भाई कुछ भी कहिए, एक बात तो माननी ही पड़ेगी, इस कोरोना नाम के छोटे से वायरस ने ढेर सारे कमाल के काम किए हैं। अब इतने हजार संक्रमित हुए, इतनों की जांच हुई, इतने ठीक हो गए, मास्क, 2 गज की दूरी, सोशल डिस्टेंसिंग, साफ-सफाई वगैरा-वगैरा के आंकड़ों की बात के अलावा, पिछले छह महीनों में कोरोना ने कितने अच्छे- अच्छों को सीधा कर दिया, इसके आंकड़े  अभी आना बाकी हैं। सुनते थे कि कुत्ते की दुम 12 साल में भी सीधी नहीं होती लेकिन यहां तो बड़े-बड़े तीस मार खा 6 महीनों में सीधे हो गये। 

याद कीजिए, इसी साल जनवरी फरवरी तक का समय, घर की मालकिन का कहते-कहते भले ही गला सूख जाए, लेकिन मजाल है कि मालिक साहब घर के काम में जरा भी हाथ बटा लें। सुबह आराम से उठना, चाय, अखबार, नाश्ता और फटाफट ऑफिस। अब अगर उस बीच में घर की मालकिन ने किसी काम के लिए कह दिया तो, दिन भर ऑफिस में कितना काम करता हूं तुम्हें मालूम है, का फतवा उसे चुप करा देता था।

घर के काम में हाथ बटाना तो दूर की बात, बहुत सारे वह काम जो कायदे से मालिक साहब के हिस्से के होते थे, मसलन टीचर पेरेंट्स मीटिंग, फीस या बिल जमा करना, माता-पिता या बच्चों को डॉक्टर को दिखाना, वगैरा-वगैरा, मुझे तो छुट्टी मिलेगी नहीं तुम ही चली जाना प्लीज के ऑर्डर के साथ महिलाओं पर ही थोप दिए जाते थे।

लेकिन इस छोटे से कोरोना ने सारी बाजी ही उलट दी। अब तो हमारे साहब लोग वह सारे काम कर रहे हैं जो कभी केवल महिलाओं के लिए रिजर्व समझे जाते थे। घर की साफ-सफाई से लेकर किचन तक मेम साहब का हाथ बटा रहे हैं। सुनते हैं कि किसी जमाने में हमारे देश में यत्र नारी पूज्यंते… का बोलबाला था। कहीं यह भी पढ़ा है कि वैदिक काल में नारियों को अत्यंत गरिमा पूर्ण स्थान प्राप्त था। वेद उन्हें घर की साम्राज्ञी कहते थे। देश की शासक और पृथ्वी की साम्राज्ञी तक बनने का अधिकार देते थे। वेदों में स्त्री यज्ञ के समान पूज्यनीय मानी गई। अपाला, घोषा, सरस्वती, सरपराग्यी, सूर्या, सावित्री, अदिति, दाक्षायनी, लोपामुद्रा, विश्ववारा, आत्रेयी आदि ने मंत्रों की रचना की।

अथर्ववेद में सुना है कि यह भी लिखा है कि माता-पिता अपनी कन्या को, पति के घर जाते समय बुद्धिमत्ता और विद्या बल का उपहार देते थे और उसे ज्ञान का दहेज देते थे। यजुर्वेद में भी ऐसे अनेक मंत्र हैं, जो स्त्रियों को पुरुषों से भी ऊंचा स्थान देते हैं। यह भी सुना है, कि वैदिक काल में ग्रह कार्यों से लेकर कृषि प्रशासन और यज्ञ कार्य से लेकर अध्यात्म साधना तक, कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं था, जहां नारियों को पुरुषों के समान स्थान न प्राप्त हो।

शतपथ ब्राह्मïण में तो स्त्रियों के द्वारा सामगान करने की परंपरा का भी उल्लेख है। यह भी सुना है कि पिछले दिनों जब हरियाणा के हिसार जिले में खुदाई हुई तो तमाम सारे हड़प्पा कालीन अवशेष मिले थे और उनसे यह नतीजा निकाला गया कि 5000 वर्ष पहले महिलाओं को पुरुषों से भी ऊंचा स्थान प्राप्त था। महिलाओं को पुरुषों की तुलना में शवदाह के समय ज्यादा जमीन उपलब्ध कराई जाती थी और उनके बर्तन, गहने भी उनके साथ ही रख दिए जाते थे।

लेकिन साहब वेद पुराणों की बातें तो कहानियां ही मानी जाती हैं, अब पुरुष घर का काम करें, यह बात जरा हमारी दादी नानियों से कहकर देखें, ऐसे मुंह सिकोड़ेंगी मानो कितना बड़ा पाप करने के लिए कहा जा रहा है।

और हमारी परदादी परनानियां, वह तो सपने में भी ऐसा नहीं सोच सकती थीं, उन्हें तो सात पर्दे में रहना और शिक्षा भी उतनी कि रामायण या चिठ्ठी  पढ़ लें, यही बहुत था। और उनके लिए पति तो तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा, तुम्हीं देवता हो, वाला देवता था।

आजादी के बाद कुछ दबंग किस्म की स्त्रियों ने नारी मुक्ति आंदोलन का हो हल्ला मचाया था, लेकिन क्या हुआ। माना कि दस-पांच परसेंट मर्द काबू में आ गए, लेकिन बाकी ढाक के वही तीन पात। अब अगर इस कोरोना जैसा  ही कोई नारी हमदर्द, तब आ गया होता, तो हमारी मां-चाचियों के भी दिन फिर गए होते।

बहरहाल इन छ: महीनों में एक तो वर्क टू होम के नए सिस्टम ने हमारे साहब बहादुरों की सारी कलई खोलकर रख दी कि वास्तव में ऑफिस में कितना काम होता था और कितनी फालतूगिरी। दूसरे जब 24 घंटे घर में रहना है तो घरवाली की जी हुजूरी किए बिना भला कब तक काम चलेगा। फोन पर भी कितना चिपके रहें।

चेंज भी तो चाहिए। हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे तो लड़के बच्चे भी निगाहें टेढ़ी कर लेंगे। इधर घर की मालकिन को भी मौका मिल गया। तो छह महीनों में कायापलट तो हो ही गई। अब जरूरी यह है कि इस आदत को बरकरार रखा जाए। वैसे भी यह  कोरोना नाम का भूत, इतनी जल्दी विदा लेता नहीं दिखता, तो घरवाली से बना कर चलना है, यह पाठ तो याद रखना ही पड़ेगा।

इस पाठ का एक ही मतलब है, कि बांट लीजिए, घर के वह काम जो आप आनंद के साथ आसानी से कर सकते हैं। उन्हें अपनी दैनिक और साप्ताहिक दिनचर्या में शामिल कर लीजिए और यह सब बिना किसी प्रेशर के महसूस करेंगे तो जिंदगी आसान हो जाएगी। ऐसा ना हो कि इधर कोरोना ने विदा ली और उधर आप पुराने ढर्रे पर आ गए, वरना अभी कोरोना के बाद कोई और वायरस नहीं आएगा, इसकी कोई गारंटी नहीं। 

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