एकाएक हवा का पक्षी एक कड़ाके के साथ रुक गया और लड़खड़ाता हुआ नीचे गिर पड़ा। आनन्द की चीख निकल गई और वह ऑपरेशन-रूम की ओर भागा। किवाड़ खुला। आनन्द उखड़े हुए स्वर में साँस ले रहा था। डॉक्टर ने उसकी घबराहट देखते हुए कहा-‘मिस्टर आनन्द, बधाई हो! लड़का हुआ है।’
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‘और बेला।’ वह कठिनाई से पूछ पाया।
‘ठीक है, अभी होश आने में देर है।’
इस सूचना से आनन्द के मुख पर तनिक भी प्रसन्नता न आई, जैसे वह केवल उसकी सांत्वना के लिए हो। वह धीरे-धीरे पांव उठाता सीढ़ियों से नीचे उतरने लगा। वहाँ रायसाहब और उनकी पत्नी बेचैनी से प्रतीक्षा कर रहे थे। तूफान अभी तक उधम मचा रहा था।
रात के कोई चार बजे बेला को होश आने पर अपने कमरे में लाया गया। नन्हें को पहले रायसाहब और मालकिन देखने गए। आनन्द खोया-सा बाहर ही बैठा रहा। न जाने आज उसका मन भय से क्यों कांपा जा रहा था। मालकिन और रायसाहब मुस्कराते हुए बाहर आए और आनन्द को बधाई देने लगे। वह चुप रहा और वैसे ही उठकर नर्स के साथ भीतर चला गया।
बेला सफेद वस्त्रों में पीली हल्दी बनी लेटी थी। उसके शरीर का पूरा लहू किसी ने चूस लिया था। उसने दृष्टि घुमाकर आनन्द की ओर देखा। उसकी आँखों में छिपी हुई बिजली चमकी और दोनों के होंठों में मुस्कान दिखने लगी। बेला ने आँख के संकेत से उसे अपने और समीप बुलाया और अपना हाथ बढ़ाकर उसके हाथों में दे दिया। उसमें जबान से अपनी प्रसन्नता जताने का बल न था, किंतु उसकी आँखों के प्यालों से प्रसन्नता छलक पड़ती थी।
नर्स ने बढ़कर झूले में पड़े नन्हें के मुँह से कपड़ा हटाया। आनन्द ने उधर देखा और बेला की ओर देखने लगा, जो मुस्करा रही थी।
जैसे ही वह बाहर जाने के लिए बढ़ा, बेला ने सिर हिलाकर उससे ठहरने का अनुरोध किया। नर्स ने पास बिछी कुर्सी आगे बढ़ा दी और आनन्द को बैठ जाने का संकेत करते हुए बोली-‘अब आप यहीं बैठिए।’
‘यह क्यों?’
‘अपनी बीवी का मन बहलाने को, हमें भी कुछ आराम करने दीजिए।’
‘बाहर तो तूफान…’
‘थम गया। अब वातावरण बिलकुल साफ है।’
नर्स के जाने के बाद आनन्द ने कुर्सी को बेला के समीप खींच लिया और उसकी उंगलियों को हाथों में लेकर प्यार से हिलाने लगा।
‘अब तो आप प्रसन्न हैं।’ बेला ने धीमे स्वर में पूछा।
‘क्यों?’
‘आपकी कामना जो पूरी हो गई।’
‘ओह! मेरी या हम दोनों की।’ उसने मुस्कराते हुए उत्तर दिया।
‘कुछ भी समझिए, प्रयत्न आपका और परिश्रम हमारा।’
आनन्द हँस दिया, पर दूसरे ही क्षण चिंतित-सा दिखाई देने लगा। उसका मन ‘नीलकंठ’ में था, जहाँ न जाने संध्या पर क्या बीत रही थी। वह शीघ्र वहाँ पहुँचना चाहता था, किंतु बेला उसे वहाँ से उठने न देती थी।
‘संध्या दीदी क्या सो रही हैं?’ बेला ने प्रश्न किया।
‘नहीं तो, बेचारी बड़ी देर तक प्रतीक्षा करती रही, पर…’
‘क्या?’
‘उसे किसी आवश्यक काम के लिए शीघ्र बस्ती में जाना पड़ा। अभी आती ही होगी।’
‘ओह!’ बेला ने एक ठण्डी साँस खींची और आनन्द की ओर देखने लगी, जिसमें छिपी बेचैनी झांक रही थी।
यों ही एक घंटा और बीत गया। आनन्द बेला के सिरहाने बैठा रहा। कभी उसे और कभी नन्हें को देख रहा था। दोनों आँखें बंद किए सो रहे थे। बेला का हाथ अभी तक आनन्द के हाथ में था। आनन्द ने धीरे-से उसका हाथ उठाकर तकिए के सहारे रख दिया। वह सो रही थी। आनन्द ने चुपके से बाहर का रास्ता लिया। बाहर निकलकर उसने टेलीफोन मिलाना चाहा, परंतु व्यर्थ, सब लाइनें कट चुकी थीं। वह भागा और बेला की गाड़ी निकालकर बस्ती की दिशा में चल पड़ा।
वह तेजी से बस्ती की ओर बढ़ा जा रहा था। सड़क के दोनों ओर बवंडर की सख्ती के चिह्न बिखरे हुए थे। गिरे हुए बिजली के खम्भे, टूटे मकान, उखड़े हुए पेड़, कोई प्रलय थी जो बम्बई में आई थी।
कहीं रात संध्या की टैक्सी को कुछ न हो गया हो… यह विचार आते ही आनन्द के शरीर में कंपकंपी होने लगी। तूफान थम चुका था, किंतु समुद्र में मची हलचल जारी थी। सांय-सांय करती हवा अभी भी पानी को उछाल रही थी।
गाड़ी बस्ती के फाटक में आई। वहाँ की हालत देखकर आनन्द विस्मित रह गया। फाटक के एक ओर की दीवार ढेर हो चुकी थी।
वह गाड़ी को लेकर कारखाने की ओर मुड़ा। कारखाने की छत और दीवारें टूट-टूटकर धरती से मिल रही थीं। उसने गाड़ी एक ओर रोक दी और लम्बे-लम्बे कदम भरता हुआ उधर बढ़ने लगा, जहाँ मजदूरों का जमघट था। चारों ओर निस्तब्धता छा रही थी। इतनी भीड़ होते हुए भी वहाँ सन्नाटा था। लग रहा था, जैसे वह मुर्दों की बस्ती में चला आया हो।
उसकी घबराहट बढ़ गई। तेजी से चलते हुए भी उसे अनुभव हो रहा था कि जैसे उसकी टांगें कांप रही हों। उसने दो-चार खड़े मजदूरों से संध्या की कुशलता पूछी, किंतु किसी ने उत्तर न दिया और मूर्ति बने उसे देखते रहे। रात के तूफान ने उन्हें इतना गंभीर बना दिया था कि वे अपनी चिंताएँ प्रकट करना भी नहीं चाहते थे।
जैसे ही वह भीड़ के पास पहुँचा, मजदूरों ने हड़बड़ाई आँखों से उसे देखा और गर्दनें झुकाकर एक ओर हट गए। उसने भी इस मौन को तोड़ना उचित न समझा और उसी गंभीरता के साथ वहाँ जा पहुँचा, जहाँ नन्हें पाशा और सुंदर खड़े थे। उनके चेहरों पर घोर उदासी थी। उसे देखते ही नन्हें पाशा की डरावनी चीख निकल गई।
आनन्द सब समझ गया। भीड़ एक ओर हट गई और दृश्य साफ हो गया। नन्हें पाशा गिरते-गिरते संभला। सुंदर ने उसे पकड़कर दीवार के एक गिरे पत्थर पर बिठा दिया। भीड़ के बीच सफेद कपड़े से ढंकी किसी की लाश पड़ी थी, जिसके सिरहाने खाना बीबी अपने बाल नोच-नोचकर रो रही थी। वह समझ गया कि यह अभागिन कौन है। वह लाश पर झुका और उसके चेहरे से कपड़ा हटा दिया।
संध्या का मौन बर्फ के समान सफेद चेहरा देखकर उसका रक्त-संचालन रुक गया। उसे लगा जैसे किसी ने उसे जलती भट्टी से निकालकर एकाएक बर्फ के ढेर में दबा दिया है। उसने एक दृष्टि चारों ओर दौड़ाकर देखा। सबकी आँखें भीग रही थीं।
यह सब कैसे हुआ? कब हुआ? वह कुछ भी न जानना चाहता था, जैसे पहले से ही सब जानता था। वह घुटनों के बल वहीं झुक गया और उसने संध्या की लाश अपनी बांहों में उठा ली।
वह लाश को उठाकर घर की ओर बढ़ा और भीड़ सिर झुकाए चुपचाप उसके पीछे हो ली। कारखाने में लगी मशीनें अजगर बनकर झांक रही थीं, तबाही और बर्बादी के सिवाय वहाँ कुछ न था।
इस बर्बाद बस्ती में संध्या का छोटा-सा मकान केवल वैसे-का-वैसा खड़ा था। उसकी छत के नीचे अब भी कितने ही मजदूर आश्रय ले रहे थे। मकान के ऊपर खुदा ‘नीलकंठ’ का शब्द देखते ही आनन्द का दिल डूबने लगा, उसके हाथ में नीलकंठ के जन्मदाता का शरीर था, उसका जी चाहा कि वह बोझ उठाए इसी धरती में समा जाए।
उसने लाश लाकर बरामदे के चबूतरे पर रख दी और स्वयं चुपचाप एक ओर बैठ गया।
आने-जाने वालों का जमघट लग गया। थोड़ी ही देर में रायसाहब और उनकी धर्मपत्नी भी अपने दुर्भाग्य पर आँसू बहाते आ पहुँचे। अभी वह एक जीवन के आने की खुशी मना भी न पाए थे कि मौत ने दूसरा जीवन ले लिया।
हुमायूं को जब इस घटना का पता चला तो वह भी आ पहुँचा। आनन्द से गले मिलकर रोने लगा। सुंदर और पाशा ने बतलाया कि रात लोगों को बाहर निकालते समय एक छत के गिर जाने से यह सब कुछ हुआ। उसे लाख मना किया, परंतु यह अपनी हठ पर अड़ी रही। नत्थू की बीवी और बच्चे को निकालते समय यह घटना घटी।
‘नत्थू की बीवी का क्या हुआ?’
‘वह भी चल बसी और बच्चा भी।’
उसी समय आनन्द ने उन मजदूरों पर दृष्टि दौड़ाई, जो इस दुःख में उसका साथ दे रहे थे। नत्थू उनमें न था। शायद बीवी का शोक मना रहा था।
संध्या की चिता शाम के चार बजे जलाई गई। आकाश की ओर उठती लपटें कई घरों में आग लगा गईं। आनन्द मूर्ति बना एक ओर जीवन का यह भयानक पहलू देखता रहा। अग्नि की लौ में उसे संध्या की सूरत दिखाई दे रही थी।
सब चले गए, किंतु आनन्द मूर्ति बना उस चिता को देखता रहा। उस समय तक, जब तक कि लकड़ियाँ अंगारे बनकर राख न हो गईं। सबने उसे लौट चलने को कहा, किंतु वह मौन बैठा रहा। जब उसने अपने कंधों पर किसी के हाथ का स्पर्श अनुभव किया तो देखा हुमायूं उसे उठने को कह रहा था।
उसने देखा कि वह वहाँ अकेला नहीं, बल्कि रायसाहब और उनकी धर्मपत्नी भी उसी की प्रतीक्षा कर रहे थे। उसे वह अब अपने संग ले जाना चाहते थे। वह जानते थे कि यहाँ रहकर उसके मन का बोझ हल्का न होगा।
हुमायूं के कहने पर वह रायसाहब के संग उनके घर चला गया।
उसी रात जब मालकिन बेला को देखने अस्पताल गईं तो उन्होंने आनन्द के अस्वस्थ होने का बहाना कर दिया। वह ऐसी दशा में उसे दीदी की मृत्यु की सूचना देना न चाहती थीं। उन्होंने अन्य लोगों को भी उसे बताने से मना कर दिया।

दो दिन पश्चात् जब उसने आनन्द के मुख पर भी उदासी देखी तो पूछने लगी-‘आखिर क्या बात है? डैडी, मम्मी, आप-जो भी आता है मुँह लटकाए, उदास, इसमें अवश्य कोई बात है।’
‘कुछ नहीं बेला।’
‘आप मुझसे छिपा रहे हैं। आप भी मुझे पराया समझते हैं।’
‘वास्तव में…वास्तव में बात ही ऐसी है, क्या कहूँ। कोई विशेष बात तो नहीं।’
बेला ने देखा, आनन्द के होंठ कांप रहे थे। उसके माथे से पसीना फूट रहा था। वह आश्चर्य से उसे देखते हुए बोली-
‘क्या बात है, आप कहते क्यों नहीं?’
‘बेला, तुम्हारी दीदी हमसे सदा के लिए रूठ गईं।’
‘क्या?’ बेला की चीख निकल गई-‘तो क्या?’
‘हाँ, वह उसी रात जब तुमसे मिलकर गईं, बवंडर के घेरे में आ गईं।’
‘तो आपने मुझसे छिपाया क्यों? दीदी।’
वह फूट-फूटकर रोने लगी। आनन्द ने पास बैठकर उसे सांत्वना देने को हाथ बढ़ाया तो बेला ने अपनी चीखों को दबाने के लिए उसकी आस्तीन को मुँह में रख लिया।
वह आनन्द की गोद में बेहोश पड़ी थी। आनन्द ने घंटी बजाकर डॉक्टर को बुलाया। डॉक्टर ने इंजेक्शन देकर उसे बिस्तर पर लिटा दिया और आनन्द भयभीत दृष्टि से उसे देखता रहा, उसके होश में आने की प्रतीक्षा करने लगा।
नीलकंठ-भाग-37 दिनांक 02 Apr.2022 समय 10:00 बजे रात प्रकाशित होगा ।

