Recurrent Miscarriage: भ्रूण महिला के अंडे और पुरुष स्पर्म में मौजूद 23-23 क्रोमोसोम के फर्टिलाइज होने पर बनता है। क्रोमोसोम में विकार होने पर भ्रूण में भी कोई न कोई जेनेटिक विकार आ जाता है। ऐसे विकृत भ्रूण विकसित नहीं हो पाते हैं और दूसरे या तीसरे महीने में गर्भपात हो जाता है।
शादी के बाद हर महिला मां बनना चाहती है, लेकिन कई कारणो से उनका गर्भ ठहर नही पाता और
गर्भपात हो जाता है। कई महिलाएं तो बार-बार गर्भपात या रिकरिंग मिसकैरेज का दर्द झेलती हैं जो उन के लिए पीड़ादायक और तनावपूर्ण अनुभव होता है। वैज्ञानिकों के हिसाब से बारबार गर्भपात होने की दर काफी कम है। जहां सामान्यत: जोड़ों में गर्भपात की दर 10-15 प्रतिशत होती है, वहीं दूसरी बार 2 प्रतिशत और तीसरी बार गर्भपात केवल 1 प्रतिशत ही मिलता है। जिंदल अस्पताल, मेरठ की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. अंशु जिंदल के अनुसार 35 साल से अधिक उम्र की महिलाओं को
गर्भपात के हाई रिस्क कैटेगरी में आती है। अंडो की क्वालिटी खराब होने से भ्रूण का हैल्दी विकास नहीं हो पाता। 2-3 बार पहले गर्भपात झेल चुकी और डायबिटीज, हाइपोथायरॉयड पीड़ित महिलाओं में भी गर्भपात होने की संभावना ज्यादा रहती है।
क्या है कारण और निवारण
गर्भपात ज्यादातर प्रेगनेंसी की पहली और दूसरी तिमाही में होते हैं। पहली में जेनेटिक या भ्रूण में खराबी से और दूसरी महिला के यूटरस में विकार या अन्य कारणों से होते हैं।
जेनेटिक भ्रूण विकार
गर्भपात के 80 प्रतिशत मामले भ्रूण में विकार के कारण होते हैं। भ्रूण महिला के अंडे और पुरुष स्पर्म में मौजूद 23-23 क्रोमोसोम के फर्टिलाइज होने पर बनता है। क्रोमोसोम में विकार होने पर भ्रूण में भी कोई न कोई जेनेटिक विकार आ जाता है। ऐसे विकृत भ्रूण विकसित नहीं हो पाता, प्रकृति खुदब-खुद यूटरस से बाहर फेंक देती है और गर्भपात हो जाता है। अगर मां का ब्लड ग्रुप आरएच नेगेटिव है और पिता का पॉजिटिव है तो यह भी जेनेटिक गर्भपात का कारण बनता है।
उपचार: दोनों पार्टनर या गर्भपात हुए भ्रूण का टिशू से कैरियोटाइप जेनेटिक क्रोमोसोम टेस्ट किया जाता है। मेडिकल साइंस में भ्रूण के जेनेटिक विकार का कोई उपचार नहीं है। प्रेगनेंसी के इच्छुक दंपति के लिए आईवीएफ तकनीक का सहारा लेना बेस्ट है।
यूटरस में जन्मजात विकृतियां

महिला के यूटरस में जन्मजात विकृतियां या म्यूलेरियन डक्ट डिफेक्ट्स भी गर्भपात का
कारण बनते हैं।
सेप्टेट यूटरस: यूटरस के बीच सेप्टम मेम्ब्रेन या झिल्ली होती है। भ्रूण इस पर चिपक जाता है। समुचित ब्लड सप्लाई न हो पाने के कारण विकसित नहीं हो पाता और गर्भपात हो जाता है।
उपचार: लेप्रोस्कोपी या दूरबीन ऑपरेशन से सेप्टम वॉल को काट दी जाती है।
टी-शेप यूटरस: इसमें यूटरस एक तरफ बना होता है, दूसरी तरफ की अविकसित होता है जो अतिरिक्त और अनुपयोगी उपांग होता है। इससे भ्रूण का विकास नहीं हो पाता।
उपचार: हिस्टेरोस्कोपी लेजर सर्जरी से ठीक किया जाता है।
सर्वाइकल इनकॉम्पिटेंस: यूटरस का मुंह यानी सर्विक्स कमजोर होता है और समय से पहले खुल जाता है, जिससे समय से पहले अपरिपक्व बच्चे के जन्म का खतरा रहता है या गर्भपात हो जाता है।
उपचार: दूसरी प्रेगनेंसी से पहले सर्विक्स को वजाइना से स्टिच कर बांध दिया जाता है। या फिर लेप्रोस्कोपिक इनसेरक्लेज या टोटल एब्डोमिनल सेरक्लेज किया जाता है, जिसमें सर्विक्स के ऊपरी भाग को स्टिच करके यूटरस का मुंह बंद कर दिया जाता है।
फ्रायब्रॉयड, एंडोमेट्रिओसिस या साइनिकी
चिपचिपापन: इनसे यूटरस के अंदरुनी परत मांसपेशियों में चली जाती है, यूटरस को
कमजोर कर देती है और गर्भपात हो जाता है।
उपचार: फ्रायब्रॉयड जैसे विकार लेप्रोस्कोपी सर्जरी से और साइनिकी को हिस्टेरोस्कोपी लेजर सर्जरी से ठीक किया जा सकता है।
पॉलिसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम:
महिलाओं में अंडा बनने की प्रक्रिया कमजोर हो जाती है, हार्मोन का लेवल गड़बड़ा जाता है और गर्भपात की संभावना दोगुनी हो जाती है। उपचार: प्रेगनेंसी की शुरुआत से ही हार्मोन थेरेपी दी जाती है
रक्त विकार: महिला के रक्त में एंटीफोस्फोलिपिड सिंड्रोम के कारण प्रोटीन की अधिकता से एंटीबॉडीज बन जाती हैं। रक्त में माइक्रोथोम्बस या छोटे-छोटे थक्के बन जाते हैं। ये यूटरस के प्लेसेंटा तक पहुंचकर भ्रूण में ब्लड सर्कुलेशन को ब्लॉक कर देते हैं जिससे गर्भपात हो जाता है।
उपचार: रक्त में एंटीबॉडीज के लेवल ज्यादा होने पर महिला को पूरी गर्भावस्था में ब्लड थिनर हैपरिन के इंजेक्शन लगाए जाते हैं और बेबी एस्पीरिन दी जाती है।
गर्भपात के बाद क्या रखे ध्यान
1. गर्भपात से बचने के लिए प्रेगनेंसी प्लान करने से पहले ही नहीं, शादी के पहले से कॉन्शियस होना जरूरी है। गर्भपात के बाद भी तकरीबन 85 प्रतिशत महिलाएं दुबारा कंसीव कर लेती हैं। शारीरिक-मानसिक रूप से मजबूत बनने और तनावमुक्त रहकर यथासंभव खुश रहने की कोशिश
करनी चाहिए।
2. लेट मैरिज और लेट फैमिली प्लानिंग अवायड करें।
3. शादी से पहले ही दोनों को ब्लड ग्रुप चैक करें।
4. गर्भपात के बाद कम-से-कम 24 घंटे आराम जरूर करें। कम-से-कम एक सप्ताह
ज्यादा मेहनत वाले काम न करें
5. इंफेक्शन से बचने के लिए ब्लीडिंग के लिए टैम्पूज का इस्तेमाल न करें।
6. फिजीकल रिलेशनशिप न बनाएं।
7. गर्भपात के बाद महिला को नॉर्मल पीरियड्स आने में 4-6 सप्ताह का समय लगता है। जब तक 2 बार नॉर्मल पीरियड्स न हो जाए या कम से कम 3 महीने दुबारा प्रेगनेंसी प्लान न करें ताकि बॉडी पूरी तरह रिकवर हो सके।
8. दुबारा कंसीव करने के लिए महिलाओं को डॉक्टर से कंसल्ट जरूर करें। अगली प्रेगनेंसी
से पहले गर्भपात के कारणों को खत्म करने की कोशिश करें।
9. अगर महिला का ब्लड ग्रुप नेगेटिव और पुरुष का पॉजीटिव है, तो एंटी-डी इंजेक्शन लगवाएं। ताकि शरीर में एंटीबॉडीज न बनें और प्रेगनेंसी में दुबारा दिक्कत न हो।
10. सेहत का पूरा ध्यान रखें। फोलिक एसिड, आयरन, प्रोटीन, विटामिन बी 12, डी, ई जैसे पौष्टिक तत्वों और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर आहार लें। डॉक्टर के परामर्श से जरूरी सुप्प्लिमेंट भी लें।
लिक्विड डाइट ज्यादा लें। दिन में कम-से- कम 2-3 लिटर पानी जरूर पिएं।
11. फिटनेस पर पूरा ध्यान दें। हल्का व्यायाम या वॉक जरूर करें। इससे बॉडी हार्मोन रेगुलेट
होंगे और दुबारा प्रेगनेंसी में दिक्कत आने की संभावना कम होगी।
अन्य कारण
1. देर से शादी या 35 साल से ज्यादा उम्र में मां बनने पर गर्भपात की आशंका 40-50 प्रतिशत बढ़ जाती है। इस स्टेज पर ओवरीज के हार्मोन और अंडा बनाने की क्षमता कम हो जाती है। सीरम
एएमएच लेवल से जांच की जाती है और उसी हिसाब से उपचार किया जाता है।
2. एंडोक्राइम ग्लैंड्स से रिलीज होने वाले हार्मोन शरीर और रिप्रोडक्टिव अंगों के फंक्शन को रेगुलेट करते हैं। कई गर्भवती महिलाओं में हार्मोन अंसतुलन की वजह बार-बार गर्भपात हो जाता है। ऐसे में गर्भवती महिलाओं को हार्मोन थेरेपी और इम्यून थेरेपी दी जाती है।
3. पुरुषों के सिमन में डीएनए फ्रेगमेंटेशन इंडेक्स 30-35 प्रतिशत से ज्यादा होना भी गर्भपात का कारण है। इससे पुरुषों के स्पर्म काउंट में कमी और स्पर्म की क्वालिटी भी प्रभावित होती है। निवारण के लिए उन्हें 3 महीने तक एंटीऑक्सीडेंट कैह्रश्वस्यूल का कोर्स कराया जाता है।
4. मोटापा, थायरॉयड, जेस्टेशनल डायबिटीज मलाइटस, पीसीओडी, ओबेसिटी जैसी क्रोनिक डिजीज जैसे कारण भी गर्भपात के खतरे को बढ़ा देते हैं। महिलाओं को गर्भाधान में दिक्कत आ सकती है, आगे जाकर गर्भपात हो सकता है।
5. अनहेल्दी लाइफ स्टाइल, अनहेल्दी फूड हैबिट्स बार-बार गर्भपात का बड़ा कारण है। एल्कोहल, तंबाकू, ड्रग्स, स्मोकिंग, चाय-कॉफी कैफीन का अधिक सेवन गर्भपात की दर बढ़ाती है। कंसीव करने से पहले फोलिक एसिड, विटामिन बी12 और विटामिन डी की कमी भी गर्भपात की आशंका बढ़ाती है।
