आनन्द फरामजी नर्सिंग होम की बालकनी में खड़ा रात के फैलते हुए अंधकार को देख रहा था। यों तो नर्सिंग होम में चारों ओर बिजली के लट्टू जगमगा रहे थे, किंतु आनन्द की दृष्टि रात की कालिमा को चीर रही थी।
आज की रात उसके लिए जीवन या मरण की रात थी। आज बेला का ऑपरेशन होना था। पेट में बच्चे की स्थिति कुछ इस प्रकार थी कि बिना ऑपरेशन उसका जन्म बहुत कठिन था। माँ और बच्चे दोनों के प्राणों का संकट था।
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डॉक्टर ऑपरेशन की तैयारियाँ कर रहे थे। बेला बिस्तर पर लेटी पीड़ा से कराह रही थी। रायसाहब और मालकिन उसके पास बैठे थे। आनन्द ने ऑपरेशन की सूचना संध्या को दे दी थी, उसने आने का प्रण भी किया था। उसे विश्वास था कि वह अवश्य आएगी।
आनन्द की दृष्टि बार-बार ऊपर आती लिफ्ट की ओर जाती। किंतु संध्या को न देख वह उदास हो जाता। इस चिंताजनक रात को उसे संध्या के सहारे की बड़ी आवश्यकता थी। उसके बिना वह इस स्थिति में खुद को अकेला-सा अनुभव कर रहा था।
हो सकता है, उसने उसका मन रखने को ही प्रण कर लिया हो। जब से वह उसके घर से आया था, वह एक बार भी बेला को देखने न आई थी-यह सोचकर उसकी उदासी और बढ़ जाती, किंतु आशा को न छोड़ते हुए बराबर सीढ़ियों और लिफ्ट की ओर देखता रहा।
उसे निराश न होना पड़ा। ऑपरेशन से एक घंटा पूर्व संध्या सीढ़ियों से चढ़कर धीरे-धीरे ऑपरेशन-थियेटर की ओर आ रही थी। आनन्द ने उसे दूर से आते देखा तो उसके मुख पर प्रसन्नता दौड़ गई।
आज संध्या को वह एक अलौकिक रंग में देख रहा था। अंधेरी रात और बरामदे में हल्की बिजली की रोशनी में उसका मुख यों प्रतीत हो रहा था, जैसे चांद धीरे-धीरे धरती पर उतर रहा हो। आज वह सादी और सफेद साड़ी में सुसज्जित थी, जिसमें उसका रूप पहले से कहीं बढ़कर निखरा हुआ था।
ज्यों ही वह स्तम्भ के पास से गुजरी, जिसकी ओट में आनन्द उसकी प्रतीक्षा कर रहा था, उसके पांव एकाएक रुक गए। दोनों ने मौन दृष्टि से एक-दूसरे को देखा और ठिठककर रह गए।
‘मैं तो समझा था शायद…’
‘मैं न आ सकूँ।’ संध्या ने बात काटते हुए उत्तर दिया-‘ऑपरेशन में तो शायद अभी एक घंटा शेष है।’
‘हाँ, समझ नहीं आता क्या होने वाला है।’
‘अधीर मत होइए, सब ठीक हो जाएगा। कहाँ है बेला?’
‘सामने कमरे में।’ आनन्द ने धीमे स्वर में कहा और दोनों उस ओर चल दिए।
‘कोई और आया?’ संध्या ने प्रश्न किया।
‘रायसाहब और मम्मी।’
‘कहाँ है?’
‘नीचे रिसेप्शन हॉल में यहाँ से ही गए हैं।’
‘ओह!’
दोनों ने बेला के कमरे में प्रवेश किया। वह पत्थर की मूर्ति के समान बिस्तर पर लेटी थी। नर्स उसका नाप ले रही थी। आहट पाकर बेला ने आनन्द और संध्या को सामने देखा तो उसके होंठों पर मुस्कान खिल आई। उसे आशा थी कि दीदी उसे देखने अवश्य आएगी। संध्या भी कोई पुरानी बात दोहराने नहीं आई थी, बल्कि उसका साहस बढ़ाने आई थी। उसने बेला की लज्जा से झुकी दृष्टि को देख लिया था।
संध्या ने पास बैठ उसे पुकारा तो दोनों की आँखों में से एक साथ आँसू छलक पड़े, जैसे किसी भरे हुए प्याले में छिपी प्रसन्नता भी झांक रही थी।
‘मैं समझी, दीदी कभी न आएंगी।’
‘वह क्यों? क्या अपने भी छोड़ जाते हैं?’
‘अच्छा हुआ, तुम आ गईं वरना शायद हम एक-दूसरे को कभी…’
‘चुप पगली।’-संध्या ने उसके मुँह पर हाथ रख दिया और उसका हाथ अपने हाथों में लेकर प्यार से कहने लगी, ‘ऐसी बातें मुँह पर नहीं लाते। माँ बनना है अब तुम्हें, अच्छी बातें सोचा करते हैं, अशुभ विचार दूर रखने पड़ते हैं। ला तेरा हाथ देखूँ, अरे तेरी आयु तो सौ वर्ष की होगी, देख जीवन रेखा कितनी लंबी है।’
‘और तुम्हारी?’ बेला ने संध्या का हाथ देखना शुरू कर दिया।
इस पर दोनों की हल्की-सी हँसी गूंजी। दोनों ने कनखियों से झाँककर देखा। आनन्द के उदास मुख पर भी रौनक छा रही थी।
दोनों बहनों को एक संग हँसते देख आनन्द को लगा, जैसे वह गंगा-यमुना के संगम पर खड़ा दोनों नदियों का मिलन देख रहा हो। उसकी अपनी आँखों में भी प्रसन्नता के आँसू छलकने लगे। वह उन्हें रोक न सका और तेजी से दोनों को छोड़कर बाहर निकल गया।
वह उसी खम्भे का सहारा लेकर आसमान पर छाए काले बादलों को देखने लगा। बादल और घने हो चुके थे। हवा बंद थी-बालकनी के सामने असीम समुद्र बिलकुल मौन था।
बेला को ऑपरेशन-कक्ष में ले जाया गया। संध्या और आनन्द उसे धैर्य देते हुए बाहर आ ठहरे। उनके मुँह में धीरज के शब्द थे, होंठों पर मुस्कान थी, किंतु भीतर से दोनों के मन भय से डूबे जा रहे थे।
ऑपरेशन-कक्ष के द्वार बंद हो गए। दोनों दूर तक फैले समुद्र को देखने लगे, जिसमें सिक्का भरा प्रतीत हो रहा था। वातावरण में एक घुटन-सी थी।
हवा के कुछ झोंकों ने वातावरण में एक हल्की-सी फुरहरी-सी भर दी, दोनों के घुटे दिलों को कुछ अवकाश मिला। संध्या ने बालकनी से नीचे सिर लटका दिया और हवा के झोंकों का आनन्द लेने लगी।
थोड़े समय पश्चात् हवा की गति तेज हो गई। दूर से सांय-सांय की आवाज होने लगी, मानो इस गुम वातावरण की पूर्ति किसी तूफान से होने वाली हो। अंधेरे में फैला हुआ समुद्र साफ दिखाई दे रहा था, परंतु उसमें दूर से हलचल के चिह्न प्रकट हो रहे थे।
एकाएक हवा के तेज झोंके अस्पताल की ऊँची दीवारों से टकराकर शोर मचाने लगे। समुद्र में पानी की उछालें बढ़कर आकाश छूने का प्रयत्न करने लगीं।
तूफान का जोर बढ़ता ही गया। सहसा संध्या को अपने कारखाने का ध्यान आया, जहाँ रात की शिफ्ट चल रही थी। दिन में काम करने वाले मजदूर कारखाने के पास ही बनी घास-फूस की छोटी झोपड़ियों में डेरा डाले सो रहे होंगे, उनका क्या होगा। उसका विचार था कि आगामी वर्ष में उनके लिए छोटे-छोटे मकान बनवा देगी। घास-फूस के घर अस्थायी प्रबंध थे।
कारखाने की छत भी तो खपरैल की ही थी, क्योंकि आरंभ में इमारत बनाने के लिए कंपनी के पास धन का अभाव था। एक तो अस्थाई और कच्चा, दूसरा समुद्र से इतना निकट… तूफान का जोर सहन करना बड़ा ही कठिन था। संध्या ने अपनी बेचैनी आनन्द पर प्रकट की तो वह उसी समय गाड़ी लेकर वहाँ जाने को तैयार हो गया, परंतु संध्या ने उसे रोक दिया। ऐसे समय में उसका अस्पताल में होना सबसे आवश्यक था। सहसा दूर एक मलबा दिखाई दिया। कहीं किसी इमारत पर बिजली की तारें आग पकड़ गईं और देखते-ही-देखते लपटें आकाश से बातें करने लगीं। हवा के झोंके आग को फैलाने लगे।
खतरे का अलार्म बजा। एक डॉक्टर बाहर आया और तेजी से दोनों को भीतर ले गया। पूरा शहर एक भयानक बवंडर की लपेट में आ गया था। खतरा हर क्षण बढ़ रहा था।
अकस्मात् एक धमाका हुआ और बिजली चली गई। शहर अंधेरे में डूब गया। दोनों की एक हल्की-सी चीख निकल गई और ऑपरेशन-रूम की ओर बढ़ते हुए बोले-‘डॉक्टर!’
‘घबराइए नहीं, भीतर उजाला है। ऑपरेशन-रूम का अपना डायनमो है।’, डॉक्टर दोनों को भीतर आने का संकेत कर स्वयं चला गया। दोनों ने ऑपरेशन-रूम में झांककर देखा। भीतर उजाला देखकर उन्हें संतोष हुआ।
‘आप भीतर चले जाइए।’ संध्या ने आनन्द को दरवाजे के भीतर धकेलते हुए कहा।
‘और तुम?’
‘मुझे बस्ती में जाना है।’
‘इतने तूफान में, कैसे?’
‘घबराओ नहीं, टैक्सी नीचे मेरी प्रतीक्षा में है।’
‘परंतु, इस समय जाना खतरे से खाली नहीं।’ आनन्द ने संध्या को पकड़ते हुए कहा।
‘कोई बात नहीं, हजारों के जीवन का प्रश्न है।’
‘तो ठहरो, मैं भी चलता हूँ।’
‘नहीं-नहीं, आपका यहाँ रहना आवश्यक है। तूफान थमते ही आ जाऊँगी।’

आनन्द अभी कुछ कह भी न पाया था कि संध्या सीढ़ियाँ उतर गई। उसने नीचे देखा कि एक टैक्सी फाटक से बाहर जा रही थी, जो देखते-देखते दृष्टि से ओझल हो गई।
आनन्द भय से खम्भे के साथ चिपककर खड़ा हो गया। उसे लग रहा था जैसे वह भी किसी बवण्डर के घेरे में आ गया है। उसका दम घुटने लगा। उसकी आँखें ऑपरेशन-रूम से आती हुई रोशनी से हटकर छत पर लगे वायु की दिशा बताने वाले पक्षी पर जा लगीं। वह अपनी पूरी गति से अपने गिर्द घूमे जा रहा था। उसकी गति से बवंडर की भयानकता का अनुमान लगाया जा सकता था।
नीलकंठ-भाग-36 दिनांक 01 Apr.2022 समय 10:00 बजे रात प्रकाशित होगा ।

