Hindi Novel Kacche Dhage | Grehlakshmi
Kacche Dhage hindi novel by sameer

रीमा देवी ‘बैड टी’ लेकर विवेक के कमरे में पहुंचीं तो उनके दिल पर धक्का-सा लगा‒विवेक बिस्तर पर नहीं था…वह कुर्सी पर बैठा सामने पड़े मेज पर सिर टिकाए गहरे-गहरे श्वास ले रहा था…पास ही खाली बोतल और खाली गिलास रखा था।

रीमा देवी ने उसके कंधे पर हाथ रखकर धीरे से पुकारा‒

कच्चे धागे नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- भाग-1

“विवेक‒बेटा विवेक।”

विवेक ने कसमसा कर सिर उठाया और और आंखें फाड़ कर मां की ओर देखकर नींद भरी आवाज में बोला‒”महेश…मर गएला है।”

“विवेक…होश में आ बेटे।”

विवेक ने सिर को झटका दिया…फिर सीधा बैठता हुआ बोला‒

“आई एम वेरी सॉरी मां! अपन सपने में देखेला था कि महेश मर गएला है।”

“काहे को किसी का बुरा चाहता है बेटा?” रीमा देवी ने चाय की प्याली उठाकर उसकी ओर बढ़ा दी और कहा‒”कभी-कभी दूसरे का बुरा चाहने वाला का ही भगवान बुरा कर देता है।”

“अरे…इससे ज्यास्ती और क्या बुरा करेंगा मां…अपन की देवयानी को भी छीन लिया।”

“शायद इसमें कोई लाभ हो जो हम लोगों के ज्ञान से बाहर हो।”

“मां अपन ‘ऊपर वाले’ पर भरोसा किएला कि अंजला का पहला पति मर जाएंगा…अपन की पहली पत्नी मर जाएंगी…अपन ने इसी वास्ते अंजला की शादी महेश से करा दी थी…अपन ने देवयानी से शादी कर लिया कि अपन की पहली पत्नी होने के नाते वह साली भी मर जाएंगी। देवयानी तो मर गएली है पर महेश जिन्दा बच गएला। देवयानी को कोई बीमारी नहीं थी पर महेश साले को कैन्सर था। वह साले सारे डॉक्टर लोग झूठ बोलते हैं….सबने झूठ बोला था कि महेश छः महीने के अंदर-अंदर मर जाएंगा पर वह साला इतने बड़े खतरनाक रोग से बच गएला है।”

“बस, चुप रह…जो हो गया सो हो गया।”

“अरे, महेश को मरना था तो वह साला काहे को मरने से बच गया?”

“विवेक…मैं कहती हूं बस कर।”

“मां तू अपन को यह बता दे…क्या हाथ की लकीरों का लेख गलत होएला है महेश आखिर काहे को नहीं मरेला है?”

“चटाख!” अचानक रीमा देवी का एक झन्नाटेदार थप्पड़ विवेक के गाल पर पड़ा और विवेक हड़बड़ा कर खड़ा होकर आश्चर्य से बोला‒मां…!”

“अबकी बार अगर तूने महेश को कोसा तो तेरा ‘कोसा’ मुझे लगे।”

“मां! यह तू क्या बोल रही है?”

“हां, इसलिए कि अगर महेश को कुछ हुआ तो मुझे इतना ही दुःख होगा जितना भगवान न करे तेरे मरने का होता।”

“मां…तेरे को महेश से इतना ‘मोह’ क्यों है?”

“इसलिए कि तेरी तरह महेश भी मेरा ही बेटा है।”

“मां‒!” विवेक हड़बड़ा कर कई कदम पीछे हट गया।

“हां! यह सच है…महेश तेरा जुड़वा भाई है…वह तुझसे केवल तीन मिनट बड़ा है।”

“नहीं…नहीं…नहीं…तू अपन को बहका रही है। यह…यह तो अनहोनी हुई।”

“यह अनहोनी नहीं‒सच है।”

“पर कैसे?”

“मैंने बताया था न कि जगमोहन और तेरे पिता बचपन के दोस्त थे।”

“हां‒मालूम है।”

“महेश की मां मेरी गहरी सहेली थी‒हम दोनों ‘दोपट्टा बदल’ बहनें थीं। तेरे पिता और जगमोहन ने साथ-साथ काम शुरू किया।”

“हम दोनों सहेलियां एक साथ गर्भवती हुईं…और दोनों ने साथ ही नर्सिंग होम में बच्चों को जन्म दिया। सावित्री का केस उलझा हुआ था इसलिए सावित्री को बेहोश करके ऑपरेशन करके बच्चे का जनम हुआ, लेकिन बच्चा जन्म लेते ही मर गया…यह भगवान की लीला थी कि उस समय मेरी कोख से आगे-पीछे दो बच्चों ने जन्म लिया…एक तू था और दूसरा महेश। जब डॉक्टर ने बताया कि सावित्री फिर कभी मां नहीं बन सकेगी तो मुझे बहुत सदमा पहुंचा, क्योंकि सावित्री को बच्चे की बड़ी चाह थी। जगमोहन को बच्चे का चाव था…जगमोहन शुरू ही से कठोर था।”

मुझे विश्वास था कि अगर जगमोहन को पता चल गया कि सावित्री कभी मां नहीं बनेगी तो वह दूसरी शादी कर लेगा, क्योंकि वह भी अपने वंश का अकेला ही था और आगे वंश चलाने वाला चाहिए भी था…संयोग था कि उस समय जगमोहन कारोबार के सिलसिले में दिल्ली गया हुआ था, मगर तेरे पिता नर्सिंग होम ही में थे…मैंने उनसे बात की और उनकी सहमति से अपना एक बच्चा सावित्री के बच्चे की जगह रख दिया…इस तरह महेश, सावित्री और जगमोहन का बच्चा बनाकर पला-बढ़ा जिसके बारे में मरते दम तक सावित्री भी बेखबर रही और जगमोहन भी आज तक बेखबर है।”

विवेक के दिमाग में धमाके हो रहे थे‒उसने थूक निगल कर कंपकंपाती आवाज में कहा‒

“इसका मतलब है अपन अब तक अनजाने में ही अपने भाई को कोसता रहा था।”

“हां बेटा‒तभी तो बड़ों ने कहा है- कभी किसी का बुरा मत चाहो…हो सकता है अनजाने में तुम किसी अपने के लिए बुरा चाह रहे हो।”

“नहीं…नहीं मां…अब महेश नहीं मरेंगा…अपन ऐसी कोई बात जबान से नहीं निकालेंगा कि महेश को कोसन लगे…अरे अपन ही का भाई है…अपन के लिए दुनिया में…इससे बड़ी खुशी की बात क्या हो सकती है…और फिर अंजला, चाहे अपन से उसका ब्याह होता है या महेश का…वह बहू तो तेरी ही है…मैं वचन देता हूं अपने भाई की तरह ही रहूंगा। मां जाये भाई की तरह।”

“बस अब तू अपना हुलिया बदल‒नहा-धो और दफ्तर जा।”

महेश के साथ खून के रिश्ते, इतने गूढ़ के बारे में सुनकर विवेक बड़ा अजीब महसूस कर रहा था…इसी बात को तो भाग्य कहते हैं। कौन जाने किस समय तक किसी का कौन-सा भेद छुपा रहता है और कौन सगा स्वयं ही उभर आता है…उसे खुशी भी थी कि उसका अपना सगा भाई है‒महेश भी इस भेद को नहीं जानता…और वह इसी सगे भाई की मौत की कामना कर रहा है ताकि वह अंजला से शादी कर सके‒और…और….।

दफ्तर जाते हुए और दफ्तर में भी बड़ी देर वह मौन बैठा इसी विषय पर सोचता रहा।

विवेक के चले जाने के बाद रीमा देवी की क्रिश्चियन नौकरानी चुपचाप आकर बैठ गई। रीमा देवी ने पूछा‒

“मैरी! तुम्हें कुछ कहना है?”

“हां मालकिन, क्षमा चाहती हूं, मैंने आपकी बातें सुन ली हैं…आपने विवेक बेटे को बताना ही था तो सच्ची बात क्यों नहीं बताई?”

“देखो मैरी! इस दुनिया में तुम्हीं अकेली इतना बड़ा भेद जानती हो, क्योंकि उस ‘नर्सिंग होम’ में तुम नर्स थीं। तुम जानती थीं कि मैं जगमोहन की बेईमानी का बदला लेने के लिए अपना बच्चा सावित्री के बच्चे से बदल रही हूं। मैंने अपने बेटे को बड़ा बनाने के सपने देखे थे, वह जगमोहन की बेईमानी और मेरे पति के सीधेपन से मिट्टी में मिल गए थे…मैंने सोचा था कि जगमोहन मेरे पति को बिजनेस में गिरा कर इतना धनवान बन गया है…और भले ही हम गरीब रहें, हमारा बच्चा तो ऐश का जीवन व्यतीत करेगा…और जगमोहन का बच्चा झोपड़पट्टी में रहेगा।”

मगर विवेक को पालते-पालते मुझे उससे इतना मोह हो गया जितना अपनी कोख के बच्चे से मां को होता है…उसे पालने में मैंने अपनी जान लड़ा दी ताकि जो अन्याय इस मासूम बच्चे के साथ किया, उसका प्रायश्चित कर सकूं।

विवेक मुझे सगी मां समझता है…मेरे लिए जान देता है…अगर उसे सच्चाई मालूम हो जाती तो वह टूट कर बिखर जाता…सावित्री पहले ही मर चुकी है…जगमोहन शायद इस सवाल पर कभी विश्वास न करे कि उसका असली बेटा विवेक है…इस तरह विवेक कहीं का न रहता।

महेश के ‘कैन्सर’ की खबर सुनकर मैंने कैसे धीरज रखा, तुम नहीं समझ सकतीं‒मैं प्रायश्चित करती थी कि काश! मैं फिर उसको अपनी कोख में रख सकूं ताकि वह दुनिया के ऊंच-नीच, सर्द-गर्म से बचा रहे।

अब महेश भी मौत के मुंह से निकल आया है। विवेक को भगवान मेरी उम्र भी दे दें…विवेक अंजला को पाने के लिए….महेश के प्रति बुरा ही सोचता रहता है…इसीलिए आज मैंने विवेक से झूठ बोल दिया कि महेश उसका जुड़वा भाई है वरना हो सकता है अंजला की खातिर वह कुछ और ही कर बैठता।

“आप ठीक कहती हैं मालकिन।”

“मैरी! पवित्र मरियम की कसम खाकर वचन दो कि तुम इस ‘भेद’ को अपने ही सीने में रखोगी।”

“मालकिन! यह राज मेरे साथ दफन होगा‒आप संतुष्ट रहेें।”

“मैं तुम्हारा उपकार जन्मों तक नहीं भूलूंगी‒”कहते-कहते उसका गला रुंध गया।”

विवेक के शरीर पर कीमती सूट था…उसकी कार बंगले के फाटक पर रुकी-फाटक के बाहर शहनाइयां बज रही थीं…बंगले के चारों ओर रंगारंग बल्ब जगमगा रहे थे….ऐसा लगता था जैसे आज महेश और अंजला की शादी का फंक्शन हो।

चौकीदार विवेक को देखकर उछल पड़ा‒विवेक ने खिड़की से झांक कर ऊंची आवाज में कहा‒

“अबे देखेला है…फाटक खोल।”

“नहीं साहब…बड़े मालिक की इजाजत नहीं।”

“अरे तेरे बड़े मालिक की ऐसी की तैसी…खोलेगा या मारूं टक्कर।”

चौकीदार ने फाटक खोल दिया और कार फर्राटे भरती हुई अंदर पहुंची। जगमोहन खुशी-खुशी नौकरों को आदेश दे रहा था। कार के चिरमिरा कर रुकने की आवाज पर वह मुड़ा…फिर विवेक पर नजर पड़ते ही उसके तेवर बदल गए…उसने विवेक को अपनी ओर बड़ी शराफत से एक बड़ा-सा गुलदस्ता लेकर आते देखा और किसी कटखने कुत्ते की तरह उसकी ओर झपटता हुआ गुर्राया-

“बास्टर्ड! तुझे किसने अंदर आने दिया?”

विवेक ने उछलकर पीछे हटते हुए गुलदस्ते को ढाल बना कर कहा‒

“अबे साला अंकल। आज अपन झगड़ा करने नहीं आएला। अपन का भाई, आई मीन अपन का दोस्त महेश अच्छा होकर आएला है…अपन उसका स्वागत करने आएला है।”

जगमोहन दहाड़ कर बोला‒”मैं तेरी शक्ल नहीं देखना चाहता…निकल जा यहां से।”

“देख साले बुड्ढे‒आज अपन का मूड खराब नहीं करने का।”

अंजला लपक कर बाहर आ गई…फिर विवेक को देखते ही उसके चेहरे का रंग उड़ गया। विवेक ने उसे देखते हुए जोर से कहा‒

“ऐ अंजू! बाई गॉड! आज अपन सच्चे मन से अपने यार…अपने भाई महेश का स्वागत करने को आएला है…इस बुड्ढे को रोको अंजू…यह अपन के पिता का बचपन का दोस्त है वरना अपन इसको नाकों चने चबवा देता।”

थोड़ी देर बाद जगमोहन बुरी तरह हांफने लगा…उसे खड़ा होने के लिए मेज का सहारा लेना पड़ा। विवेक भी आकर उसके बराबर में खड़ा हो गया और बोला‒

“काहे को खाली-पीली अपना हैल्थ खराब किएला है…यार! अपन तेरे को साफ शब्दों में बोला…अपन अपने यार अपने भाई महेश का स्वागत करने आएला है‒वह अपन का ‘जुड़वां’ है और अपन का बचपन का यार है‒साला, तुमसे ज्यास्ती खुशी आज अपन को है…महेश का ऑपरेशन कामयाब हो जाने का खुशी तुम सबके साथ शेयर करने का है।”

अंजला आश्चर्य से विवेक को देख रही थी…विवेक ने उसे देखा और बोला‒”यार! तेरे को भी विश्वास नहीं होने का है? अच्छा आने दे महेश को‒अपन उसके सामने तेरे को ‘भाभी’ बोलेंगा।”

इतने में ड्राइवर ने जगमोहन से कहा‒”मालिक! छोटे मालिक की फ्लाइट आने का समय हो गया है।”

“अरे…चलो-चलो‒जल्दी से।”

कारों का पूरा ‘काफिला’ बंगले से निकला…सबसे पीछे विवेक की कार थी…जल्दी-जल्दी कारों में बैठने की हबड़ा-तबड़ी में विवेक ने अंजला को अपनी कार में खींच लिया…किसी ने ध्यान भी नहीं दिया।

रास्ते में अंजला ने विवेक से कहा‒”विवेक! क्या तुम सचमुच गम्भीर हो?”

“ऐ साली! अपन उस दिन गम्भीर होएंगा जिस दिन अपन का आखिरी सांस निकल जाएंगा।”

“भगवान न करे।”

“भगवान जो कुछ करेला है…अच्छा ही करेला है।”

“तो तुमने भगवान के फैसले को मंजूर कर लिया।”

“अब यार अपन को मां की ‘मार’ के फैसले मानने पड़ते हैं…और यह तो भगवान का फैसला है…अपन ने मान लिया।”

“काश! यह फैसला तुमने देवयानी के जीवन में मान लिया होता।”

“वह साली जल्दबाज निकली…अपन के बराबर की सीट ही खाली कर गई…जब अपन उसको अपनाने का फैसला किया तो वह साली जहर खा चुकी थी।”

“क्या…? देवयानी ने जहर खाया था?”

“हां, उसे चिन्ता थी कि अपन जो भगवान पर अटल विश्वास रखेला है कहीं उसी विश्वास को खो न बैठे…इसलिए खिसक गई।”

“हे भगवान!”

“वह अपन का उपाय गलत हो गएला है…ज्योतिषी ने बोला था ‘उपाय’ के बाद अपन तीसरी बार भी ब्याह कर सकता है…अब साली तेरे को अपन का ब्याह कराने का है…अपन ने लड़की भी सोच ली है।”

“कौन है?”

“वह…देवयानी की मां मैनिका कैसी रहेंगी?”

अंजला हंस पड़ी।

“क्या बुरी रहेंगी?” विवेक ने गम्भीरता से पूछा।

“तुम अपनी मां से शादी करोगे?”

“तो क्या हुआ? दुनिया के सामने एक नए रिश्ते की बुनियाद रखेंगा।”

अंजला इतनी हंसी कि उसकी आंखों में आंसू आ गए। कार एयरपोर्ट पर रुक गई तो अंजला ने जल्दी से दरवाजा खोलते हुए कहा‒”मैं जाती हूं…पिताजी ने देख लिया तो गजब हो जाएगा।”

फिर वह अंदर चली गई। विवेक कार में बैठा हुआ उसे जाते देखता रहा…उसके चेहरे पर निराशा भी थी और खुशी भी…आंखों में आंसू भी। अचानक ही उसकी निगाहें रीमा देवी पर पड़ीं जो भीड़ से बचकर एक ओर खड़ी थीं। विवेक जल्दी से कार से उतर आया और मां के पास पहुंचकर बोला‒”मां तू भी आ गएली।”

रीमा देवी धीरे से बोली‒”क्या मैं यहां नहीं आ सकती? अरे महेश तेरे साथ बचपन से मेरे पास आता था वह मेरे लिए…”

“बस मां…तूने ही तो बताया है कि महेश मेरा जुड़वा भाई है।”

ईं…हां…हां…मैं भूल गई थी।”

“यह क्या हो गएला है तुझे?”

“कुछ नहीं…खुश हूं न बहुत इस बात से कि एक बेटा मौत को हराकर लौट आया और दूसरे ने उसे अपना भाई मान कर कोसना बंद कर दिया।”

“चल आ…वह फ्लाइट आ गई।”

वह लोग जल्दी से दाखिला टिकट लेकर अंदर आ गए। माइक पर प्लेन के लैंड होने की घोषणा हो चुकी थी…और ‘पान अमरीकन’ एयर लाइन्स का देवकाय जहाज ‘रनवे’ पर उतरने के लिए चक्कर काट रहा था…सब उसको देख रहे थे…और खुशी से सबके दिल धड़क रहे थे।

फिर-जाने क्या हुआ? प्लेन एकदम मुंह के बल इतनी तेजी से नीचे आया जैसे उसका ईंधन समाप्त हो गया हो…इंजन एकदम बन्द हो गया हो‒लोग सन्नाटे में रह गए…और…चंद सेकेंड भी नहीं लगे…और पूरा प्लेन मुंह के बल जमीन से आ टकराया‒एक कान फाड़ देने वाला धमाका हुआ।

साथ ही आग और शोलों में लिपटे हुए जहाज के सैकड़ों टुकड़े ज्वालामुखी से फूटे लावे की तरह हवा में उड़ते नजर आए…जिनमें इन्सानों के शरीर भी थे‒ऐसे लगा जैसे एयरपोर्ट में प्रलय आ गई हो।

रीमा देवी तेजी से सीना पीटती हुई चिल्लाती हुई दौड़ी‒”मेरा बच्चा…मेरा महेश!”

“मां…!” विवेक उसके पीछे दौड़ा।

‘एमरजेन्सी’ गाड़ियां लाउंज में खड़ी भीड़ को रोकने के लिए आ गईं‒दर्जनों एंबुलेंस, फायर ब्रिगेड घटनास्थल की ओर दौड़ पड़े। विवेक ने बड़ी मुश्किल से रीमा देवी को रोका जो उसकी बांहों में बेहोश हो गई थीं‒दूसरी ओर जगमोहन फर्श पर लेटा हुआ हाथ-पांव मार-मार कर चिल्ला रहा था‒”मेरा बच्चा…मेरा लाल।”

नौकर उसे संभालने की कोशिश कर रहे थे… विवेक हैरान-हैरान रीमा देवी को संभाले खड़ा था। उसने अंजला को देखा जो हक्काबक्का-सी उस ओर देख रही थी जहां जहाज के मलबे के शोलों में उसका सुहाग जल रहा था… विवेक के कानों में जैसे अदृश्य-सी ज्योतिषी की भविष्यवाणी गूंज रही थी।

“तुम्हारा पहला पति मर जाएगा।”

“तुम्हारा पहला सुहाग उजड़ जाएगा।”

फिर अंजला ने विवेक को देखा‒दोनों अपनी-अपनी जगह यही नहीं समझ पा रहे थे कि वह खुश हों या दुखी हों‒अंजला स्वयं ही चलकर विवेक के पास आ गई। उसने धीरे से कहा‒

“शायद हमने जिसे भगवान का फैसला समझ लिया था…वह भगवान का असली फैसला नहीं था…मगर भगवान का यह फैसला असली फैसला है।”

“तुम ठीक कहती हो अंजू…मुझे खुशी इस बात की है कि मेरा विश्वास तब भी टूटा था जब देवयानी ने मुझे यह बताया था कि महेश का ऑपरेशन कामयाब हो गया है‒मैंने सोच लिया था कि तुम अपना फैसला महेश के हक में दोगी।”

फिर उसने अंजला के पेट की ओर देखकर कहा‒”मुझे जीवन-भर बस एक ही दुःख रहता कि मेरा बच्चा भैया का बच्चा बनकर पल रहा है।”

“विवेक! सच्चाई किस तरह सामने आती है…तुम देख ही चुके हो…क्योंकि सच्चाई भी तो भगवान ही का रूप है‒सच्चाई यह है कि मेरी कोख में जो बच्चा पल रहा है वह तुम्हारा नहीं, महेश का है।”

विवेक के होंठों पर मुस्कुराहट फैल गई‒”आज तुमने आखिरी बार मेरा विश्वास टूटने से बचा लिया…मुझे देवयानी सच्चाई बता चुकी थी‒मगर जानना चाहता था कि अब जब हम दोनों जिन्दगी के साथी बनने वाले हैं तुम यह सच्चाई मुझे बताती हो या नहीं?”

फिर उसने धीरे से अंजला का माथा चूम लिया।

दोनों की आंखों में आंसू झलक रहे थे।

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