आज मेरी बेटी को नौकरी का कॉल लेटर मिला। हमारी तो खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा। इससे पहले घर वाले उसके प्रतियोगिता परीक्षा में बैठने पर हम पति-पत्नी पर चिल्ला रहे थे कि अपनी हैसियत की पढ़ाई कराओ।

हमारा स्तर अपने परिवार में सबसे नीचा था। बाकी मेरे देवर व जेठ सब इंजीनियर थे। मेरे पति प्राइवेट फर्म में मामूली पद पर थे। पर जब प्रतियोगिता परीक्षा मेरी बेटी ने अच्छे अंकों से उत्तीर्ण कर ली और छात्रवृत्ति भी प्राप्त कर ली, तो एक बार में सबके मुंह बंद हो गए। पर मेरे जेठ तब भी टांग अड़ाते रहे कि कुछ फीस कम होने से सारी फीस तो माफ नहीं हो गई।

साल में बेटी की फीस के 3000 रुपये जाने थे। हमने फैसला किया कि अगर 10 रुपये रोज भी जमा किए जाएं तो हम उसकी फीस जमा कर सकते हैं। हमने किसी की नहीं सुनी और उसका दाखिला इंजीनियरिंग कॉलेज में करवा दिया।

आज जब उसकी नौकरी लग गई वो भी बहुत अच्छी, तो किसी से कुछ कहते नहीं बन रहा है। कहते हैं कि अगर ठान लो तो कुछ भी मुश्किल नहीं है। आज ऐसा लग रहा है कि जैसे बेटी के साथ हमारे जेठ के स्वभाव में भी एकाएक कितना बदलाव आ गया है। इतने साल बाद आज लग रहा है कि हम भी इस घर के सदस्य हैं।

सच है कि बच्चों की प्रगति से भी इज्जत बढ़ती है। मेरी कहानी से प्रेरणा लें और किसी भी बड़े काम को करने में हिम्मत न हारें और अपने बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा देने में कोई कोताही न बरतें।

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