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बालमन की कहानियां
Balman Ki Kahaniyan

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

स्वर्णप्रस्थ के महाराज इन्द्रप्रताप सिंह जितने प्रजाप्रेमी एवं न्यायप्रिय थे, उतने आखेट एवं संगीत के भी शौकीन थे।

एक भी दिन ऐसा नहीं था कि इंद्रप्रताप सिंह बिना संगीत सुने या आखेट के चैन से रह पाए हों। मौसम परिवर्तन भी उनके इस शौक को रोक नहीं पाता था।

उसी राज्य के हरिपुर गाँव में गोपी नाम का एक सीधा-साधा युवक रहता था। गोपी अशिक्षित था, किंतु वीर व चरित्रवान था। वह काफी मधुर बांसुरी बजाया करता था।

गरीबी एवं बेरोजगारी का मारा गोपी गाँव में ही ठाकुर रणजीत के यहाँ गायों को चराने का काम किया करता था। बदले में जो भी मेहनताना मिलता, उससे सर्वप्रथम बूढ़ी बीमार माँ के लिए दवाई लाता, अपने लिए नई बांसुरी खरीदता और शेष से घर खर्च का सामान खरीदता।

रोज की तरह एक दिन गोपी नाश्ते की पोटली, बांसुरी व गायों को लेकर जंगल की तरफ चल दिया। गायों को चरने के लिए छोड़कर स्वयं एक वृक्ष पर चढ़कर बांसुरी बजाने लगा।

संयोगवश राजा इंद्रप्रताप भी आखेट के लिए उसी जंगल में पहुँचे हुए थे। वे एक खरगोश का पीछा करते हुए सैनिकों से बिछड़कर जंगल में दूर निकल गए। सैनिक राजा को इधर-उधर ढूंढ रहे थे। इधर जंगल में घोडे का पैर किसी पत्थर से टकराया। राजा धड़ाम से जमीन पर आ गिरे। घोड़ा घायलावस्था में जमीन पर अचेत हो गया। थोड़ी देर बाद राजा संभले और जंगल में सैनिकों को ढूंढने के लिए हाथों में तलवार थाम एक ओर चल दिए।

थोड़ी दूर चलने पर उन्हें बांसुरी की मधुर धुन सुनाई पड़ी। वे मंत्रमुग्ध हो उस ओर बढ़ चले। एक जगह पहुँचकर उन्होंने जब वृक्ष के ऊपर देखा, तो पाया कि एक युवक आंखें मूंदकर बांसुरी बजाने में तल्लीन है।

राजा उसे आवाज दे पाते, तभी पास की झाड़ी से निकलकर एक शेर ने उनपर हमला बोल दिया। खूखार आदमखोर के हमले से राजा घबरा गए। उनके हाथों से तलवार छूटकर नीचे गिर गई।

शोरगुल सुन गोपी का ध्यान भंग हो गया। उसने जब नीचे का दृश्य देखा, तो वह झट से नीचे कूद गया। राजा को शेर की पकड़ से बचाने के लिए वह निहत्था ही शेर पर टूट पड़ा और शेर को पकड़कर दूसरी ओर खींचने लगा। गोपी के हमले से गुस्साए शेर ने राजा को छोड़ गोपी को धर दबोचा। अब गोपी शेर की गिरफ्त में था। तब तक शेर की पकड़ से छूटे राजा ने जमीन पर गिरी अपनी तलवार उठाई और एक ही झटके से शेर की गर्दन को धड़ से अलग कर दिया। शेर वहीं ढेर हो गया। गोपी और राजा दोनों की जान बच गई।

गोपी राजा को नहीं पहचानता था। उसने पूछा-“बंधु तुम कौन हो? पोशाक से तो भले खानदान के मालूम पड़ते हो। अरे, तुम तो बहुत जख्मी हो गए हो… चलो मेरे घर चलो… वहीं मरहम-पट्टी कर दूंगा।”

राजा बिना कुछ बोले गोपी के साथ हो लिए। जब वे जंगल से बाहर निकले, तो आखिरी वृक्ष के पास ही सैनिकों से उनकी मुलाकात हो गई। राजा ने सैनिकों को सारी घटना बता दी और गोपी की प्रशंसा करते हुए बोले-“हे वीर योद्धा, तुम्हारा नाम क्या है? तुमने स्वर्णप्रस्थ के राजा इंद्रप्रताप सिंह की जान बचाई। मैं तुम्हारे शौर्य का कायल हो गया हूँ। मैं तुम्हें इसी वक्त अपना सेनापति नियुक्त करता हूँ।”

गोपी आश्चर्यचकित होकर राजा की ओर देखने लगा। फिर दोनों हाथ जोड़कर बोला-“क्षमा महाराज! आप हमारे सम्राट हैं। मैं अज्ञानतावश आपको पहचान ना सका। मुझे माफ कर दें महाराज। मेरा नाम गोपी है और मैं पास के गाँव हरिपुर का रहने वाला हूँ।”

राजा गोपी को अगले दिन दरबार में आने को कहकर वहां से राजमहल लौट गए। गोपी विस्मित हो उन्हें जाते हुए देखता रहा।

सेनापति बनने के बाद गोपी गोपालचंद कहलाने लगा। बीमार माँ इलाज के बाद स्वस्थ हो गई। सेनापति गोपालचंद की कमर में तलवार के साथ-साथ बांसुरी भी बंधी रहती थी, जिसे वह दरबार में खूब बजाया करता।

स्वर्णप्रस्थ के महाराज इन्द्रप्रताप सिंह जितने प्रजाप्रेमी एवं न्यायप्रिय थे, उतने आखेट एवं संगीत के भी शौकीन थे।

एक भी दिन ऐसा नहीं था कि इंद्रप्रताप सिंह बिना संगीत सुने या आखेट के चैन से रह पाए हों। मौसम परिवर्तन भी उनके इस शौक को रोक नहीं पाता था।

उसी राज्य के हरिपुर गाँव में गोपी नाम का एक सीधा-साधा युवक रहता था। गोपी अशिक्षित था, किंतु वीर व चरित्रवान था। वह काफी मधुर बांसुरी बजाया करता था।

गरीबी एवं बेरोजगारी का मारा गोपी गाँव में ही ठाकुर रणजीत के यहाँ गायों को चराने का काम किया करता था। बदले में जो भी मेहनताना मिलता, उससे सर्वप्रथम बूढ़ी बीमार माँ के लिए दवाई लाता, अपने लिए नई बांसुरी खरीदता और शेष से घर खर्च का सामान खरीदता।

रोज की तरह एक दिन गोपी नाश्ते की पोटली, बांसुरी व गायों को लेकर जंगल की तरफ चल दिया। गायों को चरने के लिए छोड़कर स्वयं एक वृक्ष पर चढ़कर बांसुरी बजाने लगा।

संयोगवश राजा इंद्रप्रताप भी आखेट के लिए उसी जंगल में पहुँचे हुए थे। वे एक खरगोश का पीछा करते हुए सैनिकों से बिछड़कर जंगल में दूर निकल गए। सैनिक राजा को इधर-उधर ढूंढ रहे थे। इधर जंगल में घोडे का पैर किसी पत्थर से टकराया। राजा धड़ाम से जमीन पर आ गिरे। घोड़ा घायलावस्था में जमीन पर अचेत हो गया। थोड़ी देर बाद राजा संभले और जंगल में सैनिकों को ढूंढने के लिए हाथों में तलवार थाम एक ओर चल दिए।

थोड़ी दूर चलने पर उन्हें बांसुरी की मधुर धुन सुनाई पड़ी। वे मंत्रमुग्ध हो उस ओर बढ़ चले। एक जगह पहुँचकर उन्होंने जब वृक्ष के ऊपर देखा, तो पाया कि एक युवक आंखें मूंदकर बांसुरी बजाने में तल्लीन है।

राजा उसे आवाज दे पाते, तभी पास की झाड़ी से निकलकर एक शेर ने उनपर हमला बोल दिया। खूखार आदमखोर के हमले से राजा घबरा गए। उनके हाथों से तलवार छूटकर नीचे गिर गई।

शोरगुल सुन गोपी का ध्यान भंग हो गया। उसने जब नीचे का दृश्य देखा, तो वह झट से नीचे कूद गया। राजा को शेर की पकड़ से बचाने के लिए वह निहत्था ही शेर पर टूट पड़ा और शेर को पकड़कर दूसरी ओर खींचने लगा। गोपी के हमले से गुस्साए शेर ने राजा को छोड़ गोपी को धर दबोचा। अब गोपी शेर की गिरफ्त में था। तब तक शेर की पकड़ से छूटे राजा ने जमीन पर गिरी अपनी तलवार उठाई और एक ही झटके से शेर की गर्दन को धड़ से अलग कर दिया। शेर वहीं ढेर हो गया। गोपी और राजा दोनों की जान बच गई।

गोपी राजा को नहीं पहचानता था। उसने पूछा-“बंधु तुम कौन हो? पोशाक से तो भले खानदान के मालूम पड़ते हो। अरे, तुम तो बहुत जख्मी हो गए हो… चलो मेरे घर चलो… वहीं मरहम-पट्टी कर दूंगा।”

राजा बिना कुछ बोले गोपी के साथ हो लिए। जब वे जंगल से बाहर निकले, तो आखिरी वृक्ष के पास ही सैनिकों से उनकी मुलाकात हो गई। राजा ने सैनिकों को सारी घटना बता दी और गोपी की प्रशंसा करते हुए बोले-“हे वीर योद्धा, तुम्हारा नाम क्या है? तुमने स्वर्णप्रस्थ के राजा इंद्रप्रताप सिंह की जान बचाई। मैं तुम्हारे शौर्य का कायल हो गया हूँ। मैं तुम्हें इसी वक्त अपना सेनापति नियुक्त करता हूँ।”

गोपी आश्चर्यचकित होकर राजा की ओर देखने लगा। फिर दोनों हाथ जोड़कर बोला-“क्षमा महाराज! आप हमारे सम्राट हैं। मैं अज्ञानतावश आपको पहचान ना सका। मुझे माफ कर दें महाराज। मेरा नाम गोपी है और मैं पास के गाँव हरिपुर का रहने वाला हूँ।”

राजा गोपी को अगले दिन दरबार में आने को कहकर वहां से राजमहल लौट गए। गोपी विस्मित हो उन्हें जाते हुए देखता रहा।

सेनापति बनने के बाद गोपी गोपालचंद कहलाने लगा। बीमार माँ इलाज के बाद स्वस्थ हो गई। सेनापति गोपालचंद की कमर में तलवार के साथ-साथ बांसुरी भी बंधी रहती थी, जिसे वह दरबार में खूब बजाया करता।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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