस्त वृद्ध बच्चों कि भांति किलक उठे थे. केक कटने लगा तो मित्र ने उससे गाने का आग्रह किया।

 ‘बार बार दिन ये आए’ गाया तो फिर फरमाइशों की झड़ी ही लग गई थी. सुनने वाले थक ही नहीं रहे थे. यहाँ तक कि रात घिर आने तक गानों का दौर चलता रहा. सब खाना पीना तक भूल चुके थे. प्रतीक को अपनी जिंदगी में एसे कद्रदान आज तक नहीं मिले थे. ढेर सारा प्यार और सम्मान पाकर वह अभिभूत हो उठा था. लौटते में भी सबका एक ही आग्रह था कि वह वक्त निकालकर उनके पास आता रहे और उन्हें इसी तरह गाने सुनाता रहे। 

‘बेटे,हमारे पास तुम्हें देने के लिए कुछ नहीं है।’

‘आप लोगों ने तो मुझे वो दिया है जिसके लिए में आज तक तरस रहा था.’हर्षातिरेक से प्रतीक का कंठ अवरूद्ध हो गया था। 

राघव सर के बिलखने का स्वर कानों में पड़ा तो प्रतीक वर्तमान में लौटा. किसी नजदीकी रिश्तेदार के पहुँचने पर राघव सर उससे लिपटकर फफक उठे थे. प्रतीक ने घृणा से मुंह फेर लिया. 

इंसान इतना दोगला कैसे हो जाता है?जीते जी जिन पिता को वृद्धाश्रम में रखा,अब उनके मरने पर ये घड़ियाली आँसू। 

पलक झपकते कैसे किसी के प्रति मन फिर जाता है यह अभी प्रतीक की मनस्थिति को देखकर समझा जा सकता था। 

लौटते में प्रतीक अपनी उत्सुकता  नहीं रोक पाया. गाड़ी चलते ही उसने बंसी काका और माधव काका पर प्रश्नों की झड़ी लगा दी. जिनका दोनों ने सहजता से उत्तर दिया. 

‘बाप बेटे में परस्पर कोई मनमुटाव नहीं था. राघव तो अपने पिताजी पर जान छिड़कता था. समस्या तो राघव की पत्नी की थी. वही घर में विशंभर की उपस्थिति सह नहीं पा रही थी. विशंभर शांतिप्रिय इंसान था. उसे लेकर पति पत्नी में कलह बढ़े,इससे पूर्व ही वह एक दिन चुपचाप अपना सामान लेकर यहाँ वृद्धाश्रम में रहने आ गया. राघव उस समय विदेश में था. पता चलते ही वह तुरंत पिता से मिलने लौटा . हमारे सामने की ही बात है. बहुत लज्जित और परेशान था. घर लौट चलने के लिए विशंभर के पैरों तक पड़ गया. किन्तु विशंभर शांत मुसकुराते रहे. उनका बस एक ही जवाब था कि वे अपनी मर्जी से यहाँ अपने हमउम्र लोगों के संग रहने आए है.राघव और उसकी बहू इसे अन्यथा न लें. उन्हे किसी से कोई शिकायत नहीं है. जब मन होगा वे घर लौट आएंगे।’

‘फिर?कब लौटे वे? मेरे आश्रम आते रहने तक तो काका वहीं थे.’ प्रतीक को आज मन ही मन बहुत ग्लानि महसूस हो रही थी. थोड़ा सा काम क्या मिल गया वह इतना व्यस्त हो गया कि अपने सच्चे कदरदानों के पास जाना ही छोड़ दिया। 

‘विशंभर तो कभी नहीं लौटता. बेचारा राघव जब भी आता सबके लिए ढेर सामान लेकर आता, पापा से लौटने की  मिन्नतें करता । हम पसीज जाते। पर विशंभर न लौटने की जिद पर अड़ा रहता. वो तो इस महामारी ने उसे लौटने पर मजबूर कर दिया. कोरोना ने पांव पसारने शुरू ही किए थे कि एक दिन राघव आकर खूब रोया ,गिड़गिड़ाया. विशंभर की चिंता में उसकी रातों की नींद और दिन का चैन हराम हो गया था. विशंभर लाख दलीलें देता रहा कि यहाँ कोई खतरा नहीं है पर राघव उन्हें साथ ले जाकर ही माना. कोरोना तो नहीं हुआ पर ह्रदयाघात ने हमारे दोस्त को हमसे हमेशा के लिए छीन लिया।’

माहौल भारी हो गया था. किंतु प्रतीक अभी भी संशय से घिरा था. क्या राघव सर ने उसे ब्रेक विशु काका की सिफारिश पर दिया था? इसका मतलब वह आज जो कुछ भी है विशु काका और राघव सर की मेहरबानी से है. इसमें उसका अपना कुछ नहीं है.  वह तो आज भी वहीं रेस्तरां में ही चप्पल घिस रहा होता। कितने महान थे विशु काका. उसके लिए इतना कुछ कर दिया किंतु कभी जुबां पर नहीं लाए। 

और एक वह खुद है इस महामारी के दौरान प्रवासी मजदूरों की उसने थोड़ी आर्थिक मदद क्या कर दी अखबार और चैनल वालों ने उसे आसमां पर बैठा दिया है. वह स्वयं भी तो खुद को किसी हातिमताई से कम नहीं आंक रहा है।

 मन का एक संशय पूरा दूर भी ना हो पाता कि शंकाओं के ढेरों दूसरे बादल उमड़ घुमड़ आते. बाहर बादल आवरण हटाकर बरसने लगे थे.  अंदर प्रतीक संशय के बादलों से घिरा छटपटाने लगा था जब रहा नहीं गया तो उसने अपना दिल का चोर उजागर कर दिया। 

‘विशंभर ने बातों बातों में राघव से तुम्हारी तारीफ अवश्य की थी यह कहकर कि उसे तुम्हारे आने और गाने सुनने का इंतजार रहता है.और इसलिए भी वह घर नहीं लौटना चाहता.  लेकिन तुम्हें काम देने के लिए दबाव या अनुशंसा हमारे सामने तो कभी नहीं की.’ बिजली कड़कने की तेज आवाज के साथ बौछार और भी तेज हो गई. बादलों का गुनाह नहीं कि वे बरस गए,आखिर दिल हल्का करने का हक तो सभी को है . प्रतीक की जिंदगी में भी आज जाने कितने बादल छंटने वाले थे और जाने कितना नेह बरसने वाला था।

‘यह होती है असल मदद कि दायां हाथ किसी को कुछ दे तो बाएं को भी पता ना लगे.  यह नहीं कि 4 कपड़े भी दिए तो पहले तस्वीर उतार ली . राघव सर ने उसे काम विशु काका के कहने पर दिया है या उसकी काबिलियत देखकर इसका खुलासा तो अब केवल राघव सर ही कर सकते हैं. जब तक उसे अपनी काबिलियत पर भरोसा नहीं हो जाएगा वह गा नहीं पाएगा.’  प्रतीक की आंखों के सम्मुख उस दिन का दृश्य घूम गया. उस दिन रेस्तरां में उसका गाना खत्म हुआ तो एक शख्स उठकर जोर-जोर से तालियां बजाने लगे थे. ‘बहुत खूब’ उन्होंने आगे बढ़कर प्रतीक से हाथ मिलाया था.’ मैं राघव, मेरे अगले गाने की रिकॉर्डिंग करोगे?’ प्रतीक हक्का-बक्का देखता रह गया था।

  वृद्ध आश्रम में यह सब सुनाते वह रो ही पड़ा था. विशु काका ने उसे सीने से लगा लिया था. ‘ कहा था न मैने ठंडा पानी और गरम प्रेस कपड़ों की सारी सलवटें निकाल देते है.इसी तरह ठंडा दिमाग और ऊर्जा से भरा दिल जीवन की सारी उलझन मिटा देते है। प्रतिभा हमेशा छुपी नहीं रहती बेटे. एक न एक दिन दुनिया के सामने आ ही जाती है.  तुम खूब उन्नति करोगे हम सब का आशीर्वाद तुम्हारे साथ है। ‘

‘ओह , तो उस दिन राघव सर विशु काका के कहने पर उसके रेस्तरां  में आए थे और उसके गायन से प्रभावित होने का नाटक कर रहे थे. और वह ओघड़  व्यर्थ ही अब तक खुद को तीस मार खान समझता रहा. 

प्रतीक की जिंदगी उससे अजीब सी आंख मिचौली खेल रही थी. एक कुहांसा  छँटता तो दूसरा घेर लेता.  उसका आत्मविश्वास कमजोर पड़ने लगा था. उस जैसा नाकारा इंसान दूसरों के रहमों करम के बिना आगे बढ़ ही नहीं सकता. नहीं चाहिए उसे ऐसा काम. औरों ने भी उसे काम राघव सर की सिफारिश पर ही दिया होगा। 

प्रतीक के उदासीन रवैए से घर वाले भी परेशान थे. न रिकॉर्डिंग पर जा रहा था ना घर पर कुछ कर रहा था. पूछने पर कुछ बताता भी नहीं था. राघव सर के बुलाने पर भी वह नहीं गया था. काफी दिन ऐसे ही गुजर गए तो एक  दिन राघव सर खुद ही आ धमके। 

‘यह सब मैं क्या सुन रहा हूं प्रतीक? पापा के जाने के गम में तो मैं डूबा हुआ था.  तुमने क्यों सब काम-धाम समेट लिया है? रिकॉर्डिंग के लिए भी नहीं आ रहे?’

‘ क्या आपने मुझे विशु काका के कहने से ब्रेक दिया था?’ प्रतीक का सीधा सपाट स्वर सुन राघव सर चौंक उठे। 

‘ओहो तो यह माजरा है.  तुम्हें पता चल ही गया।‘

 ‘मतलब यह सच है?’ प्रतीक का स्वर कांप उठा था। 

‘ तुम गलत समझ रहे हो. पापा ने सही कहा था प्रतीक बहुत स्वाभिमानी है. जितना मेधावी है उतना ही खुद्दार भी. मैं उसकी खुद्दारी का सम्मान करता हूं. चाहता हूं उसे जिंदगी में जो भी मिले उसकी अपनी काबिलियत से मिले. यह जरूरी नहीं कि उसका गाना हम सबको पसंद आ रहा है, प्रभावित कर रहा है तो तुम्हें भी करें. एक बार उसे सुन लो बस और मैंने वही किया. बस एक बार सुना और तुमने मुझे जीत लिया. तुम्हें ब्रेक देकर मैंने तुम पर कोई एहसान नहीं किया. नए चेहरे, नई आवाज इस इंडस्ट्री की डिमांड है. यहां कोई सिफारिश या भाई भतीजावाद से आ भी जाए तो भी टिकता अपने बलबूते पर ही है. जब तक तुम्हारी आवाज का जादू चलेगा तभी तक तुम चलोगे.  मैं अपने चलने की गारंटी नहीं ले सकता तो तुम्हारी या किसी और की क्या लूंगा? और हां इस गलतफहमी में भी मत रहना कि औरों ने तुम्हें काम मेरे कहने से दिया है. जब मैं खुद किसी के कहने से किसी को काम नहीं देता तो मेरे कहने से कौन देगा ?अपनी उन्नति, बर्बादी सबके लिए तुम खुद जिम्मेदार हो. अब तुम कल से रिकॉर्डिंग के लिए आ रहे हो या मैं किसी दूसरे को लूं?’ राघव सर जाने के लिए उठ खड़े हुए थे. प्रतीक ने इंकार मैं गर्दन हिलाई तो वे हैरान रह गए. इतनी समझाइश के बावजूद??

 ‘कल से नहीं सर, मैं आज बल्कि अभी से आना चाहूंगा.’ प्रतीक के जवाब के साथ दोनों खुलकर हंस पड़े. बाहर मेह तेजी से बरसने लगा था।  

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