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अनकही-गृहलक्ष्मी की कहानी
Ankahi-Grehlakshmi Story

अनकही-“देख आ गया ना!” एक घंटे के इंतजार के बाद समीर का मुस्कुराकर ये कहना भी इतना खूबसूरत था जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता।

“हाँ आ गये” कहकर हँस दिया। वक़्त थम सा गया था। मानो कानों में एक साथ कई पैंजनिया झंकृत हो उठीं हो।

“काश पहले आए होते!”

“पहले बुलाया होता”!

आँखों में कुछ नमी आ गई तो उसने कहा,”चल! कहीं बैठते हैं!”

आज फिर उसके साथ चल पड़ी। शरीर बिल्कुल हल्का लग रहा था। योगियों वाली मनःस्थिति थी। जहाँ तन वहीं मन था। कदमों से कदम मिलाते हम युनिवर्सिटी कैंपस की यादों में भटक गये थे। जब यूँ ही बेवजह घूमा करते थे। न शब्दों से और न ही हरकतों से कोई कह सकता था कि हम प्यार में थे। बस मन था कि सब समझता था उन अनकहियों को भी,जो कभी कही ही नहीं गईं थीं। कुछ बातें जो होठों पर नहीं आतीं पर दिल पर सीधे दस्तक देती हैं,कुछ ऐसी ही केमिस्ट्री थी हमारी।

“कहाँ खो गई?” समीर का हँसता चेहरा देखा तो बुरी तरह झेंप गई।

“कहीं नहीं…. बस यूँ हीं …!”

“पापाजी हमें यहीं लाया करते थे।”

हम रेस्टोरेंट के आगे खड़े थे। रेस्ट्रां मध्यम वर्गीय लोगों के लिए था। काफी भीड़ थी वहाँ। बनारस के राजश्री की याद आ गई। आमने-सामने बैठे थे। बातें अभी शुरू भी नहीं हुईं थीं कि बगल वाली टेबल पर एक पिता-पुत्र आकर बैठ गये।

क्या बोलती। कभी कभी मंजिल से खूबसूरत रास्ते ही होते हैं। बाहर कम से कम एक उम्मीद थी कि चंद लम्हों पर अपना भी हक होने वाला है। एक बार फिर से जुदा होने के पहले वह मुझमें खोने वाला है पर वास्तविकता तो यह थी कि खाना खाने के अलावा कोई उपाय नहीं था।

सार्वजनिक स्थान पर हर बात नहीं की जा सकती थी। जिन लम्हों के लिए इतना कुछ सोच रखा था वह अगले कुछ मिनटों में सिमटने वाले थे। एक कराह सी उठी अपनी बेबसी पर और आँखें बिन मौसम बरसात सी बरसने लगीं। उसने आँखों में देखा तो कुछ परेशान हुआ। शायद खुशी के क्षण में आँसू की बात समझ नहीं पाया।

स्त्री और पुरुष की सोच यहीं तो अलग होती है। यहीं मात खा जाता है उनका प्रेम। स्त्री अपने साथी के दर्द को जीती है। उसे समा लेती है खुद में,जैसे जन्मी ही हो अपने प्रिय के दर्द को वहन करने के लिए जबकि पुरूष बस उसे खुश देखना चाहता है। उसकी नजर में वह रेसकोर्स की वह मंजिल होती है जो उसकी प्रेरणा स्त्रोत है। जहाँ पहुँच कर वह विजयी महसूस करना चाहता है। साथी की खुशी में अपनी खुशी घोलने की उत्कंठा निगाहों में लिए उस ओर देखता है और वह भींगी आँखें उसे हारा हुआ सा महसूस कराती हैं तब तिलमिला उठता है। पुरुष हार बर्दाश्त नहीं कर सकता।

अच्छा हुआ कि इंतजार करते हुए एक काला चश्मा खरीद लिया था। समीर को मेरे आँसुओं में छिपे हुए अपने मोहब्बत के दर्द को देखना भारी लग रहा था और मुझे इन व्यक्तिगत क्षणों का यूँ जाया होना। कुछ देर की चुप्पी के बाद मैंने आँखों को आवरण दे दिया। कम से कम अब वह बातें कर सकेगा। जज्ब आँसुओं ने कंठ अवरुद्ध कर दिया तो वाशरूम जाने की बात कह कर उठी। अकेली खड़ी थी तो फिर पिछले दिनों की सैर पर निकल पड़ी।

“कसम खाओ कि सिर्फ पढ़ोगी और किसी तरह की दोस्ती में नहीं पड़ोगी।” पापा ने अपने सिर की कसम दी थी। जीवन दिया था और जीने का हक़ छीन लिया था। तभी तो जब समीर ने जुदा होते वक़्त पूछा कि आगे क्या करोगी तो हँसते हुए कहा था कि वही करूँगी जो सब करते हैं।

फिर उसके सवालों की झड़ी के जवाब में कह दिया कि

“मैं कोई एक्सट्रा ऑरडिनरी थोड़े ही हूँ।”

“तुम एक्सट्रा ऑरडिनरी हो! बस घर-गृहस्थी में उलझने के लिए नहीं बनी हो। मेरी मानो तो करियर पर ध्यान दो।”

पर नहीं! मुझमें ना तो वह गंभीरता थी और ना हीं वह समझ….खैर जिंदगी से कोई शिकायत नहीं.. सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा है। वाशरूम के बाहर लंबी लाइन थी तो वापस अपनी सीट पर आ बैठी। थोड़ी देर के लिए खुद पर नियंत्रण आ गया था।

“क्या खायेगी तू?”

“जो पहले खाती थी चिली चिकन विथ गार्लिक सॉस”

“और कुछ लेगी?”

“नहीं!”आँखों में देखती रही।

वह जरा भी नहीं बदला था। वैसे तो फेसबुक पर उसकी फैमिली फोटो में सबको देख चुकी थी फिर भी परिवार के बारे में पूछ लिया।

“शाहीन कैसी है? तुमने लव मैरिज की ना!”

“तू नहीं मिली ना!”

“मजाक छोड़ो….।”

“सीरियसली…..तुम्हारी झलक जहाँ मिली वहीं अटक गया।”

“इतना चाहते थे मुझे? पहले कहा क्यों नहीं?”

“रोका तो था और करियर बनाने के लिए भी कहा था पर नहीं! तुम्हारी वफादारी अपने परिवार के लिए कुछ ज्यादा ही थी।”

“हा हा….आर्थोडॉक्स फैमिली से हूँ ना!”

“और कुछ अपने बारे में बताओ।”

“मस्त है जिंदगी। तुम्हारे साथ होती तो पिज्जा पकाती। अभी पति व बच्चे के लिए चुड़ा-मटर बनाती हूँ।”

“तुम्हारी मीटिंग कैसी रही जिस सिलसिले में आना हुआ।”

“वो तो अभी चल ही रही है।”

दोनों को हँसी आ गई। यह हँसी वैसी ही निश्छल थी जैसी बीस साल के युवा की होती है।

“फिर मिलोगी?”

“हाँ! बीस की उम्र में मिले थे और अब तीस साल बाद मिलें हैं,प्रोग्रेशन एनालिसिस के हिसाब से चालीस साल बाद। शायद वही आखिरी मुलाक़ात होगी।”मैं मुस्कुराई।

“दुष्ट लड़की! हमेशा दिल जलाने वाली बातें करती है और हर बार वही जवाब कि क्या करूँ…।”

“….. आर्थोडॉक्स फैमिली से हूँ ना!”

मैंने रटा-रटाया जवाब दोहराया। प्यार करना, निभाना और उसे शादी तक पहुँचाना,सबके बस की बात नहीं होती। तभी तो हँसी-खुशी इस बात को स्वीकार कर लिया था कि समीर जैसे भले मानस की दोस्ती भी तो कुछ कम नहीं!

आज सुबह किसी साहित्यिक सम्मेलन में भाग लेने के लिए अहमदाबाद आई थी। मीटिंग तो एक बहाना था इसी बहाने अपने बीते लम्हों में जीना था। मन फिर से युवा हो चंचल हो रहा था तो उसे समेट कर खुद को सहज किया। वापसी की फ्लाइट में कुछ ही घंटे शेष रह गये थे। कैब आ गई थी। भावुक मन को संभालते हुए आगे बढ़ना भी जरूरी था।समीर के हाथों में मीठी सुपारी थी।

“खिलाओ मुझे!”

“ये खायेगी?”

“हाँ!”

“सस्ते में निपट गई!”वह हँसा।

“सस्ते में कहाँ,पूरी उम्र खर्ची है हमने!”

हौले से कहा और निकल गई। जो अबतक ना कहा था। वही अनकही बात सहसा बाहर आ गई। उससे दूर जाकर भी दूर जो ना जा सकी थी। पता था कि अब शायद कभी ना मिल सकूँ। मुड़कर देखा तो वह वहीं खड़ा मेरे बढ़ने का इंतज़ार कर रहा था। नज़रें हटाना मुश्किल था फिर भी हटा लिया। सच! ये जिंदगी भी ना बार-बार इम्तिहान लेती है। अपने हाल-ए-दिल पर किसी शायर की शायरी याद आ गई जो बचपन में पढ़ी थी।

ख्वाहिशों का क़ाफ़िला भी अजीब है…

कमबख्त वहीं से गुजरता है, जहाँ रास्ते नहीं होते!

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