और पूरा पढ़ लेना मुन्नो इस मुए कोरोना ने तो सच मानो लाकडाउन लगवा कर ऐसा काम किया है, कि हम औरतों की हर तरफ से मिट्टी खराब हो रही है ।एक बात बताऊं जब यह लाक डाउन का फरमान आया था, तो मन में खूब लड्डू फूटे थे ,कि अब रोज-रोज की, सुबह उठकर क्या नाश्ता बनाना है ,जल्दी से साहब को लंच बना कर देना है ,बच्चों को तैयार कर स्कूल भेजना है ,वगैरा-वगैरा का झंझट खत्म, लेकिन वो कहते हैं ना कि अगर सब सोचा हो जाए तो कहना ही क्या ।अरे हर बात उल्टी हो गई ।अब दिन भर इधर तो ,साहब घर में ,उधर बच्चे ।ना कोई आने वाला न जाने वाला ।
तो सबका टारगेट मैं। साहब तो वर्क टू होम के नाम पर लैपटॉप और मोबाइल से चिपके रहते हैं और बच्चे उन्हें मोबाइल पर गेम खेलने से फुर्सत ही नहीं ,ऊपर से हर घंटे बाद सबकी कोई ना कोई फरमाइश। चाय ,कॉफी ,कोल्ड ड्रिंक्स तक तो गनीमत है ,लेकिन अब बाहर से तो कुछ आना नहीं ,तो,” सुनो जी आज कुछ चटपटा बना दो ” ,”मम्मी पिज्जा- बर्गर जैसा कुछ चाहिए” ,जैसे फरमाइशी सेंटेंस दिन भर कान खाते रहते हैं। अब सोचती हूं मुन्नों तो आठ -आठ आंसू रोने को मन करता है ।सच्ची मुन्नो वह भी क्या दिन थे ,जब इनके ऑफिस और बच्चों के स्कूल जाने के बाद सारा मौसम ही बदल जाता था ।कभी सोसाइटी में किटी पार्टी ,तो कभी बर्थडे, मैरिज एनिवर्सरी वगैरा-वगैरा की गैदरिंग और कुछ नहीं तो सेटरडे,- संडे को माल ही चले गए ।
परसों मैसेज बॉक्स में “सुरेश चंद दिनेश चंद का साड़ी सेल 60% डिसकाउन्ट”, का मैसेज पढ़कर आंते -पीतें ही सुलग गईं। मन तो हुआ कि तुरंत फोन करके 50 गाली सुनाऊं। अरे जब कहीं आना जाना ही नहीं है ,तो पचास परसेंट आफ हो या नब्बे परसेंट ,साड़ी लेकर करूंगी क्या ,किसे दिखाऊंगी ।लॉकडाउन से पहले वाले दिन होते ,तो कुछ और बात थी ,लेकिन अभी तो पिछली दिवाली पर खरीदी और गिफ्ट में आई साड़ियां और सूट वैसे के वैसे ही पड़े हैं। कल यह कह रहे थे ,कि क्या बात है ,दिन भर मैक्सी में ही घूमती रहती हो ,तो मन हुआ कि पचास सुनाऊं
। अब सुबह से इनके और बच्चों के चक्कर में जो चकरघिन्नी बनती हूं ,तो दो ढाई बजे ही बाथरूम में घुसने का मौका मिलता है ।अब तुम्ही बताओ ,सुबह से तैयार होकर कैसे बैठ जाऊं और बाथरूम से आने के बाद सिवा लंच लेकर दो घड़ी कमर सीधी करने के ,कुछ भी नहीं सूझता और चार बजते- बजते ही फिर वही फरमाइशों का दोैर शुरू हो जाता है जो रात के दस बजे के बाद भी खत्म नहीं हो पाता , ऐसे में सिंगार -पटा क्या याद आएगा। कपड़े भी वही दो -चार जोड़ी बदल -बदल कर पहने जा रहे हैं ।अब तुम ही सोचो मुन्नो न कामवाली बाई ,ना कपड़े धोने वाली, यानी सारे घर का लिया -दिया सब आपके सर ,ऊपर से अभी पिछले हफ्ते ,वाशिंग मशीन खराब हो गई ,यानी सारे घर की लादी भी अब आपको ही धोनी है ।अब तो मुन्नो दिन रात यही मनाती रहती हूं कि कब यह लाक डाउन खत्म हो और कब वह पुराने दिन लौट कर आएं और रही इनकी बात तो एक शेर याद आ रहा है ,कि “वह दिन हवा हुए जब पसीना गुलाब था
अब इत्र भी मलो तो मोहब्बत की बू नहीं “
बस मुन्नो दिल की कहनी थी सो कह दी पढ़कर एक फोन जरूर मुझे कर लेना
जानती हूं कि तुम्हारे लिए यह लॉकडाउन तो भगवान की कृपा बनकर आया है ,क्योंकि तुम्हारे यहां तो सिवा तुम्हारे साहब और छोटे भाई के कोई है ही नहीं, तो खूब मजे कर रही होगी ।लेकिन अपनी इस दुखियारी बहन को भी एक आध फोन तो कर लिया करो
बस
तुम्हारी दुखियारी बहन
