Balman Story
Bharat Katha Mala

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

“वैष्णव जन तो तेने कहिए…” की आवाज़ दादू के कमरे से आ रही थी। दादू को यह भजन बहुत प्रिय है।

“गांधीजी के दो प्रिय भजन थे, एक रघुपति राघव राजा राम, पतित पावन” और दूसरा” वैष्णव जन तो तेने कहिए जे पीर पराई जाने रे” दादू ने अमर को बताया था।

अमर सोचने लगा, रघुपति राघव राजाराम वाला भजन तो ठीक है। दादी के साथ कभी-कभी मंदिर जाना पड़ता है, वहां बहुत लोगों को राम भगवान. कृष्णजी, नंदलाल, के भजन गाते सुना है। लेकिन यह, “वैष्णव जन तो तेने कहिए” कुछ खास समझ नहीं आता। दादू ने उसे अपने तरीके से समझाने की कोशिश की थी; दूसरों के दु:ख-दर्द को समझकर हमेशा सहायता करनी चाहिए, पर अमर के पल्ले कुछ पड़ा नहीं था।

दादी भी घर में रोज ठाकुरजी की पूजा करते समय घंटा बजाते हुए तन्मय होकर अयोध्यापति, रामजी के भजन गाती है। पूजा के बाद प्रसाद में कभी फल, कभी मिठाई देती है, प्यार से अमर के सर पर हाथ फेरती है और अच्छी-अच्छी बातें समझाने लगती है। बस इसी में अमर की मुश्किल हो जाती है। अमर प्रसाद लेकर जल्दी से दौड़ जाता है, दादी पीछे से कहती रह जाती है। ये सारी बातें अमर न सुनना चाहता है और न समझना।

पता नहीं, सभी बड़ों को क्या बीमारी है! मौका लगा नहीं की उपदेश देना शुरू!

वह परसों ही दोस्त से लड़कर घर आया था। अपना गुस्सा चिल्लाकर, सामान फेंक कर निकाल रहा था तो दादी समझा रही थी, “गुस्सा करना अच्छी बात नहीं है बेटा! अपना ही खून जलता है!”

और मां! उनकी तो हर दूसरी बात सीख है!

कभी उनकी बात का पलट कर जवाब दो तो कहेंगी…

“छी: बड़ों को ऐसे पलट कर जवाब देते हो!

स्कूल में ये सीखते हो?

इट्स सो रूड अमर!”

अमर सोचता है, “हुंह! मैं इनकी बात क्यों सुनू भला! ये लोग तो खुद ही अपनी कहीं बात याद नहीं रखते। अपनी बारी में तो सब भूल जाते हैं!”

परसों ही दादी, माँ पर कितना गुस्सा हो रही थी! मां आफिस से लौटते हुए दादी की मनपसंद पत्रिका लाना भूल गई थीं; बस जोर-जोर से मां को डांटने लगी। मां ने भी दुगने गुस्से से जवाब दिया था “क्या हो गया यदि इतने कामों के बीच भूल गई तो? आप एक दिन इंतज़ार भी तो कर सकती है! थक गई थी मैं, आज आफिस के काम का इतना बोझा था सर पर। आप जरा भी चौन नहीं लेने देती है।”

अमर को पता है, पापा के आते ही दादी या मां दोनों में से कोई फिर शुरु हो जायेगी और आते ही पापा का मूड खराब कर देंगी। अमर को सोच कर हंसी आई, “मुझे सीखाती है, बेटा चुगली करना बुरी बात है!”

अमर के पास अपने कारण है अपने तरीके से व्यवहार करने के। घर में जिसे देखो वही कहता कुछ है और करता कुछ और ही है।

आज अमर बड़ा खुश है, उसका परीक्षाफल आया है। नब्बे प्रतिशत नम्बर आये है। मां, पापा, दादी सभी ने उसे खूब प्यार किया, तोहफे दिये। मां चाहती थी इस बार उसका दाखिला “रचना पब्लिक स्कूल” में करवा दे। वह बारहवीं तक का नामी स्कूल है। स्कूल की लिखित परीक्षा में सफल रहा, फिर प्रिंसिपल साहब ने बच्चों से मौखिक प्रश्न पूछे थे। अमर ने भी बड़े उत्साह और आत्मविश्वास से जवाब दिये थे। उसका एडमिशन हो गया तो मम्मी-पापा कितने खुश थे। वे खुश होते है तो अमर को कितना अच्छा लगता है!

बालमन की कहानियां
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यूनिफॉर्म, किताबें, बैग, लंचबॉक्स, पानी की बोतल, जूतें सभी तो नई ले दी थी पापा ने। दो दिन ही स्कूल गया था कि टायफाईड हो गया। जब तक ठीक हुआ गर्मी की छुट्टियां हो गयी थी।

कल से स्कूल शुरू हो रहा है। अमर के मन में खुशी, डर-दु:ख सभी का मिला-जुला भाव है। पुराने दोस्त छूटने का दुःख है। अमर को अपनी राशि मैडम कितनी याद आती है! पहली से पांचवीं तक वे ही क्लास टीचर थी। सभी बच्चे उनके फेवरेट थे, सभी! कुछ समझ नहीं आता तो दो-तीन, कितनी भी बार पूछों नाराज़ नहीं होती थी, प्यार से समझाती थी। इतने प्यार से बोलती है कि आधा डर तो वैसे ही भाग जाता है। नये-नये तरीके से पाठ पढ़ाती, कभी पहेलियां पूछती, कभी जोक्स सुनाती। उनके पीरियड में सभी को बड़ा मज़ा आता था, ध्यान से सुनों तो एक बार में ही पाठ समझ आ जाता है।

अमर घर में अकेला बच्चा है। मम्मी-पापा दोनों ऑफिस के कामों में इतना व्यस्त रहते है कि अमर के साथ वक्त ही नहीं लगा पाते है। दादी पूजा-पाठ करती रहती है। कभी अमर को कहानी सुनाती या कोई गेम खेलती भी तो वह जल्दी ही उकता जाता, वे हर समय नसीहत देती रहती हैं!

अमर आज नये स्कूल जाने के लिए तैयार हो रहा है। बाहर से बहादुर बना हुआ है, मन ही मन घबरा रहा है। नई टीचर कैसी होगी, नये साथी कैसे होंगें सोच रहा है। यह स्कूल बारहवीं तक का है, बस में बड़े-छोटे सभी बच्चे थे।

बस से उतर कर अमर अपनी कक्षा में गया। रिसेस में खाना खाकर वह नीचे चला गया। उत्सुकतावश खेल के मैदान के किनारे खड़ा होकर देखने लगा। खेल देखने में बड़ा मज़ा आ रहा था। मगन वह खड़ा था कि उधर से आठवीं-नवीं कक्षा के बच्चों का झुंड गुजरा। बच्चें शरारती थे, उनका लीडर लम्बा-तगड़ा, शरारत भरी हंसी थी उसके चेहरे पर। लीडर ने पास आकर उसकी पीठ पर जोर का धौल जमाते हुए पूछा-

“क्यों बे नया मुर्गा आया है स्कूल में?

किस क्लास में है?”

अमर को अपने लिए मुर्गा शब्द सुनकर बड़ा गुस्सा आया, जब्त कर उसने जवाब दिया,

“छठीं क्लास में।”

लीडर ने फिर धौल जमाते हुए पूछा,

“अच्छा पहले किस स्कूल में था?

तुझे क्या आता है? गाना, बजाना, नाचना?

चल बता सबसे अच्छा क्या लगता है?”

अमर ने जान छुड़ाने के लिए कहा,

“खेलना” सच था, खेलकूद में हमेशा ढेरों मेडल-कप जीतता था वह।

लीडर बोला, “अच्छा है। चल फिर तू दौड़, हम तेरे पीछे-पीछे”

सारे लड़के ज़ोर से हंस दिये। अमर आगे-आगे दौड़ रहा था लड़कों का झुण्ड उसके पीछे। कोई उसके सिर पर हाथ फेर रहा था, बाल छेड़ रहा था, कोई पीठ पर जोरों से धौल जमाकर हंस रहा था। अमर जान बचाकर तेज़ भाग रहा था कि पीछे से एक लड़के ने टांग अड़ा दी, वह गिरते-गिरते बचा। गिरते-पड़ते कक्षा में जाकर बैठ गया। छुट्टी तक उसका मन नहीं लगा।

मन ही मन अमर खुद को कोस रहा था जो कक्षा में किसी को दोस्त बनाये बिना यो अकेले खेल के मैदान के पास जाकर खड़ा हो गया था। वह भी क्या करें। खेल में उसकी जान बसती थी।

छुट्टी होते ही अमर दौड़कर बस में बैठ कर चैन की सांस ले ही रहा था कि सुबह वाली टोली में से तीन बच्चे उसी की बस में बैठ गये। उनका लीडर श्याम भी साथ ही बैठा था। अमर को देखते ही चिल्लाया, “इधर आ जा बे! अकेला बोर हो जायेगा! चल हमारे पास आ जा मज़े करेंगे!”

अमर की जान सूख गई।

सप्ताह भर पहले की घटना चलचित्र की तरह उसकी आंखों के आगे कौंध गई। वह पार्क में दोस्तों के साथ खेल रहा था। अचानक पेड़ पर बने घोंसले से चिड़ियाँ का बच्चा नीचे गिर गया था। बच्चे उसके चारों तरफ इकट्ठा हो गये, अमर और उसके दोस्तों को एक नया शगल मिल गया था। वे डण्डी से उस नन्हें बच्चे को कोंचने लगे। बच्चा नन्हें-नन्हें पंखों से चीं-चीं करता इधर-उधर फुदक कर बचने की कोशिश कर रहा था। बच्चों को, खासकर अमर को उसे छेड़ने में बड़ा मज़ा आ रहा था! गौरैया शोर मचाती हुई उनके सर पर मंडरा रही थी, लेकिन उसकी करुण पुकार को अनसुना कर अमर इधर-उधर फुदकते बच्चे को देखता, कोंचता और दोस्तों के साथ हंसता। वह तो एक अंकल की नज़र पड़ गई तो उन्होंने बच्चों को डांटकर भगाया और माली के बेटे से गौरैया के बच्चे को घोंसले में रखवाया था।

इस समय बस में बैठे अमर की दशा ठीक उस चिड़ियाँ के बच्चे की तरह थी। अमर को उसकी कातर निगाहें, दर्द से भरी चहचहाट याद आ रही थी!

“वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीर पराई जाने रे……” भजन का मतलब अब अमर को समझ आ रहा था। जब दादू ने समझाया था उसे बिल्कुल भी समझ नहीं आया था।

काश ये शरारती, सताने वाले बच्चे उसके मन का डर समझ पाते! कैसे वह जल्दी से जल्दी घर की ठंडी छांव में पहुंचना चाहता था! उनसे दोस्ती करना चाहता था, निश्चिंत हो कर सांस लेना चाहता था, ठीक उस चिड़ियाँ के बच्चे की तरह!

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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