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बालमन की कहानियां
Aasman Par- Naam Balman ki Kahaniyam

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

एक गाँव में एक बूढी औरत रहती थी। रेल दुर्घटना में वह अपने पति और इकलौते बहू-बेटे को खो चुकी थी। उसके जीने का एकमात्र सहारा उसकी सात वर्षीया पोती सलोनी ही रह गई थी। वह बड़ी जतन से सलोनी का पालन-पोषण कर रही थी। पूजा-पाठ और धर्म-कर्म में उनकी गहरी आस्था थी। सलोनी को भी वह धार्मिक और नैतिक कहानियाँ और गीत सुना-सुनाकर अच्छी-अच्छी बातें सिखातीं। रोज समय से स्कूल भेजतीं। सलोनी भी चाव से सुनती और दादी की हर बात पर गौर करती।

काफी होशियार होने लगी थी सलोनी।

एक दिन की बात है, दादी पूजा के लिए बेलपत्र पर राम नाम लिखने में मगन थीं। तभी सलोनी आकर उसके कंधे से झूल गयी। दादी को अपने काम में व्यवधान पड़ता मालूम हुआ, तो दादी मनुहार करने लगीं-“अरे…रे! मेरी प्यारी परी रुक भी जा। बस थोड़ा ही बचा है। लिख लेने दे फिर साथ-साथ खेलेंगे… हाँ।”

“ठीक है दादी। मैं यहाँ पर बैठ कर देखू?” सलोनी ने मासूमियत से पूछा।

“हाँ, हाँ बैठ जा। लेकिन कोई शरारत नहीं।” दादी ने हिदायत दी।

“ठीक है दादी।”

वह वहीं दादी के पास जमीन पर बैठकर बेलपत्र को गौर से देखने लगी।

“अच्छा दादी! एक बात पूछू?” आँखें मटकाती हुई सलोनी ने पूछा।

“हाँ! मेरी अम्मा पूछ।”

“आपको याद है, एक दिन मैंने आपसे कहा था कि मेरी किताब से पढ़कर एक कविता सुना दो।” सलोनी दादी का मुंह देखती हुई बोली।

“हाँ… हाँ! याद है ना। अच्छे से याद है। मैंने वह पढ़कर नहीं सुनाई। लेकिन एक दूसरी कहानी जरुर सुनाई थी।” दादी मुस्कुराती हुई बोली।

“आप मुस्कुरा रही हैं। जबकि आज आपका झूठ पकड़ा गया है।” सलोनी ने तपाक से कहा।

“झूठ! कैसा झूठ? कब झूठ बोला मैंने?” दादी आश्चर्य से बोली।

“तब आपने कहा था कि आपको पढ़ना-लिखना नहीं आता है। लेकिन आप तो लिखना जानती हैं। बेलपत्र पर इतना लिख दिया आपने। पढ़ना भी तो जानती ही होंगी, पर मुझसे झूठ बोला आपने।” सलोनी मुँह फुलाती हुई कनखियों से कभी दादी को तो कभी बेलपत्र को देखने लगी।

“ओह… हो! मेरी लाड़ो। हो गया मेरा लिखा हुआ। चल अब समझाती हूँ।” पोती का माथा चूमती हुए दादी उसे लेकर आँगन में लगी खाट पर बैठकर समझाने लगीं-

“मेरी प्यारी बच्ची! मैंने तुमसे झूठ नहीं कहा। सचमुच मैं तेरी किताबें, कोई चिट्ठी-पत्री या और भी कुछ नहीं पढ़-लिख सकती।”

“तो क्या आप स्कूल नहीं जाती थीं, जो पढ़ना नहीं आता?” पोती ने उत्सुकता से पूछा।

“नहीं, कभी नहीं।” दादी उदास हो गईं।

“अच्छा, दादा जी ने कभी आपको डांटकर स्कूल नहीं भेजा?” नन्हीं सलोनी का कौतुक मन सबकुछ जान लेना चाहता था।

“धत् पगली! पढ़ने-लिखने की उम्र में तो मैं अपने बाबूजी के घर थी। यहाँ तो तुम्हारे दादाजी से ब्याह के बाद आई ना!” दादी झेंपती हुई बोलीं।

“अच्छा अच्छा! तो आपके बाबूजी ने आपको स्कूल क्यों नहीं भेजा?” सलोनी गाल पर उंगली रखकर सिर हिलाती हुई बोली।

“पहले लड़कियों को स्कूल तो दूर, घर से बाहर भी निकलने नहीं दिया जाता था। अम्मा ने एक बार कहा भी था स्कूल जाने के लिए। लेकिन बाबूजी ने डपटकर कहा- बेटी जात पढ़-लिखकर क्या करेगी। राम-नाम भर लिखना सीख जाए, काफी है। बस फिर कभी स्कूल का नाम नहीं लिया किसी ने। घर के अंदर ही राम-नाम लिखने भर पढ़ लिया मैंने।” दादी ने समझाया।

“ओह दादी! ये तो बहुत गलत बात है। आजकल तो लड़कियाँ खूब पढ़ती हैं… जितना मन हो उतना। देखना दादी मैं भी पढूंगी… खूब पढूंगी।” सलोनी दादी से लिपट गई।

“हाँ, मेरी लाड़ो! तुम खूब पढ़ना। मैं तो बेलपत्र पर राम-नाम लिखती हूँ। तुम पढ़-लिखकर आसमान पर अपना नाम लिखना।”

और, पोती को बाँहों में समेटती हुई दादी उससे लाड़ जताते लगीं।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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