एक मकान मालिक के दस-बारह किरायेदार जिन्हें दूर के सार्वजनिक नल से पानी भरना पड़ता था। एक दिन इन किरायेदारों को भनक लगी कि मकान मालिक अगले महीने से मकान किराये में बढ़ोतरी करने वाला है। फिर क्या था, सभी ने निर्णय लिया कि यदि मकान मालिक किराया बढ़ाता है तो मोहल्ले के अंदर नल लगवाने की शर्त रखेंगे। इस पर बिना किसी ना नुकर के मकान मालिक नल लगवाने के लिए राजी हो गया। बढ़ा हुआ किराया जो उसे मिलने वाला था।
लेकिन नल की स्थापना कहां करें, इसे लेकर सभी किरायेदार अपनी-अपनी राय दे रहे थे। यह भी ध्यान रख रहे थे कि नल उनके घर के सामने ही लग जाए। उधर मकान मालिक की नजर इस पर थी कि नल के लिए पाइप लाइन कम से कम लगे ताकि कम खर्च आए। जैसे-तैसे नल के स्थापना का स्थान निश्चित हो गया और एक दिन नगर-निगम के कर्मचारी नल लगा कर चले गए।
शाम के समय जब नल से पानी आने वाला था, उस समय मोहल्ले के सभी लोग इकट्ठा हो गए। नल का उद्घाटन करने के लिए नारियल और मिठाई लाकर पूजा करने का प्रस्ताव रखा गया। इस प्रस्ताव को सहमति तो सब ने दे दी पर किसा का हाथ जेब तक नहीं गया। आखिरकार एक महिला ने साहस का परिचय दिया जिस पर सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ। परंतु इसका राज भी जल्द ही पता चल गया।
उस महिला की बेटी की शादी अभी हाल ही में संपन्न हुई थी। शादी में बचे नारियल और मिठाई वह घर से ले आई। नल से पानी आने में विलंब हो गया तो लोग कहने लगे इतने सारे अपरिचित लोगों को देख कर नल भी नई दुल्हन की तरह शरमा रहा है। जब नल से पानी आने लगा तो उसकी पूजा की गई, नारियल फोड़ा गया तथा प्रसाद वितरण किया गया। इस तरह मोहल्ले के इस इकलौते नल का उद्घाटन धूमधाम से हो गया।
जिस मकान के एकदम सामने नल लगा था, उन्हें लोग कह रहे थे आप मजे में रहे, आपके मकान के सामने ही नल लगा है। लेकिन अगली सुबह ही उस परिवार को समझ आ गया कि वह किस मुसीबत में पड़ गए हैं, क्योंकि सुबह चार बजे से ही नल पर पानी भरने के लिए लोग नंबर लगाने लगे। बाल्टियों और बर्तनों की आवाज के साथ महिलाओं के संवाद सुबह से ही कानों पर पडऩे लगे।
नल को लगे दो माह हो गए, पर उसे इस बीच कभी बंद नहीं किया गया। जब तक नगर-निगम वाले पानी की सप्लाई देते, तब तक नल पर पानी भरा जाता। नल की टोटी इतनी जाम हो गई कि बंद ही नहीं होती। लगता है उसे भी खुले रहने की आदत लग गई थी।
नल चौबीस घंटे बाल्टियों से घिरा रहता। जब कभी नल पर लड़ाई-झगड़े होते तो उसे भी नहीं बख्शा जाता, उसे भी इसका शिकार होना पड़ता था। वह बेचारा कर भी क्या सकता है। लोगों की सेवा में लगा वह सोच रहा है कि बस गर्मियों के दिनों में ही उसे परेशानी ज्यादा है, बाद में शायद कुछ आराम मिल जाएगा। देखें बेचारे नल के साथ आगे क्या होता है।
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