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गृहलक्ष्मी कहानियां

सूरज क्षितिज से मुलाकात के लिए चल पड़ा है। पवन भी उसके साथ है। पंछी की आवाजें कुछ मदधिम पड़ने लगी है। सांझ फैलने लगी है। बच्चे  मैदान में खेल रहे हैं। महिलाएं टोलियों में सैर कर रही हैं। इतनी सारी गतिविधियों के बीच बांसुरी की तान वातावरण में सुगंध की तरह तिर रही है। कोने वाले घर की खिड़की में बैठे वृद्ध महाशय की कंपायमान उंगुलियां बांसुरी पर स्वरलहरी छेड़ रही हैं।

खिड़की के सामने वाली राह से गुजरते राहगीर चंद सेकंड के लिए रुकते हैं। झुर्रीदार चेहरे, सफेद बाल वाले बुजुर्ग को देखते हैं। उनकी उंगलियों के कंपन होंठों पर गीत बनकर सहसा फूट पड़ते हैं। राहगीर गुनगुनाने लगते हैं… और बांसुरी बजाने वाला अपनी बांसुरी में मगन है।

सैर कर रही महिलाओं की टोलियां भी खिड़की के सामने कुछ धीरे हो जाती हैं। कुछ के सुर उठते हैं, कुछ मुस्कुराकर रह जाती हैं। पर बांसुरी एक अलग ही दुनिया में है। बच्चे भी खिड़की को देखते हैं। धीरे-धीरे खिड़की में रोशनी फैल जाती है। संगीत थमता है। पर्दा लग जाता है।

हल्की -सी स्वर लहरियां फिर वातावरण में ठुमकने लगी हैं। रोशनी झिर्रियों से निकल पड़ी हैं। पंक्षियों की चहचहाहट बांसुरी के साथ जुगलबंदी कर रही है। पर्दा हट गया वह बूढ़ा इंसान खिड़की पर आ बैठा है। आंखे बंद हैं, हाथ बांसुरी को थामे हैं। श्वास के साथ गीत बदल रहा है। सुबह स्कूल बस का इन्तजार करते बच्चे और माएं, अखबार पहुंचाते हॉकर्स, दूध के पैकेटों को लेकर इधर-उधर जाते साइकिल सवार, सैर को निकले बूढ़े-जवान, अधेड़ आदमी और औरतें, जो इर्द-गिर्द है सब बूढ़े इंसान को देख रहे हैं।

खिड़की के सामने वाले तार पर बैठी दयाल चिड़िया ने अपने शरीर को कसकर गीत शुरू किया है। वह वही गीत गा रही है जो उस वृद्ध की बांसुरी से निकल रहा है। दिन फैलने लगा है। सड़क पर कोलाहल बढ़ चला है। बांसुरी थम गई है। खिड़की पर पर्दा डल गया है।

………वातावरण में बस शोर ही शोर है। राहगीर रुक रहे हैं। बांसुरी और बूढ़ा इंसान अब नहीं हैं… पर सहसा होठों पर शब्द गीत बनकर उमड़ने लगे हैं। इर्द-गिर्द आते-जाते लोग अब वही गीत गा रहे हैं। 

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