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गृहलक्ष्मी की कहानियां

गृहलक्ष्मी की कहानियां: मां तुम कहां गई?
हां, मैं यहां किचन में हूं। क्या हुआ बेटा? शीला भागते हुए आई।
मां मेरी नौकरी पक्की हो गई है। शीला यह सुनकर फूली न समाई। वो अपने बेटे के लिए बहुत खुश थी ।पर मां मुझे बेंगलुरु जाना होगा। मुझे इसी हफ्ते ज्वाइन करना है। वहां जाकर फ्लैट लेते ही, मैं तुम्हें अपने साथ ले चलूंगा।
यह सुनकर शीला कुछ निराश हुई पर वह अपने बेटे के लिए बहुत खुश थीं। वह और उसका बेटा यही उनका संपूर्ण परिवार था। वह दोनों एक दूसरे के लिए जी रहे थे।
बनारस की गलियों में ही उसका जीवन व्यतीत हुआ। यहीं वह पली-बढ़ी और यही उसका विवाह हुआ। पड़ोस की मिश्राइन और शुक्लाइन उनकी प्रिय सखियां थीं। जो उसका सुख—दुख में साथ देती थीं।
कुछ ही दिनों बाद विशाल अपनी मां को अपने साथ ले जाने आया। भारी मन से अपनी सहेलियों से विदा लेकर वह बेंगलुरु चली गईं।
“सुना है यहां कोई किसी का हाल-चाल भी नहीं पूछता”, उदास मन से उसने विशाल से पूछा। मैं पूरा दिन कैसे बिताऊंगी? वहां शुक्लाइन और मिश्राइन भी तो नहीं होंगी।
“मैं हूं ना मां।” विशाल ने मुस्कुराते हुए कहा। शीला भी उसकी बात सुनकर मुस्कुराने लगी।
बिल्डिंग के नीचे खड़े होकर वह बिल्डिंग को निहार रही थी। इतनी ऊंची बिल्डिंग! वह मन ही मन सोच रही थी। “मां, चलो” विशाल की आवाज सुनकर वो थोड़ा सकपकाई।
”हां, हां चलो।”
वे अपने फ्लैट पर पहुंचे। शीला सोच रही थी कि अब मुझे इसकी आदत डालनी होगी। छोटे शहर से बड़े शहर का सफर इतना आसान नहीं होता। कुछ ही दिनों में उसे महसूस हो गया था कि सब यहां अनजान और अजनबी हैं। कोई किसी से कोई मतलब नहीं रखता।
अपने बेटे के ऑफिस जाने के बाद शीला सारे काम निपटाती। बहुत दिल चाहता तो अपनी सखियों से फोन मिला कर बात कर लेती।
पर वो कहीं ना कहीं थोड़ा उदास रहती थी। विशाल समझता था पर वह जानता था कि कुछ ही दिन में मां को आदत हो जाएगी । एक दिन शीला बाजार से कुछ सामान लेकर आ रही थी, तो उसकी मुलाकात प्रिया से हुई। उसका एक छोटा सा बच्चा भी था।
वह पहली महिला थी, जिसमें शीला से इस तरह अपनत्व से बात की थी। अब वह दोनों अकसर मिलतीं। कभी-कभी प्रिया जब पार्क में अपने बच्चे को ले जाती तो शीला भी साथ जातीं। दोनों घंटो बातें करते।
शीला खुश रहने लगी थीं। उसे नयी सहेली जो मिल गई थी। पर ना जाने क्यों कभी-कभी शीला को एहसास होता था कि बिल्डिंग की औरतें उसे न जाने क्यों अजीब नजरों से देखती थीं।
आपस में कुछ खुसर-फुसुर बातें भी करती थीं, पर उसने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। यह शहर उसके लिए अनजान था और यहां के लोग भी। कुछ खास था तो उसकी नई सहेली प्रिया! एक दिन शीला ने उसे अपने घर भी बुला कर चाय पिलाई। प्रिया 134 नंबर फ्लैट में रहती थी और उसके पति इंजीनियर है। बातों ही बातों में उसने शीला को बताया। कुछ देर बैठ वह अपने घर चली गई।
शीला, विशाल से प्रिया के बारे में बहुत सी बातें करतीं। बातों ही बातों में विशाल ने कहां “अरे मां!कभी मुझे भी मिलवाओ अपनी सहेली से”। ”हां, हां क्यों नहीं?”

इतना कहकर वह फोन की ओर लपकी और फोन पर प्रिया को रात के खाने का न्योता दे दिया। शीला खाना बनाकर मेज पर सजाकर प्रिया का इंतजार कर रही थी। पर बहुत देर हुई वह नहीं आई।
विशाल बोला, “मां चलो हम खाना खा लेते हैं, शायद उसे कोई जरूरी काम रहा हो।” पर उसे बताना तो चाहिए था, इसी उधेड़बुन में थी शीला। दोनों खाना खाकर सोने चले गए। शीला करवटें बदलती रही और प्रिया के बारे में सोचती रही। ना जाने क्या परेशानी रही होगी ? क्यों नहीं आई ?
शीला ने अगले दिन उसके घर जाने की सोची। बेटे के ऑफिस जाने के बाद वो उसके फ्लैट पर पहुंची। पर वहां बड़ा सा ताला लगा हुआ था।
वह निराश होकर वापस आ गई । अभी वह दरवाजा खोलकर अंदर पहुंची ही थी कि फोन की घंटी बजी। उसमें दबे मन से फोन उठाया पर यह प्रिया की आवाज थी। प्रिया की आवाज सुनते ही उसने कई सवाल एक साथ दागे। अरे! कहां थी तुम कल ?क्यों नहीं आई?
हम तुम्हारा इंतजार कर रहे थे।
“अरे मेरे बच्चे की तबीयत खराब थी, मै उसे डॉक्टर को दिखाने ले गई थी, अभी वापस आई हूं।” प्रिया ने कहा। ”अच्छा! तो अब कैसी है तबीयत बच्चे की? मैं तुम्हारे घर गई थी वहां ताला लगा हुआ था।” शीला बोली “हां, मैं बस अभी आई हूं डॉक्टर के यहां से। “
अच्छा चलो फिर बाद में मिलते हैं।” प्रिया ने कहा।
शाम को शीला ने विशाल को पूरी बात बताई। विशाल बोला,”मां हमें उसके बच्चे को देखने जाना चाहिए।” शीला बोली, “हां हां कल हम जरूर चलेंगे।”
पर वह दोनों जब उसके फ्लैट पर पहुंचे तो वहां ताला लगा हुआ था।
दोनों को बहुत अजीब लगा। दोनों वापस आ गए। उसके बाद बहुत दिनों तक प्रिया दिखाई नहीं दी। एक दिन बाजार जाते वक्त उसने प्रिया के बारे में वॉचमैन से पूछने का मन बनाया।
“अरे ! वॉचमैन भइया सुनिए जरा।”
जी मेम साहब !
अरे वह जो फ्लैट नंबर 134 की प्रिया है ना वह कहीं गई है क्या?
दिखाई नहीं दी।
वॉचमैन यह सुनकर कुछ चौंक सा गया।
यह क्या कह रही हैं, आप मेम साहब ?
प्रिया मेम साहब ?
हां, हां वही प्रिया जिसका एक छोटा सा बच्चा है ।
तभी विशाल भी वहां आ पहुंचा।
क्या हुआ मां ?
“कुछ नहीं। बस वॉचमैन से मैं प्रिया के बारे में पूछ रही थी।” शीला ने जवाब दिया।
अच्छा तो अब कैसा है उनका बच्चा? उसकी तबीयत ठीक तो है?
क्या साहब मजाक क्यों करते हो ? उन्हें मरे तो 2 साल हो गए। उनका बच्चा उनके फ्लैट की खिड़की से गिरकर मर गया था, जिसकी वजह से वह भी उसी खिड़की से कूद के मर गई और आज भी उस फ्लैट में ताला लगा रहता है। वह फ्लैट कोई नहीं लेता। लोग कहते हैं आज भी वह किसी- किसी को दिखाई देती है। पर यह सब बेकार की बातें हैं ,अफवाह है। आप क्यों पूछ रहे थे उनके बारे में?
शीला और विशाल एक दूसरे को आश्चर्य से देखने लगे शीला को अब यह एहसास हुआ कि वह औरतें उसे क्यों अजीब निगाहों से देखती थीं।

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