बेला ने गाड़ी की गति तेज कर दी। सड़क पर वर्षा होने से फिसलने का संदेह होते हुए भी वह हवा की-सी तेजी से बढ़ी जा रही थी, वह आज आनन्द से जीवन का निर्णय करके छोड़ेगी, वह कभी यह सहन न कर सकती थी कि उसकी आँखों के सामने उसी की छाती पर मूंग दलकर आनन्द संध्या से विवाह कर ले। वह बांझ है, ये झूठे शब्द उसे फूंक रहे थे; वह तड़प रही थी, जल रही थी।
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संध्या की बस्ती के फाटक में से होते हुए वह सीधे गाड़ी को बरामदे के पास ले आई। संध्या और उसकी माँ बरामदे में एक ओर खड़ी बातें कर रही थीं। एकदम ब्रेक लगने की आवाज सुनकर चौंक पड़ीं। संध्या बेला को बरामदे की सीढ़ियों पर पाँव रखते देखकर उसके स्वागत के लिए बढ़ी-‘आओ बेला’-उसने मुस्कराते हुए कहा।
‘कहाँ है वह?’ क्रोध में नथुने फैलाते हुए बेला ने पूछा।
‘अंदर कमरे में, परंतु…’
पूरी बात सुने बिना ही बेला जोर-जोर से पाँव रखती भीतर चली गई। संध्या उसके क्रोध को भांप गई। हुमायूं ने टेलीफोन पर उसे सब बता दिया था, पर उसने आनन्द से इसका वर्णन न किया था। वह व्यर्थ उसे चिंतित न करना चाहती थी।
कहीं यह क्रोध कोई और रूप न धारण कर ले, यह सोचकर वह बेला के पीछे-पीछे अंदर कमरे में चली आई। दोनों को चुपचाप अपनी ओर आते देख आनन्द सोफे से उठ बैठा।
‘आओ मिस सपेरन, आज रास्ता भूलकर इधर कैसे आ गईं?’-आनन्द ने व्यंग्य भरे स्वर में पूछा।
‘सपेरे की खोज में।’-होंठों को दांतों तले दबाते बेला ने उत्तर दिया।
‘खूब, आओ बैठो, देखो संध्या इनके लिए कुछ लाओ। सांपों में रहकर यह स्वयं आज कुछ अधिक विष लिए हुए हैं।’
बेला ने घूमकर संध्या को देखा और जो पीछे खड़ी हँस रही थी। उसे देखकर बेला और जल-भुन गई। संध्या ने भी उसके मन में उठता हुआ धुआं देख लिया और आनन्द की ओर देखते हुए झुककर बोली-‘अभी लाई।’
‘दीदी! रहने दो, बहुत हो चुका। यदि हो सके तो बाहर चली जाओ।’
‘वह क्यों? क्या कोई प्राइवेट…’
‘हाँ-हाँ बहुत ही प्राइवेट।’
संध्या चुपके से बाहर चली गई। जाते समय उसने संकेत से आनन्द को डटे रहने के लिए कहा।
‘कहो, कैसे आना हुआ?’ आनन्द ने संध्या के जाते ही पूछा।
‘आपका धन्यवाद करने।’
‘धन्यवाद! कैसा?’
‘उस रंगीन रात का, जो मैंने आपके साथ व्यतीत की।’
‘ओह! वास्तव में बात ही कुछ ऐसी थी, मुझे फौरन बम्बई पहुँचना था।’
‘क्यों नहीं, यहाँ भी तो किसी की आँखें आपकी प्रतीक्षा में बिछी हुई थीं।’
‘सो तुम ठीक समझीं, न जाने क्यों मन थोड़ी देर के लिए भी इस बस्ती से दूर नहीं रहना चाहता था।’ आनन्द ने विष से काटते हुए उत्तर दिया।
‘किसी का घर जलाकर बसाई हुई बस्तियाँ कभी नहीं रहतीं और फिर वह बस्ती, जहाँ दूसरों की बेबसी पर ठहाके लगाए जाते हैं।’
‘बहुत खूब! क्या यह फिल्म का डायलॉग था… किंतु ऐसे डायलॉग वास्तविक जीवन में कोई प्रभाव नहीं रखते।’
‘इसलिए कि आप वास्तविक जीवन से बहुत दूर अपनी रंगरलियों में मस्त हैं, किसी के उजड़े हुए घर पर नया महल खड़ा करना चाहते हैं।’
‘तो क्या हुआ, अपने परिश्रम से जो बनाया बन गया। तुम जैसी नागिन के भरोसे रहता तो आज तक कोई नाम और चिह्न भी न रहता।’
‘क्यों नहीं, अब तुम सब कुछ कहोगे-नागिन, सपेरन, बदचलन और बांझ भी-जो जी में आए कह डालिए। आप यों मेरा अपमान करके रास्ते से क्यों हटते हैं? मैं तो स्वयं आपसे दूर जा रही हूँ, कभी न लौटने के लिए, अब मैं आपकी आँखों में न खटकूँगी। झुकना तो मैंने कभी नहीं सीखा, न जाने जीवन की कौन-सी बेबसी मुझे यहाँ खींच लाई है। मैं जीवित ही अपने आपको विधवा समझती…’
‘बेला’-पर्दे के पीछे से निकलती हुई संध्या चिल्लाई, ‘ऐसे अशुभ बोल मुँह से मत निकालो।’
‘तुम घबराओ नहीं, मेरी माँग का सिंदूर तुम्हारी माँग में लग जाएगा।’
‘होश में आओ।’ संध्या ने लपककर बेला को कंधे का सहारा दिया, जो क्रोध में कांप रही थी। उसका शरीर पसीने से लथपथ हो रहा था, उसकी आँखें आग बरसा रही थीं। वह इस पागलपन में सब कुछ भूल रही थी।
जैसे ही संध्या ने उसे अपनी बांहों में लिया, बेला ने झटके से उसे अलग कर दिया और चिल्लाते हुए बोली-
‘मुझ अशुभ को मत छुओ, वरना तुम भी बांझ हो जाओगी और यह जीवन-भर अपने घर में उजाला देखने को तरसते रहेंगे, फिर शायद तुम्हारे उजड़े हुए घर पर भी कोई नया महल बना डालें।’
इससे पहले कि संध्या कोई उत्तर देती, वह क्रोध में फुफकारती हुई कमरे से बाहर चली गई। संध्या उसे रोकने को बढ़ी, परंतु आनन्द ने उसे पकड़ लिया और बोला-‘जाने दो।’
‘नहीं, उसे रोकना होगा, वह किसी बड़े भ्रम में है।’
‘होने दो, इससे पहले कि वह किसी की कुटिया फूंक दे, वह स्वयं ही राख हो जाएगी।’
‘नहीं-नहीं आनन्द।’ संध्या ने अपना हाथ खींचते हुए कहा।
बेला की गाड़ी स्टार्ट हो चुकी थी। इससे पहले कि दोनों उसे रोकने का निर्णय करते, गाड़ी बाहर जाने लगी। गाड़ी की तेज गति और ऊँची आवाज, बेला के क्रोध की सीमा बता रही थी।
एकाएक गाड़ी का ब्रेक लगने से एक धमाका हुआ और शीशे फूटने की ध्वनि चारों ओर गूँजी। दोनों भागकर देखने के लिए बरामदे में आए। फाटक से एक ट्रक भीतर आया। बेला ने ब्रेक लगाते-लगाते गाड़ी को ट्रक से बचाना चाहा और वह घूमकर बिजली के खंभे से जा टकराई।
आनन्द और संध्या यह घटना देखकर तुरंत उधर दौड़े। इधर काम करते हुए मजदूर भी वहाँ पहुँच चुके थे।
बेला बेहोश गाड़ी के स्टेयरिंग पर पड़ी थी। गाड़ी का अगला भाग दब चुका था। मजदूरों की सहायता से उसे सीट से खींचकर बाहर निकाला गया। उसके माथे पर चोट आई थी।
आनन्द ने उसे अपनी बांहों में उठाया और तेज कदमों से चलता हुआ कमरे में ले आया। डॉक्टर को फोन किया और दोनों उसकी बेहोशी दूर करने का यत्न करने लगे। डॉक्टर ने आते ही इंजेक्शन दिया और कमरे की सब खिड़कियाँ खुलवा दीं। बेहोशी का कारण क्रोध और घबराहट थी।
जब उसे कुछ समय पश्चात् होश न आया तो डॉक्टर ने उसका पूरा निरीक्षण किया और आनन्द की ओर देखकर मुस्कराने लगा। दोनों डॉक्टर के होंठों पर मुस्कान देखकर आश्चर्य से उत्सुकतापूर्वक देखने लगे। डॉक्टर ने आनन्द को एक तरफ बुलाया और उसके कान में कुछ कहा।
दवा लिखते ही फिर दोनों कानाफूसी करने लगे। संध्या से न रहा गया और पास आकर पूछने लगी, ‘आखिर बात क्या है?’
‘कुछ ऐसी ही बात है।’ आनन्द ने मुस्कराहट होंठों में दबाते हुए उत्तर दिया।
‘मैं भी तो सुनूँ।’
आनन्द धीरे से अपना मुँह संध्या के कान के पास ले आया और बोला-‘तुम मौसी बनने वाली हो।’
‘सच!’ उसके मुँह से निकला।
‘जी’-डॉक्टर जो उनके संकेत समझ रहा था, साक्षी में बोला।
बेला के होश में आने के चिह्न प्रकट होने लगे और तीनों उधर लपके। उखड़े-उखड़े साँसों में वह हिचकियाँ-सी लेने लगी। डॉक्टर ने दवाई में भिगोया रूई का फाहा उसकी नाक के सामने रख दिया और तीनों दम साधे उसे देखने लगे। माथे पर आई चोट को धोकर उसने दवाई लगा दी।
डॉक्टर के चले जाने पर आनन्द बेला के हाथ मलने लगा। संध्या दूध ले आई और दोनों ने मिलकर बलपूर्वक उसे दूध पिलाया। थोड़े समय पश्चात् पाशा मामू और खाना बीबी मुस्कराते हुए आए और बधाई देकर चले गए।
बेला आश्चर्य में थी कि यह सब क्या हो रहा है? क्या आनन्द के पास मेरे दोबारा लौट आने पर ये सब लोग उसे बधाई दे रहे हैं या उसकी हार पर उसका उपहास उड़ाया जा रहा है।
वह उसी उलझन में पड़ी संध्या से पूछने ही वाली थी कि हुमायूं ने प्रवेश किया और आनन्द के कंधे पर थपथपाते हुए बधाई दी। संध्या और आनन्द दोनों मुस्करा दिए। बेला विचित्र विस्मय में थी।
जब हुमायूं को बेला ने अपने पास अकेला पाया तो धीरे से पूछने लगी-‘आपने कैसे जाना कि मैं यहाँ हूँ।’
‘खुशी की इठलाती हवा जो कह आई थी।’
‘क्या?’
‘कि तुमने मंजिल फतह कर ली।’
‘नहीं! यह तो मेरी हार की जय-जयकार हो रही है, मेरी गाड़ी की घटना ही इन लोगों की सहानुभूति का कारण बनी है। वरना…’
‘वरना क्या?’
‘मेरी आशाओं की अर्थी।’
‘लेकिन कभी-कभी तूफानों में पड़कर टेढ़े रास्ते भी सीधे हो जाते हैं।’
‘समझ में नहीं आता, आखिर यह क्या तमाशा है, सब हँस रहे हैं, मेरी बेबसी पर मुस्कराकर आपस में खुसर-फुसर कर रहे हैं, कोई बधाई देता है, कोई मुँह मीठा कर रहा है, हर किसी की दृष्टि मुझी पर लगी हुई है।’
‘तो तुमसे किसी ने कुछ नहीं कहा?’ हुमायूं ने भोलेपन से प्रश्न किया।
‘नहीं तो।’
‘आनन्द!’ ऊँची आवाज से हुमायूं ने पुकारा। आनन्द भागता हुआ अंदर आ पहुँचा।
‘क्या है?’
‘तुम भी अजीब आदमी हो।’
‘क्यों?’
‘इस बेचारी से अभी तक कुछ कहा ही नहीं।’
‘क्या?’
‘मेरा सिर।’ यह कहता हुआ हुमायूं आनन्द को छोड़कर बाहर चला गया कि स्वयं उससे निबट ले।
आनन्द ने एक दृष्टि जाते हुए हुमायूं पर डाली और फिर घूमकर बेला को देखा। दोनों की आँखें एक-दूसरे से मिलीं और दिलों में एक कंपकंपी-सी दौड़ गई। आनन्द धीरे से उसके पास आ ठहरा और नम्रता से पूछने लगा-‘तो सच तुम्हें इस बात का ज्ञान नहीं?’
‘किस बात का?’
‘तुम यहाँ धन्यवाद करने आई थीं न उस रंगीन रात का।’
‘हाँ, तो…’
‘भगवान ने तुम्हारी सुन ली।’
‘क्या?’
‘शीघ्र हमारे घर एक अतिथि आने वाला है।’
बेला यह सुनकर लजा गई और तकिए में मुँह छिपाने का यत्न करने लगी।
हुमायूं और संध्या भी वहाँ आ पहुँचे और तीनों बैठकर चाय पीने लगे। बेला उसके मुख पर हर्ष की रेखाओं को पढ़कर चुपचाप बिस्तर पर लेटी मन-ही-मन मुस्करा रही थी।
आनन्द और संध्या को एकांत में मिलते और बातें करते देखकर उसके मन में डाह की भावना जाग उठती-वह बेचैन हो जाती और कई विचार आ-आकर उसे सताने लगते।
कभी वह सोचती कि शायद संध्या आनन्द से पूछ रही हो-‘यह सब क्या हुआ? कब हुआ? तुम तो कहते थे कि बेला बांझ है, बेला में बच्चे जनने की शक्ति नहीं और यदि हो भी तो तुम कानून और समाज से लड़कर मुझसे ब्याह रचाने वाले थे, फिर यह सब क्या हुआ। संध्या की आशाओं पर पानी फिर गया। यह सोचकर स्वयं ही बेला मुस्कराने लगती, फिर कोई और विचार, कोई अन्य घटना उसे गंभीर बना देती।
बगल वाले कमरे में आनन्द और संध्या किसी बात पर खड़े हँस रहे थे। बेला ने देखा और झुंझला उठी, आज वह दीदी की अतिथि थी वरना कभी अपने घर में ऐसे चोरी-छिपे की बातें होतीं तो वह फौरन उसे बाहर निकाल देती, वह अपनी हँसी को बांटना न चाहती थी।
कुछ सोचकर एकाएक ही उसने हाय-हाय की रट लगानी आरंभ कर दी। आनन्द और संध्या भागे हुए उसके पास आए। ‘सिर में बड़ा दर्द है’ यह कहकर उसने आनन्द से सिर दबाने का अनुरोध किया। संध्या ने यह काम करना चाहा तो बेला ने उसे रोक दिया और बोली-‘इनके होते किसी पराये को कष्ट देने का मुझे क्या अधिकार है?’
पराये का शब्द सुनकर संध्या को बुरा तो लगा, परंतु अवसर को देखते हुए वह चुप रही और आनन्द के कहने पर दूध लेने बाहर चली गई। उसे बेला की यह बात बिलकुल न भायी थी कि वह पति को देवता के स्थान पर एक खिलौना समझे, वह न चाहती थी कि आनन्द फिर उसके हाव-भाव का शिकार हो जाए और उसकी तपस्या और परिश्रम व्यर्थ जाए।
दूध के साथ दवाई की गोली देते हुए संध्या ने दृढ़ मुद्रा में आदेश देते हुए कहा-‘जाइए, रात हो गई, आराम कर लीजिए।’
‘परंतु मेरा सिर।’
‘वह मैं संभाल’-संध्या ने बेला की बात बीच में ही काट दी और आनन्द को वहाँ से उठ जाने का संकेत किया। आनन्द चला गया। बेला को दीदी की यह बात अच्छी न लगी।

बेला चुपचाप लेटी अपनी उलझनों में खोई रही। बातों में जब उसे संध्या से पता चला कि डॉक्टर ने उसे यहीं बिस्तर पर लेटे रहने का आदेश दिया है, तो पूछने लगी-
‘कब तक?’
‘छह महीने तक, जब तक बच्चा नहीं होता।’
‘वह क्यों?’
‘दशा ही ऐसी है, वरना तुम्हारी जान का भय है।’
‘परंतु यह मुझसे न होगा। एक स्थान पर पड़े-पड़े मैं पागल हो जाऊँगी।’ वह बेचैनी और घबराहट में अपना सिर झिंझोड़ने लगी।
‘धीरज रखो, सब ठीक हो जाएगा, हम तो तुम्हारे संग हैं।’ बेला चुप हो गई और छत पर छिपकलियों को देखने लगी, जो एक कीड़े को लेकर आपस में लड़ रही थीं। वह सोचने लगी क्या वह और संध्या भी दो छिपकलियाँ हैं-और आनन्द-उसने अपना मुँह तकिए में छिपा लिया।
नीलकंठ-भाग-33 दिनांक 29 Mar.2022 समय 10:00 बजे रात प्रकाशित होगा ।

